#Iamhappy वह खुशी का पल ( blog related topic )

हम खुशियों की खोज में न जाने कहाँ-कहाँ भटकते है।बड़े-बड़े चाहतों के पीछे ना जाने कितना परेशान होते हैं। पर, सच पूछो तो खुशी हर छोटी बात में होती है। यह सृष्टि की सबसे बड़ी सच्चाई है।

इस जिंदगी के लंबे सफर में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। ये खुशियां इन उतार चढ़ाव में हमें हौसला और हिम्मत देती हैं। पर अक्सर हम छोटे-छोटी खुशियों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, किसी बड़ी खुशी की खोज में। ऐसा एहसास स्वामी विवेकानंद को अपने जीवन के आखरी दौर में हुआ था।

खुशी ऐसी चीज़ नहीं है जो हर समय हमारे पास रहे। यह संभव नहीं है। खुशी और दुख का मेल जीवन के साथ चलता रहता है। हाँ, खुशी की चाहत हमारे लिए प्रेरणा का काम जरूर करती है। कभी किसी के प्यार से बोले दो बोल, बच्चे की प्यारी मुस्कान, फूलों की खूबसूरती या चिड़ियों के चहचहाने से खुशी मिलती है। कभी-कभी किसी गाने को सुन कर हीं चेहरे पर मुस्कान आ जाती हैं या कभी किसी की सहायता कर खुशी मिलती है। जेनिफ़र माइकेल हेख्ट ने अपनी एक पुस्तक “दी हैपीनेस मिथ: द हिस्टीरिकल एंटिडौट टू वाट इस नॉट वर्किंग टुड़े“ में इस बात को बड़े अच्छे तरीके से बताया है।

कठिनाइयों की घड़ी में छोटे-छोटी खुशियाँ उनसे सामना करने का हौसला देती हैं। इस बारे में अपने जीवन की एक घटना मुझे याद आती है। मेरी बड़ी बेटी तब 12 वर्ष की थी। उसके सिर पर बालों के बीच चोट लग गया। जिससे उसका सर फूट गया। मैं ने देखा, वह गिरने वाली है।

घबराहट में मैंने उसे गोद में उठा लिया। जब कि इतने बड़े बच्चे को उठाना सरल नहीं था। मैंने एक तौलिये से ललाट पर बह आए खून को पोछा। पर फिर खून की धार सिर से बह कर ललाट पर आ गया। वैसे तो मैं जल्दी घबराती नहीं हूँ। पर अपने बच्चे का बहता खून किसी भी माँ के घबराने के लिए काफी होता है। इसके अलावा मेरे घबराने की एक वजह और भी थी । बालों के कारण चोट दिख नहीं रहा था। मुझे लगा कि सारे सिर में बहुत चोट लगी है।

मेरी आँखों में आँसू आ गए। आँखें आँसू से धुँधली हो गई। मैं धुँधली आँखों से चोट को ढूँढ नहीं पा रही थीं। मेरी आँखों में आँसू देख कर मेरी बेटी ने मेरी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की।

उसने मेरे गालों को छू कर कहा- “ मम्मी, तुम रोना मत, मैं बिलकुल ठीक हूँ’। जब मैंने उसकी ओर देखा। वह मुस्कुरा रही थी। मैं भी मुस्कुरा उठी। उसकी दर्द भरी उस मुस्कुराहट से जो ख़ुशी मुझे उस समय मिली। वह अवर्णनीय है। मुझे तसल्ली हुई कि वह ठीक है। उससे मुझे हौसला मिला। मेरा आत्मविश्वाश लौट आया। उसकी मुस्कान ने मेरे लिए टॉनिक का काम किया। मैंने अपने आँसू पोछे और घबराए बिना, सावधानी से चोट की जगह खोज कर मलहम-पट्टी किया और फिर उसे डाक्टर को दिखाया।
              

                           मुस्कुरा कर देखो तो सारा जहां हसीन है,
                    वरना भिगी पलकों से तो आईना भी धुंधला दिखता है।

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#SurnameChangeनाम में क्या रखा है? ( Blog related topic )

नाम में क्या रखा है? अक्सर शादी के बाद नाम बदलने / नया उपनाम जोड़ने के समय कहा जाता है। पर जानते हैं  सच्चाई क्या है? कहा जाता है कि किसी भी व्यक्ति को सबसे प्यारा शब्द अपना नाम लगता है।

इस संबंध में मुझे अपनी एक सहेली की बात याद आती है। शादी के बाद कुछ ही वर्षों में उसका पति से अलगाव हो गया। उसका तलाक का केस चल रहा था। वह अपने पति को बेहद नापसंद करती थी। उसने ऐसे में मुझ से एक ऐसी बात कही। जो मैं आज भी भूल नहीं पाई हूँ। उसने मुझसे कहा – ‘ जिस आदमी की वजह से मेरे जिंदगी बर्बाद हुई मुझे उसका उसका नाम  / सरनेम ढोना पड़ रहा है”।

यह विडम्बना ही है ना कि शादी अर्थात नया सरनेम। आप चाहो या ना चाहो। कुछ दिनो पहले मेरे बचपन की सहेली लिली ने लगभग 36 वर्षों बाद मुझे खोज निकाला और फेस -बुक मैसेंजर पर मेसेज भेजा। नाम जाना हुआ था। पर सरनेम नया होने से मैं काफी देर तक दुविधा में रही। और एक अन्य सहेली ने तो उस ठीक से न पहचान पाने के कारण फेस बुक में स्वीकार / एक्सेप्ट ही नहीं किया।

ऐसा महिलाओं के साथ ही क्यों? यह सवाल अक्सर मन में आता है। यह  व्यवस्था कुछ सोच कर बनाई गई होगी । पहले शायद ऐसा इसलिए रहा होगा क्योंकि महिलाएं घर के भीतर चारदीवारों में रहती थीं। अतः परेशानी नहीं होती होगी। पर आज समाज का स्वरूप बादल गया है। महिलाओं की अपनी एक पहचान हो गई है। पर प्रथा पुरानी हीं चल रही है।

मैं बहुत अरसे से एक पुरानी सहेली को फेस बुक पर खोजने का नाकामयाब प्रयास कर रहीं हूँ। अपनी अन्य सहेलियों से भी पूछ रहीं हूँ। सबका एक ही प्रश्न है – उसका नया सरनेम क्या है?

