एक नन्ही परी ( कन्या भ्रुण हत्या पर आधारित मार्मिक कहानी )

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विनीता सहाय गौर से कटघरे मे खड़े राम नरेश को देख रही थीं। पर उन्हे याद नहीं आ रहा था, इसे कहा देखा है? साफ रंग, बाल खिचड़ी और भोले चेहरे पर उम्र की थकान थी। साथ ही चेहरे पर उदासी की लकीरे थीं।वह कटघरे मे अपराधी की हैसियत से खड़ा था।वह आत्मविश्वासविहीन था।

लग रहा था जैसे उसे दुनिया से कोई मतलब ही नहीं था। वह जैसे अपना बचाव करना ही नहीं चाहता था।कंधे झुके थे।शरीर कमजोर था। वह एक गरीब और निरीह व्यक्ति था। लगता था जैसे बिना सुने और समझे हर गुनाह कबूल कर रहा था। ऐसा अपराधी तो उन्होंने आज तक नहीं देखा था। उसकी पथराई आखों मे अजीब सा सूनापन था, जैसे वे निर्जीव हों।

लगता था वह जानबूझ कर मौत की ओर कदम बढ़ा रहा था। जज़ साहिबा को लग रहा था- यह इंसान इतना निरीह है। यह किसी का कातिल नहीं हो सकता है।क्या इसे किसी ने झूठे केस मे फँसा दिया है? या पैसों के लालच मे झूठी गवाही दे रहा है?नीचे के कोर्ट से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।
विनीता सहाय ने जज़ बनने के समय मन ही मन निर्णय किया था कि कभी किसी निर्दोष और लाचार को सज़ा नहीं होने देंगी। झूठी गवाही से उन्हे सख़्त नफरत थी। अगर राम नरेश का व्यवहार ऐसा न होता तो शायद जज़ विनीता सहाय ने उसपर ध्यान भी न दिया होता।

दिन भर मे न-जाने कितने केस निपटाने होते है। ढेरों जजों, अपराधियों, गवाहों और वकीलों के भीड़ मे उनका समय कटता था। पर ऐसा दयनीय कातिल नहीं देखा था। कातिलों की आखों मे दिखनेवाला गिल्ट या आक्रोश कुछ भी तो नज़र नहीं आ रहा था। विनीता सहाय अतीत को टटोलने लगी। आखिर कौन है यह?कुछ याद नहीं आ रहा था।
विनीता सहाय शहर की जानी-मानी सम्माननीय हस्ती थीं।

गोरा रंग, छोटी पर सुडौल नासिका, ऊँचा कद, बड़ी-बड़ी आखेँ और आत्मविश्वास से भरे व्यक्तित्व वाली विनीता सहाय अपने सही और निर्भीक फैसलो के लिए जानी जाती थीं। उम्र के साथ सफ़ेद होते बालों ने उन्हें और प्रभावशाली बना दिया था। उनकी बुद्धिदीप्त,चमकदार आँखें एक नज़र में ही अपराधी को पहचान जाती थीं। उन्हे सुप्रींम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का भी गौरव प्राप्त था। उनके न्याय-प्रिय फैसलों की चर्चा होती रहती थी।

पुरुषो के एकछत्र कोर्ट मे अपना करियर बनाने मे उन्हें बहुत तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। सबसे पहला युद्ध तो उन्हें अपने परिवार से लड़ना पड़ा था। वकालत करने की बात सुनकर घर मेँ तो जैसे भूचाल आ गया। माँ और बाबूजी से नाराजगी की तो उम्मीद थी, पर उन्हें अपने बड़े भाई की नाराजगी अजीब लगी। उन्हें पूरी आशा थी कि महिलाओं के हितों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले भैया तो उनका साथ जरूर देंगे। पर उन्हों ने ही सबसे ज्यादा हँगामा मचाया था।

तब विनी को सबसे हैरानी हुई, जब उम्र से लड़ती बूढ़ी दादी ने उसका साथ दिया। दादी उसे बड़े लाड़ से ‘नन्ही परी’ बुलाती थी। विनी रात मेँ दादी के पास ही सोती थी। अक्सर दादी कहानियां सुनाती थी। उस रात दादी ने कहानी तो नहीं सुनाई परगुरु मंत्र जरूर दिया। दादी ने रात के अंधेरे मे विनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मेरी नन्ही परी, तु शिवाजी की तरह गरम भोजन बीच थाल से खाने की कोशिश कर रही है। जब भोजन बहुत गरम हो तो किनारे से फूक-फूक कर खाना चाहिए।

तु सभी को पहले अपनी एल एल बी की पढाई के लिए राजी कर। न कि अपनी वकालत के लिए। ईश्वर ने चाहा तो तेरी कामना जरूर पूरी होगी। विनी ने लाड़ से दादी के गले मे बाँहे डाल दी। फिर उसने दादी से पूछा- दादी तुम इतना मॉडर्न कैसे हो गई? दादी रोज़ सोते समय अपने नकली दाँतो को पानी के कटोरे मे रख देती थी। तब उनके गाल बिलकुल पिचक जाते थे और चेहरा झुरियों से भर जाता था।

विनी ने देखा दादी की झुरियों भरे चेहरेपर विषाद की रेखाएँ उभर आईं और वे बोल पडी-बिटिया, औरतों के साथ बड़ा अन्याय होता है। तु उनके साथ न्याय करेगी यह मुझे पता है। जज बन कर तेरे हाथों मेँ परियों वाली जादू की छड़ी भी तो आ जाएगी न। अपनी अनपढ़ दादी की ज्ञान भरी बाते सुन कर विनी हैरान थी। दादी के दिये गुरु मंत्र पर अमल करते हुए विनी ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। तब उसे लगा – अब तो मंज़िल करीब है।
पर तभी न जाने कहा से एक नई मुसीबत सामने आ गई। बाबूजी के पुराने मित्र शरण काका ने आ कर खबर दी। उनके किसी रिश्तेदार का पुत्र शहर मे ऊँचे पद पर तबादला हो कर आया है। क्वाटर मिलने तक उनके पास ही रह रहा है। होनहार लड़का है। परिवार भी अच्छा है। विनी के विवाह के लिए बड़ा उपयुक्त वर है। उसने विनी को शरण काका के घर आते-जाते देखा है। बातों से लगता है कि विनी उसे पसंद है। उसके माता-पिता भी कुछ दिनों के लिए आनेवाले है।

शरण काका रोज़ सुबह,एक हाथ मे छड़ी और दूसरे हाथ मे धोती थाम कर टहलने निकलते थे। अक्सर टहलना पूरा कर उसके घर आ जाते थे। सुबह की चाय के समय उनका आना विनी को हमेशा बड़ा अच्छा लगता था। वे दुनियां भर की कहानियां सुनाते। बहुत सी समझदारी की बातें समझाते।

पर आज़ विनी को उनका आना अखर गया। पढ़ाई पूरी हुई नहीं कि शादी की बात छेड़ दी। विनी की आँखें भर आईं। तभी शरण काका ने उसे पुकारा- ‘बिटिया, मेरे साथ मेरे घर तक चल। जरा यह तिलकुट का पैकेट घर तक पहुचा दे। हाथों मेँ बड़ा दर्द रहता है। तेरी माँ का दिया यह पैकेट उठाना भी भारी लग रहाहै।

बरसो पहले भाईदूज के दिन माँ को उदास देख कर उन्हों ने बाबूजी से पूछा था। भाई न होने का गम माँ को ही नही, बल्कि नाना-नानी को भी था। विनी अक्सर सोचती थी कि क्या एक बेटा होना इतना ज़रूरी है? उस भाईदूज से ही शरण काका ने माँ को मुहबोली बहन बना लिया था। माँ भी बहन के रिश्ते को निभाती, हर तीज त्योहार मे उन्हेंकुछ न कुछ भेजती रहती थी।आज का तिलकुट मकर संक्रांति का एडवांस उपहार था। अक्सर काका कहते- विनी की शादी मे मामा का नेग तो मुझे ही निभाना है।
शरण काका और काकी मिनी दीदी की शादी के बाद जब भी अकेलापन महसूस करते , तब उसे बुला लेते थे। अक्सर वे अम्मा- बाबूजी से कहते- मिनी और विनी दोनों मेरी बेटियां हैं। देखो दोनों का नाम भी कितना मिलता-जुलता है।जैसे सगी बहनों के नाम हो। शरण काका भी अजीब है। लोग बेटी के नाम से घबराते है। और काका का दिल ऐसा है, दूसरे की बेटी को भी अपना मानते है।

मिनी दीदी के शादी के समय विनी अपने परीक्षा मे व्यस्त थी। काकी उसके परीक्षा विभाग को रोज़ कोसती रहती। दीदी के हल्दी के एक दिन पहले तक परीक्षा थी। काकी कहती रहती थी- विनी को फुर्सत होता तो मेरा सारा काम संभाल लेती। ये कालेज वालों परीक्षा ले-ले कर लड़की की जान ले लेंगे। शांत और मृदुभाषी विनी उनकी लाड़ली थी।

वे हमेशा कहती रहती- ईश्वर ने विनी बिटिया को सूरत और सीरत दोनों दिया है।
आखरी पेपर दे कर विनी जल्दी-जल्दी दीदी के पास जा पहुची। उसे देखते काकी की तो जैसे जान मे जान आ गई। दीदी के सभी कामों की ज़िम्मेवारी उसे सौप कर काकी को बड़ी राहत महसूस हो रही थी। उन्होंने विनी के घर फोन कर ऐलान कर दिया कि विनी अब मिनी के विदाई के बाद ही घर वापस जाएगी।

शाम मे विनी दीदी के साथ बैठ कर उनका बक्सा ठीक कर रही थी, तब उसे ध्यान आया कि दीदी ने कॉस्मेटिक्स तो ख़रीदा ही नहीं है। मेहँदी की भी व्यवस्था नहीं है। वह काकी से बता कर भागी भागी बाज़ार से सारी ख़रीदारी कर लाई। विनी ने रात मे देर तक बैठ कर दीदी को मेहँदी लगाई। मेहँदी लगा कर जब हाथ धोने उठी तो उसे अपनी चप्पलें मिली ही नहीं। शायद किसी और ने पहन लिया होगा।

शादी के घर मे तो यह सब होता ही रहता है। घर मेहमानों से भरा था। बरामदे मे उसे किसी की चप्पल नज़र आई। वह उसे ही पहन कर बाथरूम की ओर बढ़ गई। रात मे वह दीदी के बगल मे रज़ाई मे दुबक गई। न जाने कब बाते करते-करते उसे नींद आ गई।
सुबह, जब वह गहरी नींद मे थी। किसी उसकी चोटी खींच कर झकझोर दिया।कोई तेज़ आवाज़ मे बोल रहा था- अच्छा, मिनी दीदी, तुम ने मेरी चप्पलें गायब की थी। हैरान विनी ने चेहरे पर से रज़ाई हटा कर अपरिचित चेहरे को देखा। उसकी आँखें अभी भी नींद से भरी थीं।

तभी मिनी दीदी खिलखिलाती हुई पीछे से आ गई। अतुल, यह विनी है। सहाय काका की बेटी और विनी यह अतुल है। मेरे छोटे चाचा का बेटा। हर समय हवा के घोड़े पर सवार रहता है। छोटे चाचा की तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए छोटे चाचा और चाची नहीं आ सके तो उन्हों ने अतुल को भेज दिया। अतुल उसे निहारता रहा, फिर झेंपता हुआ बोला- “मुझे लगा, दीदी, तुम सो रही हो। दरअसल, मैं रात से ही अपनी चप्पलें खोज रहा था।“
विनी का को बड़ा गुस्सा आया। उसने दीदी से कहा- मेरी भी तो चप्पलें खो गई हैं। उस समय मुझे जो चप्पल नज़र आई मैं ने पहन लिया। मैंने इनकी चप्पलें पहनी है,किसी का खून तो नहीं किया । सुबह-सुबह नींद खराब कर दी। इतने ज़ोरों से झकझोरा है। सारी पीठ दर्द हो रही है। गुस्से मेँ वह मुंह तक रज़ाई खींच कर सो गई। अतुल हैरानी से देखता रह गया। फिर धीरे से दीदी से कहा- बाप रे, यह तो वकीलों की तरह जिरह करती है।

काकी एक बड़ा सा पैकेट ले कर विनी के पास पहुचीं और पूछने लगी – बिटिया देख मेरी साड़ी कैसी है? पीली चुनरी साड़ी पर लाल पाड़ बड़ी खूबसूरत लग रही थी। विनी हुलस कर बोल पड़ी- बड़ी सुंदर साड़ी है। पर काकी इसमे फॉल तो लगा ही नहीं है। हद करती हो काकी। सारी तैयारी कर ली हो और तुम्हारी ही साड़ी तैयार नहीं है। दो मै जल्दी से फॉल लगा देती हूँ।

