Big thanks to all Blogger Buddies and readers

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Addiction of posting posts– Usually I write in Hindi, but today I decided to write in English, so that my thanks can reach out to all my friends. Blog world was completely alien for me, when I started writing, but now I am addicted to it.

Credit goes to my blogger friends- All credit goes to blog world and my blogger friends. Each and every like, vote, view, opinion and comment are precious to me. It motivates me, and gives strength for further writing.

The Economic Times – As usual, today morning I was going through the daily” The Economic Times”. I saw a catchy headline “ New Kids on the Blog: CEOs” (pg 10, dated 17 th July 2015). CEOs of MNCs have started blogging, using it as strong tool for healthy communication. The daily says “ The blogs are a channel of communication and engagement. They help build feedback loops, create an environment of trust.

A beautiful blogger buddy of mine had a dilemma “ a pen is mightier than a sword”?. Yes, it depends on the situation, whether you are in a battle ground or blog spot. So, I would suggest you all to play with words, carve your own world and enjoy life. Keep on reading and writing .

 Thanks once again my blogger buddies and readers.

 

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आनर किलिंग या अपने सम्मान की ख़ातिर हत्या ( सामाजिक समस्याएँ )

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सम्मान के रक्षा के लिए, परिवार या उसके अन्य सदस्यों द्वारा उसी परिवार केकिसी एक सदस्य की हत्या करने या उसे अस्वीकृत किया जाना आनर किलिंगकहलाता है। इसकी शिकार ज़्यादातर लड़कियाँ हीं होती हैं।

एक और आनर किलिंग 

हमारे समाज में एक और आनर किलिंग होता है।जिसके लिए ना सज़ा है ना सज़ा का प्रावधान। मज़े की बात है कि समझते सब है,पर ना समझ बन कर। अक्सर कुछ परिवारों में लड़कियों के बेमेल, गलत, बेढंगे या  धोखापूर्ण विवाह हो जाते हैं। ऐसे में इसे सुलझाने, संभालने या सहारा देने की कोशिश के बदले लड़कियों को दोषी ठहराया जाता है। ताकि समाज में उस परिवार की इज्ज़त बनी रहे। मतलब, समस्या का हल नहीं निकाला जाता है।ऐसे में लड़की को उसके भाग्य की दुहाई दी जाती है और उसी परिस्थिति रहने और झेलनेका ज्ञान दिया जाता है। अगर लड़की ऐसा नहीं करती है, तब गलती छुपाने के लिए उसे हीं गलत ठहराया जाता है। यह आनर किलिंग हत्या नहीं तिल –तिल मरने की सज़ा होती है।

क्या ऐसे में कुछ किया जाना चाहिए? या लड़की को लड़की होने की सज़ा मिलते रहना चाहिये?

 

 

 

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फारसी महाभारत राजमनामा ( विरासत )

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आज हम धर्म, जाति और भाषा के झगड़े में घिरी

जिंदगी में ड़ूबे है । पर ऐसे भी लोग हुए है, जो इन

सब से ऊपर उठ कर दुनिया को एक अलग नज़रिये

से देखते थे। अकबर, एक मुस्लिम शासक ने हिंदुओं

के महाकाव्य का फारसी अनुवाद करवाया, जिसमें

हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थ “गीता” भी समाहित है।

फ़तेहपुर सीकरी में एक अनुवाद – गृह की स्थापना

कर 1584-1586 में महाभारत का पहला फारसी

अनुवाद हुआ। इसे नाम दिया गया “राजमनामा”

अर्थात महायुद्ध की एक कहानी। इस अनुवाद की

विशेषता है इसमें महाभारत की घटनाओं के सुंदर

चित्रों का समनव्यय।

 

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बेर का आंचर ( व्यंजन )

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एक  किलो बेर को धो कर सूखने दे। फिर उसमे अच्छे से नमक डाल कर मिलाये (शीशे के बर्तन मे)। रात भर रहने दे। यह पानी छोड़ देगा। अगले दिन बेर को पानी से  निकाल कर सुखाएँ। रात में फिर उसी नमक पानी में ड़ाल कर अगले दिन फिर सुखाएँ। जब तक पूरा नमक पानी सूख जाएँ (3-5दिन) तक यही प्रक्रिया अपनाए। अब 1किलो इमली पानी में फुलाएं। इसका गूद्दा अलग कर लें। इसमें आधा किलो गुड/ खजूर गुड और नमक मिलाये। इसे धूप में 1-2 दिन धूप में गाढ़ा होने दें। अब इसमे इसमें बेर डाले और 2-4 धूप लगाएँ। दोनों मिल कर गाढ़ा हो जाने तक धूप लगाएँ।
मशाला- सौफ 50ग्राम, जीरा 25 ग्राम, मेथी 10 ग्राम, धनिया 25 ग्राम, लाल मिर्च 25ग्राम, कलौंगी 10 ग्राम सब सूखा भून कर पाउडर करें। बेर में यह मशाला मिला कर शीशा के जार में रख दें।