आज-कल एक नया चलन हो गया है दोनों उपनामों को लगाना। अपना पुराना और पति का नया उपनाम जोड़ दिया जाता है। जैसे ऐश्वर्या राय बच्चन या क़रीना कपूर खान। पर सोचिए जरा दो या तीन जेनरेशन के बाद हमारी बेटियों के नाम में कितने उपनाम जुट चुके होंगे। पर इसका उपाय क्या है?

#toghter बचपन का वह साथ ( blog related )

शाम का सुहाना समय था। मैं सोफ़े पर अधलेटी टीवी देख रही थी। दिन भर की भाग – दौड़ के बाद बड़ा अच्छा लगता है आराम से बैठ कर अपना मन पसंद टीवी कार्यक्रम देखना। अगर ऐसे में हाथों में गरमा – गरम चाय का प्याला हो। तब और भी अच्छा लगता है। ऐसे में लगता है कि कोई परेशान ना करे। ना कोई छेड़े। फोन की घंटी भी उकताहट पैदा कर देती है। वह दिन भी ऐसा ही था। मैं बड़े मनोयोग से टीवी देख रही थी।

तभी फोन की आवाज़ आई। शायद कोई मैसेज था। मन में ख्याल आया – बाद में देखूँगी। पर फिर मैंने सोचा कहीं मेरे ब्लॉग की कोई सूचना या वोट तो नहीं है। ब्लॉग लिखना बहुत अच्छा लगता है। पर उसके ज्यादा खुशी होती है उसके बारे में वोट या कमेंट्स पढ़ कर। मैं अपने इस लोभ को रोक नहीं पाई। फोन हाथों में ले कर देखा। मैसेंजर पर किसी का मैसज था। फेसबुक पर भी आमंत्रण था। नाम तो जाना पहचाना था, पर सरनेम कुछ अलग था।

यही विरोधाभास है हमारे यहाँ। लड़कों के नाम तो ज्यों के त्यों रहते है। पर लड़कियों को अपने परिचय में कुछ नया जोड़ना पड़ता है शादी के बाद। मुझे पूरा नाम पढ़ कर ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा था। मानव स्वभाव भी बड़ा विचित्र होता है। अक्सर हमें आधी अधूरी कहानियां ज्यादा परेशान करती है। हमारी पूरी कहानी जानने की चाह का फायदा टीवी सीरियल वाले भी उठाते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। मेरे आधी याद ने मेरा पूरा ध्यान उधर ही खींच लिया। यह किसका मैसेज है? दिमाग में यह बात घूमने लगी।

निर्णय नहीं ले पा रहीं थी। जीत अधूरे टीवी कार्यक्रम की होगी या अधूरी याद की। आखिरकार मैंने फेसबुक देखा। आँखों के आगे लाभग 36 वर्ष पुराने दिन घूमने लगे। यह तो लिली है। हम दोनों ने बचपन का बहुत खूबसूरत समय साथ गुजारा था। हम एक ही कॉलोनी में रहते थे। हमारे घर आमने सामने था। हमारे पारिवारिक संबंध थे। साथ में खेलना कूदना और समय बिताना। हमने ना जाने कितनी होली साथ खेली थीं, और दुर्गा पूजा के कार्यक्रम इकट्ठे मनाये । ढेरो मीठी यादों ने घेर लिया।

मेरे पिता के तबादले के बाद हमलोगों का साथ छूट गया था। हमारी शादियाँ हो गई। हमारे उपनाम बदल गए। परिवार और बच्चों में उलझ कर हमारी जिंदगी तेज़ी से आगे बढ़ गई। किसी जरिये से उसे मेरे बारे में मालूम हुआ था। तभी लिली का फोन आ गया। उसकी आवाज़ में उत्साह और खुशी झलक रही थी। हम बड़े देर तक भूली- बिसरी यादों को बताते, दोहराते रहे।

बचपन का साथ और यादें इतनी मधुर होती है।यह तभी मैंने महसूस किया। सचमुच बड़ा मार्मिक क्षण था वह। आज इतने समय के बाद हमारी बातें हो रहीं थी। जब हमारे बच्चे बड़े हो चुके है। दुनिया बहुत बदल चुकी है। पर बचपन का वह साथ आज भी मन में उल्लास भर देता है।

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#LookUpStories ख़ुशी की वह घड़ी ( blog related )

