जिंदगी के रंग – 216

जीवन एक यात्रा है, हम सब मुसाफिर हैं।

चलते जाना है।

किसकी मंजिल मालूम नहीं कहां है।

मिलना एक इत्तेफाक है।

जाने जिंदगी के किस मोड़ पर कब कौन मिल जाए

और कब कहां बिछड़ जाए।

ना जाने कब कोई सफर अधूरा छोड़ चला जाए।

इस धूप- छाँव से सफर में

जब मरहम लगाने वाला अपना सा कोई मिल जाता है।

तब दोस्तों का एक कारवां बन जाता है।

कुछ लोगों से मिलकर लगता है,

जैसे वे जाने पहचाने हैं।

जिंदगी का सफर है इस में चलते जाना।

 मिलना बिछड़ना तो लगा ही रहेगा।

जीवन एक यात्रा है, हम सब मुसाफिर हैं।

बस चलते जाना है।

 

 

यह कविता आदरणीय मनोरमा जी अौर  अनिल जी को समर्पित है. जो किसी कारणवश दूसरे शहर में शिफ्ट हो रहे हैं.

This poem is dedicated to respected  Anil ji and Manorama ji on their farewell.