खूब गोरा रंग, ऊँची कद काठी, तीन भाईयों की प्यारी बहन और माँ-पापा की लाड़ली बेटी थी वैदेही । अगल-बगल की गलियों में ना जाने उसकी कितनी सखी-सहेलियाँ रहतीं थी। उसका सारा दिन सहेलियों के साथ हुड़दंग करने में बीतता। कभी गोलगप्पे, कभी दही भल्ले या आलू टिकिया खाना या फिर छत पर बैठ गप्पें करना उस के पसंदीदा शगल थे। हाँ गप्प के साथ बुनाई और क्रोशिये का काम भी चलता रहता।
रात को जब बड़े भईया और पापा के घर आने का समय होता, वैदेही अपने टेबल पर किताबें खोल कर ऐसा शमा बाँध देती, जैसे सारा दिन पढ़ाई कर रही हो। पर उसके कान और आँखें लगे होते गली की ओर। पहले मंजिल की उसकी कमरे की खिड़की से जैसे ही भैया दूर गली के कोने पर नज़र आते, वह सीढ़ियाँ कूदती-फाँदती दरवाजा खोलने पहुँच जाती। बड़े भईया रोज़ कुछ ना कुछ लिए हुए घर पहुँचते- जलेबी, गर्म समोसे, मिठाईयाँ, फल या चॉकलेट। जो वे हमेशा प्यार से वैदेही को हीं पकड़ाते थे।
उस दिन भईया के हाथों में कुछ ज्यादा हीं सामान था और साथ में था एक नवयुवक – रणजीत। वह भईया के आफिस में काम करता था। भईया और पापा उसके शांत स्वभाव और कर्मठ व्यवहार से बड़े खुश थे। जल्दी हीं वैदेही सारा माज़रा समझ गई। यह सब उसके विवाह की तैयारी थी। वह भी खुश थी, जैसे इस उम्र की हर लड़की शादी के नाम से होती है। दोनों परिवार एक दूसरे से मिले और जल्दी हीं शादी हो गई। विवाह के बाद भईया ने मदद कर रणजीत का अलग व्यवसाय करवा दिया। व्यवसाय बड़ा अच्छा चल निकला।
शादी के बाद, कुछ दिनों में हीं वैदेही को पता चल गया कि रणजीत का शांत स्वभाव, वास्तव में तूफान के पहले की शांती थी। दरअसल वह बड़ा हीं गुस्सैल स्वभाव का था। पीना-पिलाना और देर रात तक ताश खेलना उसके रोज़ के नियम थे। नशे में वह अपना आपा और भी खो देता। रोज़ का झगड़ा और हो हल्ला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। इस बीच वैदेही तीन पुत्रों और एक पुत्री की जननी बन चुकी थी। पापा के गुजर जाने की वजह से उसे भईया-भाभी या माँ को यह सब बताने में हिचक होती थी। उसे यह भी लगता था, शायद समय के साथ रणजीत में सुधार आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
रणजीत को समझाने की वैदेही की कोशिश आग में घी का काम करती। वैदेही को नए कपड़ों और साड़ियों का बड़ा शौक था। हाथ में पैसे आते हीं वह भोला के दुकान से नई-नई साड़ीयाँ खरीद लाती। एक रात नशे में रणजीत ने हद कर दी। गुस्से में रणजीत नें वैदेही के सारी दामी कपड़े और साड़ियाँ इकट्ठे कर आग के हवाले कर दिये। वैदेही बड़े होते बच्चों के सामने तमाशा नहीं करना चाहती थे। पर ये बातें रणजीत की समझ में नहीं आती थीं।
दिन भर खुशमिजाज़ दिखने वाली वैदेही अंदर हीं अंदर घुलती रहती। अपनी सहेलियों को कुछ भी बताने से हिचकती थी। पर दीवारों के भी कान होते हैं। सारा आस पड़ोस बिना टिकट रोज़ का यह नाटक देखता था। एक रात रणजीत ने आने में बहुत देर कर दी। वैदेही का दिल धड़कने लगा। नशे में कहीं कुछ हो तो नहीं गया? लगभग आधी रात रणजीत घर पहुँचा। चिंतित वैदेही उस से देर से आने का कारण पूछने की भूल कर बैठी। नशे में चूर रणजीत ने गाली-गलौज, हंगामा और झगड़ा शुरू कर दिया । बच्चे आँखें मलते जाग गए। रौद्र रूप धारण किए पति ने वैदेही को धक्के मार कर घर से बाहर कर दिया। बच्चों ने रोकना चाहा। उन सब को भी आधी रात में रणजीत ने घर से बाहर कर दिया। पीने-पिलाने के चक्कर में व्यवसाय का भी बुरा हाल था।
बड़ी होती बेटी और तीन बेटों की माँ आज असहाय अपने घर के बाहर आधी रात के समय लाचार खड़ी थी। दो-चार दिन अपने मायके में रह कर वह वापस लौटी। तब पता चला कि रणजीत को किसी केस की वजह से पुलिस खोज रही है। अतः वह फरार है। रणजीत के ना रहने से घर में शांती तो बहुत थी। पर पैसों के बिना घर चलना मुश्किल हो गया। पर कहते हैं ना कि ईश्वर सब सहने की हिम्मत देता है। एक ही रात में वैदेही के चारो बच्चे जैसे सयाने और समझदार हो गए। चारों ने अपनी योग्यतानुसार जो भी काम मिला करने लगे। वैदेही ने भी बुनाई-कढ़ाई जैसे काम शुरू कर दिये।
उनके पास जो था, जैसा था। उसमें हीं खुश थे। अब उन सब की जिंदगी सुकून भारी थी। तभी अचानक वैदेही की बेटी रौशनी के लिए अपने आप एक अच्छा रिश्ता आया। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शादी की तिथी पास आने लगी। अपने गहने बेच कर वैदेही ने पैसों का इंतज़ाम किया। बेटों ने अपनी-अपनी नौकरी से भी कुछ अग्रिम पैसे ले लिए थे। लड़के वालों की कोई फर्माइश नहीं थी। पर शादी का खर्च तो था हीं।
तभी एक विचित्र बात हुई। अचानक रणजीत घर वापस आ गया। परंतु उसका रूप-रंग बदला हुआ था। वह गेरुए धोती-कुर्ते में था। हाथों में था एक लंबा त्रिशूल, गले में लंबा रुद्राक्ष माला, लालट पर भभूत और पैरों में खड़ाऊँ। चेहरे पर कभी शिकन ना लानेवाली वैदेही को समझ नही आ रहा था कि सन्यासी पति के प्रत्यागमन पर वह रोए या हँसे।
चार बच्चों के साथ, बीच मझधार में वैदेही को अकेले छोड़ देने वाले पति ने उसे बताया कि वह बदल चुका है। अब वह परिवार में बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहता है। जब रात में वह जमीन पर कंबल बिछा कर सोने लगा, तब वैदेही को उस पर दया आ गई। वैदेही ने जानना चाहा कि इतने सालों तक वह कहाँ था। पूरी रात रणजीत अपनी दुख और कष्ट भरी कहानी सुनाता रहा। उसकी कितनी कठिन जिंदगी थी। उस रात नशे में तेज़ चलाते बाईक से दुर्घटना हो गई और उस व्यक्ती की वहीं मृत्यु हो गई। पुलिस से छुपने के कोशिश में वह घर से फरार हो गया।वह पहचाना ना जा सके, इसलिए उसने दाढ़ी-मूंछे बढ़ा ली थीं। भटकते-भटकते वह ईश्वर के द्वार, हरिद्वार पहुँचा। वहाँ वह गंगा तट पर गुरु जी से मिला। वैदेही के साथ किए गए अन्याय और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए बीमारों, कोढ़ियों और गरीबों की सेवा करता रहा इतने वर्षों तक। अब उसने सभी बुरी आदतें छोड़ दीं है।
रणजीत ने अगले दिन से बाज़ार के काम और सब्जियाँ लाने जैसे काम अपने जिम्मे ले लिया। जिंदगी पटरी पर आ गई थी। सभी बड़े खुश थे। बच्चे पिता के बदले रूप और स्वभाव से प्रसन्न थे। वैदेही शादी के कामों में उलझी थी। विवाह की पूर्वसंध्या पर संगीत कार्यक्रम में सभी व्यस्त थे। नाच -गाने का उल्लासपूर्ण माहौल था। तभी वैदेही को उनकी प्रिय सहेली ने इशारे से बुलाया।
वह वैदेही को चुप रहने का इशारा कर आपने साथ पीछे के गैरेज की ओर ले गई। जो प्रायः खाली और बंद पड़ा रहता था। द्वार के दरार से वैदेही ने देखा, रणजीत शराब पीने में व्यस्त है और अपने किसी मित्र से कह रहा है –“ यह मेरा सुरक्षित कमरा है। यहाँ पीने पर किसी को शक नहीं होता है। हाँ, मुझे पैसों की तंगी तो होती है। पर हाट-बाज़ार से पैसे बचा कर बोतल खरीद लाता हूँ। सोचता हूँ, कल रोशनी की बारात आने के ठीक पहले पीने का नाटक कर वैदेही से दस-बीस हज़ार रुपए झटक लूँगा। मैंने उसके पास काफ़ी रुपये देखे हैं।“ गेरुए वस्त्रधारी बगुले भगत का असली रूप देख वैदेही सन्न रह गई। उसे लगा, धरती फट जाये और वह भी सीता की तरह उसमें समा जाये।
उसके चेहरे पर घबराहट छा गई। यह कैसा पिता है, जो अपनी बेटी का शत्रु है। वह गैरेज की ओर आगे बढ़ी। तभी उसकी सहेली ने उसे हाथ पकड़ कर खींच लिया। दोनों ने कुछ बातें की और वैदेही के चेहरे पर कुछ निर्णायक भाव आ गए। अगले दिन शाम में शादी की भीड़-भाड़ अपने सबाब पर थी। दुल्हन बनी रोशनी बड़ी सुंदर लग रही थी। तभी नशे में झूमता रणजीत वैदेही से उज्जड तरीके से शराब खरीदने के लिए पैसे माँगने लगा।
तत्काल वैदेही ने बेटों से कह कर रणजीत के लिए शराब की बोतलें मँगवा दिया । तुरंत पैसे लाने का आश्वासान देते हुई रणजीत को शान्त रहने का निवेदन करने लगी । अपना काम इतनी सरलता से बनता देख रणजीत खुश हो गया और गटागट पीना शुरू कर दिया। वैदेही का तीर ठीक निशाने पर लगा था। थोड़ी देर में रणजीत नशे में चूर हो गया।तीनों बेटों ने उसे चुपचाप पीछे के उसी गैरेज में ड़ाल,बाहर से ताला बंद कर दिया।
रोशनी की शादी उसके अकर्मण्य पिता के अनुपस्थिती में बड़े अच्छे से सम्पन्न हो गया। अगले दिन उसकी बिदाई होने के बाद सभी मेहमानों को बिदा कर वैदेही गैरेज के पास पहुँची। बेटों ने ताला खोला। रणजीत का नशा उतार चुका था। पर उस की आँखें अभी भी लाल थीं। बिखरे बाल, मुँह से शराब की दुर्गंध उसके चेहरे को कदर्य और भद्दा बना रही थीं।
अपना वार खाली जाते देख बौखलाया रणजीत, पहले की तरह झगड़े और मार-पीट पर उतारू हो गया। पर तभी वहाँ पुलिस आ गई। वैदेही को पुलिस अफसर ने धन्यवाद देते हुए कहा –“ आपने इसकी सूचना हमें दे कर अच्छा किया । बहुत दिनों से पुलिस इसे नशे में एक्सिडेंट करने की वजह से खोज रही थी। हरिद्वार की एक महिला ने भी इस पर केस दर्ज किया है। उस महिला ने बताया कि रणजीत ने हरिद्वार में उस से झूठ बोल कर विवाह किया था। कुछ साल उसके साथ बीताया। कुछ महीनों पहले उसके रुपये और गहने चोरी कर फरार हो गया था।