दोपहर लगभग 12 बजे का समय था। सोमवार का दिन था। अचानक मेरे पति ने मुझे फोन किया। वे बड़े घबराए हुए थे। उनकी आवाज़ में परेशानी झलक रही थी। आवाज़ में नाराजगी भी थी। उन्होने बताया कि बड़ी देर से वे हमारी बड़ी बेटी को फोन लगा रहें है। पर उसका फोन लग नहीं रहा है।
यह मेरे पति की हर दिन की आदत थी। वे दिन में फुर्सत के क्षणों में एक बार बेटी से बात जरूर करते थे। उस समय बड़ी बेटी पुणे में पढ़ाई कर रही थी। बच्चे जब घर से दूर होते हैं। तब उनका ध्यान रखना जरूरी होता है। उस दिन उन्होने बड़े झल्लये स्वर में कहा- “तुम्हारी बेटी का फोन क्यों नहीं लग रहा है?
मेरे पति की एक बड़ी अजीब आदत है। बच्चे जब अच्छा करते हैं, तब वे बड़े प्यार से उन्हें “मेरी बेटियाँ” कह कर बुलाते है। पर जब बेटियों से नाराज़ होते है तब अक्सर कहतें है- ‘तुम्हारी बेटियाँ’। उस दिन भी वह बार-बार नाराजगी से कह रहे थे – आजकल तुम्हारी बेटी बड़ी लापरवाह होती जा रही है। आज सुबह से उसने फोन नहीं किया है।
मैंने उन्हे समझाने की कोशिश की। हो सकता है, वह क्लास में हो। या किसी ऐसे जगह हो। जहाँ फोन ना लग रहा हो। पर थोड़ी देर बाद उन्होने बताया कि अभी भी फोन नहीं लग रहा हो। उनका सारा गुस्सा मुझ पर उतरने लगा।
ऐसा तो वह कभी नहीं करती है। मैंने भी उसे फोन करने की कोशिश की। पर फोन नहीं लगा। थोड़ी देर में मुझे भी बेचैनी होने लगी। मैं घबरा कर बार-बार फोन करने लगी। पर कोई फायदा नहीं हुआ। उसके कमरे में रहनेवाली उसकी सहेली को फोन करने का प्रयास भी बेकार गया। हॉस्टल में फोन करने पर मालूम हुआ कि वह सुबह-सुबह कहीं बाहर निकाल गई थी। शाम ढल रही थी।
हम लोगों की घबराहट बढ़ गई। आज-कल वह थोड़ी परेशान भी थी। क्योंकि नौकरी के लिए विभिन्न कंपनियाँ आने लगी थी। कैंपस-सेलेक्सन के समय की वजह से थोड़ी घबराई हुई थी। अँधेरा हो चला था। समझ नहीं आ रहा था, से किस से पूछे? कैसे पता करें?
मुझे बताए बिना वह कहीं नहीं जाती थी। बाज़ार जाना हो या सिनेमा, मुझे फोन से जरूर बता देती थी। बार-बार मन में उल्टे-सीधे ख्याल आने लगे। ड़र से मन कांपने लगा। कहीं कुछ उल्टा-सीधा तो नहीं हो गया। लग रहा था, क्यों उसे पढ़ने के लिए इतना दूर भेज दिया?
सारा दिन ऐसे ही बीत गया था। फोन की घंटी फिर बजी और मुझे लगा पति का फोन होगा। लेकिन इस बार बेटी का फोन था। उसकी आवाज़ सुन कर शांति हुई। मैं उसे डाँटने ही वाली थी कि उसकी उत्साह भरी आवाज़ आई- “ मम्मी, मुझे नौकरी मिल गई”। दरअसल उसे देर रात पता चला कि अगले दिन एक अच्छी कंपनी का टेस्ट और इंटरव्यू है। अगले दिन सुबह एक के बाद दूसरे टेस्ट होते रहे और उसे फोन स्विच आफ रखना पड़ा। जिन लोगों का चयन एक टेस्ट में होता उन्हे अगले टेस्ट और फिर इंटरव्यू के लिए भेजा जाता रहा। लगातार टेस्ट और इंटरव्यू के बीच उसे बात करने का मौका नहीं मिला। उसके कमरे में रहनेवाली उसकी सहेली भी साथ थी। इसलिए उसका फोन भी नहीं लग रहा था।
खुशखबरी सुन कर पूरे दिन का तनाव दूर हो गया। बेटी को उज्ज्वल भविष्य के राह पर अग्रसर होते देख मन ख़ुशी से नाच उठा। तभी मेरे पति ने कहा-“ देखा तुमने, मेरी बेटी कितनी लायक है”।

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#Together हमारा साथ ( blog related )

