कभी चाहा नहीं ताजमहल ,
हम तो एक अधखिले
लाल गुलाब से हीं ख़ुश थे ,
मिली तन्हाईया ….,
जो अकेलापन कभी खटकता था ,
वही अब शीतल सुहावनी लगती है .
और यह अंधेरे में उजाला ,
दर्द में दुआ ,
खोजना सीखाने लगा है .

कभी चाहा नहीं ताजमहल ,
हम तो एक अधखिले
लाल गुलाब से हीं ख़ुश थे ,
मिली तन्हाईया ….,
जो अकेलापन कभी खटकता था ,
वही अब शीतल सुहावनी लगती है .
और यह अंधेरे में उजाला ,
दर्द में दुआ ,
खोजना सीखाने लगा है .

बहते अश्रुओं ने सिखाया ,
जो बातें ज़्यादा दर्द देतीं हैं,
वही अनमोल सीखें भी देतीं हैं.

जो न देते थे जवाब ,
उनके सलाम आने लगे…
वक़्त बदला तो,
मेरे नीम पे आम आने लगे…

Anonymous
दिल के कुछ ऐसे
गहरे, अनदेखे..धुँध भरे
कोने भी हैं,
जहाँ ढेरों यादें
ढेरों बातें
बसे है …..
कहीं गहरे अँधेरा में .
क्योंकि वहाँ
सूरज हीं नहीं चमकता .

हम किसी का हिस्सा बन गए ,
पर सामने वाले ने
जाना हीं नहीं ….
माना हीं नहीं ….
सवालों भरी इस
राह पर
गर ये कहे कि,
मेरे सवालों का
जवाब तुम हो .
तो भी क्या फ़ायदा ?

बातों और अनदेखी करनेवाली निगाहों
से भी चोटे लगती है .
दर्द तो ठीक भी हो जाते है ,
पर रह जाती है टीसे और निशान
याद दिलाने के लिए .
पूरी ज़िंदगी लग जाती है
कभी ना मिटने वाले, ऐसे निशान,
मिटाने के लिए .

कुछ अपने हैं,
इसलिये चुप हैं.
कुछ चुप हैं,
इसलिये अपने हैं.

Unknown
उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविन्द न आयेंगे।
कब तक आस लगाओगी तुम
बिके.. हुए अखबारों से।
कैसी रक्षा मांग रही हो
दु:शासन…. दरबारों से।
स्वंय… जो लज्जाहीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे।
उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविन्द न आयेंगे।Il१॥
कल तक केवल अंधा राजा
अब गूंगा बहरा भी है।
होंठ सिल दिये हैं जनता के
कानों पर पहरा भी है।
तुम्ही कहो ये अश्रु तुम्हारे
किसको क्या समझायेंगे।
उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविन्द न आयेंगे।ll२॥
छोड़ो मेंहदी भुजा संम्भालो
खुद ही अपना चीर बचा लो।
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि
मस्तक सब बिक जायेंगे।
उठो द्रौपदी वस्त्र संम्भालो
अब गोविद न आयेंगे। Il३॥
– अटलबिहारी वाजपेयी

छोटे मन से कोई
बड़ा नहीं होता,
टूटे मन से कोई
खड़ा नहीं होता .

– युगपुरूष अटल बिहारी बाजपेयी
एक टुकड़ा ज़िंदगी का
बानगी है पूरे जीवन के
जद्दोजहद का .
उठते – गिरते, हँसते-रोते
कभी पूरी , कभी स्लाइसों
में कटी ज़िंदगी
जीते हुए कट हीं जाती है .
इसलिए मन की बातें
और अरमानों के
पल भी जी लेने चाहिये.
ताकि अफ़सोस ना रहे
अधूरे हसरतों ….तमन्नाओं …. की.

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