गुमनाम अधूरी ग़ज़लों को
मुकम्मल क़ाफ़िया मिल जाए।
तो उनकी सफ़र पूरी हो जाए।

गुमनाम अधूरी ग़ज़लों को
मुकम्मल क़ाफ़िया मिल जाए।
तो उनकी सफ़र पूरी हो जाए।

कुछ कहना था, कुछ सुनना था।
पर बात अधूरी रह गई।
क़िस्सा-ए-इश्क़ छेड़ा,
पर कहानी अधूरी रह गई।
क्या शिकवा आल्फ़ाज़ो और
लफ़्ज़ों की ग़र वे अनसुनी रह गई।
जब नज़्म-ए-ज़िंदगी अधूरी रह गई।


अधूरी मुहब्बतों की
दास्ताँ लिखी जाती है।
राधा और कृष्ण,
मीरा और कान्हा को
सब याद करते हैं।
किसे याद है कृष्ण की
आठ पटरानियों और
16 हजार 108 रानियों की?

क्यों कुरेदते हो
पुरानी बातें?
रूह पर उकेरे
यादों और दर्द के,
निशां कभी मिटते हैं क्या ?
खुरच कर हटाने की
कोशिश में कुछ ज़ख़्मों
के निशां रह जातें हैं
नक़्क़ाशियों से।
कई अधूरी ख़्वाहिशें,
गहनों में जड़े नागिनों सी
अपनी याद दिलाती हैं।
जब करो चर्चा,
गुज़रते हैं उसी दौर से।
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