मघा नक्षत्र

27 नक्षत्रों में मघा 10वां नक्षत्र है, जिसका संबंध सीधे हमारे पितरों (पूर्वजों) से माना गया है। इस नक्षत्र का स्वामी केतु है, लेकिन इसके अधिपति देवता ‘पितर’ हैं। सूर्य के मघा नक्षत्र में आते ही मानसून का सबसे मुख्य और पवित्र काल शुरू होता है।

मघा का पानी

17 अगस्त से 31 अगस्त 2026 मघा नक्षत्र रहेगा। प्रसिद्ध लोक-कहावत: “मघा के बरसे, माता के परसे” — जिस तरह माँ अपने हाथों से प्रेमपूर्वक खाना परोसकर बच्चे को तृप्त करती है, ठीक उसी तरह मघा नक्षत्र की बारिश पूरी धरती और फसलों को तृप्त कर देती है।

अमृत जल

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार मघा की बारिश में एक प्राकृतिक शीतलता और ऊर्जा होती है। लोक-परंपराओं में इस जल को साफ बर्तन या कपड़े से छानकर संचित किया जाता है और पूरे वर्ष शुभ कार्यों के लिए रखा जाता है।

पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सूर्यदेव मघा नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, तब सभी पितर (पूर्वज) सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों को आशीर्वाद देने और धरती की स्थिति देखने आते हैं।
एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब इंद्रदेव ने देवताओं की तृप्ति के लिए अमृत की वर्षा की योजना बनाई, तब पितरों ने भी पृथ्वी के समस्त जीवों की भलाई के लिए आशीर्वाद दिया। इसीलिए मघा नक्षत्र में होने वाली वर्षा की प्रत्येक बूंद को पितरों के सीधे आशीर्वाद के समान माना जाता है। मान्यता है कि इस समय होने वाली वर्षा से फसलों में कीट नहीं लगते, भूमि की उर्वरकता बढ़ती है और इस जल के स्पर्श मात्र से जीवन में सुख-समृद्धि तथा शांति आती है।