 

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जिंदगी के रंग (1) ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें ( कविता )

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ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें
दूर खड़ा फूलों भरा, हरा भरा,

पुराना दरख्त समीर के झोंकों में झूम रहा था।
नीचे खेलते बच्चे किलक रहे थे।
ड़ालों पर पंछी चहक रहे थे।
जिंदगी के रंग कितने सलोने है।

तभी पेड़ चीख़ उठा। उस से भी तेज़ चीख़ें आईं
ऊपर नीड़ों से, और गोल-गोल उड़ते पंछियो की।
कोई उसे बेरहमी से काट रहा था,

शायद सीमेंट-बालू के नीड़ बनाने के लिए।
आसपास के पेड़ सन्न देख रहे थे,
क्या इसके बाद हमारी बारी है? सोच रहे थे।
पेड़ धरा पर पड़ा था, फूल टूट-टूट कर बिखर गए थे।

हमें हमेशा लगता है, दुर्घटनाएँ दूसरों के साथ हीं होते है
पर ऐसा नहीं है। जिंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें।
हम हीं भूल जाते है, कभी-कभी गहरी जड़ें भी सहारा नहीं दे पातीं हैं हमें,

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केलौग्स चौकोज के साथ खुल जाए बचपन, खिल जाए बचपन ( Blog related topic )

बात कुछ पुरानी है। तब मेरी मेरी दोनों बेटियाँ छोटी-छोटी थीं। छोटे से बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करना कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, यह एक माँ ही बता सकती है। कुछ ऐसी ही मेरे भी कहानी है।

तब दोनों बेटियाँ स्कूल में पढ़तीं थी। मैं भी नौकरी करती थी। इसलिए सुबह घर में बड़ी भाग -दौड़ रहती थी। दोनों को तैयार करना, टिफ़िन देना, फिर उन्हें नाश्ता करवा कर समय पर रवाना करना बहुत बड़ा काम होता था। इसके साथ हीं मुझे भी तैयार होना पड़ता था। ताकि मुझे अपने स्कूल जाने में देर ना हो जाये।

इन बातों का मतलब यह है कि तब सुबह का हर पल मूल्यवान होता था। किसी छोटे बच्चे की माँ को मैनेजमेंट के कोर्स में पढ़ाये जानेवाले समय प्रबंधन और बहुकार्य या मल्टीटास्किंग सिखाने की जरूरत नहीं होती है। वह छोटे बच्चों के पीछे भाग-भाग कर अपने आप सब सीख जाती है। कुछ वही हाल मेरा भी था। इन सारे कामों में सबसे कठिन काम था दोनों को नाश्ता करवाना और दूध पिलाना। रोज़ दोनों दूध नहीं पीने के किसी नए बहाने के साथ तैयार मिलतीं।

तभी मुझे मेरे एक सहेली नें केलौग्स चौकोज का नया पैकेट दिखाया। उसने बताया कि यह बच्चों को यह बड़ा पसंद आता है। मैंने पैकेट पर लिखे पोषण तत्वों को ध्यान से पढ़ा। इस पर लिखे विटामिन ए, सी, प्रोटीन, कैल्सियम, आयरन और कैलोरी की जानकारी पढ़ कर मैं खुश हो गई। इसमें चाकलेट का स्वाद और मिठास भी थी। बस, मैं बाज़ार से तुरंत एक पैकेट केलौग्स चौकोज खरीद कर ले आई। मन हीं मन खुश हो रही थी, चलो अब बेटियों को स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता देना आसान हो गया। समय की बचत और बच्चों का मनपसंद नाश्ता भी, मतलब एक पंथ दो काज।

अगली सुबह खुशी-खुशी मैंने दो बॉल में दूध दिया और उस पर केलौग्स चौकोस डाले। पर यह क्या? दोनों बेटियों ने नई चीज़ देख कर मुँह बना लिया। मेरे तो होश उड़ गए। मैंने उनके लिए कुछ और नाश्ता बनाया ही नहीं था और अब कुछ और  बनाने का समय भी नहीं था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था अब क्या करूँ? तभी मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने उन्हे एक कहानी सुनाना शुरू किया – राजा रानी की कहानी । मैंने उनसे कहा, दूर एक देश है। जिसे इग्लैंड या यूनाइटेड किंगडम कहते हैं। वहाँ आज भी राजा-रानी और राजकुमार होते हैं। यह केलॉग्स राजा रानी और राजकुमारों के देश से आया है। मैंने कनखियों से देखा वे ध्यान से कहानी सुन रहीं थी। मैंने चम्मच से खिलाना शुरू किया और फिर धीरे से चम्मच उनके हाथों में पकड़ा दिया। दोनों को स्वाद पसंद आया। तभी छोटी बेटी पूछ बैठी -” मम्मी, क्या वहाँ का राजकुमार भी यह केलॉग्स चौकोज़ खाता है।” अब दोनों के प्रश्न खत्म ही नही हो  रहे थे, पर नाश्ता झट से खत्म हो गया। मेरे जान में जान आई। अब तो दोनों केलॉग्स चौकोज़ को राजकुमार वाला नाश्ता ही बुलाने लगीं और बिना नाज़-नखरा अपने से मांग कर खाने लगीं।