जिंदगी में जब आसानी से कुछ मिलता है। तब हम उसका मूल्य नहीं समझते हैं। बचपन से एक ही परिवार में पले बढ़े बच्चे लड़ते झगड़ते बड़े होते है। छोटी-छोटी बातों में आपस में उलझ जाते है। पर बड़े होने पर जब वे अलग हो जाते है। अपनी-अपनी जिंदगी में सेटल हो जाते है। अलग – अलग शहरों में बस जाते हैं। तब उन का आपस में मिलना-जुलना कठिन हो जाता है। तब पुरानी यादें मूल्यवान लगने लगती है। तब पुराना साथ, पुरानी बातें याद आने लगती हैं।
मेरे घर भी कुछ ऐसा ही हुआ। हम चार लोगों का परिवार है। मैं, मेरे पति और मेरी दो प्यारी-प्यारी बेटियाँ। जब बेटियाँ छोटी थीं। तब मैं घर और नौकरी में उलझी रहती थी। दोनों बेटियाँ भी अन्य सामान्य बच्चों की तरह फर्माइशें करतीं। आपस के झगड़ों में मुझे भी परेशान करतीं। जब कभी वे ज्यादा परेशान करतीं। तब मैं सोचतीं – कब ये बड़ी होंगी? कब मुझे परेशान करना कम करेंगी।
बचपन में दोनों बेटियाँ एक ही कमरे में रहतीं थीं और एक बड़े बिस्तर पर सोतीं थीं। दोनों हमेशा अपने-अपने कमरे और अलग पलंग की फरमाईश कर परेशान करतीं थी। तब हम दो कमरे के घर में रहते थे। अतः उन्हे अलग कमरे देना संभव नहीं था। बड़ा घर लेना कठिन होगा। मैं बच्चों को यह सब समझाती रहती थी। पर बच्चे तो बच्चे होते हैं। उनकी जिद से मैं परेशान हो जाती थी।
देखते-देखते समय पंख लगा कर उड़ गया। बच्चे बड़े हो गए। बड़ी बेटी पढ़ाई करने बाहर चली गई। पति का तबादला कोलकाता हो गया। वे वहाँ चले गए। छोटी बेटी दसवीं में थी अतः मुझे उसके साथ धनबाद में रुकना पड़ा। ताकि उसकी पढ़ाई और बोर्ड के परीक्षा में बाधा ना आए। हम सभी एक दूसरे की बड़ी कमी मससूस करते थे। पर उपाय क्या था? परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बन गईं थी।
हमने इस कमी को दूर करने के लिए दक्षिण घूमने का कार्यक्रम बनाया। ताकि भीड़-भाड़ और घर से दूर हम चारो कुछ दिन एक साथ बीता सके। कार्यक्रम बन गया। हम सब बड़े खुश थे। इकट्ठे रहने का मौका मिलेगा।
तभी पता चला कि मेरे पति की छुट्टियाँ किसी कारणवश स्थगित कर दी गईं है। उनकी छुट्टियाँ मिलने तक मेरा और छोटी बेटी के स्कूल की छुट्टियाँ लगभग खत्म हो रहीं थी। लगा अब घूमने का कार्यक्रम नहीं बन पाएगा। दोनों बच्चे बड़े मायूस हो गए।
अब जब हम चार लोग तीन शहर में थे तब हमें साथ होने का मोल समझ आ रहा था। अतः हमने अपना कार्यक्रम फिर से सीमित समय के अनुसार बनाया, ताकि कुछ समय तो साथ बिता सकें, और दक्षिण के यात्रा पर गए। यह यात्रा कम दिनों का जरूर था। पर साथ-साथ बिताया यह समय हमारे लिए यादगार बन गया। खास बात यह थी कि जो बच्चे अलग बिस्तर और कमरे के लिए झगड़ते थे। वे बेटियाँ अब साथ सोने के लिए परेशान थीं । वे चाहती थीं कि हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहें। चारो एक साथ एक बिस्तर पर सोए और समय बिताएँ।

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#ChooseToStart मेरा नया फोन ( blog related )

मेरे हाथों में है चमचमाता नया स्मार्ट फोन। मैं हैरानी से उसे निहार रहीं हूँ। मन में खयाल आ रहें हैं- “क्या यह सचमुच मुझे स्मार्ट बना देगा”? पर यह क्या? मैं तो उसमें ही उलझ कर रह गई हूँ।

इसके बटन जरा सा छु जाने पर फोन कहीं का कहीं लग जाता है। फोन देख कर जितनी खुशी हुई। उसे काम में लाने में उतनी हीं उलझन हो रही है। मुझे अपना पुराना फोन याद आने लगा। उस पर हाथ बैठा था। मुझे उसका अभ्यास था। अतः काम करना आसान लगता था।

मुझे पुराने दिन याद आने लगे। फोन की दुनिया में बड़ी तेज़ी से बदलाव आए हैं। कुछ दशकों पहले तक कुछ ही घरों में फोन हुआ करते थे। वह भी तार से जुटे, डायल करने वाले फोन होते थे। दूसरे शहर फोन करना हो तो कॉल बुक करना पड़ता था। घंटो इंतजार के बाद बात होती थी। कुछ समय बाद सभी शहरों के कोड नंबर आ गए। जिसकी सहायता से फोन लगता था। पर यह भी आज के जैसा सुविधाजनक नहीं था। यात्रा के दौरान तो फोन करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।

हाल के वर्षों में फोन की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। विज्ञान का एक अद्भुत चमत्कार सामने आया। मोबाइल फोन उपलब्ध हो गए। वह भी ऐसा कि मुट्ठी में समा जाये। ना लंबी तार, ना डॉयल करने की मुसीबत। जहां चाहो , जब चाहो, जिससे चाहो बातें कर सकते है। सारी दुनियाँ ही सिमट कर करीब लगने लगी।

पर हाँ, जब सामन्य मोबाईल फोन हाथ में आया तब भी वही उलझन हुई। जो आज हो रही है। तब भी लगा था कि इसे काम में लाना सीखना होगा। पर ये फोन इतने सहज-सरल होते है कि सीखने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी। इस बात को याद कर मुझे बड़ी तस्सली हुई। चलो इसे भी मैं सीख लूँगी। पर फिर भी अपने स्मार्ट फोन को काम में लाने में घबराहट हो रही थी- कही मैं गलत तरीके से चला कर इस बिगाड़ ना दूँ। फिर मन में ख्याल आया- कही मुझमें परिवर्तन से बचने की प्रवृती का भाव (Change resistance) तो नहीं आ रहा है? नहीं-नहीं, यह तो बड़ी अफसोस की बात होगी।

मेरा स्मार्ट फोन से पहला परिचय तब का है। जब कुछ समय पहले मेरी छोटी बेटी नें इंजीनियरिंग कॉलेज में अपना प्रोजेक्ट स्मार्ट फोन एप पर आधारित बनाया था। साथ ही पहला पुरस्कार भी पाया था। तभी से मेरे मन में इस फोन की लालसा थी। आज जब यह फोन मेरे हाथों में है। तब ऐसे घबराना ठीक नहीं है।