वैदेही आज बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था, काश वह पहले इतनी हिम्मत जुटा कर रणजीत को अपनी जिंदगी से बाहर कर पाती।
भगवान ब्रह्मा चाहते थे कि भारत के दर्शन, वेद तथा उपनिषदों का ज्ञान लुप्त नहीं हो और धर्म क्षीण न हो जाये। इसलिए ब्रह्मा ने ऋषि वेद व्यास को भारत की कथा यानि महाभारत लिखने की प्रेरणा दी। विष्णु के अवतार, वेदव्यास महाभारत की घटनाओं के साक्षी थे। साथ ही वे वेदों के भाष्यकार भी थे। वेदों को उन्होने सरल भाषा में लिखा था। जिससे सामान्य जन भी वेदों का अध्ययन कर सकें। उन्होने अट्ठारह पुराणों की भी रचना की थी।
वेद व्यास एक महान कवि थे। ब्रह्मा के अनुरोध पर व्यास ने किसी लेखक की कामना की जो उनकी कथा को सुन कर लिखता जाये। श्रुतलेख के लिए व्यास ने भगवान गणेश से अनुरोध किया। गणेश जी ने एक शर्त रखी कि व्यास जी को बिना रुके पूरी कथा का वर्णन करना होगा। व्यास जी ने इसे मान लिया और गणेश जी से अनुरोध किया कि वे भी मात्र अर्थपूर्ण और सही बातें, समझ कर लिखें।
इस तथ्य के पीछे मान्यता है कि महाभारत और गीता सनातन धर्म के सबसे प्रामाणिक पाठ के रूप में स्थापित होने वाले थे। अतः बुद्धि के देव गणेश का आशीर्वाद महत्वपूर्ण था।
किवदंती है कि व्यास जी के श्लोक गणेश जी बड़े तेजी से लिख लेते थे। इसलिए व्यास जी कुछ सरल श्लोकों के बाद एक बेहद कठिन श्लोक बोलते थे। जिसे समझने और लिखने में गणेश जी को थोड़ा समय लग जाता। जिस से व्यास जी को आगे के श्लोक और कथा कहने के लिए कुछ समय मिल जाता था। भगवान गणेश ने ब्रह्मा द्वारा निर्देशित कविता “महाभारत” को दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य कहलाने का आशीर्वाद दिया।
भारत और भारत के लोगों की इस वृहद कहानी में अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास , भूगोल, ज्योतिषशास्त्र, तत्वमीमांसा , कामशास्त्र जैसे विषयों के साथ भौतिक जीवन की नि:सारता का गीता संदेश भी शामिल है। इसलिए भारत की यह कहानी महाभारत कहलाई।
पौराणिक कथा के अनुसार 12 वर्ष के भयंकर सूखे से सरस्वती नदी शुष्क हो तिरोहित हो गई। इसका गहरा प्रभाव मानव जाति पर पड़ा।
इस दौरान मानव, मात्र अपने जीवित रहने के प्रयास में ज्ञान से दूर होता गया। इस नदी के तट पर यज्ञ-पूजन करने वाले ऋषीगण और लोग, भयंकर आकाल के कारण यहाँ से पलायन कर गए। इस भयंकर आकाल ने सरस्वती नदी के साथ वेद के ज्ञानों को भी लुप्त कर दिया।
सरस्वती ही तब विशालतम, परम पवित्र ,और मुख्य नदी थी। ऐसा वर्णन वेद, पुराण रामायण, महाभारत, वैदिक सभ्यता आदि में मिलता है।
यह देख महर्षि पराशर के पुत्र और भगवान ब्रह्मा के अवतार, वेद व्यास या कृष्ण द्वयपायन ने पुनः सभी ज्ञानपूर्ण वेदों को जमा, संकलित और सरल भाषा में रचित किया । इसे चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद में पुनः जन सामान्य के सामने प्रस्तुत किया। ताकि पुनः समाज का निर्माण हो सके। इन्होने वेदों को सरल, और जन साधारण की भाषा में लिखा। जो भाष्य कहलाए और द्वयपायन वेद व्यास कहलाने लगे ।
ऋग्वेद के नदी सूक्त के अनुसार यह पौराणिक नदी पंजाब के पर्वतीय भाग से निकलकर कुरुक्षेत्र और राजपूताना से होते हुए प्रयाग या इलाहाबाद आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर पुण्यतीर्थ त्रिवेणी कहलाती है। मान्यता है कि आज भी प्रयाग में यह अंत:सलिला है यानि धरती के अंदर ही अंदर बहती है।
वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समानांतर खुदाई में ५५००-४००० वर्ष पुराने शहर मिले हैं जिन में पीलीबंगा, कालीबंगा और लोथल भी हैं। यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित तथ्य को प्रमाणित करते हैं।
कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि भीषण भूकम्पों के कारण सरस्वती लुप्त हुईं हैं। ऋग्वेद तथा अन्य पौराणिक वैदिक ग्रंथों में दिये सरस्वती नदी के सन्दर्भों के आधार पर कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि हरियाणा से राजस्थान होकर बहने वाली मौजूदा सूखी हुई घग्घर-हकरा नदी प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी की एक मुख्य सहायक नदी थी।
कर्ण – एक अभिशप्त पुत्र की व्यथापूर्ण आत्म कथा ( महाभारत की विडम्बना पूर्ण कहानी)
मंद शीतल वायु मेरे शरीर और आत्मा को ठंडक और सुख प्रदान कर रही है। साथ ही माँ के हांथों का स्पर्श और अश्रु जल भी मेरी आत्मा को शीतल कर रही है। इस के लिए पूरी जिंदगी अपने को जलाता रहा था।
माँ के इस स्पर्श के लिए ना जाने कब से तरस रहा था। मैंने उसे वचन दिया था, उसके पाँच पुत्र जीवित रहेंगे। वचन पूरा करने का संतोष मुस्कान बन अधरों पर है। बचपन से आज तक मुझे अपनी जीवन के सारे पल याद आ रहें हैं। अभी तक ना जाने कितने अनुतरित प्रश्न मुझे मथते रहें हैं। कहतें हैं, मृत्यु के समय पूरे जीवन की घटनाएँ नेत्रों के सामने आ जाते हैं। क्या मेरी मृत्यु मुझे मेरे पूर्ण जीवन का अवलोकन करवा रही है? अगर हाँ, तब मैं कहना चाहूँगा- मृत्यु जीवन से ज्यादा सहृदया, सुखद और शांतीदायक होती है।
मैं अपने आप को बादल सा हलका और कष्टों से मुक्त पा रहा हूँ। चारो ओर हाहाकार और रुदन है। रक्त धारा धरा के रंग को बदल रही है। यहाँ पर उपस्थित नर और नारी व्यथित हैं। सभी के आश्रुपुर्ण नयन हैं। पति, पुत्र या पिता के लिए विलाप करनेवालों की आवाज़ वातावरण को व्यथित कर रहीं है। पर मैं असीम सुख के सागर में डूब उतरा रहा हूँ। अब ना कोई दुख है ना कष्ट।
मैं, अंग नरेश, महायोद्धा , दानवीर, धर्मनिष्ठ, तेजोमय सूर्यपुत्र, ज्येष्ठ कुंती नन्दन, कौंतेय, कर्ण या राधेय का शरीर कुरुक्षेत्र की धरा पर अवश, निर्जीव पड़ा है। तन पर अनेकों घाव हैं।साथ है, बेरहमी से खींच कर निकाले कवच-कुंडल का ताज़ा घाव और मुख से बहती रक्त धार।
मेरे रथ का चक्का मृतिका में अटका , जकड़ा है। मैंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र रख कर दोनों हाथों से माटी में धसें रथ के चक्र को निकालने का असफल प्रयास कर रहा था। तभी छल से, युद्ध विधान के विपरीत, मुझ पर अर्जुन ने वार किया।
अभी भी ईश्वर के कठोरता की इति नहीं हुई। अभी भी मेरी परीक्षा शेष थी। जब मेरा अंत निकट था। मैं अपने शारीरिक कष्टों और आसन्न मृत्यु को देख व्यथित था। तब, पिता सूर्य और इंद्र मेरे कष्टों से द्रवित न हो , मेरे दानवीरता की सीमा जानने के बहस में लिप्त हो गए।
मेरे दानवीरता को परखने के लिए भिक्षुक बन दोनों, मुझ से मेरे दाँतों में जड़ित तिल भर स्वर्ण की माँग कर बैठे। इंकार कैसे करता। मैंने ना बोलना नहीं सीखा है कभी। स्वर्ण टंकित दांत को कठोर पाषाण प्रहार से तोड़ भिक्षुक बने पिता सूर्य और इन्द्र को दे दिया था। अतः मुख भी आरक्त है। तप्त रक्त की धार मुख से बह कर मेरे संतप्त हृदय को ठंडक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।
********************* आज मुझे अपने जन्म की कथा याद आ रही है। मैं अपने माँ के अंक में हूँ। एक सुंदर स्वस्थ शिशु जो स्वर्ण अलंकारों से सज्जित है। ऐसे काम्य, सुंदर और स्वस्थ शिशु को देख कर माँ की आँखों में प्रसन्नता क्यों नहीं है? क्यों वह अचरज भरी आँखों से मुझ को देख रही है। अश्रु उसके ग्रीवा तक बह रहें है। फिर उसी माँ ने मुझे एक सुंदर मखमल युक्त पेटी में गंगा में प्रवाहित कर दिया।
मेरे साथ यह सब क्या और क्यों हो रहा है? बाद में मुझे मालूम हुआ, मेरे माता कुंती को दुर्वासा ऋषि ने मात्र किसी देव को स्मरण कर संतान प्राप्ति का वरदान दिया था। तत्काल वरदान की सच्चाई जानने के प्रयास में वे सूर्य देव से मुझे मांग बैठीं। मैं, रवितनय कर्ण तुरंत उनकी गोद में आ गया। पर माता कुंती में कुमारी माता हो, संतान को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं थी। फलतः माँ ने मुझे असहाय, गंगा की धार के हवाले कर दिया।
मैं अकेल सुंदर मखमल युक्त पेटी में गंगा की कलकल- छलछल करती पवित्र धार में बहता जा रहा हूँ। जब मैंने आँखों को खोलने का प्रयास किया तब तेज़-तप्त पिता सूर्य की किरणें नेत्रों में चुभने लगीं और मैं क्रंदन कर उठा। गगन में शान से दमकते हुए मेरे पिता ने सब देखते हुए भी अनदेखा कर दिया।
पर निसंतान सूत अधिरथ ऐसा नहीं कर सके। उन्होने मुझे गंगा की धार में असहाय क्रंदन करते सुना। तत्काल मुझे निकाल अपने साथ अपनी पत्नी के पास ले गया। एक माँ ने अश्रुपूर्ण नयन से अर्क पुत्र को विदा कर दिया था। दूसरी, राधा माता ने परिचय जाने बगैर , खुशी से चमकते नेत्रों से और खुली बाहों से मुझे स्वीकार किया। उन्होने मेरा नाम रखा वसूसेना । मेरे वास्तविक माता पिता कौन कहलाएंगे? राधा और धृतराष्ट्र के रथ को चलानेवाले अधिरथ ही न?