वास्तव में मैंने कहीं पढ़ा था कि केलॉग्स का सबसे बड़ा कारखाना यूनाइटेड किंगडम के ट्रैफर्ड पार्क, मैनचेस्टर में है और केलॉग एक रॉयल वारंट रखती है, जो उसे एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस ऑफ वेल्स से प्राप्त हुआ था। इसे हीं कहानी बना कर मैंने उन्हें सुना दिया था।

अब दोनों बेटियाँ बड़ी हो कर इंजीनियर बन चुकी हैं। बड़ी बेटी को मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद, अभी हाल में विदेश जाने का अवसर मिला। वह वहाँ से मेरे लिए अनेक विदेशी उपहार  ले कर लौटी और साथ में ले कर आई केलौग्स चौकोज का डब्बा। उसने हँस कर मुझ से कहा – ” मम्मी, राजकुमारों वाला केलौग्स चौकोज  उसके हीं देश से ले कर आई हूँ। मेरी  आँखों के सामने उनके  बचपन के  “खुशी के  पल” नाच उठे।

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किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

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नयना का सपरिवार बनारस घूमने का पहला अवसर था। दोनों बेटियों और पति के साथ बड़ी कठिनाइयों से यह कार्यक्रम बन पाया था। सुबह, सबसे पहले गंगा स्नान कर वे चारो विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा-अर्चना किया। बनारस के विभिन्न मंदिरों और पर्यटन स्थलों को घूमने में दो दिन कैसे निकल गए, उसे पता हीं नहीं चला।

यहाँ आ कर नयना को, पिंजरे से आज़ाद परिंदे जैसा अहसास हो रहा था। उसे वापस घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। अतः उसने काशी प्रवास और बढ़ा लिया। काशी आ कर गंगा में नौका विहार नहीं किया तो यात्रा अधूरी होगी। जबकी, उसके पति को रुकने का मन बिलकुल नहीं था।

नयना की शादी कम उम्र में हो गई थी। तब उसकी पढ़ाई भी अधूरी थी। ससुराल वाले और पति उसे काम करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। विशेष कर उसकी जेठानी उसे बड़ा परेशान करती थी। नयना का अकर्मण्य, मोटा पति हितेश, अक्ल से भी मोटा था। अतः भाभी के आँचल के पल्लू से बंधा रहता। भाभी सुगमता से अपने देवर को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती। वह अपनी कमाई से मात्र सौ रुपए नयना को देता और बाकी सारी कमाई माया यानि भाभी के कालिमायुक्त, कलुषित चरणों में चढ़ा देता। ना जाने छोटी कुटिल आँखों वाली कदर्य माया भाभी में नयना के पति को क्या सौंदर्य दिखता था।

तब तक नयना से अनजाने में भूल हो गई। एक-एक कर वह दो पुत्रियों की जननी बन गई। सारा ससुराल उससे नाराज़ हो गया। पुत्रवती भाभी का जादू उसके मूढ़ पति के सर चढ़ कर बोलने लगा। घर का सारा धन और पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे माया को चढ़ावा में चढ़ता गया। नयना जब पति को बेटियों के भविष्य के बारे में समझाना चाहती, उसका पति उसके ऊपर तरह-तरह के दोष मढ़, नयना से नाराज़ हो, माया भाभी के साथ कोप भवन में चला जाता था।

नयना ने जेठ की तरफ एक दो बार आशापूर्ण निगाहों से देखा। पर कुछ काम ना करनेवाले जेठ अपनी पत्नी की योग्यता से बड़े प्रभावित थे। जिसने सोने की अंडा देनेवाली मुर्गी अर्थात नयना के सरकारी पदाधिकारी, पति को अपने वश में कर रखा था। नयना ने जहां भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, कोरे आश्वासन के अलावा कोई मदद नहीं मिली। तब नयना ने सारे अत्याचार, बेटियों के भविष्य की वजह से झेलना स्वीकार कर लिया। नयना ने अपनी पढ़ाई बड़ी कठिनाईयों से पूरी की तथा  नौकरी करने लगी। जिस से बेटियों की पढ़ाई ठीक से चल सके। पर पति और माया भाभी का तोता- मैना प्रेम कथा प्रकरण चलता रहा।