मैंने अपने आप से कहा- कोशिश करनी होगी। मैं इसे कर सकती हूँ। मैंने प्यार से अपने स्मार्ट फोन को हाथों में उठाया। और यह क्या? यह तो पहले के फोन से भी सरल- सहज है। इसे आज के समय में दोस्ताना फोन या युजर फ्रेंडली कहेंगे।

अब समझ आया इसे स्मार्ट फोन क्यों कहते हैं। इससे बैठे-बैठे बातें करो या खरीदारी। अपने मेल देखो या व्हाट्स एप पर ग्रुप बना कर पूरे परिवार और मित्रों के करीब आ जाओ। । कोई भी एप डाउन लोड कर लो, और बैठे-बिठाये पूरी दुनिया अपने पास ले आओ। ब्लॉग लिखो या पढ़ो। यह तो हर काम को आसान कर देता है।

अब तो हाल यह है कि सोते-जागते मैं अपना स्मार्ट फोन अपने करीब रखतीं हूँ। मैं सचमुच स्मार्ट बन गई हूँ।

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(Look Up Stories ) मेरा घर ( blog related)

जिंदगी की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। बच्चे पढ़ाई में व्यस्त थे। हम पति और पत्नी अपने-अपने नौकरी में खुश थे। पति का जहां भी तबादला होता। वहीं किराए का घर ले कर आशियाना बसा लेते थे। चिड़ियों की तरह तिनका-तिनका सजाने लगते थे।

जिंदगी अच्छी कट रही थी। सिनेमा देखना, बाहर घूमने जाना, गोलगप्पे और चाट खाना, बच्चों के रिजल्ट निकलने पर उनके स्कूल जाना जैसी बातों में मगन थे हम सब। बच्चों की खिलखिलाहटों के साथ हम भी हँसते। उन्हें एक-एक क्लास ऊपर जाते देखना सुहाना लगता। बड़ी बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुँच गई थी। छोटी बेटी भी ऊँची कक्षा में चली गई थी। पढ़ाई का दवाब और खर्च दोनों बढ़ गए थे। बच्चों की हर उपलब्धि मन में खुशियाँ भर देती थी। ये सब खुशियाँ ही इतनी बड़ी लगती कि इससे ज्यादा कुछ चाहत हीं नहीं होती थी। ना हमारे ज़्यादा अरमान थे, ना कोई लंबा चौड़ा सपना था। हम अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा होते देख कर खुश थे।

ऐसे में एक दिन बड़ी बेटी ने पूछा – “मम्मी, हमारा अपना घर कौन सा है? हमें भी तो कहीं अपना घर लेना चाहिए”। मैं और मेरे पति चौंक पड़े। हमारा घर? यह तो हमने सोचा ही नहीं था। किराये के घर को हीं अपना मान लेने की आदत पड़ गई थी।
मन में एक बड़ा सपना जाग उठा। एक अपने घर की चाहत होने लगी। पर जब हमने इस बारे में सोचना शुरू किया। तब लगा कि हमारे आय में एक अच्छे घर या फ्लैट की गुंजाइश नहीं है। बच्चों की पढ़ाई में काफी खर्च हो रहा था। घर के और ढेरों खर्च थे। कुछ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी थीं।

काफी सोंच-विचार के बाद हमने बैंक लोन के लिए बात किया। दो कमरे का खूबसूरत प्यारा सा फ्लैट पसंद भी आ गया। पर हर महीने कटने वाला बैंक इन्स्टाल्मेंट हमारे बजट से कुछ ज्यादा हो रहा था। घर के खर्चों में काफी कटौती के बाद भी कठिनाई हो रही थी। कभी-कभी मेरे पति झल्ला उठते। उन्हें लगता कि मैं कुछ ज्यादा बड़ी उम्मीदें पालने लगी हूँ। अपना घर लेना हमारे बूते से बाहर है। तभी मेरे पति की तरक्की हो गई और तनख़्वाह में भी इजाफ़ा हुआ। इससे हमारी समस्या खत्म तो नहीं हुई। पर आसानी जरूर हो गई। हमने फ्लैट बुक कर लिया।

कुछ समय पैसे की थोड़ी खिचातानी और घर के खर्चों में परेशानी जरूर हुई। पर जल्दी ही मालूम हुआ की घर के ऋण पर मेरे पति को  आयकर  में कुछ छूट मिलेगा  और हमारी  बैंक इन्स्टाल्मेंट की समस्या लगभग  खत्म हो गई। कुछ समय में हमारा फ्लैट मिल गया। गृह प्रवेश की पूजा के दिन आँखों में खुशी के आँसू भर आए। लगा आज हमारा बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया।
इस खुशी में एक और बहुत बड़ी खुशी यह थी कि हमारी बड़ी बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो गई थी और उसे वहीं नौकरी मिल गई थी। जहाँ हमारा फ्लैट है। छोटी बेटी का भी वहीं इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। दोनों बहने अपने नए घर में रहने लगीं। हम दोनों भी अक्सर वहाँ छुट्टियां बिताने लगे। अपने घर में रह कर हम सभी कॉ बड़ी आत्मसंतुष्टि होती।

बड़ी बेटी की शादी के बाद हमने घर किराये पर दे दिया है। सच बताऊँ तो, हमारा घर आज हमारा एक कमाऊ सदस्य है। उससे आने वाला किराया हमारे बहुत काम आता है। जब भी अपना घर देखती हूँ। मन में बहुत बड़ी उपलब्धि का एहसास होता है। जल्दी ही पति के रिटायरमेंट के बाद हम अपने सपनों के घर में जाने वालें हैं। मेरे पति अक्सर कहते है- “ यह घर तुम्हारे सपने और सकारात्मक सोंच का नतिज़ा है।