विनी दीदी के पलंग पर बैठ कर फॉल लगाने मे मसगुल हो गई। काकी भी पलंग पर पैरों को ऊपर कर बैठ गई और अपने हाथों से अपने पैरों को दबाने लगी। विनी ने पूछा- काकी तुम्हारे पैर दबा दूँ क्या?वे बोलीं – बिटिया, एक साथ तू कितने काम करेगी? देख ना पूरे काम पड़े है और अभी से मैं थक गई हूँ। साँवली -सलोनी काकी के पैर उनकी गोल-मटोल काया को संभालते हुए थक जाए, यह स्वाभाविक ही है। छोटे कद की काकी के लालट पर बड़ी सी गोल लाल बिंदी विनी को बड़ी प्यारी लगती थी।विनी को काकी भी उसी बिंदी जैसी गोल-मटोल लगती थीं।

तभी मिनी दीदी की चुनरी मे गोटा और किरण लगा कर छोटी बुआ आ पहुचीं। देखो भाभी, बड़ी सुंदर बनी है चुनरी। फैला कर देखो ना- छोटीबुआ कहने लगी। पूरे पलंग पर सामान बिखरा था। काकी ने विनी की ओर इशारा करते हुई कहा- इसके ऊपर ही डाल कर दिखाओ छोटी मईयां।

सिर झुकाये फॉल लगाती विनी के ऊपर लाल चुनरी बुआ ने फैला दिया। चुनरी सचमुच बड़ी सुंदर बनी थी। काकी बोल पड़ी- देख तो विनी पर कितना खिल रहा है यह रंग।विनी की नज़रें अपने-आप ही सामने रखे ड्रेसिंग टेबल के शीशे मे दिख रहे अपने चेहरे पर पड़ी। उसका चेहरा गुलाबी पड़ गया। उसे अपना ही चेहरा बड़ा सलोना लगा।

तभी अचानक किसी ने उसके पीठ पर मुक्के जड़ दिये- “ तुम अभी से दुल्हन बन कर बैठ गई हो दीदी” अतुल की आवाज़ आई। वह सामने आ कर खड़ा हो गया। अपलक कुछ पल उसे देखता रह गया। विनी की आँखों मेँ आंसू आ गए थे। अचानक हुए मुक्केबाज़ी के हमले से सुई उसकी उंगली मे चुभ गई थी। उंगली के पोर पर खून की बूँद छलक आई थी।

अतुल बुरी तरह हड्बड़ा गया। बड़ी अम्मा, मैं पहचान नहीं पाया था। मुझे क्या मालूम था कि दीदी के बदले किसी और को दुल्हन बनने की जल्दी है। पर मुझ से गलती हो गई- वह काकी से बोल पड़ा। फिर विनी की ओर देख कर ना जाने कितनी बार सॉरी-सॉरी बोलता चला गया। तब तक मिनी दीदी भी आ गई थी।

विनी की आँखों मेँ आंसू देख कर सारा माजरा समझ कर, उसे बहलाते हुए बोली- “अतुल, तुम्हें इस बार सज़ा दी जाएगी।“ बता विनी इसे क्या सज़ा दी जाए? विनी ने पूछा- इनकी नज़रे कमजोर है क्या? अब इनसे कहो सभी के पैर दबाये। यह कह कर विनी साड़ी समेट कर, पैर पटकती हुई काकी के कमरे मे जा कर फॉल लगाने लगी।

अतुल सचमुच काकी के पैर दबाने लगा, और बोला- वाह! क्या बढ़िया फैसला है जज़ साहिबा का। बड़ी अम्मा, देखो मैं हुक्म का पालन कर रहा हूँ। “तू भी हर समय उसे क्यों परेशान करता रहता है अतुल?”-मिनी दीदी की आवाज़ विनी को सुनाई दी। दीदी, इस बार भी मेरी गलती नहीं थी- अतुल सफाई दे रहा था।

फॉल का काम पूरा कर विनी हल्दी के रस्म की तैयारी मेँ लगी थी। बड़े से थाल मे हल्दी मंडप मे रख रही थी। तभी मिनी दीदी ने उसे आवाज़ दी। विनी उनके कमरे मे पहुचीं। दीदी के हाथों मे बड़े सुंदर झुमके थे। दीदी ने झुमके दिखाते हुए पूछा- ये कैसे है विनी? मैं तेरे लिए लाई हूँ। आज पहन लेना। मैं ये सब नही पहनती दीदी- विनी झल्ला उठी। सभी को मालूम है कि विनी को गहनों से बिलकुल लगाव नहीं है। फिर दीदी क्यों परेशान कर रही है? पर दीदी और काकी तो पीछे ही पड़ गई।

दीदी ने जबर्दस्ती उसके हाथों मेँ झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके ड्रेसिंग टेबल पर पटक दिये। फिसलता हुआ झुमका फर्श पर गिरा और दरवाज़े तक चला गया।तुनकते हुए विनी तेज़ी से पलट कर बाहर जाने लगी। उसने ध्यान ही नहीं दिया था कि दरवाजे पर खड़ा अतुल ये सारी बातें सुन रहा था। तेज़ी से बाहर निकालने की कोशिश मे वह सीधे अतुल से जा टकराई। उसके दोनों हाथों में लगी हल्दी के छाप अतुल के सफ़ेद टी-शर्ट पर उभर आए।

वह हल्दी के दाग को हथेलियों से साफ करने की कोशिश करने लगी। पर हल्दी के दाग और भी फैलने लगे। अतुल ने उसकी दोनों कलाइयां पकड़ ली और बोल पड़ा- यह हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। ऐसे तो यह और फ़ैल जाएगा। आप रहने दीजिये। विनी झेंपती हुई हाथ धोने चली गई।

बड़े धूम-धाम से दीदी की शादी हो गई। दीदी की विदाई होते ही विनी को अम्मा के साथ दिल्ली जाना पड़ा। कुछ दिनों से अम्मा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी। डाक्टरों ने जल्दी से जल्दी दिल्ली ले जा कर हार्ट चेक-अप का सुझाव दिया था। मिनी दीदी के शादी के ठीक बाद दिल्ली जाने का प्लान बना था। दीदी की विदाई वाली शाम का टिकट मिल पाया था।
***
एक शाम अचानक शरण काका ने आ कर खबर दिया। विनी को देखने लड़केवाले अभी कुछ देर मे आना चाहते हैं। घर मे जैसे उत्साह की लहर दौड़ गई। पर विनी बड़ी परेशान थी। ना-जाने किसके गले बांध दिया जाएगा?

उसके भविष्य के सारे अरमान धरे के धरे रह जाएगे। अम्मा उसे तैयार होने कह कर किचेन मे चली गईं। तभी मालूम हुआ कि लड़का और उसके परिवारवाले आ गए है। बाबूजी, काका और काकी उन सब के साथ ड्राइंग रूम मेँ बातें कर रहे थे। अम्मा उसे तैयार न होते देख कर, आईने के सामने बैठा कर उसके बाल संवारे। अपने अलमारी से झुमके निकाल कर दिये। विनी झुंझलाई बैठी रही।

अम्मा ने जबर्दस्ती उसके हाथों मे झुमके पकड़ा दिये। गुस्से मे विनी ने झुमके पटक दिये। एक झुमका फिसलता हुआ ड्राइंग रूम के दरवाजे तक चला गया। ड्राइंग-रूम उसके कमरे से लगा हुआ था।
परेशान अम्मा उसे वैसे ही अपने साथ ले कर बाहर आ गईं। विनी अम्मा के साथ नज़रे नीची किए हुए ड्राइंग-रूम मेँ जा पहुची। वह सोंच मे डूबी थी कि कैसे इस शादी को टाला जाए। काकी ने उसे एक सोफ़े पर बैठा दिया। तभी बगल से किसी की ने धीरे से पूछा- आज किसका गुस्सा झुमके पर उतार रही थी? आश्चर्यचकित नज़रों से विनी ने ऊपर देखा। उसने फिर कहा- मैं ने कहा था न, हल्दी का रंग जाने वाला नहीं है। सामने अतुल बैठा था।

अतुल और उसके माता-पिता के जाने के बाद काका ने उसे बुलाया। बड़े बेमन से कुछ सोंचती हुई वह काका के साथ चलने लगी। गेट से बाहर निकलते ही काका ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- “विनी, मैं तेरी उदासी समझ रहा हूँ। बिटिया, अतुल बहुत समझदार लड़का है। मैंने अतुल को तेरे सपने के बारे मेँ बता दिया है। तू किसी तरह की चिंता मत कर। मुझ पर भरोसा कर बेटा।

काका ने ठीक कहा था। वह आज़ जहाँ पंहुची है। वह सिर्फ अतुल के सहयोग से ही संभव हो पाया था। अतुल आज़ भी अक्सर मज़ाक मेँ कहते हैं –“मैं तो पहली भेंट मेँ ही जज़ साहिबा की योग्यता पहचान गया था।“ उसकी शादी मेँ सचमुच शरण काका ने मामा होने का दायित्व पूरे ईमानदारी से निभाया था। पर वह उन्हें मामा नहीं, काका ही बुलाती थी। बचपन की आदत वह बादल नहीं पाई थी।
***
कोर्ट का कोलाहल विनीता सहाय को अतीत से बाहर खींच लाया। पर वे अभी भी सोच रही थीं – इसे कहाँ देखा है। दोनों पक्षों के वकीलों की बहस समाप्त हो चुकी थी। राम नरेश के गुनाह साबित हो चुके थे। वह एक भयानक कातिल था। उसने इकरारे जुर्म भी कर लिया था।

उसने बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। एक सोची समझी साजिश के तहत उसने अपने दामाद की हत्या कर शव का चेहरा बुरी तरह कुचल दिया था और शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर जंगल मे फेंक दिया था। वकील ने बताया कि राम नरेश का अपराधिक इतिहास है। वह एक क्रूर कातिल है।

पहले भी वह कत्ल का दोषी पाया गया था। पर सबूतों के आभाव मे छूट गया था। इसलिए इस बार उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए। वकील ने पुराने केस की फाइल उनकी ओर बढ़ाई। फ़ाइल खोलते ही उनके नज़रों के सामने सब कुछ साफ हो गया। सारी बातें चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगी।

लगभग बाईस वर्ष पहले राम नरेश को कोर्ट लाया गया था। उसने अपनी दूध मुहीं बेटी की हत्या कर दी थी। तब विनीता सहाय वकील हुआ करती थी। ‘कन्या-भ्रूण-हत्या’ और ‘बालिका-हत्या’ जैसे मामले उन्हें आक्रोश से भर देते थे। माता-पिता और समाज द्वारा बेटे-बेटियों में किए जा रहे भेद-भाव उन्हें असह्य लगते थे।

तब विनीता सहाय ने रामनरेश के जुर्म को साबित करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा दी थी। उस गाँव मेँ अक्सर बेटियों को जन्म लेते ही मार डाला जाता था। इसलिए किसी ने राम नरेश के खिलाफ गवाही नहीं दी। लंबे समय तक केस चलने के बाद भी जुर्म साबित नहीं हुआ।

इस लिए कोर्ट ने राम नरेश को बरी कर दिया था। आज वही मुजरिम दूसरे खून के आरोप में लाया गया था। विनीता सहाय ने मन ही मन सोचा- ‘काश, तभी इसे सज़ा मिली होती। इतना सीधा- सरल दिखने वाला व्यक्ति दो-दो कत्ल कर सकता है? इस बार वे उसे कड़ी सज़ा देंगी।

जज साहिबा ने राम नरेश से पूछा- ‘क्या तुम्हें अपनी सफाई मे कुछ कहना है?’ राम नरेश के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कान खेलने लगी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा – “हाँ हुज़ूर, मुझे आप से बहुत कुछ कहना है। मैं आप लोगों जैसा पढ़ा- लिखा और समझदार तो नहीं हूँ। पता नहीं आपलोग मेरी बात समझेगें या नहीं। पर आप मुझे यह बताइये कि अगर कोई मेरी परी बिटिया को जला कर मार डाले और कानून से भी अपने को बचा ले। तब क्या उसे मार डालना अपराध है?”

