
उनसे सच की
क्या उम्मीद करना,
जो ख़ुद से भी झूठ बोलतें हैं?
बड़े सलीक़े से झूठ बोलते हैं।
तय है, हर लफ़्ज़ से, बेख़ौफ़ टपकते झूठ का हुनर ,
मुद्दतों में सीखा होगा।
वे हमें नादाँ कहते हैं।
हैं नादान क्योंकि
हमने भी भरोसा करना ,
यक़ीं करना अरसे
से सीखा है।