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#StartANewLife जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत (blog related ) )

     तब उन्नीस वर्ष की थी मैं । अभी टीन एज के आखरी वर्ष में थी। बड़ी बेफ़िक्री और मस्ती के दिन थे। आई. ए. परीक्षा के रीजल्ट आ गए थे। बड़े अच्छे अंकों से मैं पास हुई थी। अतः बी. ए. में मनचाहे विषय – मनोविज्ञान में प्रवेश मिल गया था। खुशी-खुशी कालेज में बी. ए. में पढ़ रही थी।

तभी अचानक मेरी शादी तय हो गई। शादी के नाम से इतनी खुश थी, जैसे जीवन का सबसे अनमोल खजाना मिल गया हो। नए कपड़े, गहने, सहेलियों की छेड़-छाड़ में सारी खुशियाँ समाई थी। बड़ी-बड़ी आँखों में ढेरो सपने थे।

नई जिंदगी के नए सपनों के साथ ससुराल पहुँची। पर यह क्या? वहाँ तो जीवन का अर्थ ही कुछ और था। बहू यानि काम करने की मशीन। सुबह से रात तक बीसियों लोगों का भोजन बनाना, चाय पिलाना जैसे कामों में दिन कब बीत जाता पता ही नहीं चलता। इसके बाद भी दहेज पर छींटाकशी और उलाहनों का अंत नहीं था। इस जीवन की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। दिन भर किसी की एक मीठी बोली के लिए तरस जाती। इस समय मुझे समझ आया कि मैं माँ बनने वाली हूँ।

तभी बी. ए. के परीक्षा की तिथि निकल गई। पढ़ाई बिलकुल ठप्प थी। कालेज छूट गया था। पर मन के किसी कोने में यह ख्याल था कि मुझे किसी भी हाल में परीक्षा देनी है। परीक्षा के समय माईके जाने का अवसर मिला। बड़ी राहत मिली। लगा माँ को सारी बातें बता कर कुछ उपाय निकलेगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वहाँ से कुछ दिनों के बाद इस आश्वासन के साथ वापस ससुराल भेज दिया गया – घबराओ नहीं। कुछ दिनो में सब अपने आप ठीक हो जाएगा। पर आज तक क्या अपने आप कभी कुछ ठीक हुआ है?

बेटी के जन्म के बाद ससुराल आने पर मुसीबतें और बढ़ गई। साथ में काम भी बढ़ गया। बेटी होने का ताना भी मिलने लगा। घर के कामों में फर्माइशों की लिस्ट बढ़ती गई। यह शायद बेटी के होने की सज़ा भी थी।

मन में अक्सर खयाल आता कि क्या यही मेरी पहचान है? क्या यही मेरा जीवन है? एक बँधुआ मजदूर की तरह खटना और ताने सुनते रहना। रात में यह सब सोंच कर नींद नहीं आती। तब खिड़की के पास खड़े-खड़े ना जाने कितनी रातें बिताईं। आँखों से आँसू बहते रहते।
तभी मेरे बी. ए. का रिजल्ट आ गया। खुशी मिश्रित हैरानी हुई। मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे अंकों से पास हुई थी।

तब मैंने अपने नए जीवन के लिए एक निर्णय लिया। एक नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ाने का निश्चय किया और मैंने एम. ए. के प्रवेश का फार्म भर दिया। यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में सीमित सीटें थी। पर अच्छे अंक होने की वजह से प्रवेश मिल गया। घर के विरोध, काम के बोझ, उलाहनों और नन्ही सी बिटिया के देख-भाल का बोझ तो था। पर कहतें है – दिल से कुछ करने की चाहत हो तो ईश्वर भी मदद करतें है। उसी ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप मैंने एम. ए. किया। फिर पी. एच. डी. किया। आज मैं दो प्यारी बेटियों की माँ, एक सफल गृहणी और कालेज शिक्षिका हूँ। मेरे उस एक निर्णय ने मेरी जिंदगी बदल दी। 

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मेरा अजनबी भाई ( एक अनोखी और सच्ची कहानी )

मेरे जीवन में कुछ रहस्यमय घटनाएँ हुई हैं। जिन्हे याद कर मै रोमांचित हो जाती हूँ। यह वास्तविक घटना सन 1991 की है। तब हम घाटशिला नाम के छोटे से शहर में रहते थे । एक बार हम सभी कार से राँची से घाटशिला लौट रहे थे। यह दूरी लगभग 170 किलोमीटर थी। यह दूरी समान्यतः चार घंटे में हम अक्सर तय करते थे।

शाम का समय था। सूरज लाल गोले जैसा पश्चिम में डूबने की तैयारी में था। मौसम बड़ा सुहाना था। यात्रा बड़ी अच्छी चल रही थी। मेरे पति  कार चला रहे थे। साथ ही गाना गुनगुना रहे थे। मेरी आठ वर्ष की बड़ी बेटी  व एक वर्ष की छोटी बेटी कार के पीछे की सीट पर आपस में खेलने में मसगुल थीं।

तभी एक तेज़ आवाज़ ने हम सभी को भयभीत कर दिया। कार तेज़ी से आगे बाईं ओर झुकती हुई सड़क पर घिसटने लगी। अधर ने किसी तरह कार को रोका। कार से बाहर आकर हमने देखा कि आगे का बायाँ चक्का अपनी जगह से पूरी तरह बाहर निकाल आया है। कार रिम के सहारे घिसती हुई रुक गई थी। कार का चक्का पीछे सड़क के किनारे पड़ा था। हम हैरान थे कि ऐसा कैसे हुआ? एक भयंकर दुर्घटना से हम बाल-बाल बच गए थे।