जन्म से मेरे बदनटंकित स्वर्ण कवच –कुंडल और मेरे मुख पर पिता सूर्य का तेज़ देख मोहित हो गए राधा और अधिरथ । निस्वार्थतापूर्वक, अपूर्व प्रेम के साथ पालक माता-पिता ने मेरा पालन- पोषण किया। काश मैं उनका वास्तविक पुत्र होता। आज भी जब कोई मुझे राधेय पुकारता है तब सबसे अधिक खुशी होती है। आजतक, मृत्युपर्यन्त, उन्हें ही मैं अपना माता- पिता मान पुत्र धर्मों का निर्वाह करता आया हूँ।
मेरे बचपन में मेरे बाल्य सखा मुझे परिचय रहित मान चिढ़ाते। पास-पड़ोस के लोग अक्सर मुझे देख उच्च स्वर में कानाफूसी करते, मुझे सुनाते और जलाते थे। मेरे दुखित हृदय कभी किसी ने शीतल स्नेह से नहीं सहलाया।
मेरे बालपन में एक बार महारानी कुंती हमारे घर आई। मेरी माँ को अपनी सखी बताती थी। विशेष रूप से मुझे से मिलीं। मुझे गोद में बैठा कर प्यार किया। पर उनकी नयन अश्रुपूर्ण क्यों हैं? मेरा बाल मन समझ नहीं पाया। वे मेरे लिए वस्त्र और उपहार क्यों लाईं थीं? मैंने द्वार के ओट से छुप कर सुना। वे मेरी भोली राधा माता से कह रहीं थी –“ राधा, तेरा यह पोसपुत्र आवश्य किसी उच्च गृह का परित्यक्त संतान है। प्रेम से इसका पालन पोषण करना।
सब ने उनके महानता और सरलता की प्रशंसा की। राज परिवार की पुत्रवधू निष्कपट भाव से सूत पत्नी से मित्रता निभा रहीं हैं। एक अनाथ, अनाम बालक पर स्नेह वर्षा कर रहीं थीं। तब किसी के समझ में नहीं आया कि परित्यक्त पुत्र के मोह और मन के अपराध बोध ने उन्हें यहाँ आने के लिए बाध्य किया था।
बचपन से पांडव मुझे निकृष्ट सूत पुत्र मान कर अपमानित करते आए हैं। भीम हर वक्त मेरे उपहास करता रहा है। अर्जुन मेरी श्रेष्ठता को जान कर भी अस्वीकार करता रहा है। आश्रम के गुरुजन भी राजपुत्रों के सामने मुझे सूत पुत्र कह अपमानित करते हैं। पूरे संसार में धर्म की रक्षा करने के लिए जाना जाने वाला युधिष्ठिर यह सब अन्याय देख कर हमेशा मौन रहे।
मैं सूत अधिरथ का पुत्र हूँ। पर रथ चलाने के बदले मेरी कामना होती अस्त्र-शस्त्र चलाने की। द्रोणाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से इन्कार कर दिया। क्योंकि गुरु द्रोण मात्र राजपुत्रों और क्षत्रियों को शिक्षा देते हैं। मैं दूर से, वृक्षों के झुरमुट से सौभाग्यशाली राजपुत्रों को देख उनके भाग्य से ईष्या करता और अकेले में स्वयं अभ्यास करता। तब सोचा करता, सूत पुत्र के अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण की कामना ग़लत क्यों, भूल क्यों है?
द्रोणाचार्य के इन्कार के उपरान्त मैंने ने गुरु परशुराम के चरणों में आश्रय ढूँढ लिया। गुरु परशुराम मात्र ब्रहमनों को शिक्षा देते थे। मैंने अपना परिचय छुपा ज्ञान अर्जित किया। अपने को सर्वोतम धनुर्धर बनाने के लिए रात-दिन मेहनत की और अपने उदेश्य में सफल हुआ।
एक दिन थके क्लांत गुरु जी को मैंने अपनी जंघा पर निंद्रा और विश्राम करने कहा। गुरु जी गहरी नींद में सो गए। तब, अचानक एक कीट मेरे जंघा में काटने लगा। पीड़ा से मैं छटपटा उठा। बड़ा दुष्ट कीट था। लगा जैसे मेरे जाँघों के अंदर छेद बना कर अंदर घुसता हीं जा रहा है। बड़ी तेज़ पीड़ा होने लगी। कष्ट और अपने बहते रक्त की परवाह ना करते हुई मैं निश्चल बैठा रहा, ताकि गुरु की निंद्रा में व्यवधान ना पड़े। जैसे पूरे जीवन मेरे अपनों ने ही मुझे अपना नहीं माना, वैसे हीं उस दिन मेरे ही रक्त ने मुझे से दुश्मनी की।
जंघा से बहते, तप्त रक्त के स्पर्श से गुरु जी जाग गए। उन्हें मालूम था कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं होती। बिना मेरी बात सुने मुझे श्राप दे डाला। फलतः मैं उनसे शापित हुआ। उन्हों ने गुस्से से कहा, उनसे प्राप्त सारी शिक्षा और ब्रह्मास्त्र प्रयोग मैं तभी भूल जाऊंगा, जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी। तब तक मुझे भी नहीं पता था कि वास्तव में मैं कौन हूँ? मुझे अधिरथ और उनकी पत्नी राधा का पुत्र वासुसेना या राधेय?
यह जान कर गुरु परशुराम का क्रोध ठंढा हुआ और तब उन्हों ने मुझे अपना धनुष “विजय’ दिया। साथ में दिया मेरे नाम को अमर होने का आशीर्वाद। पर श्राप तो अपनी जगह था । क्यों गुरु जी ने उनके प्रति मेरी श्रद्धा, सहनशीलता और निष्ठा नहीं देखी?
गुरु द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर में अपनी शिक्षा और शिष्यों की योग्यता प्रदर्शन करने के लिए रंगभूमी प्रतियोगिता आयोजित किया। वहाँ अनेक राजे-महाराजे, सम्पूर्ण राज परिवार आमंत्रित थे। सभी गणमान्य अतिथि और समस्त राज परिवार सामने ऊँचे मंच पर आसीन थे। मैं भी उत्सुकतावश आयोजन में जा पहुंचा। सभी शिष्यगण अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर रहे थे। सबसे योग्य शिष्य अर्जुन अपनी धनुर्विध्या से सबको मोहित कर रहा था। गुरुवर ने अर्जुन को सर्वोत्तम धनुर्धर बताया।
मुझे मालूम था कि मैं अर्जुन से श्रेष्ठ हूँ। अतः मैंने अर्जुन को ललकारा। पर यहाँ मेरे योग्यता का सम्मान नहीं हुआ। कृपाचार्य ने मेरे राज्य और वंश पर प्रश्न चिन्ह लगाए। मैं एक सूत-पालित पुत्र मात्र था। मात्र राजा या राज पुत्रों का ऐसे आयोजन में भाग लेने की परंपरा रही है। मेरी आँखों में अश्रु कण छलक आए। पर वहाँ कोई नहीं था मेरे हृदय की कातरता को समझनेवाला। सामने सिहांसनारूढ़ माता कुंती तो जानती थी मेरा गुप्त परिचय।
मेरे पिता, नभ स्वामी सूर्य तो पहचानते थे मुझे। पर वे चुपचाप चमकते रहे गगन में। मेरे माता-पिता सब जान कर मौन रहे, मेरा दुख और अपमान देखते रहे। यह मेरे शर्म और अपमान की पराकाष्ठा थी। मेरे गुण सिर्फ इसलिए महत्वहीन थे, क्योंकि मेरे पास अपना परिचय नहीं था। मेरा हृदय तड़प रहा था अपना परिचय जानने के लिए।
क्या कहाँ जन्म लेना है, यह किसी शिशु के वश की बात है? शायद ईश्वर से मेरा दर्द सहा नहीं गया और मेरे सम्मान की रक्षा के लिए दुर्योधन को भेज दिया। उस दिन ज्येष्ठ कौरव दुर्योधन ने मेरे सम्मान की रक्षा की। उन्हों ने तत्काल मुझे अंग देश का राजा, अंगराज घोषित किया। अब मैं एक राजा की हैसियत से अर्जुन से युद्ध करने योग्य था। बदले में ने दुर्योधन ने मात्र मेरी सच्ची मित्रता चाही।
सभी मुझे अंगराज बनने की बधाई दे रहे हैं। मेरे राजा बनने की खुशी में दुर्योधन ने एक वृहद उत्सव आयोजित किया है। मेरे राज्य- अंगराज्य में खुशियाँ मनाई जा रहीं हैं।मेरा पूरा राज्य दीपों से जगमगा रहा है। पर किसी को मेरे मनः स्थिती का ज्ञान नहीं है। इतने बड़े सम्मान के बाद भी मेरे दिल का एक कोना खाली और अन्धकारमय है, जो मुझ से बारंबार पूछता है – तू है कौन? कहाँ से आया है? तेरे माता-पिता कौन हैं?