मेरी बेटी को उसके पति ने दहेज के लिए जला दिया था। मरने से पहले मेरी बेटी ने अपना आखरी बयान दिया था, कि कैसे मेरी फूल जैसी सुंदर बेटी को उसके पति ने जला दिया। पर वह पुलिस और कानून से बच निकला। इस लिए उसे मैंने अपने हाथों से सज़ा दिया। मेरे जैसा कमजोर पिता और कर ही क्या सकता है? मुझे अपने किए गुनाह का कोई अफसोस नहीं है।

उसका चेहरा मासूम लग रहा था। उसकी बूढ़ी आँखों मेँ आंसू चमक रहे थे, पर चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह जज साहिबा की ओर मुखातिब हुआ-“ हुज़ूर, क्या आपको याद है? आज़ से बाईस वर्ष पहले जब मैं ने अपनी बड़ी बेटी को जन्म लेते मार डाला था, तब आप मुझे सज़ा दिलवाना चाहती थीं।

आपने तब मुझे बहुत भला-बुरा कहा था। आपने कहा था- बेटियां अनमोल होती हैं। उसे मार कर मैंने जघन्य पाप किया है।“

आप की बातों ने मेरी रातो की नींद और दिन का चैन ख़त्म कर दिया था। इसलिए जब मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ तब मुझे लगा कि ईश्वर ने मुझे भूल सुधारने के मौका दिया है। मैंने प्रयश्चित करना चाहा। उसका नाम मैंने परी रखा। बड़े जतन और लाड़ से मैंने उसे पाला।

अपनी हैसियत के अनुसार उसे पढ़ाया और लिखाया। वह मेरी जान थी। मैंने निश्चय किया कि उसे दुनिया की हर खुशी दूंगा। मै हर दिन मन ही मन आपको आशीष देता कि आपने मुझे ‘पुत्री-सुख’ से वंचित होने से बचा लिया। मेरी परी बड़ी प्यारी, सुंदर, होनहार और समझदार थी। मैंने उसकी शादी बड़े अरमानों से किया। अपनी सारी जमा-पूंजी लगा दी।

मित्रो और रिश्तेदारों से उधार ली। किसी तरह की कमी नहीं की। पर दुनिया ने उसके साथ वही किया जो मैंने बाईस साल पहले अपनी बड़ी बेटी के साथ किया था। उसे मार डाला। तब सिर्फ मैं दोषी क्यों हूँ? मुझे खुशी है कि मेरी बड़ी बेटी को इस क्रूर दुनिया के दुखों और भेद-भाव को सहना नहीं पड़ा। जबकि छोटी बेटी को समाज ने हर वह दुख दिया जो एक कमजोर पिता की पुत्री को झेलना पड़ता है। ऐसे मेँ सज़ा किसे मिलनी चाहिए? मुझे सज़ा मिलनी चाहिए या इस समाज को?

अब आप बताइये कि बेटियोंको पाल पोस कर बड़ा करने से क्या फायदा है? पल-पल तिल-तिल कर मरने से अच्छा नहीं है कि वे जन्म लेते ही इस दुनिया को छोड़ दे। कम से कम वे जिंदगी की तमाम तकलीफ़ों को झेलने से तों बच जाएगीं। मेरे जैसे कमजोर पिता की बेटियों का भविष्य ऐसा ही होता है।

उन्हे जिंदगी के हर कदम पर दुख-दर्द झेलने पड़ते है। काश मैंने अपनी छोटी बेटी को भी जन्म लेते मार दिया होता। आप मुझे बताइये, क्या कहीं ऐसी दुनिया हैं जहाँ जन्म लेने वाली ये नन्ही परियां बिना भेद-भाव के एक सुखद जीवन जी सकें? आप मुझे दोषी मानती हैं। पर मैं इस समाज को दोषी मानता हूँ। क्या कोई अपने बच्चे को इसलिए पालता है कि यह नतीजा देखने को मिले? या समाज हमेँ कमजोर होने की सज़ा दे रहा है? क्या सही है और क्या गलत, आप मुझे बताइये।

विनीता सहाय अवाक थी। मुक नज़रो से राम नरेश के लाचार –कमजोर चेहरे को देख रही थीं। उनके पास कोई जवाब नहीं था। पूरे कोर्ट मे सन्नाटा छा गया था। आज एक नया नज़रिया उनके सामने था? उन्होंने उसके फांसी की सज़ा को माफ करने की दया याचिका प्रेसिडेंट को भिजवा दिया।

अगले दिन अखबार मे विनीता सहाय के इस्तिफ़े की खबर छपी थी। उन्होंने वक्तव्य दिया था – इस असमान सामाजिक व्यवस्था को सुधारने की जरूरत है। जिससे समाज लड़कियों को समान अधिकार मिले। अन्यथा न्याय, अन्याय बन जाता है, क्योंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।गलत सामाजिक व्यवस्था और करप्शन न्याय को गुमराह करता है और लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा ख़त्म करता है। मैं इस गलत सामाजिक व्यवस्था के विरोध मेँ न्यायधिश पद से इस्तीफा देती हूँ।
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आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी )

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

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नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

                              pillow          

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

temple

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

clock 2

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

                                  b clock

(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।यह कहानी बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि  बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।)

सौन्दर्य (blog related)

मेरी सहेलियाँ सजती-सँवरती और मुझे भी नए-नए फैशन समझातीं। मुझे सजने- सँवरने का बिलकुल मन नहीं करता था। मेरी सहेलियाँ मेरी समस्या समझती ही नहीं थीं। उनके चिकने, साफ- सुथरे चेहरे दमकते रहते थे। मेरा चेहरा मुंहासों से भरा था। मुझे इन मुंहासों की वजह से बड़ी शर्मिंदगी होती थी। उन्हें छुपाते-छुपाते मैं थक गई थी। मेरा आत्मविश्वास भी कम हो गया था। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। मैं रोज़ एक ही जींस और टॉप में कालेज़ पहुँच जाती। मैं ना किसी से ज्यादा बातें करतीं ना किसी लडके से मेरी दोस्ती थी।

मुझे राधिका के साथ अपना प्रोजेक्ट का काम करना था। बालों को आगे कर अपने गाल पर मैंने फैला लिया, जिससे मेरे गाल छुप जाये।फिर अपनी सहेली राधिका के घर पहुँची। राधिका ने नाराजगी से पूछा- “कमल ने मुझे तुम्हें कैंटीन में भेजने कहा था। पर तुमने फोन कर कमल को मना क्यों कर दिया? वह अच्छा लड़का है। तुमसे दोस्ती करना कहता है। तुम सबलोगों से इतनी कटी-कटी क्यों रहती हो?

मेरी बड़ी-बड़ी आँखों मेँ आँसू भर आए। मैंने अपने गालों पर से बाल हटा कर अपने मुँहासे राधिका को दिखाए। मेरे दोनों गाल लाल-गुलाबी मुहांसों से भरे थे। राधिका ने मुस्कुरा कर कहा-“ बस, यही तुम्हारी समस्या है? वह उठी और अपने अलमारी से कुछ निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मेरे हाथों में गार्नियर प्योर एक्टिव नीम फ़ेस वाश की सफ़ेद-हरे रंग की ट्यूब थी। मैंने कहा-“ इससे क्या होगा?” राधिका ने हँसते हुए कहा- “लगा कर तो देख।“

लगभग एक सप्ताह बाद मैं बहुत खुश थी। गार्नियर का जादू देख कर मैं हैरान थी। मेरा चेहरा मुंहासों से मुक्त दमक रहा था। हमेशा पहननेवाले जींस को हटा कर एक सुंदर से सलवार-कुर्ते में मैं तैयार हो गई। बालों को खूबसूरती से क्लिप से लगा कर बाँधा और कॉलेज कैंटीन में राधिका से मिलने पहुँची। मैं उसे धन्यवाद देना चाहती थी। कैंटीन मेँ हम दोनों सहेलियाँ बैठ कर गप्पें कर रहीं थीं। तभी कमल वहाँ आया और हमारे साथ बैठ गया। उसकी आँखों मेँ मेरे लिए प्रशंसा दिख रही थी। उसने मुझ से पूछा-“ तुम अर्चना की छोटी बहन हो क्या? तुम दोनों काफी मिलती-जुलती हो। इसलिए मैंने अनुमान लगा लिया। पर तुम उससे ज्यादा ग्लैमरस हो। मैं और राधिका खिलखिला कर हंस पड़े। सच्चाई जान कर कमल झेंप गया। आज मैं और कमल अच्छे दोस्त हैं। मैं और राधिका इसे गार्नियर-मैजिक कहतें है। अब मैं पहले जैसी सहमी-सिमटी नहीं बल्कि आत्मविश्वाश से भरी अर्चना हूँ। सभी कहते हैं मैं हर पार्टी की जान हूँ। हम सभी सहेलियों को त्वचा समस्या होने पर गार्नियर-लक विश करते हैं।

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जंगल ओलंपिक ( प्रेरक बाल कथा )

गिल्लू गिलहरी बहुत दौड़ती थी। वह जंगल ओलंपिक में भाग लेने की तैयारी कर रही थी।हर दिन सुबह उठ कर वह दूर तक दौड़ लगाती थी।उसने अपने भोजन में दूध और मेवे शामिल कर लिए थे।वह स्कूल में भी खेल-कूद में भाग लेने लगी थी।वह चाहती थी कि उसकी चुस्ती-फुर्ती बढ़ जाये।अब वह पहले की तरह हर समय टीवी और कंप्यूटर में व्यस्त नहीं रहती थी।कोच बंकु उसकी मेहनत से बहुत खुश थे।
पर जब भी कोच बंकु बंदर अभ्यास करवाते तब वह पीलू खरगोश से पीछ छूट जाती थी। पीलू ख़रगोश बड़ा घमंडी था। अभ्यास के समय पीलू आगे निकल कर सभी को जीभ चिढ़ाता।अगर कोई उससे आगे निकलने की कोशिश करता, तब वह कोच की नज़र बचा कर उसे धक्का दे कर गिरा देता। गिल्लू को लगने लगा था,वह रेस जीत नहीं पाएगी।
इस साल हिमालय नेशनल पार्क के राजा तेज़ा शेर ने अपनी सभा में जंगल ओलंपिक खेलों की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि खेलों से सदभावना और दोस्ती बढ़ती है। खेल हमें स्वस्थ रखते हैं। इससे हमारे जीवन में अनुशासन आता है। इसलिए जंगल में ओलंपिक खेलों का आयोजन किया जा रहा है।इसमें अन्य जंगलों को भी न्योता दिया गया है। इस ओलंपिक में अनेक  प्रकार के खेलों को शामिल किया गया था।गिल्लू ने छोटे जानवरों के 1000 मीटर लंबी दौड़ मे हिस्सा लिया था।
राजा तेज़ा ने जंगलवासियों को मनुष्यों के ओलंपिक खेलो की जानकारी दी।इस खेल का आयोजन हर चौथे वर्ष किया जाता है।वे चाहते है कि हिमालय नेशनल पार्क के जंगल में ओलंपिक का  आयोजन हो।सभी जानवर इस ऐलान से बहुत खुश थे।  इस आयोजन के लिए खेल के मैदान तैयार किए जाने लगे। दौड़ के लिए रेस-ट्रैक बनाए जा रहे थे।
गिल्लू जी-जान से मेहनत कर रही थी। आज के दौड़ के अभ्यास में वह सबसे आगे थी।जैसे ही उसने पीछे पलट कर पास आते पीलू को देखा,वह घबरा गई। पीलू उसे जीभ दिखाते हुए तेज़ी से आगे निकल गया। गिल्लू की  आँखों में आँसू आ गए। दौड़ के बाद वह आम के पेड़ के पीछे जा कर आँसू पोछने लगी। तभी कोच बंकु वहाँ आए। उन्हों गिल्लू को बिना डरे अभ्यास करने कहा। पर गिल्लू बहुत घबरा गई थी।
अभ्यास के बाद गिल्लू अपने घर पहुची। बड़े पीपल के पेड़ के सबसे ऊपर के ड़ाल के बिल में उसका घर था।पर वह घर के अंदर नहीं गई। बाहर ऊंची ड़ाल पर बैठ गई। वहाँ से सारा जंगल नज़र आता था। उसे अपने दौड़ का ट्रैक नज़र आ रहा था। कल ही प्रतियोगिता है। वह रोने लगी। उसे लग रहा था कि वह कभी पीलू से जीत नहीं पाएगी। तभी पीछे से उसकी माँ ने आवाज़ दिया- बेटा, तू तो सबसे तेज़ दौड़ती है। दौड़ तुम ही जीतोगी। गिल्लू ने हैरानी से पूछा- माँ, तुमने मुझे दौड़ते हुए कब देखा? माँ ने मुस्कुरा कर कहा- हर दिन मैं यहाँ से तुम्हें अभ्यास करते हुए देखती हूँ। गिल्लू ने सुबकते हुए पूछा- पर मैं पीलू से हार क्यों जाती हूँ? माँ ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा- तुम अपने मन से हार का ड़र निकाल दो, और दौड़ते समय कभी पीछे मत देखो। मेरी सीख याद करते हुए दौड़ना। जीत तुम्हारी होगी।
अगले दिन गिल्लू समय पर तैयार हो कर दौड़ के ट्रैक पर पहुची। माँ ने दूर से हाथ हिलाया। दौड़ शुरू हुई। बिना पीछे देखे वह दौड़ती चली गई और वह रेस जीत गई।
रेस में प्रथम आने के बाद उसने माँ से पूछा – माँ तुमने क्या जादू किया था? माँ ने कहा- मैं ने कुछ भी नहीं किया था। बस तुम्हारे मन का डर निकल गया था। और हाँ, आगे वही बढ़ता है जो पीछे नहीं देखता ।तुम दौड़ के समय बार-बार पीछे देखने मे जो समय लगाती थी। उसमें ही पीलू तुमसे आगे निकल जाता था।गिल्लू बेटा,खेल-कूद प्यार और सद्भावना बढ़ाता है,लड़ाई-झगड़ा नहीं। आज पीलू की दुष्टता रेस-ट्रैक के कैमरे में सभी को नज़र आ गई। आज दौड़ में उसने बिनी बिल्ली को धक्का दिया था। राजा तेजा ने उसे कड़ी सजा देने का ऐलान किया है और तुम्हें प्रथम पुरस्कार मिलेगा।

