सुनहरी सुबह और रुपहली शाम – कविता

एक आदत सी थी,

बेफिक्री से गुनगुनाने और मुस्कुराने की।

सुनहरी सुबह और  रुपहली  शाम की ,

खूबसूरती में ङूब जाने की। 

पर ज़माने  ने  इसमें भी  कमियां निकाल दी।

तब ख्याल आया, 

अब तो 

खूबियों के सिवा कुछ बचा हीं नहीं ।

 हाथ जुङ गये  इबादत में।

When the world pushes you to your knees, you’re in the perfect position to pray.
~ Rumi