एक बड़ा हादसा तो टल गया था। पर हम चिंतित थे। शाम ढाल रही थी। शहर से दूर इस सुनसान जगह पर कार कैसे बनेगी? सड़क के दूसरी ओर मिट्टी की छोटी सी झोपड़ी नज़र आई। जिसमें चाय की दुकान थी। मेरे पति उधर बढ़ गए। मैं कार के पास खड़ी थी। तभी मेरी नज़र कार के पीछे कुछ दूर पर गिरे एक नट पर पड़ी। मैंने उसे उठा लिया। किसी अनजान प्रेरणा से प्रेरित मैं काफी आगे तक बढ़ती गई। मुझे और भी नट व बोल्ट मिलते गए और मैं उन्हे उठा कर अपने साड़ी के पल्लू में जमा करते गई। जबकि मैं यह भी नहीं जानती थी कि वे किसी काम के हैं या नहीं।

मैं जब वापस लौटी तब अधर मेरे लिए परेशान दिखे। तब तक हमारी कार के पास कुछ ग्रामीण इकट्ठे हो गए थे। उनमें से एक चपल सा दिखने वाल साँवला, कद्दावर व्यक्ति मदद करने आगे आया। उसके चपटे, बड़े से चेहरे पर चोट के निशान थे और छोटी-छोटी आँखों में जुगनू जैसी चमक थी। मेरे पास के नट व बोल्ट देख कर वह उत्साहित हो गया। उसने कहा- “दीदी जी, आपने तो सारे नट-बोल्ट जमा कर लिए हैं। लाईये मैं आपकी कार बना देता हूँ। मुझे यह काम आता है।” तुरंत उसने कुछ ग्रामीणों को पास के गाँव से कुछ औज़ार लाने भेजा। उसके “दीदी” संबोधन और ग्रामीणो पर प्रभाव देख कर हमें तस्सली हुई। चलो, अब कार बन जाएगी।

अधर ने मुझे और बच्चों को चाय की दुकान पर बैठा कर चाय दिलवाई और स्वयं कार ठीक करवाने लगे। चाय वाला मुझसे बार-बार कुछ कहने की कोशिश कर रहा था। चाय वाले ने फुसफुसाते हुए मुझ से कहा- ” आप यहाँ मत रुकिए। अब रात भी हो रही है। आप के साथ बच्चे भी हैं। तुरंत यहाँ से चले जाइए। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह ऐसी बातें क्यों कर रहा है। चाय वाले ने फिर मुझसे कहा- ” वह व्यक्ति बड़ा खतरनाक है जो आपलोगों की सहायता कर रहा है। यहाँ पर होनेवाले ज़्यादातर अपराधों में यह शामिल होता है। हाल में हुए हत्या का आरोपी है। आप यहाँ मत रुकिए। थोड़ी देर में मेरी दुकान भी बंद हो जाएगी। यह तो बड़ा दुष्ट व्यक्ति है। पता नहीं, कैसे आपकी मदद कर रहा है। यहाँ सभी उससे बड़ा डरते है।” वह लगातार एक ही बात तोते की तरह रट रहा था -“आप बच्चों को ले कर जाइए। मत रुकिए।” चाय दुकान में बैठे अन्य लोगों ने भी सहमति में सिर हिलाया अौर बताया कि वह व्यक्ति वहाँ का कुख्यात अपराधी है।

मै घबरा गई। मुझे याद आया कि मेरे काफी गहने भी साथ है क्योंकि, मैं एक विवाह में शामिल होने राँची गई थी। मैंने अपने पति को सारी बात बताने की कोशिश की। पर वह अनजान व्यक्ति लगातार अपने पति के साथ बना रहा। वह मुझे  अकेले में बात करने का अवसर नहीं दे रहा था। मुझे परेशान देख , उस अजनबी ने मुझे समझाते हुए कहा- “दीदी, आप घबराइए मत। हम हैं ना। भय की बात नहीं है। हमारे रहते यहाँ आपको कोई परेशान नहीं कर सकता। वह हमें रोकने का जितना प्रयास कर रहा था। मन में उतना ही डर बढ़ता जा रहा था। उसकी मीठी-मीठी बातों के पीछे षड्यंत्र नज़र आ रहा था।

मैंने किसी तरह अवसर निकाल कर अपने पति को सब बातें बताईं। पर वहाँ से जाने का कोई साधन नहीं था। अब क्या करूँ। कुछ समझ नहीं आ रहा था। अँधेरा घिरना शुरू हो चुका था। तभी एक राँची जाने वाली एक बस आती नज़र आई। ग्रामीणों ने बताया कि बस यहाँ नहीं रुकती है। घबराहटवश, मैं बीच सड़क पर खड़ी हो गई।  बस को रोकने के लिए हाथ हिलाने लगी। बस रुक गई। बस वाले ने मेरी परेशानी और बच्चों को देख कर हमें बैठा लिया। वह अजनबी लगभग गिड्गिड़ाने लगा। “दीदी जी, मैं जल्दी ही कार बना दूँगा। आप मत जाइए।” वह मेरे पति का हाथ पकड़ कर अनुरोध करने लगा।
कुछ सोचते हुए मेरे पति ने मुझे दोनों बेटियों के साथ बस में बैठा दिया और मेरे जेवरों का सूटकेस भी साथ दे दिया। वे स्वयं वहाँ रुक गए। मेरा दिल आशंकाओं से भर गया। पर उन्हों ने आश्वासन देते हुए मुझे भेज दिया।