मैं सूर्य आराध्य हूँ। अंगराज बन मैंने निर्णय किया। सूर्य उपासना के समय आए किसी भी याचक को रिक्त हस्त कभी नहीं लौटने दूंगा। वे जो मांगेगे वही दान उन्हें मैं दूंगा। मैंने संपूर्ण जीवन इसका पालन किया। आज मैं दानवीर कर्ण कहलाता हूँ। पर इसका लाभ बहुतों ने मुझे क्षति पहुंचा कर उठाया, चाहे वे मेरी माता कुंती, देवराज इंद्रा या स्वयं मेरे पिता हिरणगर्भ कहलाने वाले सूर्य हों। सब समझते हुए भी मैं दानवीर बना रहा।
राजसिंहासनारूढ़ हो कर मैंने अपने कर्तव्य का पूर्णरूप निर्वाह किया। प्रजा का पूरा ध्यान संतान की तरह रखा। एक दिन राज्याव्लोकन करने अपने अश्व पर निकला। मार्ग में एक रोती हुई बालिका मिली। उसके पात्र से घृत मिट्टी में गिर गया था। मैंने अपनी ओर से उसे घृत देना चाहा। पर बाल हठ था कि उसे वही घी चाहिए। उस असहाय कन्या के अनुरोध पर मैंने जमीन पर गिरे घी को हाथों से निचोड़ कर मिट्टी मुक्त करना चाह। मिट्टी बलपूर्वक हथेलियों से दबाने से भूमि देवी ने कुपित हो मुझे श्राप दे दिया। कहा, जब मैं किसी भीषण युद्ध में संलग्न रहूँगा।तब वे मेरे रथ के चक्कों को वैसे ही बल से जकड़ लेंगी , जैसे आज उन्हें मैंने अपनी मुष्टिका में दबाया है।
ऐसा और किसी के साथ तो उन्हों पहले किया हो ऐसा तो मैंने नहीं सुना है। कुम्हार भी तो माटी को गुँधता, मसलता और आग में पकाता है। किसान धरती को रौंदता है और उसके सीने पर बीज रोपता है। धरती तो माँ होती है, सहनशील होती है। फिर यह माँ भी मेरे साथ इतना कठोर क्यों बन गई। एक बार भी बालिका को सहायता करने की मेरी अच्छी भावना के बारे में क्यों नहीं सोंचा?
राजा द्रुपद ने सौंदर्यमती, अग्निजनित पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर आयोजित किया। यज्ञ की अग्नि से जन्मी द्रौपदी अति रूपवान और विदुषी थी। अतः उनके स्वयंवर में जाने से मैं अपने को रोक नहीं सका। मैं द्रौपदी का रूप देख कर उसपर मोहित हो गया। पर शर्त पूरी करने के लिए स्वयंवर मंच पर नहीं गया। मैं जानता था कि मैं बड़ी सरलता से भारी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर मत्स्य नेत्रों का भेदन कर सकता हूँ। पर मैं अपनी परिचयरहित जीवन की सच्चाई भी समझता था।
मन ही मन सौंदर्य की देवी द्रौपदी की स्तुति कर रहा था। मैं श्यामल सुंदरी द्रौपदी के नत चेहरे को देखा रह गया। तभी द्रौपदी ने नज़रें उठाईं। हम दोनों के नज़रें मिलीं। वह मुझे निहार रही थी। उनमें मेरे लिए प्रशंसा और प्रेम के भाव स्पष्ट थे। किसी भी वीर में जब स्वयंवर के शर्त को जीतने की क्षमता नहीं दिखी। तब पुष्प और स्वर्ण गहनों की सज्जा से चमकता द्रौपदी का नत चेहरा उदास और नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए। मेरा हृदय अपना दुख भूल द्रौपदी के दुख से व्यथित हो गया। अगर आज स्वयंवर की शर्त पूरी नहीं हुई तो द्रौपदी को आजीवन कौमार्य व्रत लेना होगा।
आवेश में आ कर, स्वयंवर क्षेत्र की ओर कदम बढ़ाए। आधी शर्त मैंने धनुष को मोड़ और उस पर प्रत्यञ्चा चढ़ा पूरी भी कर ली। तभी कृष्ण ने नयनों के इशारे को देख धृष्ठधुम्म्न, द्रौपदी के जुड़वाँ भ्राता ने मेरी पहचान पर प्रश्न उठा, मुझे रोक दिया। कहा, मैं ब्राह्मण या राजपुत्र नहीं हूँ। पर मैं स्वयंवर मंडप में खड़े होने का भूल कर बैठा था। फलतः द्रौपदी के स्वयंवर में विद्रुप भरे अपमानजनक प्रश्नों की श्लाका से मुझे दागा गया।
सभी उपस्थित राजा, महाराजा मेरी ओर व्यंग बाणों की वर्षा करने लगे। जो मौन थे, उनके नेत्रों की व्यंग अग्नि मुझे झुलसा रही थी। गगन में प्रकाश बिखरते मेरे पिता ने मेरा अपमान देख, अपना मुख बादलों की ओट में कर लिया। सभागृह में बैठे सर्वज्ञ और युग द्रष्टा कृष्ण ने मौन रह मेरे साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया। स्वयं मुझे मुक आमंत्रण देनेवालीद्रौपदी भी मौन रही। मेरा हृदय विदीर्ण हो गया। अपमानित, अनाथ, राधेय झुके नेत्रों से वापस अपने आसान पर आसीन हो गया।
दुर्योधन मेरे साथ बैठ द्यूतक्रीड़ा के आयोजन की चर्चा कर रहा है। मुझे जुआ जैसा निकृष्ट क्रीडा या लाक्षा गृह जैसे गलत और कपटपूर्ण कार्यों का आयोजन पसंद नहीं है। अतः मैंने दुर्योधन को बहुत रोका और समझाया। मुझे मामा शकुनि के गलत परामर्श भी नापसंद हैं। परंतु जीत शकुनि की हुई। वीरता और युद्ध से पाँडवों का सामना करने के बदले छल और कपट का सहारा लिया गया।
पर, द्यूतक्रीड़ा के दौरान पाँडवों को पराजित होते देख कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँच रही थी। अब लग रहा था दुर्योधन ने उचित किया, पाँडवों को इस तरह अपमानित कर। बचपन से ये भी तो ऐसे ही मुझे अपमानित करते आए हैं। आज उस द्रौपदी को भी अपमानित होना पड़ेगा, जो मेरे अपमान का कारण बनी थीं। मैंने द्रौपदी को बहुपति, नगरवधु कह चीरहरण के लिए कौरवों को आक्रोशित कर भड़काया। यह द्रौपदी को ना पाने और मेरे अंदर विश्व के प्रति भरे आक्रोश ने मुझ से करवाया था। पर सच बताऊँ? द्रौपदी का अपमान मेरे हृदय को कचोटता है। आज भी मैं अपनी उस भूल के लिए शर्मिंदा हूँ।
वनवास के लिए प्रस्थान करते हुए द्रौपदी के सारे आभूषण और मूल्यवान वस्त्र दुर्योधन ने उतरवा लिए हैं, यह ज्ञात होते हीं मैंने सम्मानपूर्वक उन्हें कुछ आभूषण भिजवाए। पर उस सौंदर्यमयी स्वाभिमानी नारी ने उन्हें ठुकरा दिया।
वनवास पश्चात, पाँडवों के लौटने पर कृष्ण ने दुर्योधन से उनका राज्य लौटाने का अनुरोध ले कर आए। दुर्योधन के इंकार के पश्चात कृष्ण मेरे पास पहुँचें। एकांत मंत्रणा कक्ष में कृष्ण ने ऐसे रहस्य का अनावरण किया, जिसे जानने के लिए मैं न जाने कब से तड़प रहा था।
प्रथम बार मुझे अपने परिवार और माता-पिता का परिचय ज्ञात हुआ। सब मेरे इतने करीब हैं? फिर भी इतने दूर? मैं राजपुत्र सूर्य पुत्र हूँ? पर कभी किसी ने क्यों नहीं बताया? मेरे दुख और अपमान को बढ़ाते क्यों रहे? आज कान्हा युद्धगत नीतियों के कारण मेरा लाभ उठाने के लिए यह बता रहे हैं- मैं कुंती पुत्र हूँ। मेरे पिता सूर्य हैं। पाँच पांडव मेरे भाई हैं। अतः अब मुझे पाँडवों का, सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए।
क्या मुझे दुर्योधन की मित्रता भूल नटवर, मनोहर कान्हा की बातें मान लेनी चाहिए? पर मैं आज भी दुर्योधन के ऋण से उऋणी नहीं हुआ हूँ। मेरे पीड़ा और अपमान के क्षणों के साक्षी कृष्ण पहले कहाँ थे? जब सब मेरा अपमान करते थे और मुझे लगता था सारी दुनिया को जला कर राख़ कर दूँ। तब उन्होंने धर्म और सत्य की चिंता क्यों नहीं की। आज मैं स्वार्थवश दुर्योधन को छोड़ दूँ, यह मुझसे नहीं होगा।
अब कौरव-पाँडवों के मध्य युद्ध हो कर रहेगा, यह स्पष्ट हो गया है। ऐसे में युद्ध पूर्व, संध्या काल में माता कुंती मुझ से मिलने आई और मुझे कौंतेय कह कर पुकारा। अपने जिस परिचय को जानने के लिए मैं तरसा, मेरी माँ कुंती ने मुझे महाभारत युद्ध के आरंभ में बताया। बदले में अपने पुत्रों के प्राण रक्षा की कामना की। हाँ, उन्हों मुझे लालच जरूर दिया यदि मैं कौरवों को छोड़ पाँडवों के पास आ जाऊँ। तब राज्य , धन और द्रौपदी सब मेरे हिस्से में होगें। पर क्या वे सब मुझे हृदय से स्वीकार कर सकेंगे? आज अचानक वे सब मुझे बड़ा भ्राता मान कर सम्मान कर सकेंगे ? इसके आलाव मेरी निष्ठा का भी सवाल है। मैं मित्र दुर्योधन को धोखा नहीं दे सकता।
राज्यसिंहासन और द्रौपदी पाने का लोभ दे कर माता ने क्यों कुंती पुत्र होने का परिचय दिया। अगर शर्तरहित परिचय दिया होता, मैं अविलंब उसके चरणों में झुक जाता। कितनी बार इस माँ ने अपने नज़रों के सामने मुझे दुखित, व्यथित और अपमानित होते देखा। तब क्यों उसका हृदय मेरे लिए क्रंदन नहीं किया? आज मैं कौंतेय नहीं राधेय हूँ।
आज भी वह मेरी नहीं वरन पांडवों की चिंता कर रही है। बड़ी भोली हैं। मैं पाँडवों का अग्रज हूँ, यह जान कर मैं उनके प्राण कभी नहीं ले सकता हूँ, इतना तक नहीं समझती हैं। अतः मैंने माता को वचन दिया। उसके पाँच पुत्र आवश्य जीवित रहेंगे। माँ ने मेरी दानशीलता का उपयोग पंच पुत्रों के जीवन रक्षा के लिए काम में लाया। जबकि सब जानते हैं, कि कृष्ण के रहते पांचों पांडव का बाल भी बाँका नहीं हो सकता। मेरे जीवन की रक्षा का विचार किसी के मन में नहीं आया।
महाभारत की पूर्वसंध्या के समय मुझसे दान माँगने आए दीन-हीन भिक्षुक की कामना ने मुझे चकित कर दिया। मेरे शरीर के साथ जड़ित मेरी सुरक्षा कवच, स्वर्ण कवच और कुंडल मांगने वाल यह ब्राह्मण कौन है? यह कवच –कुंडल इसके किस काम का है?
