
फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।

फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।
मुलाक़ात न होने पाई थी
वक्त-ए- रुख़्सत ।
पर बंद आँखों से देखा था,
एक गहरी सी साँस और
तिरी गीली आँखों का झुक जाना,
क़तरे अश्क़ो का छलक जाना,
सूखे लबों का थरथराना।
तेरे हाथों का यूँ उठ जाना याद है
जैसे डूबने वाला हो कोई।
पर कहा नहीं तूने अलविदा
ये भी याद है।

सोन्धी-सोन्धी ख़ुश्बू बिखर गई फ़िज़ा में.
कहीं बादल बरसा था या आँखें किसी की?
कहा था –
ना कुरेदो अतीत की यादों को.
माज़ी…..अतीत के ख़ाक में भी बड़ी आग होती है.
सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,
याद दिलातीं हैं – बचपन की,
बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।
नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,
पर अब ङूबे हैं जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।
तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।
अब समझदार माँझी
कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा
तलाशता है सुकून-ए-साहिल।
एक दिन देखा शिव का चिता, भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से ।
समझ नहीं आया इतना डर क्यों वहां से जहां से यह भभूत आता हैं।
कहते हैं, श्मशान से चिता भस्म लाने की परम्परा थी।
पूरी सृष्टि इसी राख में परिवर्तित होनी है एक दिन।
एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन होनी है।
वहीं अंत है, जहां शिव बसते हैं।
शायद यही याद दिलाने के लिए शिव सदैव सृष्टि सार,
इसी भस्म को धारण किए रहते हैं।
फिर इस ख़ाक … राख के उद्गम, श्मशान से इतना भय क्यों?
कोलाहल भरी जिंदगी से ज्यादा चैन और शांति तो वहां है।

भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से – वहाँ उपस्थित होने पर भी यह पूजन देखा महिलाओं के लिए वर्जित है.
हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।
कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।
हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।
क्या हम आजाद हैं?
या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?
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