ईंट दर ईंट जुटता है ,
तब मकान बनता है.
स्नेह के तार जुटते है तब
मकान , घर बनता है.
वैसे हीं शब्द दर शब्द जब जुटते हैं,
कुछ भाव उनमें शामिल होते हैं,
तब लेख, कविता और काव्य बनते है .

ईंट दर ईंट जुटता है ,
तब मकान बनता है.
स्नेह के तार जुटते है तब
मकान , घर बनता है.
वैसे हीं शब्द दर शब्द जब जुटते हैं,
कुछ भाव उनमें शामिल होते हैं,
तब लेख, कविता और काव्य बनते है .

So beautiful! ❤ 🙂
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Reblogged this on The Shubham Stories.
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thank you.
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this poem is really awesome 👌👌
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Thank you so much 😊 Shubham .
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😊😊
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बिल्कुल सच है यह बात रेखा जी । शारदा मिश्र जी की एक बहुत अच्छी कविता की अंतिम पंक्तियां हैं –
हमने तो हर शब्द में ढाली अपनी प्रीत
दुनिया को उसमें दिखीं कविता गज़लें गीत
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वाह !!! यह सच है . मैं सहमत हूँ शारदा जी के काव्यमय अभिव्यक्ति से.
जब कभी मैं अपना दर्द या तकलीफ़ लिखती हूँ और लोग उसकी तारीफ़ कविता के रूप में करते हैं तब मेरे चेहरे पर भी मुस्कुराहट सा जाती है .
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वाह। बेहतरीन पंक्तियाँ।
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शुक्रिया मधुसूदन.
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So nice
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Thank you 😊
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