वास्तव में, अर्जुन के पिता इंद्र ने मेरे दानवीरता का उपयोग अपने पुत्र के प्राण रक्षा के लिए किया था। मुझे अजेय बनाने वाले कवच-कुंडल, छद्म ब्राह्मण रूप बना मांग लिया। यह था पिता-पुत्र प्रेम। कितना भाग्यशाली है अर्जुन। इंद्रा ने छल किया ताकि उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा हो सके। बदले में अपना अमोघ अस्त्र “शक्ति” मुझे एक बार प्रयोग करने की अनुमति दी।
मेरे पिता आसमान में सात घोड़ों के रथ पर सवार रहे। सब पर अपना प्रकाश समान रूप से डालते रहे। पर मेरे ऊपर उनकी नज़र नहीं पड़ी। मेरी माता हीं नहीं मेरे पितामह भीष्म भी मुझे समझ नहीं पाये। महाभारत युद्ध पूर्ण गति से आरंभ हो चुका था। सेनापति, पितामह भीष्म ने मुझे युद्ध में भाग नहीं लेने दिया। उन्हे भय था, मैं अचानक पाँडवों का साथ देने लगूँगा, कौरवों को धोखा दे दूंगा। दसवें दिन उनके शर शैया पर जाने के बाद ग्यारहवें दिवस से मुझे कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में जाने की आज्ञा मिली।
चौदहवें दिन युद्ध में ना चाहते हुए भारी हृदय से भीम पुत्र घटोत्कच का मुझे संहार करना पड़ा। युद्ध विभीषिका के मध्य, सत्रहवें दिन मेरे सामने रथ पर मेरा अनुज अर्जुन था। पांडवों को मेरा परिचय ज्ञात नहीं था। पर मैं तो सब जानता था। छोटे भाई को मैं शत्रु रूप नहीं देख रहा था। आज अपना परिचय जानना मेरे लिए ज्यादा पीड़ादायक हो गया है। मेरी आँखों में अनुज के लिए छलक़ते प्रेम को कोई नहीं पढ़ सका। कृष्ण, अर्जुन को गीता का पाठ पढ़ाते रहे।
मैं अपने दैवीय और अमोघ अस्त्र-शस्त्र से ऐसे प्रहार करता रहा कि देखनेवाले तो इसे युद्ध माने पर मेरे अनुज अर्जुन का अहित ना हो। मुझे ज्ञात था कि इस निर्णायक युद्ध का अंत मेरी मृत्यु से होगा।
जिसकी माँ ही उसके मृत्यु की कामना करती हो और पिता नेत्र फेर ले। उसे वैसे भी जीवित रहने का क्या लाभ है? माँ ने मेरी सच्चाई पांडवों को भी बताई होती, तब बात अलग होती। मैं अपने मृत्यु के इंतज़ार में युद्ध का खेल खेलता रहा और अपने अंत का इंतज़ार करता रहा।
मैं छोटे भ्राता के युद्ध कौशल से अभिभूत उसकी प्रशंसा कर उठा। तभी मेरे रथ का चक्र मिट्टी में धंस गया। मैं रथ से नीचे उतार गया। सारे अस्त्र-शस्त्र रख मृतिका में फंसे रथ के चक्के को पूर्ण शक्ति के साथ निकालने लगा।
मुझे पूर्ण विश्वास था कि अर्जुन निहत्थे शत्रु पर वार नहीं करेगा। पर हुआ ठीक विपरीत। मैं हतप्रभ रह गया। नटवर, रणछोड़, कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने मुझ निहत्थे पर वार कर दिया। अस्त्र-शस्त्र विहीन अग्रज के साथ अर्जुन ने भी छल कर दिया। शायद अच्छा हुआ। वरना ना जाने कब तक, मुझे छद्म युद्ध जारी रखना पड़ता। आघात ने मेरे असहाय शरीर को भूमि पर धाराशायी कर दिया। अर्धखुले, अश्रुपूर्ण नयनों से मैंने अनुज भ्राता को प्रेमपूर्ण नयनों से देखा। नेत्रों में भरे आए अश्रुबिंदु से अनुज की छाया धुँधली होने लगी।मेरे नेत्र धीरे- धीरे बंद होने लगे। पर, मेरे नील पड़ते अधरों पर तृप्तीपूर्ण विजय मुस्कान क्रीडा कर रही थी।
आज युद्ध क्षेत्र में एक अद्भुत दृश्य ने मुझे चकित कर दिया है। मुझे संपूर्ण जीवन अभिशप्त और परिचय विहीन कह कर अपमानित करने वाले पांचों पांडव मेरे लिए रुदन कर रहें है। मेरी माता श्री मेरे अवश और निर्जीव शरीर पर मस्तक टिकाये विलाप कर रही है। माता कुंती से अधिक पांडव दुखित हैं। मेरा परिचय गुप्त रखने के लिए क्रोधित हो रहें है।
धर्मराज युधिष्ठिर करुण नेत्रों से माता कुंती को देखते रह गए। जैसे उनके व्यथित नयन कह रहे हों -” माता तो कुमाता नहीं होती कभी “। और फिर वे कह उठे, “माता, आज तुम्हारी इस भूल का मूल्य सम्पूर्ण स्त्री जाति को चुकाना पड़ेगा। मैं तुम्हें और समस्त नारी जाति को शापित करता हूँ, कि उनमें कभी भी किसी बात को गुप्त रखने की क्षमता न रहे।
जीवित कर्ण को वितृष्णा की दृष्टि से देखनेवाले पांडव उस के शव को पाने और अंतिम संस्कार करने के लिए व्याकुल दिख रहे है। आज कौरव और पांडव मेरे निर्जीव काया को पाने के लिए आपस में झगड़ रहें हैं। कौन मेरा अंतिम संस्कार करेगा? कैसी विडम्बना है। काश, इस प्रेम का थोड़ा अंश भी जीवन काल में मुझे प्राप्त होता तो मेरी तप्त आत्मा शीतल हो जाती। पर सच कहूँ? हार कर भी मैं जीत गया हूँ।
रंगीली और रंजन की जोड़ी नयनाभिराम थे। रंगीली के सौंदर्य में कशिश थी। बड़े-बड़े खूबसूरत नयन, दमकता चेहरा, लंबी – छरहरी देहयिष्टि। लगता था विधाता ने बड़े मनोयोग से गढ़ा था। पर रंजन का व्यक्तित्व उससे भी प्रभावशाली था। लम्बी-चौड़ी, बलशाली काया, काली आँखों में एक अनोखा दर्प , उनके गोद में होती उनकी परी सी सुंदर पुत्री एंजले। अभिजात्यता की अनोखी छाप पूरे परिवार पर थी। उनकी आंग्ल भाषा पर जबर्दस्त पकड़ थी। दोनों के दोनों ऐसी अँग्रेजी बोलते थे। जैसे यह उनकी मातृ भाषा हो। पर जब उतनी ही शुद्ध संस्कृत बोलना- पढ़ना शुरू करते। तब देखने और सुनने वाले हक्के बक्के रह जाते।
उनके कम उम्र और सात्विक रहन-सहन देख लोग अक्सर सोंच में पड़ जाते। इतनी कम उम्र का यह राजा-रानी सा जोड़ा इस आश्रम में क्या कर रहा है? जहाँ वृद्धों और परिवार के अवांछनीय परित्याक्तों की भीड़ है। अनेकों धनी, गण्यमान्य और विदेशी शिष्यों की भीड़ इस जोड़े के निष्ठा से प्रभावित हो आश्रम से जुटने लगी थी । आश्रम के विदेशी ब्रांचो में गुरु महाराज इन दोनों को अक्सर भेजते रहते थे। गुरु महाराज को मालूम था कि ये विदेशों में अपनी प्रभावशाली अँग्रेजी से लोगों तक बखूबी भारतीय दर्शन को पहुँचा और बता सकते हैं। सचमुच शांती की खोज में भटकते विदेशी भक्तों की झड़ी आश्रम में लग गई थी।
दोनों को देख कर लगता जैसे कोई खूबसूरत ग्रीक सौंदर्य के देवी-देवता की जोड़ी हो। बड़ी मेहनत और लगन से दोनों मंदिर का काम करते रहते। उनका मंदिर और गुरु महाराज के प्रति अद्भुत और अनुकरणीय श्रद्धा देख अक्सर गुरु महाराज भी बोल पड़ते –‘ दोनों ने देव योनि में जन्म लिया है। इन पर कान्हा की विशेष कृपा है। इनका जन्मों-जन्म का साथ है।“ ****
रंजन के पिता थे नगर के सम्मानीय वणिक और अथाह धन के मालिक। अनेक बड़े शहरों में उनके बड़े-बड़े होटल और मकान थे। ढेरो बसें और ट्रक यहाँ से वहाँ सामान और सवारी ढोते थे। जिसकी आड़ में उनका मादक पदार्थों और ड्रग्स का काम भी सुचारु और निर्बाध्य चलता रहता। अपने काले व्यवसाय को अबाध्य रूप से चलाने के लिए शहर के आला अधिकारियों और पुलिस वर्ग से उन्होने दोस्ताना संबंध बना रखे थे। धीरे-धीरे अपने एकलौते पुत्र को भी अपने जैसा व्यवसायपटु बनाने का प्रयास उन्होंने शुरू कर दिया था।
उस दिन शहर में नए पदास्थापित उच्च पुलिस पदाधिकारी के यहाँ उपहार की टोकरियाँ ले जाने का काम उन्होने रंजन को सौपा था। तभी, लगभग आठ- दस वर्ष पहले रंगीली और रंजन पहली बार मिले थे। रंजन ने जैसे हीं उनके ऊँचे द्वार के अंदर अपनी चमकती नई लाल कार बढाई। तभी नौसिखिया, नवयौवना कार चालक, पुलिसपुत्री कहीं जाने के लिए बाहर निकल रही थी। नकचढ़ी रंगीली ने रंजन की नई स्पोर्ट्स कार को पिता के पुलीसिया गाड़ी से रगड़ लगाते हुए आगे बढ़ा लिया था। रंजन का क्रोध भी दुर्वासा से कम नहीं था। पर धक्का मारने वाली के सौंदर्य ने उसके कार के साथ उसके दिल पर भी छाप छोड़ दिया था।
अब बिना पिता के कहे वह गाहे-बगाहे उपहारों के साथ रंगीली के घर पहुँच जाता था। अगर रंगीली से सामना हो जाता। तब रंजन मुस्कुरा कर उससे पुछता – “ आज मेरी कार में धक्का नहीं मारेंगी? रंगीली तिरछी नज़र से उसे देखती, खिलखिलाती हुई निकल जाती। रंजन को लगता जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया।
रंजन के पिता ने शायद माजरा भाँप लिया था। पर उन्हें इससे कोई ऐतराज नहीं था। न हिंग लगे ना फिटकिरी और रंग चोखा। इसी बहाने पुत्र व्यवसाय पर ध्यान तो देने लगा। उन्हें सिर्फ पत्नी की ओर से चिंता थी। जो वैरागी बनी हर वक्त पूजा-पाठ, आश्रम और गुरु में व्यस्त रहती। अक्सर घर में झुंड के झुंड साधु – संत कीर्तन करते रहते। कभी नवरात्री का नौ दिन अखंड कीर्तन चलता । कभी राम और कृष्ण का जन्मदिन मनता रहता। सभी किरतनिया दूध, फल, मेवा, फलहारी घृत पकवान और नए वस्त्र पाते रहते। घर शुद्ध घी, कपूर, धूप, हवन और सुगंधित अगरबतियों के खुशबू से तरबतर रहता। अखंड भंडारा का द्वार सभी के लिए खुला रहता।
रंजन के पिता को पत्नी का यह तामझाम पसंद नहीं था। पर वे एक होनहार व्यवसाई की तरह इस में से भी अपना फायदा निकाल लेते थे और सम्मानीय अतिथियों को आमंत्रित करने के इस सुअवसर का भरपूर फ़ायदा उठाते थे। ऐसे ही अवसरों पर रंगीली का परिवार भी आमंत्रित होने लगा। गुरु महाराज के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित रंगीली के परिवार ने भी उनसे दीक्षा ले ली। अब रंजन और रंगीली की अक्सर भेंट होने लगी। जिससे दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अब रंजन के छेड़ने पर रंगीली हँस कर कहती – “ सब तो ठीक है, पर तुम्हारी यह पुजारिन, निरामिष माँ मुझे अपने घर की बहू कभी नहीं बनने देगी।“