एक आईना ( दहेज पर आधारित वास्तविक कहानी )

नवीन कार की स्टेरिंग अपने अपार्टमेंट के रोड़ मे घुमाते हुए मन ही मन सोच रहा था – ये आज़-कल के मल्टी-नेशनल कंपनियाँ भी हद है। पैसा तो ज़्यादा जरूर देती है, पर काम भी कोल्हू के बैल की तरह लेतीं है। न तो काम का समय तय होता है न काम की सीमा है। बस टारगेट पकड़ा देते है। पिछले कुछ दिनों से वह बहुत व्यस्त रह रहा है। मन ही मन सोच रहा था, आज खाना खा कर तुरंत सोने चला जाएगा। कल ऑफिस जल्दी जाना है।
नवीन थका हारा घर पहुचा। बड़ी भूख लगी थी। पर हमेशा की तरह मृदुला टीवी के सामने बैठी सीरियल देख रही थी। वह टीवी देखने में ऐसी व्यस्त थी। जैसे उसे नवीन की उपस्थिती का एहसास ही न हो। नवीन ने परेशान हो कर माला को आवाज़ देते हुए खाना लगाने कहा। माला उसकी पत्नी के साथ दहेज में आई थी। माला ही घर का सारा काम संभालती थी। चाहता तो था वह मृदुला को आवाज़ देना, पर उसके तीखी बातों का सामना करने की ताकत अभी उसमें नहीं थी। कभी-कभी उसकी बड़ी चाहत होती, उसके मित्रों की पत्नियों की तरह मृदुला उस के लिए कुछ बनाए और प्यार से खिलाये। आफिस से लौटने पर दरवाजा खोल उसके गले से लिपट जाए। पर ऐसी उसकी किस्मत कहाँ?
मृदुला से विवाह करने का निर्णय उसका ही था। अम्मा ने एक-दो बार कुछ कहने की कोशिश भी की। पर हमेशा की तरह पापा ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। नवीन को आज भी याद है। अम्मा ने कहा था- धन नहीं गुण देख बेटा।

अपनी शादी के लिए, पापा के साथ न जाने कितनी लड़कियां उसने देखीं था। उसे सभी में कुछ न कुछ नुक्स नज़र आता। पापा उसकी ऊंची पसंद की तारीफ करते। मृदुला को देखने जब वह पहुँचा। बिना लाग लपेट के होनेवाले ससुर जी ने बात शुरू की। उन्होंने बताया, निर्मला बड़े लाड़ में पली है और वे उसके दहेज में किसी तरह कमी नहीं करना चाहतें है। उनके बताए रकम और सामानों के लिस्ट को देखते हुए नवीन ने निर्णय लेने में देर नहीं की।

पहली बार देखने पर उसे बिलकुल शांत स्वभाव की मृदुला तुरंत पसंद आ गई। यह तो उसे बाद में समझ आया कि यह तूफान के पहले की शांति थी। होनेवाली स्मार्ट सासु ने दहेज में ‘आया’ माला को भेजने की बात कह कर उसे गदगद कर दिया। माला की सारी ज़िम्मेदारी और तंख्वाह ससुराल वालों की ज़िम्मेदारी थी।
मृदुला थोड़ी मोटी, स्वस्थ गालोंवाली श्यामल सुंदरी थी। हाँ, नाक थोड़ी दबी और आगे से फैली थी। उसका मोटा होना नवीन के पापा को भला लग रहा था। दरअसल, खाते-पीते घर की स्वस्थ पुत्री, अति मोटे नवीन के सामने दुबली ही लग रही थी। और उसकी पसरी नाक पिता के वैभव के चमक में नवीन को नज़र ही नहीं आ रही थी। नवीन खाने-पीने का भरपूर शौकीन था। अपनी कमाई का भरपूर प्रभाव उसके सेहत पर नज़र आता था। इस मोटापे ने उसके काले रंगरूप को और बदसूरत बना दिया था। ठुड्डी ने नीचे तह दर तह जमे मोटापा गले तक फैला था।
मृदुला के लिए पिता-पुत्र ने सहमति दे दी। वहाँ से लौट पापा नें बड़े दर्प से अम्मा को सुनाते हुए कहा – मुझे पता था कि नवीन को उसके ओहदे के अनुसार पत्नी और ससुराल जरूर मिलेगा। देखो कैसे भले लोग है। मुँह खोलने की नौबत ही नहीं आने दिया लड़कीवालों ने। बिना माँगे ही घर भरने के लिए तैयार हैं। दरअसल नवीन के ऊँचे पद और बहुत ऊंची तंख्वाह का पापा को बड़ा अहंकार था पर अम्मा दहेज के खिलाफ थीं।
खाना नहीं लगाते देख नवीन ने फिर माला को आवाज़ दी। टीवी से बिना नज़रें हटाये, मृदुला ने फरमाइश पेश कर दी। आज उसे फ़ैशन मॉल के फूड-कोर्ट से चाट और छोले खाने का मन है। नवीन, मृदुला की रोज़-रोज़ की फरमाइशों से परेशान था। पर वह मरे मन से चुपचाप कार में मृदुला को ले कर माल की ओर बढ़ गया।
मॉल पहुँच कर मृदुला ने उसे कुछ ताज़ी सब्जियाँ और फल लेने कहा, और एक ओर खड़ी हो गई। उसे मृदुला पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। पर वह बड़े बेमन से ख़रीदारी करने लगा। तभी सामने लगे बड़े-बड़े आईने में उसने अपने-आप और मृदुला को देखा। रोज़-रोज़ के होटलों के चटपटे भोजन ने उन्हें और गोल-मटोल बना दिया था। मन ही मन सोचने लगा- चलो, कल से माला को घर पर भोजन बनाने कहेगा। हाल में ही डाक्टर ने उन दोनों को वजन कम करने का निर्देश दिया था। अब सेहत पर ध्यान देना जरूरी है।
मृदुला के गुस्से को वह मॉल के कर्मचारियों पर उतारने लगा। हरी-हरी ताज़ी लौकी और तोरई देख कर भी वह झुँझला कर कहने लगा – ये लौकी तो मोटी हैं। मुझे लंबी और पतली लौकी चाहिए। तभी सामने लगे आईने में एक लंबी, छरहरी और आकर्षक महिला को वहाँ के कर्मचारियों को निर्देश देते देखा। चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, पर कुछ याद नहीं आया। मॉल का कर्मचारी, जो उसकी मदद कर रहा था, उसने बताया, वे यहाँ के मालिक की पत्नी है। बड़े अच्छे स्वभाव की हैं। उनके प्रयास से बहुत कम समय में ही मॉल ने बहुत तरक्की कर ली है।
बड़ी देर तक वह सब्जियों की ख़रीदारी में उलझा रहा, पर उसे कुछ ठीक से समझ ही नहीं आ रहा था। तभी पीछे से किसी महिला की मीठी आवाज़ आई। नवीन ने आईने में ही देखा ,उसकी मदद कर रहे कर्मचारी को उसी महिला ने आवाज़ देता हुए कहा – ये लंबी, मोटी, पतली में ही उलझे रह जायेंग। तुम दूसरे ग्राहकों की भी मदद करो। वह हतप्रभ रह गया। आवाज़ सुनते ही उसे सब याद आ गया। यह तो वीणा थी। उसके विवाह की बात वीणा से चली थी। उसे वीणा पसंद भी आ गई थी। नवीन ने उससे फोन पर बातें भी की थीं। दहेज की रकम और सामानों का लिस्ट देख वीणा के पिता ने असमर्थता जताई। नाराज़ हो कर उसके पापा ने बात रोक दी। चिढ़ कर, झूठमूठ उसके पापा ने वीणा के पापा को फोन पर कह दिया- आपकी लड़की थोड़ी मोटी और छोटी है। हमें लंबी और पतली बहू चाहिए।   हमें आपकी लड़की पसंद नहीं है।
नवीन आईने में कभी वीणा और कभी मृदुला को देखता रह गया। उसे लगा आईना उसे मुँह चिढ़ा रहा है। आज उसे अम्मा की बात बड़ी याद आ रही थी- “ धन नहीं गुण देखो बेटा”

वह कौन थी? ( अद्भुत अनुभव )

28 दिसंबर 2014 की सुबह थी। बीते हुए क्रिसमस की खुमारी थी। यहाँ-वहाँ सजावटी सितारे और क्रिसमस-ट्री नज़र आ रहे थे। आनेवाले नव वर्ष का उत्साह माहौल में छाया था। खुशनुमा गुलाबी जाड़ा पुणे के मौसम को खुशगवार बना रहा था। मैं, अधर और चाँदनी पुणे से मुंबई जाने के लिए टैक्सी से निकले थे। हल्की ठंड की वजह से हमें चाय पीने की इच्छा हुई। टैक्सी ड्राईवर ने पुणे के महात्मा गाँधी रोड के करीब एक ईरानी रेस्टरेंट के चाय-मस्के की बड़ी तारीफ की। हमारे कहने पर वह हमें वहाँ ले गया। यह सैन्य क्षेत्र था।यहाँ चारो ओर बड़े-बड़े हरे-भरे पेड़ थे। सड़क के किनारे करिने से पौधे लगे थे। यहाँ की हरियाली भरी खूबसूरती और शांत वातावरण बड़ी अच्छी लगी। पर टैक्सी रुकते ही पास में एक भिखारिन नज़र आई। गंदे ऊँचे स्कर्ट और लटकी हुई शर्ट के ऊपर फटी पुरानी स्वेटर और बिखरे बाल में बड़ी अजीब लग रही थी।बेहद दुबली पतली थी। शायद पागल भी थी। सड़क के किनारे, रेस्टोरेन्ट के बगल में खड़ी थी। उसने नज़र उठा कर हमारी ओर देखा। मैं उससे बचते हुए तेज़ी से दूसरी तरफ से घूमते हुए रेस्टोरेन्ट की तरफ बढ़ी। वह भी शायद जल्दी में थी। अपनी धुन में वह दूसरी ओर बढ़ गई। मैं ने चैन की साँस ली। सड़कों पर ऐसे भीख माँगनेवाले लोग मुझे असहज बना देते हैं।पता नहीं यह भिक्षावृति कब हमारे देश से ख़त्म होगी। किसी भी खूबसूरत जगह पर ये एक बदनुमा धब्बे की तरह लगते हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि इन्हे भीख दे कर इस प्रवृति को बढ़ावा देना चाहिए या डांट कर हटा देना चाहिए?
रेस्टोरेन्ट के अंदर जा कर मैं उस भिखारिन को भूल गई। ईरानी रेस्टोरेन्ट की चाय सचमुच बडी अच्छी थी। मन खुश हो गया। पूरा रेस्टोरेन्ट चाय पीने वाले लोगों से भरा था। गर्मा-गर्म चाय और साथ मेँ मस्का बड़ा लाजवाब था। पर बाहर निकलते ही फिर वही औरत नज़र आई। मैं तेज़ी से कार की ओर बढ़ी। शायद मैं उसे अनदेखा करना चाहती। तभी उसने शुद्ध अँग्रेजी मेँ मुझे आवाज़ दी और कहा- “मैडम, मैं बहुत भूखी हूँ। मुझे कुछ पैसे मिल जाते तो मस्का खरीद लेती। मेरे पास चाय है।“ उसने अपने हाथ मे पकड़ी हुई प्लास्टिक की गंदी और टेढ़ी-मेढ़ी बोतल दिखलाई। उसमें चाय थी। उसने फिर शालीनता से सलीकेदार भाषा मेँ अपनी बात दोहराई। मैं अवाक उसे देख रही थी। यह पागल सी दिखनेवाली भिखारिन कौन है? इसकी बोली और व्यवहार तो कुछ और ही बता रही थी। मैंने पीछे से आ रहे अपने पति अधर की ओर देखा। उन्होने पॉकेट से कुछ रुपये निकाल कर उस महिला को दिए। अधर ऐसे लोगों के साथ बड़ी सहजता और उदारता से पेश आते हैं। उस महिला ने मुस्कुरा कर मृदु स्वर मेँ धन्यवाद दिया। फिर मेरी ओर देखा और मेरे खुले बालों की प्रशंसा करते हुए नव वर्ष की शुभ कामना दी और कहा –“अपना ख्याल रखना।”
कार मेँ बैठते हुए मैंने अपना आश्चर्य प्रकट किया-“ इतनी सलीकेदार महिला इस हालत मेँ क्यों है?” तब टैक्सी ड्राईवर ने बताया कि वह महिला किसी जमाने के डर्बी किंग की पत्नी है।अति-धनी, जुआरी और रेस के शौकीन पति  की वजह से उसका यह हश्र हुआ। जुआ सिर्फ महाभारत काल का कलंक नहीं है। आज भी कई  निर्दोष परिवारों को  इसका मुल्य चुकाना पड़ा है।
उस दिन पहली बार भिक्षावृति का औचित्य समझ आया और अधर का ऐसे लोगों को मदद करने पर मन मेँ किसी तरह की दुविधा नहीं हुई।दरअसल भिक्षावृति प्राचीन काल से जरूरतमंदों, विद्यार्थियों और संतों के आजीविका का साधन रहा है। पर आज-कल यह एक गलत प्रचलन बन गया है। कुछ बेजरूरत लोगों ने इसे पेशा बना लिया है।