ऐसी  कालिख की कोठारी से दो-तीन दिन के लिए बाहर निकल कर नयना को बड़ी शांती मिल रही थी। मान्यतानुसार शिव की त्रिशूल पर बसा बनारस, शांति और आध्यात्म की नगरी है। जहां ज्योतिर्लिंग, शक्ति पीठ और गंगा एक साथ हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक है। नयना, गलियों में बसे बनारस के अनोखे आकर्षण में उलझ कर रह गई। बनारसी और रेशमी कपड़ों के अद्भुत संसार  जैसे उसे एक नई दुनिया में ले गए । गंगा तट पर सैकड़ो घाट है। नौका विहार के समय नाविक सारे घाटों के बारे में बतला रहा था। तभी नयना के पति को माया भाभी का फोन आया।

किनारे माणिकर्णिका घाट नज़र आ रही थी। जहाँ अनेकों चिताएँ जल रहीं थीं। नयना ने किनारे दिख रहे एक आलीशान भवन के बारे में जानना चाहा। नाविक ने बताया कि यह डोम राजा का महल है। डोम राजा पारंपरिक रूप से शमशान घाट के कर्ता-धर्ता और स्वामी होतें हैं। साथ हीं वे श्मशान में चिताओं को दिया जानेवाली अग्नि के  संरक्षक होते है। उसके अनुमति से अग्नि प्राप्त की जाती है और चिता जलाया जाता है। यह परंपरा राजा हरिश्चंद्र के समय से चल  रही है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार एक चाण्डाल ने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद अपना दास बना लिया था। वह चांडाल मणिकर्णिका घाट का स्वामी था। उसने राजा हरिशचंद्र को इस घाट पर अन्त्येष्टि करने वाले लोगों से “कर” वसूलने का काम दिया था।

जलती चिताओं को देखते हुए, नयना के पति ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि नयना ने पुत्रजननी न बनने का अक्षम्य अपराध किया है। अतः मरने पर उन्हें कोई आग देनेवाला नहीं है। माया भाभी एक बड़ा उपकार करने के लिए तैयार है। नयना और हितेश  के  मरने पर उनकी  चिता को आग माया भाभी अपने पुत्र से दिलवा देगी। बदले में अभी अपनी सारी चल-अचल संपाति माया के पुत्र के नाम करना होगा। माया भाभी चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये। इसलिए हमें तत्काल वापस लौटना होगा।

नयना  और उसकी  युवा बेटियाँ हैरान उस कलुषित हृदय के व्यक्ति का चेहरा देख रहीं  थीं। नयना को  ख़्याल आया कि अभी तो मैं जिंदा हूँ। फिर मेरे अग्नि संस्कार की जल्दी  क्यों? और माया अपने पुत्र से  किराये ले कर  अग्नि दिलवाने के लिए क्यों तैयार है? इसके पीछे मात्र धन की लालसा है या कुछ और सत्य छुपा है ? दो लायक, होनहार और सुंदर इंजीनियर पुत्रियों का पिता इतना निर्दयी, नासमझ और नीच हो सकता है क्या? सिर्फ इसलिए कि वे बेटियाँ हैं? क्या वे बेटियाँ पिता को इस व्यवहार के लिए  क्षमा कर पाएँगी?

कहते हैं जाति और उसके साथ जुटे कर्म, जन्म से प्राप्त होते हैं। पर यहाँ तो अपनी ही स्वार्थी और लालची जननी, माया भाभी ने अपने पुत्र के नये  कर्म  को नियत कर दिया था – एक श्मशान चांडाल की रूप में।नयना ने सोंचा,  अगर अगली बार बनारस दर्शन का अवसर मिला, तब माणिकर्णिका घाट पर या डोम राजा के विशाल प्रासाद के नीचे मायावी माया भाभी का होनहार सुपुत्र चिता में आग देने के लिए, हाथों में अग्नि मशाल ले, किराये का पुत्र बनने को तत्पर दिखेगा। पुत्रविहीन माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए किराये का पुत्र सरलता से उपलब्ध होगा। किराये के बोर्ड पर लिखा होगा उसके किराये के रेट।

***

वर्षों बाद नयना को पुनः बनारस जाने का अवसर मिला है। पुरानी सारी बातें चलचित्र की तरह याद आने लगीं। उसे एक बार पुनः माणिकर्णिका घाट देखने की कामना हो रही थी। वह घाट जहाँ पार्वती जी ने अपने कान की मणी छुपाई थी, ताकि यायावर और घुमक्कड़ शिव उसे खोजतें रहें  और उनके साथ पार्वती को ज्यादा वक्त व्यतित करने का अवसर मिल सकें।