पर हुआ इसका उल्टा। हर दिन अपराधियों की चोरी पकड़ने वाले पिता ने रंगीली और रंजन के इस रास-लीला को तत्काल पकड लिया। अपनी 14-15 वर्ष की नासमझ पुत्री की हरकत उन्हें नागवार गुजरी। उन्होंने भी अपना पुलिसवाला दाव-पेंच आजमाया। नतीजन, अचानक उनके तबादले का ऑर्डर आया। सामान बंधा और रातों – रात वे परिवार के साथ दूसरे शहर चले गए। जैसा अक्सर इस उम्र की प्रेम कथा के साथ होता है, वैसे ही इस कमसिन तोता-मैना की अधूरी प्रेम कहानी के साथ भी हुआ। बुद्धिमान पिता ने इस कहानी पर पूर्णविराम लगा दिया। ****
20-21 वर्ष की रंगीली के पिता ने बड़े जतन से होनहार और योग्य दामाद की खोज शुरू की। सबसे पहले वे पहुँचे गुरु महाराज के पास। गुरु महाराज ने रंगीली के जन्म की जानकारी मांगी और जल्दी ही उसकी कुंडली बनाने का आश्वासन दिया। कुंडली बन कर आई। उच्चपद और उच्चकुल वरों के यहाँ हल्दी-अक्षत लगी कुंडली और सुंदर पुत्री की तस्वीरें, अथाह दहेज के आश्वासन के साथ जाने लगीं। पर ना-जाने क्यों कहीं बात हीं नही बन रही थी।
दुखी हो कर वे फिर गुरु आश्रम पहुँचे। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु महाराज ने व्यथित और चिंतित पुत्रिजनक के माथे पर अनगिनत चिंता की लकीरें देखीं। तब सांत्वना देते हुए बताया कि उनकी पुत्री की कुंडली के अष्टम घर के भयंकर मांगलिक दोष है। शनि भी लग्न में हैं। सारे ग्रह कुंडली में ऐसे स्थापित हैं कि राहू और केतु के अंदर हैं। अर्थात कालसर्प दोष भी है।
पुलिसिया दावपेंच में पारंगत रंगीली के पिता कुंडली ज्ञान में शून्य थे। अतः उन्होंने गुरु महाराज के चरण पकड़ कर कुछ उपाय जानना चाहा। जीवन भर रुपए की महिमा से हर काम निकालने वाले दुखित पिता ने यहाँ भी ईश्वर को चढ़ावा पहुँचा कर काम निकालना चाहा। गुरु महाराज ने कुपित नज़र से देख कर कहा- “ईश्वर को सिर्फ चढ़ावा से नहीं खुश किया जा सकता है।“ चिंतित पिता ने गुरु महाराज के सामने रुपयों की गड्डियों का ढेर रख दिया। नए निर्माणाधीन मंदिर का पूर्ण व्यय वहन करने का वचन दे डाला और अनुरोध किया कि पुत्री के त्रुटीपुर्ण कुंडली का भी वैसे ही आमूलचूल परिवर्तन कर दें, जैसे वे अक्सर अपराधियों के फाइलों में हेरफेर करते अौर उन्हें बेदाग, कानून की पकड़ से बाहर निकाल देते हैं।
गुरु महाराज ने करुण दृष्टि से उन्हें ऐसे देखा, जैसे माँ, आग की ओर हाथ बढ़ाते अपने अबोध और नासमझ संतान को देखती है। फिर विद्रुप भरी मुस्कान के साथ उन पर नज़र डाली और कहा – “देखिये वत्स, मैं ऐसे काम नहीं करता हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ण करनेवाले अनेकों ज्ञानी पंडित मिल जाएँगे। पर कुछ ही समय बाद जब आपकी राजदुलारी सफ़ेद साड़ी में आपके पास वापस लौट आएगी। तब क्या उसका वैधव्यपूर्ण जिंदगी आपकी अंतरात्मा को नहीं कचोटेगी?
रंगीली के पिता जैसे नींद से जाग उठे। अपनी नासमझी की माफी मांगते हुए वह कुटिल, कठोर और उच्च ओहदा के अभिमान में डूबा पिता, गुरु महाराज के चरणों में लोट गया। वे आँखों में आँसू भर कर उपाय की याचना करने लगे। गुरु जी ने मृदुल-मधुर स्वर में बताया कि सबसे अच्छा होगा, कुंडली मिला कर विवाह किया जाये। पुत्री के सौभाग्यशाली और सुखी जीवन के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है। पद, ओहदा, मान सम्मान जैसी बातों से ज्यादा अहमियत रखती है पुत्री का अखंड सौभाग्य।
गुरु महाराज ने उन्हें एक उपयुक्त वर के बारे में भी बताया। जिससे उनकी पुत्री की कुंडली का अच्छा मिलान हो रहा था। वह वर था रंजन। परिवार जाना पहचाना था। ऊपर से गुरु महाराज की आज्ञा भी थी। किसी तरह की शंका की गुंजाईश नहीं थी। पर अभी भी उच्चपद आसीन दामाद अभिलाषी पिता, बेटी के बारे में सशंकित थे। पता नही उनकी ऊँचे पसंदवाली, नखड़ाही पुत्री, जो प्रत्येक भावी योग्य वारों में मीनमेख निकालते रहती थी। उसे व्यवसायी रंजन और उसका अतिधार्मिक परिवार पसंद आयेगा या नहीं? पहले के नासमझ उम्र की प्रेम लीला की बात अलग थी।स्वयं उन्हें भी किसी उच्च पदासीन, उच्च शिक्षित दामाद की बड़ी आकांक्षा थी।
तभी गुरु महाराज ने उनकी रही-सही चिंता भी दूर कर दी। गुरु महाराज ने उनसे कहा –“ मुझे लगता है, रंगीली और रंजन का विवाह, उनका प्रारब्ध है। अतः मैं उन दोनों से स्वयं बात करना चाहता हूँ। आगे ईश्वर इच्छा। अगले दिन सुबह शुभ पुष्य नक्षत्र के समय भावी वर वधू गुरु महाराज के समक्ष आए। एकांत कक्ष में मंत्रणा आरंभ हुई। गुरु महाराज ने बताया कि उनकी दिव्य दृष्टि से उन्हें संकेत मिल रहें हैं कि रंगीली और रंजन एक दूसरे के लिए बने हैं। दोनों का जन्मों – जन्म का बंधन है। फिर उन्हों ने अर्ध खुले नयनों से दोनों को ऐसे देखा जैसे ध्यान में डूबे हों। फिर अचानक उन पर प्रश्नों की झड़ी सी लगा दी – ‘ बच्चों क्या तुम्हारा कभी एक दूसरे की ओर ध्यान नहीं गया? तुम दोनों को आपसी प्रेम का आभास नहीं हुआ? तुम्हे तो ईश्वर ने मिलाया है। हाँ, कुंडली के कुछ दोषों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में कार सेवा करने की जरूरत है।
रंगीली और रंजन को अपनी पुराना प्रणय याद आ गया। सचमुच ईश्वर किसी प्रयोजन से बारंबार दोनों को आमने –सामने ला रहें हैं क्या? दोनों गुरु महिमा से अभिभूत हो गए। तुरंत उनके चारणों में झुक मौन सहमती दे दी। दोनों के परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। तत्काल वहीं के वहीं गुरु महाराज के छत्रछाया में दोनों की सगाई करा दी गई।
कुंडली के क्रूर ग्रह, राहू और केतू की शांती के लिए गुरु जी ने सुझाव दिया – “शिवरात्री के दिन किसी शिव मंदिर में रंगीली और रंजन से काल सर्प पूजान करवाना होगा। आंध्र प्रदेश के श्री कालहस्ती मंदिर, या भगवान शिव के बारह ज्योतृलिंगों में कहीं ही इस पुजन को कराया जा सकता है।“
आँखें बंद कर थोड़े देर के मौन के बाद गुरु जी ने नेत्र खोले। सभी को अपनी ओर देखता पा कर उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान छा गई। हँस कर उन्हों ने पुनः कहा – आप लोग चिंतित ना हों। ईश्वर तो हर जगह विद्यमान है। आप किसी भी मंदिर में यह पूजा करवा सकते है। चाहें तो यहाँ भी पूजा हो सकती है। यह मंदिर भी आपका हीं है। यहाँ तो मैं स्वयं सर्वोत्तम विधि से पूजा करवा दूंगा।“ मंदिर में भोग का समय हो रहा था। गुरु महाराज उठ कर अपने पूजा कार्य में व्यस्त हो गए। रंगीली और रंजन का परिवार एक साथ माथा से माथा मिला कर काल सर्प पूजा कहाँ हो इसकी मंत्रणा करने लगे।
दोनों नव सगाई जोड़ा बड़े आम्र वृक्ष के ओट में अपने पुराने बचकाने प्रेम की याद में डूब गया। हमेशा मौन की चादर में लिपटी रहनेवाली रंजन की माँ ने पहली बार मुँह खोला- “ देखिये, गुरु महाराज हमलोगों के शुभचिंतक है। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वर्ना वे हमें अन्य मंदिरों के बारे में क्यों बताते? मेरा विचार है, पूजा इस मंदिर में गुरु जी से करवाना उचित होगा। बड़े-बड़े मंदिरों में पुजारी कम समय में आधे-अधूरे विधान से पूजा करवा देंगे और हम समझ भी नहीं सकेंगे।“
नई समधिन के सौंदर्य पर रीझे रंगीली के रसिक पिता बड़े देर से उनसे बातें करने का अवसर खोज रहे थे। इस स्वर्ण अवसर का उन्होंने तत्काल लाभ उठाया और तुरंत अपनी सहमती दे दी। गुरु जी की शालीनता और निस्वार्थता से सभी अभिभूत हो गए। फिर तो बड़ी तेज़ी से घटनाक्रम ठोस रूप लेता गया। विवाह आश्रम के मंदिर में हुआ। उस के बाद नव युगल जोड़े ने अपना मधुयामिनी अर्थात हनीमून भी आश्रम में ही मनाया।
दोनों परिवारों की विपुल धन राशी के समुचित उपयोग का ध्यान रखते हुए नव विवाहित जोड़े की लंबी विदेश मधुयामिनी यात्रा हुई। लगभग एक महीने बाद दोनों उपहारों से लदे घर वापस लौटे। विदेश में उनका ज्यादा समय गुरु निर्देशानुसार विभिन्न आश्रमों में बीता। अतिधर्मभीरु रंजन अपनी माँ की तरह अति धार्मिक था। शौकीन और पिता की दुलारी पुत्री रंगीली, प्रणय क्षणों के लिए तरस कर रह गई।
रंगीली ने अपने और अपने अल्पशिक्षित पति की सोच-समझ में जमीन आसमान का अंतर देख हैरान थी। हनीमून की खूबसूरत यात्रा को उसके पति ने धार्मिक तीर्थयात्रा में बदल दिया था। पर संध्या होते रंजन अक्सर गायब हो जाता था। एक दिन वह भी रंजन के पीछे-पीछे चल दी। पास के बार में उसने रंजन को मदिरा और बार बाला के साथ प्रेममय रूप में देख, वह सन्न रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रंजन का कौन सा रूप सच्चा है।
विदेश से लौटने तक दोनों में अनेकों बार नोक-झोंक हो चुका था। दोनों अपने ठंढे मधुयामिनी से वापस लौटे। रंगीली उदास और परेशान थी। उनके साथ में आया आश्रम के विदेशी शाखाओं में नए बने शिष्यों की लंबी सूची। जिसने सभी में खुशियाँ भर दी। किसी का ध्यान रंगीली की उदासी पर नहीं गया।
