Author: Rekha Sahay
#Together हमारा साथ ( blog related )
जिंदगी में जब आसानी से कुछ मिलता है। तब हम उसका मूल्य नहीं समझते हैं। बचपन से एक ही परिवार में पले बढ़े बच्चे लड़ते झगड़ते बड़े होते है। छोटी-छोटी बातों में आपस में उलझ जाते है। पर बड़े होने पर जब वे अलग हो जाते है। अपनी-अपनी जिंदगी में सेटल हो जाते है। अलग – अलग शहरों में बस जाते हैं। तब उन का आपस में मिलना-जुलना कठिन हो जाता है। तब पुरानी यादें मूल्यवान लगने लगती है। तब पुराना साथ, पुरानी बातें याद आने लगती हैं।
मेरे घर भी कुछ ऐसा ही हुआ। हम चार लोगों का परिवार है। मैं, मेरे पति और मेरी दो प्यारी-प्यारी बेटियाँ। जब बेटियाँ छोटी थीं। तब मैं घर और नौकरी में उलझी रहती थी। दोनों बेटियाँ भी अन्य सामान्य बच्चों की तरह फर्माइशें करतीं। आपस के झगड़ों में मुझे भी परेशान करतीं। जब कभी वे ज्यादा परेशान करतीं। तब मैं सोचतीं – कब ये बड़ी होंगी? कब मुझे परेशान करना कम करेंगी।
बचपन में दोनों बेटियाँ एक ही कमरे में रहतीं थीं और एक बड़े बिस्तर पर सोतीं थीं। दोनों हमेशा अपने-अपने कमरे और अलग पलंग की फरमाईश कर परेशान करतीं थी। तब हम दो कमरे के घर में रहते थे। अतः उन्हे अलग कमरे देना संभव नहीं था। बड़ा घर लेना कठिन होगा। मैं बच्चों को यह सब समझाती रहती थी। पर बच्चे तो बच्चे होते हैं। उनकी जिद से मैं परेशान हो जाती थी।
देखते-देखते समय पंख लगा कर उड़ गया। बच्चे बड़े हो गए। बड़ी बेटी पढ़ाई करने बाहर चली गई। पति का तबादला कोलकाता हो गया। वे वहाँ चले गए। छोटी बेटी दसवीं में थी अतः मुझे उसके साथ धनबाद में रुकना पड़ा। ताकि उसकी पढ़ाई और बोर्ड के परीक्षा में बाधा ना आए। हम सभी एक दूसरे की बड़ी कमी मससूस करते थे। पर उपाय क्या था? परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बन गईं थी।
हमने इस कमी को दूर करने के लिए दक्षिण घूमने का कार्यक्रम बनाया। ताकि भीड़-भाड़ और घर से दूर हम चारो कुछ दिन एक साथ बीता सके। कार्यक्रम बन गया। हम सब बड़े खुश थे। इकट्ठे रहने का मौका मिलेगा।
तभी पता चला कि मेरे पति की छुट्टियाँ किसी कारणवश स्थगित कर दी गईं है। उनकी छुट्टियाँ मिलने तक मेरा और छोटी बेटी के स्कूल की छुट्टियाँ लगभग खत्म हो रहीं थी। लगा अब घूमने का कार्यक्रम नहीं बन पाएगा। दोनों बच्चे बड़े मायूस हो गए।
अब जब हम चार लोग तीन शहर में थे तब हमें साथ होने का मोल समझ आ रहा था। अतः हमने अपना कार्यक्रम फिर से सीमित समय के अनुसार बनाया, ताकि कुछ समय तो साथ बिता सकें, और दक्षिण के यात्रा पर गए। यह यात्रा कम दिनों का जरूर था। पर साथ-साथ बिताया यह समय हमारे लिए यादगार बन गया। खास बात यह थी कि जो बच्चे अलग बिस्तर और कमरे के लिए झगड़ते थे। वे बेटियाँ अब साथ सोने के लिए परेशान थीं । वे चाहती थीं कि हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहें। चारो एक साथ एक बिस्तर पर सोए और समय बिताएँ।
#ChooseToStart मेरा नया फोन ( blog related )
मेरे हाथों में है चमचमाता नया स्मार्ट फोन। मैं हैरानी से उसे निहार रहीं हूँ। मन में खयाल आ रहें हैं- “क्या यह सचमुच मुझे स्मार्ट बना देगा”? पर यह क्या? मैं तो उसमें ही उलझ कर रह गई हूँ।
इसके बटन जरा सा छु जाने पर फोन कहीं का कहीं लग जाता है। फोन देख कर जितनी खुशी हुई। उसे काम में लाने में उतनी हीं उलझन हो रही है। मुझे अपना पुराना फोन याद आने लगा। उस पर हाथ बैठा था। मुझे उसका अभ्यास था। अतः काम करना आसान लगता था।
मुझे पुराने दिन याद आने लगे। फोन की दुनिया में बड़ी तेज़ी से बदलाव आए हैं। कुछ दशकों पहले तक कुछ ही घरों में फोन हुआ करते थे। वह भी तार से जुटे, डायल करने वाले फोन होते थे। दूसरे शहर फोन करना हो तो कॉल बुक करना पड़ता था। घंटो इंतजार के बाद बात होती थी। कुछ समय बाद सभी शहरों के कोड नंबर आ गए। जिसकी सहायता से फोन लगता था। पर यह भी आज के जैसा सुविधाजनक नहीं था। यात्रा के दौरान तो फोन करने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।

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