नयना ने अपने मणी का भी यहीं परित्याग किया था। वह पति के साथ उसकी आखरी यात्रा थी। उसके बाद वह बेटियों के साथ उनके नौकरी के स्थान पर चली गई थी और फिर कभी हितेश के पास वापस नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद उड़ती -उड़ती खबरें ज़रूर सुनने में आईं थीं कि माया भाभी ने सारे रुपये और जायदाद ले कर, हितेश को उसके ही घर से बाहर कर दिया था.
अभी वह गलियों से गुजर कर घाट की ओर बढ़ रही थी कि उसके कदम थम गए। दोनों बेटियों और दामाद ने देखा, सामने अर्ध विक्षिप्त भिक्षुक के रूप में हितेश भिखारियों की पंक्ति में बैठा है।

 

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बगुला भगत ( कहानी )

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यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है।

 इस कहानी पर पाठकों के विचार सादर आमंत्रित है।

खूब गोरा रंग, ऊँची कद काठी, तीन भाईयों की प्यारी बहन और माँ-पापा की लाड़ली बेटी थी वैदेही । अगल-बगल की गलियों में ना जाने उसकी कितनी सखी-सहेलियाँ रहतीं थी। उसका सारा दिन सहेलियों के साथ हुड़दंग करने में बीतता। कभी गोलगप्पे, कभी दही भल्ले या आलू टिकिया खाना या फिर छत पर बैठ गप्पें करना उस के पसंदीदा शगल थे। हाँ गप्प के साथ बुनाई और क्रोशिये का काम भी चलता रहता।

रात को जब बड़े भईया और पापा के घर आने का समय होता, वैदेही अपने टेबल पर किताबें खोल कर ऐसा शमा बाँध देती, जैसे सारा दिन पढ़ाई कर रही हो। पर उसके कान और आँखें लगे होते गली की ओर। पहले मंजिल की उसकी कमरे की खिड़की से जैसे ही भैया दूर गली के कोने पर नज़र आते, वह सीढ़ियाँ कूदती-फाँदती दरवाजा खोलने पहुँच जाती। बड़े भईया रोज़ कुछ ना कुछ लिए हुए घर पहुँचते- जलेबी, गर्म समोसे, मिठाईयाँ, फल या चॉकलेट। जो वे हमेशा प्यार से वैदेही को हीं पकड़ाते थे।

उस दिन भईया के हाथों में कुछ ज्यादा हीं सामान था और साथ में था एक नवयुवक – रणजीत। वह भईया के आफिस में काम करता था। भईया और पापा उसके शांत स्वभाव और कर्मठ व्यवहार से बड़े खुश थे। जल्दी हीं वैदेही सारा माज़रा समझ गई। यह सब उसके विवाह की तैयारी थी। वह भी खुश थी, जैसे इस उम्र की हर लड़की शादी के नाम से होती है। दोनों परिवार एक दूसरे से मिले और जल्दी हीं शादी हो गई। विवाह के बाद भईया ने मदद कर रणजीत का अलग व्यवसाय करवा दिया। व्यवसाय बड़ा अच्छा चल निकला।

शादी के बाद, कुछ दिनों में हीं वैदेही को पता चल गया कि रणजीत का शांत स्वभाव, वास्तव में तूफान के पहले की शांती थी। दरअसल वह बड़ा हीं गुस्सैल स्वभाव का था। पीना-पिलाना और देर रात तक ताश खेलना उसके रोज़ के नियम थे। नशे में वह अपना आपा और भी खो देता। रोज़ का झगड़ा और हो हल्ला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। इस बीच वैदेही तीन पुत्रों और एक पुत्री की जननी बन चुकी थी। पापा के गुजर जाने की वजह से उसे भईया-भाभी या माँ को यह सब बताने में हिचक होती थी। उसे यह भी लगता था, शायद समय के साथ रणजीत में सुधार आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

रणजीत को समझाने की वैदेही की कोशिश आग में घी का काम करती। वैदेही को नए कपड़ों और साड़ियों का बड़ा शौक था। हाथ में पैसे आते हीं वह भोला के दुकान से नई-नई साड़ीयाँ खरीद लाती। एक रात नशे में रणजीत ने हद कर दी। गुस्से में रणजीत नें वैदेही के सारी दामी कपड़े और साड़ियाँ इकट्ठे कर आग के हवाले कर दिये। वैदेही बड़े होते बच्चों के सामने तमाशा नहीं करना चाहती थे। पर ये बातें रणजीत की समझ में नहीं आती थीं।