शैली और परियाँ ( बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी )

शैली और परियाँ
शैली मम्मी के धीर-गंभीर चेहरे को देख सोंच में पड़ गई। इधर कुछ दिनों से टीचर उसेसे नाराज़ दिख रहीं थीं। कभी गृह कार्य पूरा करने कहती रहतीं थीं। कभी उसकी लिखावट में कमियाँ निकालतीं। आनेवाले परीक्षा के लिए अच्छे से पढ़ाई करने कहती रहती। न-जाने इतनी छोटी-छोटी बातों के पीछे टीचर क्यों पड़ी थी। फिर तो मैम ने हद ही कर दिया। ना जाने उसकी स्कूल-डायरी में क्या लिख दिया। मम्मी भागी-भागी उनसे मिलने गई।टीचर से बात कर मम्मी शैली से थोड़ी नाराज़ दिखी।
वैसे तो उसकी टीचर बड़ी अच्छी हैं। बड़े प्यार से पढ़ाती और बातें करती। जब वे प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरते हुए बातें करती तब शैली को बड़ा अच्छा लगता। उनकी बोली बड़ी मीठी और प्यारी है। कहानियाँ तो वे इतने अच्छे से सुनातीं, लगता जैसे कहानियों के दुनियाँ में हीं पहुँच गए हों। सभी बच्चे उनसे प्यार करते थे। उसे भी अपनी मैम बड़ी प्यारी लगती थीं। पर आज उसे उन पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। उन्होंने मम्मी से उसकी शिकायत जो की थी।
टीचर को उसने मम्मी से कहते सुना था- शैली बहुत तेज़ और होशियार है। पर बड़ी बातुनी है। सारा समय गप्प करती रहती है। फिर जल्दीबाजी में काम पूरा करती है। इसलिए बहुत भूलें करती है और लिखावट भी खराब हो जाती है। शैली ने मन ही मन सोचा- बात तो टीचर ने सही कही है। पर मम्मी से शिकायत करने की क्या ज़रूरत थी? दोस्तों से गप्पें करने में उसे बहुत मज़ा आता था।
पिछले परीक्षा में जब उसे कम अंक आए थे तब मम्मी बड़ी हैरान हुईं थीं, क्योंकि सारे प्रश्न उन्होंने उसे पढ़ाये थे। फिर भी शैली ने आधे उत्तर नहीं दिये थे और गलतियाँ भी की थीं। शैली ने डर से मम्मी को बताया ही नहीं था कि उसे अपनी सहेली को उत्तर बताने में काफी समय लगा दिया था। इसलिए उसके पास समय कम बचा था।
शैली ने मम्मी का नाराज़ चेहरा गौर से देखा। उसे डर लगा। मम्मी नाराज़ होने पर उससे बात करना बंद कर देती हैं। तब उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता है। इसलिए उसने मम्मी को बातों से बहलाने की कोशिश की। वह मम्मी को स्कूल की बातें बताने लगी। पर मम्मी ने कुछ जवाब नहीं दिया। तब शैली ने मम्मी से बताया। कल मैम ने परियों की कहानी सुनाई थी। जिसमें परियाँ अच्छे बच्चों को टाफ़ियाँ और उपहार देतीं थीं। फिर उसने मम्मी से पूछा – मम्मी क्या सच में परियाँ होती हैं? जानती हो मम्मी मैंने कल रात में सपने में परियों को देखा था। उनके हाथों में टाफ़ियाँ थी। पर वे मेरे पास नहीं आई। उन्हों ने मुझे टाफ़ियाँ भी नहीं दी। उसने मम्मी की ओर देखा। मम्मी के चेहरे पर मुस्कान खेल रही थी। शैली ने राहत महसूस किया। लगता है अब मम्मी नाराज़ नहीं है।
मम्मी ने गौर से उसे देखा। प्यार से उसके बिखरे बालों को ठीक किया और कहा- हाँ, पारियाँ तो होती है। अच्छे बच्चों को इनाम भी देती है। मैं जब छोटी थी। तब जब भी अच्छे से पढ़ती-लिखती थी तब मुझे कही न कहीं टाफ़ियाँ पड़ी मिलती थीं। जरूर वे पारियाँ ही देती होंगी। तुम्हारी मैम ने सही कहा है। तुम भी कोशिश कर सकती हो।
शैली के मन में हलचल होने लगी। उसने निश्चय किया। आज से वह भी पारियों से इनाम पाने की कोशिश करेगी। घर पहुँच कर उसने अपना बस्ता, जूता, स्कूल-ड्रेस सभी सामान जगह पर रखे। हाथ-मुँह धो कर अपने से खाना खाने लगी। दरअसल वह मैम और मम्मी के सिखाये हर अच्छी बात को पूरा कर परियों को खुश करना चाहती थी। थोड़ी देर बाद अपना स्कूल बस्ता खोल कर गृह कार्य करने लगी। उसने सुंदर और साफ लिखावट में सारा काम पूरा किया। तभी मम्मी ने दूध का ग्लास दिया। मम्मी उससे बहुत खुश थीं। यह मम्मी के चेहरे से ही लग रहा था। पर शैली परेशान थी। अभी तक परियाँ उसके पास नहीं आईं थी। तभी मम्मी ने कहा- शैली, अच्छे बच्चे अपने सामान बिखेरतें नहीं है। शैली जल्दी से अपने कापी-किताब समेटने लगी। जैसे हीं वह कापी – किताब बैग में डालने लगी, उसे बैग में कुछ चमकता हुआ नज़र आया। उसने हाथ अंदर डाला। अरे ! इसमें तो टाफ़ियाँ हैं। वह खुशी से चिल्ला पड़ी- मम्मी, देखो परियों ने मुझे टाफ़ियाँ दी है। शैली का चेहरा खुशी से चमकने लगा। वह मुँह में टाफी डालते हुए खेलने चली गई।
अब वह हर दिन अपना सारा काम और पढ़ाई समझदारी से करने लगी। हर दिन उसे कुछ न कुछ उपहार मिलने लगा। कभी किताबों के बीच, कभी पेंसिल डब्बे में, कभी तकिये के नीचे से टाफ़ियाँ, नए पेंसिल-रबर, सुंदर चित्रों वाली किताबें मिलती। उसे बड़ा मज़ा आने लगा।
परीक्षा हो गए। रिजल्ट आया तब वह हैरान रह गई। उसे विश्वाश ही नहीं हो रहा था। वह कक्षा में प्रथम आई थी। उसने मन ही मन परियों को धन्यवाद दिया। यह परियों का दिया सबसे बड़ा उपहार था।
मम्मी-पापा, उसकी टीचर सभी उससे बहुत खुश थे। रात में सोते समय उसने मम्मी से कहा – मम्मी परियों की वजह से मैं कक्षा में प्रथम आई। पर मम्मी वे मुझे कभी नज़र क्यों नहीं आती हैं? मम्मी ने हँस कर कहा – बेटा, तुम कक्षा में अपनी मेहनत और समझदारी के कारण प्रथम आई हो, क्योंकि तुम अच्छे बच्चों की तरह हर दिन मन से पढाई करने लगी। तुमने अपनी लिखावट भी सुधार ली। यह उसका ही परिणाम है। परियों ने तुम्हें प्रथम नहीं कराया है। शैली ने हैरानी से पूछा- फिर मुझे टाफ़ियाँ और उपहार कौन देता था? मम्मी ने उसके आगे अपनी मुट्ठी खोली। उसमे वही टाफ़ियाँ भरी थीं। शैली चौंक कर बोल पड़ी – अच्छा, तो मेरी परी तुम हो? मम्मी ने मुस्कुरा कर कहा- बेटा, सभी बच्चों में योग्यता होती है। पर वे मेहनत नहीं करते है। जब तुमने पारियों के सपने की बात बताई। तब मैंने उसका उपयोग कर तुम्हें प्रेरित करने का निश्चय किया। मैंने तुम्हें परियों के उपहार के रूप में इनाम दे कर तुम्हारा हौसला बढ़ाया। तुम जब इनाम पाने की कोशिश में हर दिन मेहनत करने लगी तब तुम्हें उसका नतीजा मिला। अब तो तुम यह अच्छी तरह समझ गई होगी कि अपनी योग्यता का सही उपयोग करने के लिए स्वयं मेहनत करना जरूरी है। मम्मी की बात सुनकर शैली के चेहरे पर आत्मविश्वास भरी मुस्कान खेलने लगी।

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यह कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित है। अगर पुरस्कार और सज़ा का इस्तेमाल बच्चों पर साकारात्मक तरीके से किया जाए, तब इसके लाजवाब परिणाम सामने आते हैं। यह कहानी वास्तव में कहानी नहीं, बल्कि अपने बच्चों के ऊपर आजमाए हुए अद्भुत सकारात्मक बाल मनोविज्ञान के उपयोग का उदाहरण है।

मेरी माँ ( बाल कथा, रोचक जानकारियों पर आधारित )

गुड्डू स्कूल से लौट कर मम्मी को पूरे घर मे खोजते- खोजते परेशान हो गई। मम्मी कहीं मिल ही नहीं रही थी। वह रोते-रोते नानी के पास पहुँच गई। नानी ने बताया मम्मी अस्पताल गई है। कुछ दिनों में वापस आ जाएगी। तब तक नानी उसका ख्याल रखेगी। शाम में  नानी के हाथ से दूध पीना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। दूध पी कर,वह बिस्तर में  रोते- रोते न जाने कब सो गई।रात में  पापा ने उसे  खाना खाने उठाया।  वह पापा से लिपट गई। उसे लगा,चलो पापा तो पास है। पर खाना खाते-खाते पापा ने समझाया कि मम्मी अस्पताल में हैं। रात में वे  अकेली न रहें  इसलिए पापा को अस्पताल  जाना पड़ेगा।गुड्डू उदास हो गई। वह डर भी गई थी। वह जानना चाहती थी कि मम्मी अचानक अस्पताल क्यों  गई? पर कोई कुछ बता  नहीं रहा था।

उसकी आँखों  में आँसू  देख कर नानी उसके बगल में  लेट गई। उन्होंने गुड्डू से पूछा-” गुड्डू कहानी सुनना है क्या? अच्छा, मै तुम्हें कछुए की कहानी सुनाती हूँ।’ गुड्डू ने जल्दी से कहा-” नहीं, नहीं,कोई नई कहानी सुनाओ न ! कछुए और खरगोश की कहानी तो स्कूल में आज ही मेरी टीचर ने सुनाई थी।”

नानी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया-” यह दूसरी कहानी है। गुड्डू ने आँखों  के आँसू  पोछ लिए।   नानी ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा- ” बेटा, यह  पैसेफिक  समुद्र और हिंद महासागर  में रहने  वाले कछुओं की कहानी  हैं।ये  आलिव रीडले कछुए के नाम से जाने जाते हैं। हर साल ये कछुए सैकड़ो किलोमीटर दूर से अंडा देने हमारे देश के समुद्र तट पर आते हैं। गुड्डू ने हैरानी से नानी से पूछा- ये   हमारे देश में कहाँ अंडे देने आते हैं? ” नानी ने जवाब दिया- ये कछुए हर साल उड़ीसा के गहिरमाथा  नाम के जगह पर लाखों की संख्या में आते हैं। अंडे दे कर ये वापस समुद्र में चले जाते हैं। इन  छोटे समुद्री   कछुओं का यह जन्म स्थान होता है।

फिर नानी ने कहानी शुरू की।समुद्र के किनारे बालू के नीचे कछुओं  के  घोसले  थे ।ये सब घोसले आलिवे रीडले  कछुए थे।ऐसे  ही एक घोसले   में कछुओ के ढेरो अंडे थे।कुछ समय बाद अंडो से बच्चे निकलने लगे।अंडे से निकालने के बाद बच्चों ने घोसले के चारो ओर चक्कर लगाया। जैसे वे कुछ खोज रहे हो।दरअसल वे अपनी माँ को खोज रहे थे। पर वे अपनी माँ को पहचानते  ही नहीं थे। माँ को खोजते -खोजते वे सब धीरे-धीरे  सागर की ओर बढ़ने लगे। सबसे आगे हल्के हरे रंग का ‘ऑलिव’ कछुआ था।उसके पीछे ढेरो छोटे-छोटे कछुए थे। वे सभी उसके भाई-बहन थे।

