आत्ममंथन

बहती नदी-सी ये ज़िंदगी,
कहाँ बहाए लिए जा रही है?
मौन और एकांत में,
जब पूछा दिल के दर्पण से,

हुई रू-ब-रू ख़ुद से।
मैं कौन हूँ—जगा यह सवाल,
ख़ुद को पाने की चाह,
और रूहानियत की प्यास।

रूह कानों में फुसफुसाई—
बस इतना ख़ुद में उतर जाओ,
कि ख़ुद को पा
निखर जाओ।

कठिनाइयों से मिला है ये वजूद,
छोड़ सारे मुखौटे,
रब ने जैसे भेजा,
ख़ुद को वैसा ही रहने दे।

साँसों के
इस सफ़र में
आत्मा के साथ जाना है,
सिर्फ़ कर्मों का हिसाब।

सारी कायनात और
आख़िरी ली हुई साँस
तक यही
छोड़ जाना है।

क्या तू
इससे अनजान है?
सब जानकर भी क्यों
तू बना अनजान है?


12.08.2026

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