दिन भर खुशमिजाज़ दिखने वाली वैदेही अंदर हीं अंदर घुलती रहती। अपनी सहेलियों को कुछ भी बताने से हिचकती थी। पर दीवारों के भी कान होते हैं। सारा आस पड़ोस बिना टिकट रोज़ का यह नाटक देखता था। एक रात रणजीत ने आने में बहुत देर कर दी। वैदेही का दिल धड़कने लगा। नशे में कहीं कुछ हो तो नहीं गया? लगभग आधी रात रणजीत घर पहुँचा। चिंतित वैदेही उस से देर से आने का कारण पूछने की भूल कर बैठी।
नशे में चूर रणजीत ने गाली-गलौज, हंगामा और झगड़ा शुरू कर दिया । बच्चे आँखें मलते जाग गए। रौद्र रूप धारण किए पति ने वैदेही को धक्के मार कर घर से बाहर कर दिया। बच्चों ने रोकना चाहा। उन सब को भी आधी रात में रणजीत ने घर से बाहर कर दिया। पीने-पिलाने के चक्कर में व्यवसाय का भी बुरा हाल था।

बड़ी होती बेटी और तीन बेटों की माँ आज असहाय अपने घर के बाहर आधी रात के समय लाचार खड़ी थी। दो-चार दिन अपने मायके में रह कर वह वापस लौटी। तब पता चला कि रणजीत को किसी केस की वजह से पुलिस खोज रही है। अतः वह फरार है। रणजीत के ना रहने से घर में शांती तो बहुत थी। पर पैसों के बिना घर चलना मुश्किल हो गया। पर कहते हैं ना कि ईश्वर सब सहने की हिम्मत देता है। एक ही रात में वैदेही के चारो बच्चे जैसे सयाने और समझदार हो गए। चारों ने अपनी योग्यतानुसार जो भी काम मिला करने लगे। वैदेही ने भी बुनाई-कढ़ाई जैसे काम शुरू कर दिये।

उनके पास जो था, जैसा था। उसमें हीं खुश थे। अब उन सब की जिंदगी सुकून भारी थी। तभी अचानक वैदेही की बेटी रौशनी के लिए अपने आप एक अच्छा रिश्ता आया। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शादी की तिथी पास आने लगी। अपने गहने बेच कर वैदेही ने पैसों का इंतज़ाम किया। बेटों ने अपनी-अपनी नौकरी से भी कुछ अग्रिम पैसे ले लिए थे। लड़के वालों की कोई फर्माइश नहीं थी। पर शादी का खर्च तो था हीं।

तभी एक विचित्र बात हुई। अचानक रणजीत घर वापस आ गया। परंतु उसका रूप-रंग बदला हुआ था। वह गेरुए धोती-कुर्ते में था। हाथों में था एक लंबा त्रिशूल, गले में लंबा रुद्राक्ष माला, लालट पर भभूत और पैरों में खड़ाऊँ। चेहरे पर कभी शिकन ना लानेवाली वैदेही को समझ नही आ रहा था कि सन्यासी पति के प्रत्यागमन पर वह रोए या हँसे।

चार बच्चों के साथ, बीच मझधार में वैदेही को अकेले छोड़ देने वाले पति ने उसे बताया कि वह बदल चुका है। अब वह परिवार में बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहता है। जब रात में वह जमीन पर कंबल बिछा कर सोने लगा, तब वैदेही को उस पर दया आ गई। वैदेही ने जानना चाहा कि इतने सालों तक वह कहाँ था। पूरी रात रणजीत अपनी दुख और कष्ट भरी कहानी सुनाता रहा। उसकी कितनी कठिन जिंदगी थी। उस रात नशे में तेज़ चलाते बाईक से दुर्घटना हो गई और उस व्यक्ती की वहीं मृत्यु हो गई। पुलिस से छुपने के कोशिश में वह घर से फरार हो गया।वह पहचाना ना जा सके, इसलिए उसने दाढ़ी-मूंछे बढ़ा ली थीं। भटकते-भटकते वह ईश्वर के द्वार, हरिद्वार पहुँचा। वहाँ वह गंगा तट पर गुरु जी से मिला। वैदेही के साथ किए गए अन्याय और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए बीमारों, कोढ़ियों और गरीबों की सेवा करता रहा इतने वर्षों तक। अब उसने सभी बुरी आदतें छोड़ दीं है।

रणजीत ने अगले दिन से बाज़ार के काम और सब्जियाँ लाने जैसे काम अपने जिम्मे ले लिया। जिंदगी पटरी पर आ गई थी। सभी बड़े खुश थे। बच्चे पिता के बदले रूप और स्वभाव से प्रसन्न थे। वैदेही शादी के कामों में उलझी थी। विवाह की पूर्वसंध्या पर संगीत कार्यक्रम में सभी व्यस्त थे। नाच -गाने का उल्लासपूर्ण माहौल था। तभी वैदेही को उनकी प्रिय सहेली ने इशारे से बुलाया।