‘ऑलिव’ ने थोड़ी दूर एक सफ़ेद बगुले को देखा। उसने पीछे मुड़ कर अपने भाई-बहनों  से पूछा- वह हमारी माँ है क्या? हमलोग जब अंडे से निकले थे, तब हमारी माँ हमारे पास नहीं थी।हम उसे कैसे पहचानेगें? पीछे आ रहे गहरे भूरे रंग के कॉफी कछुए ने कहा- भागो-भागो, यह हमारी माँ नहीं हो सकती है। इसने तो एक छोटे से कछुए को खाने के लिए चोंच में पकड़ रखा है।थोड़ा आगे जाने पर उन्हे एक केकड़ा नज़र आया। ऑलिव ने पास जा कर पूछा- क्या तुम मेरी माँ हो? केकड़े ने कहा- नहीं मै तुम्हारी माँ नहीं हूँ।वह तो तुम्हें समुद्र मे मिलेगी।

सभी छोटे कछुए तेज़ी से समुद्र की ओर भागने लगे। नीले पानी की लहरे उन्हें  अपने साथ सागर मे बहा ले गई।पानी मे पहुचते ही वे उसमे तैरने लगे। तभी एक डॉल्फ़िन मछली तैरती नज़र आई।इस बार भूरे रंग के ‘कॉफी’ कछुए ने आगे बढ़ कर पूछा- क्या तुम हमारी माँ हो? डॉल्फ़िन ने हँस कर कहा- अरे बुद्धू, तुम्हारी माँ तो तुम जैसी ही होगी न? मै तुम्हारी माँ नहीं हूँ। फिर उसने एक ओर इशारा किया। सभी बच्चे तेज़ी से उधर तैरने लगे।सामने चट्टान के नीचे उन्हे एक बहुत बड़ा कछुआ दिखा। सभी छोटे कछुआ उसके पास पहुच कर माँ-माँ पुकारने लगे। बड़े कछुए ने मुस्कुरा कर देखा और कहा- मैं  तुम जैसी तो हूँ।  पर तुम्हारी माँ नहीं हूँ। सभी बच्चे चिल्ला पड़े- फिर हमारी माँ कहाँ  है? बड़े कछुए ने उन्हें  पास बुलाया और कहा- सुनो बच्चों, कछुआ मम्मी अपने अंडे, समुद्र के किनारे बालू के नीचे घोंसले बना कर देती है। फिर उसे बालू से ढ़क देती है।  वह वापस हमेशा के लिए समुद्र मे चली जाती है। वह कभी वापस नहीं आती है। अंडे से निकलने के बाद बच्चों को समुद्र में जा करअपना रास्ता स्वयं खोजना पड़ता है। तुम्हारे सामने यह खूबसूरत समुद्र फैला है। जाओ, आगे बढ़ो और अपने आप जिंदगी जीना सीखो।सभी बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी गहरे नीले पानी में आगे बढ़ गए।

कहानी सुन कर गुड्डू सोचने लगी, काश मेरे भी छोटे भाई या बहन होते। कहानी पूरी कर नानी ने गुड्डू की आँसू  भरी आँखें  देख कर पूछा- अरे,इतने छोटे कछुए इतने बहादुर होते है। तुम तो बड़ी हो चुकी हो।फिर भी रो रही हो? मै रोना नहीं चाहती हूँ । पर मम्मी को याद कर रोना आ जाता है। आँसू पोंछ  कर गुड्डू ने मुस्कुराते हुए कहा। थोड़ी देर में वह  गहरी नींद मे डूब गई।

अगली सुबह पापा उसे अपने साथ अस्पताल ले गए। वह भी मम्मी से मिलने के लिए परेशान थी। पास पहुँचने प पर उसे लगा जैसे उसका सपना साकार हो गया। वह ख़ुशी से उछल पड़ी। मम्मी के बगल में  एक छोटी सी गुड़िया जैसी बेबी सो रही थी। मम्मी ने बताया, वह दीदी बन गई है। यह गुड़िया उसकी छोटी बहन है।

(यह कहानी एक बच्ची के  बाल मनोविज्ञान पर आधारित है।यह कहानी ऑलिव रीडले कछुओं के बारे में भी  बच्चों को जानकारी  देती है।” ऑलिव रीडले” कछुओं की एक दुर्लभ प्रजाति है। प्रत्येक वर्ष उड़ीशा के समुद्र तट पर लाखों की संख्या में ये अंडे देने आतें हैं।यह एक रहस्य है कि   ये कछुए पैसिफ़ीक सागर और हिन्द महासागर से  इस तट पर ही क्यों  अंडे देने आते हैं।)

चाँदनी और सैल्मन (बाल मनोविज्ञान पर आधारित बाल कथा )

स्कूल बैग बालू पर फेंक  कर वह एक चट्टान पर पर जा कर बैठ गई। उसकी आँखों  से आँसू बह रह थे। उसने स्कूल के कपड़े  भी नहीं बदले  थे। उसके आँसू समुन्द्र के पानी में टपक कर उसे और भी खारा बना रहे थे। समुद्र की चाँदी जैसी झिमिलाती लहरें चट्टान से टकरा कर शोर मचाती वापस लौट  रहीं थीं।

9 वर्ष की चाँदनी रोज़ स्कूल की छुट्टी के बाद भागती हुई समुन्द्र के किनारे आती थी। यह उसका रोज़ का नियम था। पिछले महीने ही जब उसे शहर के सब से अच्छे स्कूल में  दाखिला मिला तब वह खुशी से नाच उठी थी। उसके  माता-पिता भी बहुत खुश थे। चाँदनी बहुत मेधावी छात्रा थी। उसके माता-पिता उसे बहुत अच्छी और ऊंची शिक्षा देना चाहते थे। पर छोटे से गाँव में यह संभव नहीं था।

इसीलिए इस स्कूल में दाखिला के लिये चाँदनी ने बहुत मेहनत की थी। पर तब उसे यह कहाँ  पता था कि हॉस्टल में  रहना इतना खराब लगेगा। नया स्कूल भी उसे अच्छा नहीं लग रहा था।वैसे तो स्कूल बड़ा सुंदर था। आगे बहुत बड़ा खेल का मैदान था। पीछे एक बड़ा बगीचा था। स्कूल कंटीले तारों  से घिरा था। स्कूल के पीछे था बालू और फिर फैला था  नीला, गहरा  समुद्र।

मम्मी-पप्पा से दूर, उसे यहाँ  बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। यहाँ न तो कोई टीचर उसे पहचानते थे, न कोई अच्छी सहेली थी। पुराने स्कूल की वह सबसे अच्छी छात्रा थी। सभी  टीचर उसे पहचानते थे और सभी उसे बहुत प्यार करते थे। क्लास के शरारती और कम अंक लाने वाले बच्चों को उसका उदाहरण दिया जाता था। सहेलियां पढ़ाई में  उसकी मदद लेती रहती थीं । राधा बुआ ने तो अपनी बेटी श्रेया को हमेशा चाँदनी के साथ रहने कह दिया था, ताकि वह भी चाँदनी की तरह होनहार और होशियार बन सके।

हॉस्टल के हर खाने का स्वाद उसे एक जैसा लगता था। माँ के हाथों के स्वादिष्ट खाने को याद कर उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे और वह बिना खाये ही उठ जाती थी। उसे सिर्फ शनिवार का दिन अच्छा लगता था  क्योंकि  उस दिन छुट्टी होती थी। साथ ही यह घर से फोन आने का दिन भी होता था। मम्मी पप्पा के फोन का इंतज़ार करते हुए सोचती रहती कि इस बार वह उन्हें साफ-साफ बोल देगी कि वह यहाँ  नहीं रहना चाहती है। पर मम्मी की आवाज़ सुन कर ही समझ जाती कि वे अपनी रुलाई रोक रहीं हैं। पप्पा की बातों से भी लगता कि वे उसे बहुत याद  करतें हैं। पप्पा उसे बहादुर, समझदार और न जाने क्या- क्या कहते रहते। वे उसके उज्ज्वल भविष्य की बातें समझाते रहते  और वह बिना आवाज़ रोती रहती।

आज़ उसे गणित  के परीक्षा में बहुत कम अंक मिले थे। उसकी शिक्षिका हैरानी से उसे देख रहीं थीं क्योंकि वह चाँदनी के क्लास परफॉर्मेंस से वह बहुत खुश थीं। उन्हें  मालूम था कि चाँदनी बहुत ज़हीन  छात्रा है। उन्हों ने  चाँदनी को बुला कर प्यार से समझाया भी। पर आज वह इतनी दुखी थी कि उसे कुछ भी सुनना अच्छा  नहीं लग रहा था। इतने कम अंक तो उसे कभी नहीं आए थे। आज़ सागर किनारे बैठे-बैठे उसे लग रहा था कि वह मम्मी-पप्पा के सपने को साकार नहीं कर पाएगी। उसे अपनी योग्यता पर शक होने लगा था।

आज़ उसका मन वापस हॉस्टल जाने बिल्कुल नहीं था। आँखों से बहते आँसू उसके गुलाबी गालों से बह कर पानी में  टपक रहे थे। अचानक उसे मीठी और महीन आवाज़ सुनाई दी, जैसे उससे कोई कुछ पूछ रहा है। हैरानी से वह नज़र घुमाने लगी। पर कुछ समझ नहीं आया। तभी आवाज़ फिर सुनाई दी- “तुम कौन हो? क्यों रो रही हो?”

चाँदनी ने हैरानी से नीचे पानी में  चाँदी जैसी चमकती एक सुंदर मछली को देखा। तो क्या यह इस मछली की आवाज़ है? पर उसे विश्वाश नहीं हुआ। उसने आँसू से धुंधली आँखों को हथेलियों से पोछ कर फिर से देखने की कोशिश की। एक सुंदर झिलमिलाती मछ्ली पानी की सतह पर तैर रही थी। मछ्ली के रुपहले  शरीर पर पड़ती सूरज की किरणे उसे और चमकदार और सुंदर बना रहीं थीं। यह मछली शायद बड़ी चुलबुली थी। वह कभी पानी के सतह पर आती कभी अंदर डुबकी लगा लेती। वह लगातार इधर-उधर शरारत से तैर रही थी। चाँदनी रोना भूल कर मछली को निहारने लगी। एक बार तो  मछली पानी से बाहर ऊपर उसके करीब कूद कर वापस पानी में चली गई। चाँदनी को मछली की हरकतों को देखने में इतना मज़ा आ रहा था कि उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। अचानक मछली के पंखो पर डूबते सूरज की लालिमा चमकते देख चाँदनी ने नज़रे उठाई।  शाम ढाल रही थी। वह घबरा गई। वह बैग उठा कर स्कूल हॉस्टल की ओर लपकी। गनीमत था कि किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वह वह बहुत देर से हॉस्टल से बाहर थी। रात में बिस्तर पर  लेटे-लेटे सोचती रही कि क्या सचमुच वह मछली बोल रही थी। सपने में  भी उसे वही मछली  नज़र आती रही।

अगली दिन स्कूल के बाद वह दौड़ती हुई समुद्र के किनारे चट्टान पर पहुँच गई। आज उसकी  आँखों में आँसू   नहीं, उत्सुकता थी। उसकी आँखें  उसी मछली को  खोज रही थीं । पर वह नज़र नहीं आई। चाँदनी मायूस हो गई। तभी अचानक  मुँह से बुलबुले निकालती वही मछली पानी की सतह पर आ गई। चाँदनी एकाएक पूछ बैठी- तुम ने इतनी देर क्यों लगाई? तुम्हारा नाम क्या है?