राँची पहुँच कर अपने घर में मैंने सारी बातें बताई। उन्होंने तत्काल कारखाने (कार सर्विसिंग ) में फोन किया। दरअसल उस दिन सुबह ही हमारी कार वहाँ से धुल कर आई थी। पता चला कार सर्विसिंग वालों के भूल के से यह दुर्घटना हुई थी। कार के चक्कों के नट-बोल्ट उन्होंने लगाया गया था। पर औज़ार से कसा नहीं था। कार सर्विसिंग के मालिक ने अपनी गलती मानी। तुरंत ही कार सर्विसिंग वालों ने एक कार और कुछ मेकैनिकों को हमारे यहाँ भेजा। जिससे वे अधर और मेरी खराब कार को सुधार कर वापस ला सकें।
कार सर्विसिंग कें लोग मुझ से कार खराब होने की जगह को समझ ही रहे थे। तभी मैंने देखा मेरे पति  अपनी कार ले कर आ पहुंचे हैं। मै हैरान थी। उन्हों ने बताया कि बड़ी मेहनत से उस व्यक्ति ने कार ठीक किया। कार के रिम को सड़क से ऊपर उठाने और चक्के को सही जगह पर लगाने में उसे बड़ी कठिनाई हुई थी। पर वह लगातार मेरे अकेले लौटने का अफसोस कर रहा था।

मैं इस घटना और उस अजनबी को आज भी भूल नहीं पाती हूँ। कौन था वह अजनबी? वह मुझे दीदी-दीदी बुलाता रहा। पर घबराहट और जल्दीबाजी में मैंने अपने अनाम भाई का नाम तक नहीं पूछा । क्या ऐसे अजनबी को भुलाया जा सकता है? मैं आज भी इस घटना को याद कर सोंच में पड़ जाती हूँ । क्यों कभी एक अपराधी भी मददगार बन जाता है? उस दिन मैंने मान लिया कि बुरे से बुरे इंसान में एक अच्छा दिल होता है।
ऐसे में मेरी नज़रें ऊपर उठ जाती है और हाथ नमन की मुद्रा में जुड़ जाते हैं। जरूर कोई अदृश्य शक्ति हमारी रक्षा करती है। हम उसे चाहे जिस नाम से याद करें- ईश्वर, अल्लाह, क्राइस्ट  ………..

मैं गंगा…….( प्रदूषण )

मैं गंगा…….
मैं बहुत खुश हूँ। सागर से मिलने का समय आ रहा है। बड़ी दूर से, बड़ी देर से मैं इस समय का इंतज़ार कर रही हूँ। आज़ मैं उसके बहुत करीब हूँ। मेरे दिल में उठते ख़ुशी की तरंगों को तुम सब भी देख सकते हो। मेरे पास सागर से कहने की ढेरों बातें हैं। क्या बताऊँ, उससे क्या-क्या कहना है। पूरी जिंदगी उससे मिलने की अरमान में काटा है। बस अब वह पल आने ही वाला है। क्या तुम सब तक मेरी आवाज़ जा रही है? क्या तुम मेरी खुशी को मससूस कर सकते हो? मैं गंगा…….

अचानक ख्याल आ रहा है – सागर से मिलने से पहले अपने को सजा-सँवार तो लूँ। इतनी लंबी यात्रा में मैंने तो खुद की कोई सुध ही नहीं ली। दूसरों के लिए ही जीती रही। पर आज़ तो समय है सजने का। मैंने अपने विशाल और विस्तृत रूप पर नज़र डाला और मैं अवाक रह गई। यह क्या??? ऐसी तो तो मैं नहीं हूँ। यह काला- गंदला रंग मेरा तो नहीं है। ताजगी भरी, खिली-खिली, साफ- सुथरी, खिलखिलाती, जीवन से भरपूर मेरे रूप को क्या हो गया। सिर्फ गंदगी ही गंदगी है। बिखरे कूड़े, छहलाते कचरे, सड़े फूल पत्ते, विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेष, शमशान घाट की गंदगी, प्लास्टिक की बोतलें और सामान, मिट्टी के खंडित पात्र, शैवाल-काई, सतह पर तैरते मृत अवशेष और ना जाने क्या-क्या है। तुम मुझे गंगा कहो या हुगली, पर मैं ऐसी तो नहीं थी।

किसने किया यह सब? तुम लोगों ने तो नहीं? नहीं- नहीं, तुम सब ऐसा नहीं कर सकते हो। तुम तो मुझे जीवनदायिनी, मोक्षदायिनी माँ कहते हो। मेरी पवित्रता की कसमें खाते हो।

अब मैं क्या करूँ? किसकी सहायता लूँ? शाम हो रही है। सूरज से मेरा दुख देखा नहीं जा रहा है। आसमान में चमकते हुए सूरज ने मेरा दुख बाँटना चाहा। शाम होते ही बेचारे ने अपनी लालिमा मेरे जल पर बिखेर दिया। मेरे जल की कालिमा और मटमैलापल उसमें छुप गया है। पर अपने सीने पर फैले इस गंदगी का क्या करूँ? इस डूबते सूरज के अंधेरे में अपनी गंदगी छुपा कर सागर से मिलना होगा क्या? क्या सागर मेरे इस घृणित रूप के साथ मुझे स्वीकार करेगा? कोई तो मेरी मदद करो। क्या कोई मेरी आवाज़ सुन रहा है। मैं गंगा…….