वह वैदेही को चुप रहने का इशारा कर आपने साथ पीछे के गैरेज की ओर ले गई। जो प्रायः खाली और बंद पड़ा रहता था। द्वार के दरार से वैदेही ने देखा, रणजीत शराब पीने में व्यस्त है और अपने किसी मित्र से कह रहा है –“ यह मेरा सुरक्षित कमरा है। यहाँ पीने पर किसी को शक नहीं होता है। हाँ, मुझे पैसों की तंगी तो होती है। पर हाट-बाज़ार से पैसे बचा कर बोतल खरीद लाता हूँ। सोचता हूँ, कल रोशनी की बारात आने के ठीक पहले पीने का नाटक कर वैदेही से दस-बीस हज़ार रुपए झटक लूँगा। मैंने उसके पास काफ़ी रुपये देखे हैं।“ गेरुए वस्त्रधारी बगुले भगत का असली रूप देख वैदेही सन्न रह गई। उसे लगा, धरती फट जाये और वह भी सीता की तरह उसमें समा जाये।

उसके चेहरे पर घबराहट छा गई। यह कैसा पिता है, जो अपनी बेटी का शत्रु है। वह गैरेज की ओर आगे बढ़ी। तभी उसकी सहेली ने उसे हाथ पकड़ कर खींच लिया। दोनों ने कुछ बातें की और वैदेही के चेहरे पर कुछ निर्णायक भाव आ गए। अगले दिन शाम में शादी की भीड़-भाड़ अपने सबाब पर थी। दुल्हन बनी रोशनी बड़ी सुंदर लग रही थी। तभी नशे में झूमता रणजीत वैदेही से उज्जड तरीके से शराब खरीदने के लिए पैसे माँगने लगा।

तत्काल वैदेही ने बेटों से कह कर रणजीत के लिए शराब की बोतलें मँगवा दिया । तुरंत पैसे लाने का आश्वासान देते हुई रणजीत को शान्त रहने का निवेदन करने लगी । अपना काम इतनी सरलता से बनता देख रणजीत खुश हो गया और गटागट पीना शुरू कर दिया। वैदेही का तीर ठीक निशाने पर लगा था। थोड़ी देर में रणजीत नशे में चूर हो गया।तीनों बेटों ने उसे चुपचाप पीछे के उसी गैरेज में ड़ाल,बाहर से ताला बंद कर दिया।

रोशनी की शादी उसके अकर्मण्य पिता के अनुपस्थिती में बड़े अच्छे से सम्पन्न हो गया। अगले दिन उसकी बिदाई होने के बाद सभी मेहमानों को बिदा कर वैदेही  गैरेज के पास पहुँची। बेटों ने ताला खोला। रणजीत का नशा उतार चुका था। पर उस की आँखें अभी भी लाल थीं। बिखरे बाल, मुँह से शराब की दुर्गंध उसके चेहरे को कदर्य और भद्दा बना रही थीं।

अपना वार खाली जाते देख बौखलाया रणजीत, पहले की तरह झगड़े और मार-पीट पर उतारू हो गया। पर तभी वहाँ पुलिस आ गई। वैदेही को पुलिस अफसर ने धन्यवाद देते हुए कहा –“ आपने इसकी सूचना हमें दे कर अच्छा किया । बहुत दिनों से पुलिस इसे नशे में एक्सिडेंट करने की वजह से खोज रही थी। हरिद्वार की एक महिला ने भी इस पर केस दर्ज किया है। उस महिला ने बताया कि रणजीत ने हरिद्वार में उस से झूठ बोल कर विवाह किया था। कुछ साल उसके साथ बीताया। कुछ महीनों पहले उसके रुपये और गहने चोरी कर फरार हो गया था।

वैदेही आज बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था, काश वह पहले इतनी हिम्मत जुटा कर रणजीत को अपनी जिंदगी से बाहर कर पाती। 

 

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महाभारत के लेखक और व्यास के सहायक – भगवान गणेश (महाभारत की दिलचस्प कहानियाँ )

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भगवान ब्रह्मा चाहते थे कि भारत के दर्शन, वेद तथा उपनिषदों का ज्ञान लुप्त नहीं हो और धर्म क्षीण न हो जाये। इसलिए ब्रह्मा ने ऋषि वेद व्यास को भारत की कथा यानि महाभारत लिखने की प्रेरणा दी। विष्णु के अवतार, वेदव्यास महाभारत की घटनाओं के साक्षी थे। साथ ही वे वेदों के भाष्यकार भी थे। वेदों को उन्होने सरल भाषा में लिखा था। जिससे सामान्य जन भी वेदों का अध्ययन कर सकें। उन्होने अट्ठारह पुराणों की भी रचना की थी।