मछली जैसे जवाब देने को तैयार बैठी थी। उसने कहा- मैं सैल्मन  मछली हूँ । मेरा नाम चमकीली है। मैं  इस समुद्र में रहती हूँ। तुम कौन हो? चाँदनी हैरान थी। अरे! यह तो सचमुच बातें कर रही है। चाँदनी ने उसे अपना नाम बताया। दोनों ने ढेर सारी बातें की। सैल्मन उसे सागर के अंदर की दुनियाँ के बारे मे बताने लगी कि वह भोजन की तलाश में  समुद्र में  दूर-दूर तक तक जाती है। आज भी वह भोजन की तलाश में  दूर निकाल गई थी। इसीलिए उसे यहाँ  आने में  देर हो गई।

थोड़ी देर मे चाँदनी सैल्मन  को बाय-बाय कर गाना गुनगुनाते हुए हॉस्टल लौट चली।आज चाँदनी खुश थी क्योंकि उसे एक सहेली जो मिल गई थी। अब वह अक्सर  सागर किनारे अपनी सहेली से बातें  करने पंहुच जाती थी। उसे दिन भर की बातें  और अपनी परेशानियाँ  बताती थी। सैल्मन  उसकी बातें  सुनती रहती और पानी की सतह पर इधर -उधर तैरती  रहती। कभी अपना मुँह  गोल कर बुलबुले निकलती। उसकी चुलबुली हरकतों को देख कर चाँदनी अपनी सारी परेशानियों को भूल, खिलखिला कर हँसने लगती और हॉस्टल से चुपके से लाये रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े  सैल्मन  को देने लगती। बहुत बार सैल्मन  पानी से ऊपर कूद कर रोटी के टुकडों को मुँह  में  पकड़ने की कोशिश करती तो चाँदनी को बड़ा मज़ा आता। वह सोचने लगती, काश वह भी मछली होती। तब जिंदगी कितनी अच्छी होती। मज़े मे अपने घर मे रहती। जहाँ मन चाहे तैरती रहती।

अगली शाम उसे सैल्मन  के चमकते पंखो पर कुछ खरोचें नज़र आई। पूछने पर सैल्मन  ने बताया कि वह मछुआरों के जाल मे फँस गई थी। पर जाल में एक छेद होने कि वजह से किसी तरह से बाहर निकल गई। ये खरोचें उसी जाल के तारों  से लग गए हैं । सैल्मन ने कहा -” शुक्र है मेरी जान बच गई।” चाँदनी सिहर उठी। वह बोल पड़ी- चमकीली क्या सागर में तुम्हें खतरे भी है?  सैल्मन ने  कहा- सागर में खतरे ही खतरे हैं। बड़ी- बड़ी मछलियां, शार्क, सील और मछुआरों  के जालों जैसे खतरे हमेशा बने रहते हैं।

अचानक चाँदनी को सैल्मन होने की अपनी कल्पना पर अफसोस होने लगा। उसकी ज़िदगी तो में तो  ऐसी कोई परेशानी ही नहीं थी। उसे तो सिर्फ मन लगा कर पढ़ाई करना है। आज उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह अच्छी तरह से पढ़ाई करेगी। अब उसे स्कूल पहले से अच्छा लगने लगा था और पढ़ाई में भी मन लगने लगा था। पर घर की याद उसे हमेशा सताते रहती थी।

शनिवार को सुबह- सुबह ही मम्मी-पप्पा का फोन आ गया। पप्पा ने अच्छी और बुरी दोनों खबरें सुनाई। बुरी खबर थी कि मम्मी  को बुखार था। उनकी आवाज़ भी भारी थी। उसका मन उदास हो गया। पर अपनी प्यारी बिल्ली किटी के तीन प्यारे,सुंदर और सफ़ेद बच्चों के होने की खबर से वह खुश हो गई। पप्पा से उसने प्रश्नो की झड़ी लगा दी।

बहुत दिनों बाद चाँदनी की चहकती आवाज़ सुन पप्पा  भी हँस-हँस कर उसकी बातों का जवाब देते रहे। उसने पप्पा को बताया कि उसे क्लास- टेस्ट में वहुत अच्छे अंक आए है और उसके परीक्षा की तिथि  भी बता दी  गई  है। परीक्षा खत्म होते ही स्कूल में लंबी छुट्टी हो जाएगी। तब वह घर आएगी। तब किटी और उसके बच्चों के साथ खूब खेलेगी। वास्तव में उसे परीक्षा से ज्यादा इंतज़ार छुट्टियों की थी। पर फोन रखते ही उसे रोना आने लगा। उसका मन करने लगा कि वह उड़ कर घर पंहुच जाये।

वह आँसू भरी  आँखों  के साथ चट्टान पर जा बैठी और चमकीली को आवाज़ देने लगी। पर चमकीली का कहीं पता नहीं था। चाँदनी ज़ोरों से डर गई। उसे सैल्मन  के जाल में फँसनेवाली घटना याद आ गई। वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसे पता ही नहीं चला की सुबह का सूरज कब ऊपर चढ़ आया। अचानक उसके चेहरे पर पानी के छींटे पड़े। उसने दोनों हथेलियो के उल्टी तरफ से अपनी आँखें पोछने की कोशिश की।  तभी उसकी नज़र चमकीली पर पड़ी। वह अपनी पूंछ  से उसकी ओर पानी उछाल रही थी। चमकीली ने घबराई आवाज़ में पूछा- तुम आज सुबह-सुबह कैसे आ गई?  इतना रो क्यों रही हो?

चमकीली को देख कर चाँदनी का डर गुस्से में बदल गया। सुबकते हुए, नाराजगी से उसने कहा-” तुम ने आने में इतनी देर क्यों  लगाई। मैं तो डर गई थी। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती हूँ। तुम्हारे सिवा यहाँ  मेरा कौन है? मेरे मम्मी-पप्पा यहाँ से बहुत दूर है।” चमकीली ने हँस कर कहा -” बस इतनी सी बात? आज तो एक शार्क मेरे पीछे ही पड़ गई थी। उससे बचने के लिए मैं सागर की अतल गहराई में मूंगा चट्टानों के बीच जा कर छुप गई थी। अभी-अभी मेरी सहेलियों के मुझे बताया,  तुम मुझे आवाज़ दे रही हो।” चाँदनी को अभी भी सुबकते देख कर चमकीली उसे बहलाते हुए बोली- “अरे, तुम तो बहादुर और समझदार लड़की हो। इतनी छोटी-छोटी बातों से मत घबराओ। तुम्हें बहुत पढ़ाई करनी है और जिंदगी में बहुत आगे बढ़ाना है।”

अभी भी चाँदनी की बड़ी-बड़ी सुंदर आँखों से गाल पर टपकते आँसू  देख कर चमकीली ने कहा- “अच्छा, आराम से बैठो। मैं  तुम्हें अपनी कहानी सुनती हूँ । तब तुम्हें समझ आएगा कि  छोटी-छोटी बातों से नहीं घबराना चाहिए। तुम्हें तो दुनिया की सब सुविधाएँ मिली हैं । राह दिखाने के लिए मम्मी-पप्पा हैं । तुम्हें तो बस मन लगा कर पढना है।”

तुम्हारी कहानी? चाँदनी ने आश्चर्य से पूछा। तुम तो अपने मम्मी-पप्पा और ढेरो सहेलियों के साथ इस खूबसूरत समुद्र में  इठलाते रहती हो। तुम क्या जानो मेरी परेशानियां। मुझे घर से दूर हॉस्टल में रहना पड़ता है। ढेरो पढ़ाई करनी पड़ती है। फिर ऊपर से परीक्षा  की मुसीबत भी रहती है। लेकिन एक अच्छी बात यह है कि थोड़े ही दिनों में मेरी छुट्टियाँ होनेवाली हैं।  फिर मैं  घर जाने वाली हूँ। लेकिन तुरंत ही चाँदनी उत्सुकता से आँखें गोल कर बोल पड़ी- “अच्छा, चलो अपनी कहानी जल्दी मुझे सुनाओ।” सैल्मन  पानी पर गोल-गोल चक्कर लगा कर सतह पर बिल्कुल चाँदनी के सामने आ गई। फिर मुँह  से ढेर सारे बुलबुले निकाल कर कुछ याद करने लगी।

चमकीली कुछ सोचते-सोचते बोलने लगी-” जानती हो चाँदनी, मेरा घर यहाँ  से सैकड़ो मील दूर ताजे पानी के झरने और नदियों में है। मेरे माता-पिता तो इस दुनियां में हैं ही नहीं। हमें तो हर बात अपने आप ही सीखना होता है। पूरी ज़िंदगी हम अपना रास्ता स्वयं खोजते हैं।  हम जन्म तो ताज़े पानी की नदियों  में लेते हैं, पर उसके बाद हम नदियों  के बहाव के साथ समुद्र में  चले आते हैं । यह विशाल सागर हमारे लिए एकदम अनजान होता है। हमें  राह दिखने वाला कोई नहीं होता है। यह विस्तृत सागर देखने में तो सुंदर है। पर खतरों से भरा होता है। हर तरफ शिकारी हम जैसी मछलियों को पकड़ने की ताक में रहते हैं। हमारी  एक भूल भी जानलेवा हो सकती है।”

मेरा जन्म यहाँ  से बहुत दूर एक ताज़े पानी के झरने में हुआ था। मेरी माँ ने झरने की गहराइयों में घोसलें में अंडे के रूप में मुझे जन्म दिया। चाँदनी पूछ बैठी-” घोंसला? वह तो चिड़ियों  का होता है। पानी के अंदर कैसे घोंसला बनता है?’ सैल्मन शरारत से चाँदनी के एकदम सामने तक कूद कर पानी के छींटे उडाती वापस पानी के अंदर चली गई। फिर वह चाँदनी को समझाने लगी-” हमारा घोंसला चिड़ियों की तरह तिनकों का नहीं, बल्की कंकड़ों का होता है। मेरी माँ ने झरने के तल में एक छोटे से स्थान को अपनी पूंछ से साफ किया। फिर गड्ढा बनाया कर चारो ओर से कंकड़ो से घेर कर घोंसला बनाया था। उस घोंसले में मेरी माँ ने ढेरो अंडे दिए। इस तरह अंडे के रूप में मेरा जन्म हुआ। मेरे माता-पिता ने कुछ हफ्ते हमारी और घोंसले की देख-भाल की। उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई।”

चाँदनी आश्चर्य से सैल्मन  को देख रही थी। उसकी आँखों में आँसू आ गए।  पर उसने चुपके से उन्हे पोंछ लिया। इतने दर्दनाक जीवन की शुरुआत के बाद चमकीली जब इतना मस्त रहती है। तब चाँदनी का  इतना कमजोर होना अच्छा नहीं है। उसे भी चमकीली की तरह समझदार और साहसी बनाना होगा। चाँदनी ने पूछा –” फिर?”

चमकीली ने अपनी कहानी आगे बढ़ाई। वह बोली-‘ कुछ समय बाद मैं अंडे से बाहर आई। तब मैं बिलकुल छोटी थी ।तब अक्सर मैं और मेरे भाई-बहन कंकड़ो और चट्टानों के बीच दुबके रहते थे। क्योंकि हमारे चारो ओर खतरा ही खतरा था।  बड़ी मछलियाँ, कीड़े और पंछी हमें खाने की  ताक में रहते थे। चट्टानों, पत्थरो  और पौधों के बीच छुप कर मैंने अपना बचपन गुजारा।

जब मैं अंडे से निकली थी तब मुझे तैरना भी नहीं आता था। मै अपना पूंछ हिला कर घोंसले में ही इधर-उधर करती रहती थी।  धीरे-धीरे मैंने तैरना सीखा।” चाँदनी ने आश्चर्य से पूछा –”चमकीली, तब तुम्हें खाना कौन देता था?” “अरे बुद्धू, हमें तुम बच्चों जैसा खाना बना कर देनेवाला कोई नहीं होता है। हम जिस अंडे से निकलते हैं। उसका कुछ हिस्सा हमारे पेट के साथ लगा रहता है। वही हमारा भोजन होता है-”  चमकीली ने समझाया। फिर उसने कहा-“जानती हो चाँदनी, मेरा वह झरना बहुत सुंदर था। जैसे तुम्हें अपना घर याद आता है वैसे ही मुझे भी अपना झरना याद आता है। जैसे तुम अपने घर जाना चाहती हो, वैसे ही मुझे भी एक दिन अपने घर जाना है। मेरा झरना विशाल था। ऊपर पहाड़ पर जमा बर्फ गल कर झरने के रूप में बहता था। झरने से मीठी कल-कल की आवाज़ गीत जैसी लगती थी। मेरा झरना एक विशाल नदी में  गिरता था, जिसका नीला, ठंडा और निर्मल पानी इतना साफ था कि उसकी तल साफ नज़र आती थी।”

चाँदनी अब चट्टान पर पेट के बल लेट कर बड़े ध्यान से सुन रही थी। वह ठुड्डी को दोनों हथेलियों पर टिका कर कोहनी के बल लेट गई थी। चमकीली की बात सुन कर वह बोली-” इतने साफ पानी में तैरने में बड़ा मज़ा आता होगा?” चमकीली बोली-” मज़ा? अरे मज़ा से ज्यादा तो खतरा रहता था। शिकारियों से छुपने और बच कर भागने में बडी मुश्किल होती थी।

थोड़े बड़े होने पर मैं अपने मित्रो के साथ झुंड बना कर खाने के खोज में बाहर निकलने लगी। फिर हमारा झुंड नदी की धार के साथ आगे बढ़ने लगा। हम सभी नदी के मुहाने पर पहुँचने के बाद कुछ समय वहीं रुक गए। हमारे आगे विशाल सागर लहरा रहा था।” चाँदनी ने कहा-” रुको-रुको, तुम पहले मुझे बताओ ‘मुहाने’ का क्या मतलब होता है? और तुम वहाँ पर रुक क्यों गई?” चमकीली ने पानी से बाहर छलाँग लगाई, पूंछ से चाँदनी के चेहरे पर पानी के छीटे उड़ाती हुई वापस छपाक से पानी के अंदर चली गई। चाँदनी खिलखिला कर हँसने लगी और बोली- चमकीली, शैतानी मत करो। नहीं तो मैं भी पानी में कूद पड़ूँगी।’ सैल्मन ने हड्बड़ा कर कहा-” चाँदनी, भूल कर भी ऐसा मत करना। यह सागर बड़ा गहरा है और तुम्हें तैरना भी नहीं आता है। जब तुम बड़ी हो जाओगी और तैरना सीख लोगी तब समुद्र में गोते लगाना। तब तुम  समुन्द्र और हमारे बारे में पढ़ाई भी करना।” अच्छा-अच्छा अब आगे बताओ न चमकीली –चाँदनी बेचैनी से बोल पड़ी।

सैल्मन ने समझाया- “चाँदनी, मुहाना वह जगह है जहाँ नदी सागर में मिलती है। अर्थात समुद्र और नदी का मिलन स्थल। यहाँ  तक पानी मीठा होता है। जबकि सागर का पानी नमकीन होता है। यहाँ पर कुछ समय तक रह कर हम अपने-आप को नमकीन पानी में रहने लायक बनाते हैं। तभी हम समुद्र में रह पाते है। हम झुंड में लगभग एक वर्ष की आयु तक मुहाने पर रहते हैं। फिर हम सब समुद्र की ओर बढ़ जाते हैं। अगले कुछ वर्षो तक समुद्र ही हमारा घर बन  जाता है।” सैल्मन ने समझदारी के साथ समझाया।

फिर अचानक चमकीली ने चाँदनी से पूछा- “चाँदनी, आज तुम मेरे लिए रोटी लाना भूल गई क्या? चाँदनी के पेट में भी चूहे कूद रहे थे। चाँदनी को याद आया कि आज उसने नाश्ता ही नही किया है। पापा- मम्मी से बातें करने के बाद से वह यहाँ आ गई है। अब दोपहर हो गया है। चाँदनी घबरा गई।हॉस्टल में सभी उसे खोज रहे होंगे। चाँदनी ने जल्दीबाजी में सैल्मन  से कहा-‘ चमकीली, अब मुझे जाना होगा। बड़ी देर हो गई है। तुम्हारी बाकी कहानी बाद में सुनूगीं। ठीक है न? बाय- बाय सैल्मन  !”

