क़ौन सुने अनकही

झोंके ने मुआफ़ी माँग भी ली तो क्या,

दरख़्त से टूटे पत्तों ने कहा —

हम तो बिखर ही गए यहाँ।

ज़ख़्म भर भी जाएँ तो क्या,

निशान तो रहते हैं सदा।

कौन सुने अनकही दिल की दास्ताँ,

हर कोई अपने आप में गुम यहाँ।

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