वेद व्यास एक महान कवि थे। ब्रह्मा के अनुरोध पर व्यास ने किसी लेखक की कामना की जो उनकी कथा को सुन कर लिखता जाये। श्रुतलेख के लिए व्यास ने भगवान गणेश से अनुरोध किया। गणेश जी ने एक शर्त रखी कि व्यास जी को बिना रुके पूरी कथा का वर्णन करना होगा। व्यास जी ने इसे मान लिया और गणेश जी से अनुरोध किया कि वे भी मात्र अर्थपूर्ण और सही बातें, समझ कर लिखें।

इस तथ्य के पीछे मान्यता है कि महाभारत और गीता सनातन धर्म के सबसे प्रामाणिक पाठ के रूप में स्थापित होने वाले थे। अतः बुद्धि के देव गणेश का आशीर्वाद महत्वपूर्ण था।

किवदंती है कि व्यास जी के श्लोक गणेश जी बड़े तेजी से लिख लेते थे। इसलिए व्यास जी कुछ सरल श्लोकों के बाद एक बेहद कठिन श्लोक बोलते थे। जिसे समझने और लिखने में गणेश जी को थोड़ा समय लग जाता। जिस से व्यास जी को आगे के श्लोक और कथा कहने के लिए कुछ समय मिल जाता था। भगवान गणेश ने ब्रह्मा द्वारा निर्देशित कविता “महाभारत” को दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य कहलाने का आशीर्वाद दिया।

भारत और भारत के लोगों  की इस वृहद कहानी में अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास , भूगोल, ज्योतिषशास्त्र, तत्वमीमांसा , कामशास्त्र जैसे विषयों के साथ भौतिक जीवन की नि:सारता का गीता संदेश भी शामिल है। इसलिए भारत की यह कहानी महाभारत कहलाई।

 

 

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लुप्त सरस्वती नदी – वैदिक ज्ञान का लोप और कृष्ण द्वयपायन द्वारा पुनः संरक्षण ( महाभारत की रोचक कहानियाँ )

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पौराणिक कथा के अनुसार 12 वर्ष के भयंकर सूखे से सरस्वती नदी  शुष्क हो तिरोहित हो गई। इसका गहरा  प्रभाव मानव जाति पर पड़ा। 

 इस दौरान मानव, मात्र अपने जीवित रहने के प्रयास में ज्ञान से दूर होता गया। इस नदी के तट पर यज्ञ-पूजन करने वाले ऋषीगण  और लोग, भयंकर आकाल के कारण  यहाँ से पलायन कर गए। इस भयंकर आकाल ने सरस्वती नदी के साथ वेद  के ज्ञानों को भी  लुप्त कर दिया।

  सरस्वती ही तब विशालतम, परम पवित्र ,और मुख्य नदी थी।  ऐसा वर्णन वेद, पुराण रामायण, महाभारत, वैदिक सभ्यता आदि में मिलता  है।

     यह देख महर्षि पराशर के पुत्र और भगवान ब्रह्मा के अवतार, वेद व्यास या कृष्ण द्वयपायन ने पुनः सभी ज्ञानपूर्ण वेदों को जमा, संकलित और सरल भाषा में रचित किया । इसे चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद में पुनः जन सामान्य के सामने प्रस्तुत किया। ताकि पुनः  समाज का  निर्माण हो सके। इन्होने वेदों को सरल, और जन साधारण की भाषा में लिखा। जो भाष्य कहलाए और द्वयपायन वेद व्यास कहलाने लगे । 

ऋग्वेद के नदी सूक्त के अनुसार यह पौराणिक नदी पंजाब के पर्वतीय भाग से निकलकर कुरुक्षेत्र और राजपूताना से होते हुए प्रयाग या इलाहाबाद आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर पुण्यतीर्थ त्रिवेणी कहलाती है। मान्यता है कि आज भी प्रयाग में यह अंत:सलिला है यानि धरती के  अंदर ही अंदर  बहती है।

वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समानांतर खुदाई में ५५००-४००० वर्ष पुराने शहर मिले हैं जिन में पीलीबंगा, कालीबंगा और लोथल भी हैं। यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित तथ्य को प्रमाणित करते हैं।

कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि भीषण भूकम्पों के कारण  सरस्वती लुप्त हुईं हैं। ऋग्वेद तथा अन्य पौराणिक वैदिक ग्रंथों में दिये सरस्वती नदी के सन्दर्भों के आधार पर कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि हरियाणा से राजस्थान होकर बहने वाली मौजूदा सूखी हुई घग्घर-हकरा नदी प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी की एक मुख्य सहायक नदी थी।

 

 

 

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