विदेशी शिष्यों की संख्या बढ़ने से रंजन और रंगीली की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। अतः दोनों अपना काफी समय आश्रम में देने लगे। साल बितते ना बितते दोनों माता-पिता बन गए। प्यारी-प्यारी पुत्री एंजेल पूरे आश्रम और रंजन – रंगीली के पूरे परिवार का खिलौना थी। गुरु महाराज के असीम कृपा से दोनों परिवार कृतज्ञ था।
एक दिन, जब दुखित और व्यथित रंगीली ने गुरु महाराज से रंजन के विवेकहीन चरित्र और व्यवहार के बारे में बताया, तब उन्होंने उसे समझाया कि यह सब उसके कुंडलीजनित दोषों के कारण हो रहा है। उन्हों ने पहले ही बताया मंदिर में कार सेवा से दोष दूर होगा।अब रंजन और रंगीली, दोनों अब लगभग आश्रमवासी हो गए थे।रंगीली के पिता भी अब धीरे-धीरे उच्चपदासीन दामाद के ना मिलने के क्षोभ और दुख से बाहर आने लगे थे। *****
शाम का समय था। मौसम बड़ा खुशनुमा था। रिमझिम वर्षा हो रही थी। चारो ओर हरीतिमा थी। हरियाली की चादर पर, पास लगी रातरानी की बेल ने भीनी- भीनी खुशबू बिखेर दी थी। सामने बड़े से बगीचे में रंग बिरंगे फूल आषाढ़ महीने के मंद समीर में झूम रहे थे। आश्रम का पालतू मयूर आसमान में छाए बादल और रिमझिम फुहार देख कर अपने पंख फैलाये नाच रहा था। रंजन और रंगीली अपनी बेटी और पूरे परिवार के साथ आश्रम में अपनी छोटी कुटियारूपी कौटेज के बरामदे में गरम चाय की चुसकियों और गर्मागर्म पकौड़ियों के साथ मौसम का मज़ा ले रहे थे। पाँच वर्ष की एंजेल खेल-खेल में अपने पिता के अति मूल्यवान मोबाईल से नृत्यरत मयूर की तस्वीरें खींच रही थी।
“ क्या जीवन इससे ज्यादा सुंदर और सुखमय हो सकता है? – रंजन ने मुस्कुरा कर पूछा। थोड़ा रुक कर उसने माता-पिता, सास-स्वसुर और अपनी पत्नी पर नज़र डाली और कहा – “कल गुरु पूर्णिमा है। मैंने गुरु जी के लिए स्वर्ण मुकुट और नए वस्त्र बनवाए हैं। मुझे लगता है, कल ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी को उन्हें उपहार दे कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। खुशहाल और संतुष्ट परिवार ने स्वीकृती दे दी। सुबह-सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक मन से सारा परिवार गुरु महाराज के कक्ष के बाहर पहुंचा। द्वार सदा की तरह खुला था। भारी सुनहरा पर्दा द्वार पर झूल रहा था। पूर्व से उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें आषाढ़ पूर्णिमा की भोर को और पावन बना रहीं थीं। कमरे से धूप की खुशबू और अगरबत्ती की ध्रूमरेखा बाहर आ रही थीं। थोड़ी दूर पर बने मंदिर से घण्टियों की मधुर ध्वनी और शंख की आवाज़ आ रही थी।
गुरु जी के कुटिया के आस-पास पूर्ण शांती थी। दरअसल बहुत कम लोगों को यहाँ तक आने की अनुमति थी। पर रंजन और रंगीली के लिए गुरु जी के द्वार हमेशा खुले रहते थे। अतः दोनों बेझिझक आगे बढ़े। तभी, अंदर से आती किसी की खिलखिलाने और गुरु जी के ठहाके की आवाज़ सुनकर आधा हटा पर्दा रंजन हाथों में अटका रह गया। पर्दे की ओट से पूरे परिवार ने देखा, बिस्तर पर गुरु जी की बाँहों में उनकी निकटतम शिष्या मेनका हँस कर पूछ रही थी – यह सब इतनी सरलता से आपने कैसे किया?
गुरु जी अपनी अधपकी दाढ़ी सहलाते हुए कह रहे थे – “रंजन और रंगीली के बालपन के प्रणयकेली पर तभी मेरे नज़र पड़ गई थी। इतने वर्षों बाद सही मौका मिलते ही, सात जन्मों का बंधन बता कर उसे मैंने भंजा लिया। आज ये दोनों मेरे लिए सोने की अंडा देनेवाले मुर्गी है। देखती हो, इनकी वजह से मेरे आश्रम में स्वर्ण और धन वृष्टि हो रही है। मेनका तकिये पर टिक, अधलेटी हो कर पूछ रही थी – उन दोनों की कुंडलियाँ कैसे इतनी अच्छी मिल गई। गुरु जी ने एक आँख मारते हुए कहा – “वह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है मेनका !!!सब नकली है।
रंजन और रंगीली को लगा जैसे वे गश खा कर गिर जाएँगे। रंजन की माँ के आँखों से गुरु महिमा धुल कर बह रही थी। दोनों के पिता द्वय की जोड़ी हक्की-बक्की सोंच रहे – क्या उनसे भी धूर्त कोई हो सकता है? जीवन भर इतने दाव-पेंच करते बीता और आज ईश्वर जैसे उन्हें दिखा रहें हों – सौ चोट सुनार की और एक चोट लोहार की। ईश्वर के एक ही चोट ने उन्हें उनके सारे कुकर्मों का जवाब सूद समेत दे दिया था। रंगीली के पिता के नेत्रों के सामने उन योग्य, उच्चपद, उच्च शिक्षित वरों का चेहरा नाचने लगा, जो उनकी प्राणप्यारी सुंदरी पुत्री से विवाह के लिए तत्पर थे।
तभी खटके की आवाज़ से सारे लोग और गुरु जी चौंक गए। नन्ही एंजेल ने खेल-खेल में अपने पिता के मोबाइल से एक के बाद एक ना जाने कितनी तस्वीरें प्रणयरत शिष्या-गुरु के खींच लिए थे।
मेरे जिंदगी तुम्ही से शुरू हुई। पर तुम्हारे साथ खत्म हो, यह नहीं कह सकता। जाने वाले के साथ तो कोई नहीं जाता है न। पर मैं तुमसे इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि तुम्हें मैं भूल नहीं पाता हूँ। मेरा तुम्हारा बचपन का प्यार है। मेरी माँ ने मेरा परिचय तुमसे करवाया था। पूरे परिवार और समाज को हमारा प्यार मंजूर था। पर आज वही दुनिया कठोर बन कर हमारे बीच आ गई है।
मुझे आज भी तुम्हारी खूबसूरती याद है। गोरी, बल खाती काया ऊपर से तुम्हारी दो मिनट की फुर्ती। कुछ भी भूल नही पाता हूँ। घर से हॉस्टल जाने पर भी हमारा प्यार कम नहीं हुआ था। कितनी रातें तुम्हारी याद आने पर, वार्डेन से छुप कर, आयरन उल्टा कर उसे हॉट प्लेट बना तुम्हारे लिए पानी उबालता था।
आज तक तुम जैसी कोई मेरी जिंदगी में आई नहीं। पर लगता है यह बेदर्द समाज मेरी जिंदगी में तुम्हारी सौत को लाने की तैयारी में हैं। आज ना कल तुम्हारे जैसी कोई ना कोई हमारे जीवन में आ जाएगी।
आज एक सच्ची बात तुम्हारे सामने कबूल करने जा रहा हूँ। तुम मुझे बड़ी पसंद थी पर ठंड़ी होने पर बड़ी मोटी, भद्दी हो जाती थी। तुम्हारा यह बदसूरत रूप हमारे स्कूल शिक्षिका ने बहुत बार हमें दिखाने की कोशिश की, तुम्हारी ढ़ेरो बुराईयाँ भी की। पर तुम तो जानती हो प्यार अंधा होता है।
(आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले गुरु पूर्णिमा का प्रसिद्ध पावन पर्व, जो वेद व्यास जी की जयन्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है ( 31 जुलाई 2015))
महाभारत के महान रचयिता वेदव्यास थे । जिन्हें श्याम या कृष्ण रंग होने और द्वैपायन द्वीप पर तपस्या करने के कारण कृष्ण द्वयपायन के नाम से जाना जाता है।वेदों का भाष्य करने के कारण उन्हें वेदव्यास कहा गया। वे महाभारत काल के युग पुरुष थे। उन्हों ने पूरे महाभारत के घटना क्रम को देखा और लिखा है। उनके जन्म की कथा अनोखी है।
किवदंती के अनुसार, निषाद पुत्री मत्स्यगंधा यमुना नदी पर नाव चला कर पथिकों को पार पहुंचाती थी । उसके शरीर से मछली की महक आते रहने के कारण उसे मत्स्यगंधा पुकारा जाता था।
आषाढ़ पूर्णिमा अर्थात गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन पराशर मुनि उसकी नाव से यमुना पार कर रहे थे । सुंदरी मत्यगंधा पर वे मोहित हो गए।रूप आसक्त मुनि ने उससे संबंध स्थापित करना चाहा। उसे झिझकते देख त्रिकालदर्शी , ब्रह्मज्ञानी, दिव्य दृष्टि और ईश्वरांश मुनि ने आश्वासन दिया कि इस संबंध से और उससे उत्पन्न संतान से उसका कौमार्य खंडित नहीं होगा। वह कुमारी ही रहेगी।
अपने तपबल और माया से उन्हों नौका के चारों ओर कुहरे का झीना आवरण फैला दिया। फलतः किनारे खड़े लोगों को कुछ नज़र नहीं आया। मत्स्यगंधा और उनके संबंध से वेदव्यास का जन्म तत्काल हुआ। जो जन्म से वेद वेदांगों में पारंगत थे।
पराशर मुनि अपने पुत्र को अपने साथ ले कर चले गए। जाने से पहले मत्स्यगंध के मत्स्य गंध को सुगंध में बदल दिया। जो योजन तक फैलने लगी । जिस से वह योजनगंधा कहलाई और आगे चल कर सत्यवती नाम से जानी जाने लगी। कुछ समय बाद भीष्म के पिता राजा शांतनु ने योजनगंधा के रूप और सुगंध से प्रभावित हो कर उस से विवाह कर लिया।
रामायण महाकथा के अनुसार जनक पुत्री सीता जी उन्हें एक घड़े या पात्र में मिली थीं ।भूमि पुत्री सीता जी के जन्म के संबंध में अनेकों किवदंतियाँ है। एक कथानुसार वृहत यज्ञ के बाद मिथिला नरेश राजा जनक ने खेतों में हल चलाया। तभी उन को सीता जी खेत में मिली थीं। खेत जोतने के दौरान उनका हल या सीत एक घट से टकराया, जिसमें तेजोमय , अपूर्व सुंदर कन्या थी। अतः उन्हें सीता नाम दिया गया। जिसे उन्होंने गोद लेकर पाला।
एक अन्य कथा के अनुसार वे रावण और मंदोदरी पुत्री थीं। विद्वानों ने भविष्यवाणी की, कि सीता रावण के मृत्यु और लंकादहन का कारण बनेगी । अतः रावण ने मारीच को उन्हें मृत्यु के घाट उतारने का आदेश दिया, पर तेजोमय कन्या को मारने का साहस न होने के कारण मारीच उन्हें खेत में छोड़ लौट गया।
भूमिसुता सीता
एक कहानी के अनुसार मिथिला के एक महत्वपूर्ण मंदिर में पूजा करने के बदले एक विद्वान ब्राह्मण को वहाँ के राक्षस को अपना रक्तान्श, कर के रूप में देना पड़ा। जिसे उस असुर ने खेत में ड़ाल दिया , जहाँ से माता सीता मिलीं थी।
रामायण काल के विमान, शक्तिशाली युद्ध अस्त्रा-शस्त्र, जैसी बातें पहले भले मात्र कपोल कल्पना लगती होंगी। पर आज विज्ञान ने इसे हकीकत बना दिया है। तब क्या इसका अर्थ है कि तब विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी?