वह तेज़ी से भागते हुए स्कूल के पीछे के बाउंड्री के पास पहूँची जो कटीले तारों  का बना था। उन तारों के ऊपर बसंत-मालती की लताएँ फैली थी। लताओं पर गुच्छे के गुच्छे खूबसूरत सफ़ेद-गुलाबी बसंत मालती के फूल झूल रहे थे। फूलों की खुशबू चारो ओर फैली हुई थी। उसे ये फूल और इनकी खुशबू बहुत पसंद थी। पर अभी उसका ध्यान कहीं और था। उसने बड़ी सावधानी से एक जगह की लताओं को उठाया और अपने छुपे छोटे से रास्ते से लेट कर सरकती हुई अंदर चली गई। अंदर जा कर उसने अपने कपड़े में लगे बालू को झाड़ा और हॉस्टल की ओर भागी। फूलों  और लताओं ने झूल कर रास्ते को फिर छुपा दिया।

कुछ दिनो तक चाँदनी को सागर के किनारे जाने का मौका नहीं मिला। परीक्षा के कारण वह पढ़ाई में व्यस्त हो गई। चमकीली ने ठीक कहा था- “तुम्हें जीवन की सारी सुविधाएँ  मिली हैं। बस मन लगा कर पढ़ना है।” पर चमकीली की आगे की कहानी जानने के लिए वह बेचैन थी। उसकी परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थीं।

शनिवार की सुबह उसने जल्दी से नाश्ता किया और चमकीली के पास जा पहूँची। आज वह चमकीली के लिए रोटी लाना नहीं भूली थी। चमकीली उसे देखते ही खुश हो गई। चमकीली ने पूछा – “पढ़ाई मे व्यस्त थी  क्या? तुम खूब मन लगा कर पढ़ो और क्लास में  अव्वल आओ।” चाँदनी ने कहा-” तुम्हारी बात मान कर मैंने  मन लगा कर पढाई की है। अब तुम मेरी बात मान कर अपनी कहानी सुनाओ और तुम्हें एक बात बतलाऊँ? आज शाम में  पप्पा मुझे लेने आ रहे हैं। मैं छुट्टियों में खूब मस्ती करूंगी। पर छुट्टियां  खत्म होते वापस जरूर आऊँगी। तुम्हारी वजह से मुझे अपना स्कूल और हॉस्टल अच्छा लगने लगा है। घर पर तुम्हें बहुत याद  करूंगी। अच्छा बताओ, तुम कब घर जाओगी चमकीली? मेरे वापस लौटने तक तुम भी जरूर आ जाना।’ चमकीली कुछ याद करते हुए बोली-” हाँ, मुझे भी कुछ समय में अपने घर जाना है।”

तुम्हारा घर कितनी दूर है? तुम्हें लेने कौन आएगा? तुम कब यहाँ वापस लौटोगी? तुम अपनी कहानी कब पूरी करोगी? चाँदनी ने रुआंसी आवाज़ में  ढेर सारे प्रश्न पूछ लिए। दरअसल सैल्मन के घर जाने की बात सुन कर उसे रोना आने लगा।

” अरे, रुको तो। तुम ने इतने सारे प्रश्न एक साथ पूछ लिए है। मैं तुम्हें सारी बातें  बताती हूँ। पहले मैं अपनी कहानी पूरी करती हूँ। तुम्हें सब प्रश्नों का उत्तर भी मिल जाएगा। पर पहले तुम्हें मुस्कुराना होगा”- चमकीली ने कहा। चाँदनी जल्दी से आँसू पोंछ कर मुस्कुराने लगी। सैल्मन अपनी कहानी आगे बताने लगी। चमकीली ने कहा- “जैसे तुम अपने घर जाना चाहती हो वैसे ही मुझे भी एक दिन अपने घर जाना है।

सागर में  कुछ साल बिताने के बाद हमारा झुंड वापस अपने जन्म स्थान पर लौटता है। जो यहाँ से सैकड़ो किलोमीटर दूर है। हमें कोई लेने नहीं आता है, चाँदनी। हमें अपने आप ही लौटना पड़ता है।” चाँदनी ने पूछा-” तुम्हें अपना पता तो याद है न? सैल्मन पूंछ से पानी उड़ाते हुए हँस पड़ी और बोली-“हमारा कोई पता नहीं होता हैं। हमें अपने याद और समझदारी के सहारे वापस लौटना होता है।”

सागर से हम झरने के मुहाने पर पहुचते हैं। फिर हमें झरने के पानी में  बहाव के उल्टे दिशा में  तैरना पड़ता है। कहीं-कहीं तो ऊँची छलांग लगा कर ऊपर जाना पड़ता है। यह बहुत थका देने वाली यात्रा होती है। रास्ते में जंगली भालू और पंछी हमें शिकार बनाने के फिराक में रहते हैं। हमें इन सब से बचते-बचते अपने घर पहुँचना पड़ता है। यहाँ पहुँच कर हम अंडे देते है।

जिससे हमारी नई पीढ़ी शुरू होती है। जहाँ हमारी जिंदगी शुरू होती है अक्सर वहीं  हमारी जिंदगी खत्म होती है।”  यही हमारी जीवन कथा है। ईश्वर ने हमें ऐसा ही बनाया है।सैल्मन  अपनी कहानी सुना कर उदास हो गई। चाँदनी का मन द्रवित हो उठा। पर मन ही मन वह चमकीली को दाद देने लगी। वह बोल पड़ी- “अरे, तुम तो सुपर-फिश हो।’ सोलोमन ने पूछा-“सुपर-फिश मतलब?” चाँदनी ने कहा-” अरे, जैसे सुपर-मैन होता है, वैसे ही तुम सुपर-फिश हो। मतलब बहुत बहादुर सैल्मन।” दोनों सहेलियां खिलखिला कर हँसने लगी, लेकिन चाँदनी के चेहरे पर उदासी छा गई। उसने पूछा-” तब  क्या तुम वापस नहीं लौटोगी? ऐसा मत करना। तुम जरूर वापस लौट आना। तुम मेरी दोस्त हो न? मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी?” सैल्मन ने जवाब दिया- अच्छा, तुम चिंता मत करो। हमारी दोस्ती बनी रहेगी।

छुट्टियों के बाद चाँदनी स्कूल लौटी। वह बहुत खुश थी। वह अपनी कक्षा मे प्रथम आई थी। वह चट्टानों पर भागती हुई सागर के किनारे पहुँची। उसका मन उत्साह और भय के मिले-जुले एहसास से भरा था। उसे मालूम नहीं था कि अब उसे चमकीली से भेंट होगी या नहीं। वह बहुत देर चट्टान पर बैठे-बैठे सैल्मन  का इंतज़ार करती रही। चमकीली नहीं आई।  वह हॉस्टल लौट गई। जब काफी दिन बीत गए  और चमकीली नहीं नज़र आई  तब चाँदनी को  विश्वास हो गया कि चमकीली अपने झरने मेँ लौटते समय अपनी जान गँवा बैठी है।या फिर वह भी अपने माता-पिता की तरह अंडे दे कर अपने झरने मेँ मौत की नींद सो गई।

आज काफ़ी लंबे अरसे बाद, फिर भारी मन से वह सागर किनारे से वापस लौटने वाली थी। तभी नीचे पानी में  हलचल दिखी। वह गौर से देखने लगी। नीचे कुछ झिलमिलाता सा लगा पर फिर कुछ नज़र नहीं आया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और अनजाने मेँ ही वह चमकीली को आवाज़ देने लगी।

अचानक आवाज़ आई- तुम मेरी माँ को जानती हो क्या? उसका नाम चमकीली था। मैं यहाँ रोज़ तुम्हें बैठे देखती हूँ। पर डर से ऊपर नहीं आती थी। तुम मुझसे दोस्ती करोगी क्या? एक छोटी रुपहली मछ्ली पानी की सतह पर तैर रही थी। चाँदनी अविश्वास के साथ छोटी सी चमकीली को देख रही थी। चमकीली ने जाने से पहले ठीक कहा था-” तुम चिंता मत करो। हमारी दोस्ती बनी रहेगी।” उसके आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहें थे। कभी सामने डूबते लाल सूरज को देखती कभी प्यारी सी नन्ही चमकीली को। दरअसल वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी। साथ ही प्रकृति के अनोखे खेल से हैरान थी।

तभी किसी ने उसके पीठ पर हाथ रखा। उसके हॉस्टल की अध्यापिका खड़ी थीं। उन्होने चाँदनी से पूछा- बेटा, तुम अकेली यहाँ क्या कर रही हो?तुम्हें इस तरह अकेले यहाँ नहीं आना चाहिए। क्या तुम्हें सागर और उसके जीवों को देखना पसंद है? प्रकृति और पशु-पक्षियों से हमें अनेक सीख मिलती  हैं । चलो, अब मैं तुम सब बच्चों को शाम में सागर किनारे लाया करूंगी। चाँदनी चुपचाप छोटी चमकीली को निहार रही थी और सोच रही थी – क्या कोई मेरी और चमकीली के दोस्ती की कहानी पर विश्वाश करेगा?

                 (यह कहानी अभिभावकों को बाल मनोविज्ञान की जानकारी देती है। बच्चों को प्रकृति और जानवरों का  साहचर्य आनंद, खुशी और अभिव्यक्ति का अवसर  देता है। पशु-पक्षी न सिर्फ  मनोरंजन का स्रोत है ,बल्कि वे बच्चों के कोमल मानसिकता को प्रभावित करते हैं। वे बच्चों और उनके अंतर्मुखी मन की बातों को अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करतें हैं। यह कहानी इसी बात को दर्शाती है। साथ ही  इस कहानी के माध्यम से बच्चों को सैल्मन मछली के जीवन-चक्र की जानकारी मिलती है।)                            

 

जादुई घड़ी – ( बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी)

यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है।बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझानाबहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है।

जादुई घड़ी
दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- अरे, तू जाग गया है? आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? मंदिर बेटा, दादी ने बताशे मिश्री देते हुए कहा। आशु को बताशे स्वादिष्ट टाफी सा लगा। उसके सोंचा, अगर वह भी मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। उसने दादी से पूछा – दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?दादी ने पूछा – तुम सुबह तैयार हो जाओगे? हाँ, पर दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम सुबह कैसे जाग जाती हो?
दादी ने कहा – मेरे तकियों में जादुई घड़ी है। वही मुझे सुबह जगा देतें है। लो, आज इस तकिये को सच्चे मन से अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। पर आशु, सही समय पर सोना तकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। उस रात वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।
आशु स्कूल की छुट्टियों मेँ दादी के पास आया था। दादी से जादुई तकिये की बात सुनकर बड़ा खुश था क्योंकि उसे सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। मम्मी से डांट पड़ती। कभी स्कूल बस भी छूट जाती थी।
अगले दिन सचमुच वह सवेरे जाग कर दादी के साथ मंदिर गया। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।
आशु को दादी के साथ रोज़ मंदिर अच्छा लगने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। आज मंदिर जाते समय आशु को अनमना देख,दादी ने पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा? आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – दादी, छुट्टियों के बाद, घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।
दादी प्यार से कहने लगी – आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है।यह तुम्हारे इच्छा शक्ति या आत्म-बल के कारण होता है। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हमेँ नियत समय पर नींद या भूख महसूस होती है। इसे मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकतें हैं। यह घड़ी प्रकृति रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास या इच्छा शक्ति द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।
आशु हैरान था। इसका मतलब है दादी, मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था?दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – आज रात तुम बिना तकिये की मदद लिए, अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना।आशु नें वैसा ही किया। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसे अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया।