रूह का सफ़र

ना गिन दौलत,

ना गिन माल-ओ-असबाब,

गिन बस अपनी साँसें,

और हर लम्हा अमल में ढाल.

रूह का सफ़र है,

बाक़ी सब फ़ना है!!!

4 thoughts on “रूह का सफ़र

  1. क्या ही सुंदर और गहरी पंक्तियाँ हैं!
    आपने कुछ ही शब्दों में ज़िंदगी का सार कह दिया—
    कि असली दौलत न सामान है, न प्रदर्शन,
    बल्कि हर साँस की जागरूकता और हर क्षण का सच्चा कर्म।

    Liked by 2 people

      1. बहुत-बहुत धन्यवाद!
        आपकी रचनाएँ हमेशा गहरी संवेदनाओं और सच्चे अभिव्यक्ति से भरी रहती हैं।
        उन्हें पढ़ना अपने-आप में एक सुखद अनुभव होता है।

        आप ऐसे ही लिखते रहें, आपकी हर पंक्ति मन को छू जाती है।
        स्नेह और शुभकामनाएँ! 🙏✨

        Liked by 1 person

Leave a comment