क्या वैसे ही यह सत्य भी कभी समझ आयेगा? आज के वैज्ञानिक खोज, रीसर्च , प्रयोग तब के यज्ञ नहीं हो सकते क्या? घट टेस्ट ट्यूब का दूसरा रूप नहीं हो सकता है क्या? महाभारत में भी अनेक ऐसे आलौकिक जन्म की घटनाएँ वर्णित हैं ।
यह लखनऊ की जानी-मानी कढ़ाई है। यह मुगक शासकों और नवाबों को बड़ी प्रिय थी। इसे अमीरों की पसंद मानी जाती थी। वास्तव में आज भी जब चिकेंनकारी विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर किया जाता है। तब यह काफी मूल्यवान हो जाता है।
ओरगेंज़ा कपड़े पर बना बारीक चिकेनकारी
किव्दंती– इस कढ़ाई की उत्पत्ति के बारे में अनेक कहानियाँ हैं। ऐसा माना जाता है की मुगल बादशाह जहांगीर की शौकीन और विदुषी पत्नी नूरजहाँ ने इस कढ़ाई की शुरूआत करवाई थी। तब यह प्रायः नफासत और नज़ाकत की पहचान मानी जाती थी। हल्के रंगों के कपड़ों पर शुद्ध धागों से हल्के रंग की नाजुक और बेहद बारीक कढ़ाई की जाती थी। कपड़े भी उत्तम प्रकार के और मूल्यवान होते थे। अतिरिक्त खूबसूरती के लिए सितारे, मोती और दर्पण अलंकार के तौर पर लगाए जाते है।
वर्तमान कशीदाकारी – आज यह लखनऊ की पहचान है। इसकी प्रसिद्धी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी है। आज यह आम जनों के बीच भी लोकप्रिया हो गया है। आज कल यह अन्य सामान्य कपड़ों पर भी बनने लगा है। साथ ही हल्की और सामान्य कढ़ाई भी होने लगा है। जिससे कम मुल्य पर भी ये कपड़े उपलब्ध होने लगा है।
चिकेंनकारी की प्रक्रिया – ऐसा कहा जाता है की इसमें 36 अलग- अलग प्रकार के टांकों का उपयोग होता है। इसमें पहले डिज़ाइन चुना जाता है। फिर उसे कपड़े पर उत्कीर्णन यानि ब्लॉक प्रिंटिंग की सहायता से छापा जाता है। इसके बाद इसे विभिन्न कढ़ाई करने वालों को ये कपड़े धागों के साथ दे दिया जाता है। यह काम आस-पास के अनेकों गाँव में होता है। कढ़ाई पूरी होने पर कपड़े को धोया और पालिश / इस्तरी किया जाता है। तब यह बाज़ार में जाने के लिए तैयार हो जाता है।
कारीगर – सामान्य और साधारण चिकेंनकारी के कारीगर बहुतायत है। सूफियाना रंगों, बारीक 36 अलग अलग टांकों को मूल्यवान कपड़ों पर बनाने वाले कारीगर बहुत कम हैं। इसलिए आज के समय में इस तरह की कढ़ाई काफी दामी है। विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर बने कढ़ाई अनमोल है, पर उन्हे पहन कर नवाबों जैसा और राजसी अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।
मेरे पास एयरटेल का मोबाइल कनेक्शन काफी पहले से है। लगभग छः महीने पहले मैंने अपने पुराने फोन को बदलने का निश्चय किया। बड़े दिनों से एंड्रोएड स्मार्ट फोन की तमन्ना मेरे दिल में थी। आखिरकार मेरा सपना साकार हुआ। मैंने एक एंड्रोएड फोन खरीद लिया। दो-चार दिन तो मैं नए फोन को समझने और चलाने की उलझन में उलझ गई। मैंने स्मार्ट फोन की बड़ी चर्चा सुनी थी। इसलिए जल्दी जल्दी मैंने इसे सीख लिया।
युजर फ्रेंडली या दोस्ताना एप – तभी मुझे एयरटेल एप की जानकारी मिली। पहले तो मुझे घबराहट हुई। नया-नया फोन, इसमें एप कैसे डाला जाए? थोड़ा ड़र भी लगा। कही एप डालने से कोई परेशानी ना हो जाये। कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और अपने से इस एप को फोन में डाउनलोड करने का निश्चय किया। मैंने एप डालने की कोशिश की। तब पाया यह तो बड़ा आसान है। बड़े आसानी और स्वाभाविता से एप डाऊनलोड हो गया। एप डालने के बाद लगा मेरे सामने एक नई दुनिया ही खुल गई। यह तो सपनों का संसार है। मेरे अपने फोन की खिड़की से सारी दुनिया नज़र आ रही थी। ढेरो ऑप्शन के साथ एयरटेल एप मेरे मुट्ठी में था। मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। जिन कामों को करना पहाड़ लगता था। क्या सचमुच घर बैठे हो जाएगा? वह भी इतनी सरलता से ? सच बताऊँ, मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। इस आधे बित्ते के मोबाईल के विंडो यानि खिड़की से झाँकते इस एप में क्या सचमुच इतनी शक्ति है? मेरे मन में खयाल आया – पहले इस्तेमाल करो, फिर विश्वाश ।
एयरटेल एप
अलादीन का चिराग – मैंने सोचना शुरू किया, कहाँ से शुरुआत करूँ? सारे के सारे ऑप्शन बड़े लुभावने लग रहे थे। मन में तरह – तरह के ख्याल आ रहे थे। इस जलती गर्मी में घर से बाहर निकल कर कुछ भी करने का मन नहीं करता है। अगर सचमुच घर बैठे ये काम हो जाए, तब सचमुच मज़ा आ जायेगा । मैं अभी सोच विचार में लगी थी । तभी एयरटेल का एक आकर्षक ऑफर मेरे फोन पर आया। 14 रुपये के रेचार्ज से मेरे सारे काल 30 पैसे प्रति मिनट हो जाएँगे। मैंने अपने एयरटेल – मनी से यह काम करने की कोशिश की और हैरान रह गई। यह काम पल भर में हो गया। अब मैं एयरटेल – मनी का भरपूर इस्तेमाल करने लगी हूँ। यह मुझे बड़ा सरल और सुविधाजनक लगने लगा है।
अब तो मैं बड़ी सहजता और स्वाभाविता से इसके इंटरनेट का उपयोग भी करने लगी हूँ। एयरटेल वन टच इंटरनेट से मैं बड़ी आसानी से सभी से जुड़ा हुआ महसूस करती हूँ। बिना लैपटाप के जब चाहो, जहां चाहो ईमेल देखना हो या व्हाट्सएप से परिवार, मित्रों या बच्चों से बातें करना हो, सब मुट्ठी में होता है। यहाँ तक कि ब्लॉग पढ़ना या पोस्ट करना जैसे काम भी उँगलियों के इशारे से हो जाता है। लगता है जैसे हाथों में अलादीन का चिराग आ गया है।
वैसे तो ख़रीदारी महिलाओं का मनपसंद शगल और शौक होता है। पर बाज़ार की भीड़भाड़ और मोलतोल से मुझे बड़ी परेशानी मससूस होती है। ऊपर से यह भयंकर गर्मी रहा सहा उत्साह भी ठंडा कर देतीं है। ऐसे में एयरटेल से ख़रीदारी की सुविधा ठंढे – सुहाने बौछार सा लगता है। घर बैठे मन चाही ख़रीदारी करो। वह भी ढेरो ऑफरों के साथ। यह बड़ा अच्छा लगता है। वन स्टॉप शॉप फॉर ऑलकंटेन्ट ने जिंदगी को सरल और सुकून भरा बना दिया है।
फूलों से बरसते ऑफ़र– एक बात इस एप की मुझे बड़ी अच्छी लगती है। वह है ढेर सारे ऑफर। लगता है जैसे ड़ाल से टूट कर खूबसूरत फूल हथेलियों में आ गिरे हों। जब मैंने अपना मोबाईल रेचार्ज करवाया तब मुझे कुछ रेस्टोरेन्ट के डिस्काउंट कूपन ऑफर में मिले। इसी तरह इंटरनेट रीचार्ज के साथ मुझे वाइकिंग म्यूजिक की सुविधा ऑफर में प्राप्त ई।
पारिवार का मददगार दोस्त – अब मेरे बच्चे और पति सब इस एप को इस्तेमाल करने लगे हैं। मेरे पति मोबाईल रीचार्ज, डीटीएच, और ना जाने कितना सारा काम इस एप के जरिये करने लगे है। बेटियाँ भी ख़रीदारी और इंटरनेट बड़े मज़े से इस्तेमाल करने लगी है। इस से समय और मेहनत दोनों की बचत होती है।
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