आशीर्वाद

 

blessing

किसी के जाने के बाद

यादें और आशीर्वाद
रह जाते है,
ना कोई छीन सकता है,
ना इसका बँटवारा होता है.

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समा ( मनमोहक सूफी नृत्य )

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जिसकी पूरी जिंदगी ही समा हो,

      उसके जाने के बाद भी

              इसका असर कम नहीँ होता.

 

 

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हाल – कविता( आध्यात्मिक सूफी संगीत में डूबा नृत्य )

 

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हाल में डूबे हो तो
हाला का हलाहल भी
असर नहीँ करता।
बस, सारे आकाश में,
ईश की आभा बिखरी दिखती है।

 

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मौन (कविता)

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ना काग़ज़ ना कलम,
  एक आवाज़
लेखनी बन जाती है।
बस सुनने के लिये,
इन कानों को बंद कर
  सुनना होता है ……
मौन हो, अंतरात्मा की आवाज।

 

 

 

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बाहरी सफर

बाहरी सफर के साथ
समाप्त होता है दुनिया के
दुख – दर्द का सफ़र।
और आरम्भ होता है,
अनंत की यात्रा।

जिंदगी के रंग ( कविता -4 ) #Mumbaislums

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नभ में पंछियों और बादलों से ऊपर उठते हुऐ
बड़ी खूबसूरत नज़र आती है दुनिया
छोटे दिखते हुऐ,
खिलौने से घर और पेड़ पौधे
पानी की बूँदों सी चमकती ताल -तलैया
सर्प सी बल खाती  नदियाँ
बडी  खूबसूरत नज़र आती  है जिंदगी
हवाई सफर से
जैसे एक  सपनों का जहाँ है
धरती और बादलों के बीच
तभी, नीचे उतरते -उतरते
वास्तविकता के धरातल पर ले आती है
       जिंदगी
  सामने दिखता है जिंदगी का सही रंग
टूटी बदसूरत  झुग्गी -झोपड़ियों की बस्ती
कमजोर अधनंगे खेलते,
हवाई जहाज़ देख शोर मचाते बच्चे,
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें.

#mumbaislums

 

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जिंदगी के रंग (कविता – 5)

जीवन के  इंद्रधनुषी सफर में
हजारो रंग नज़र आते है,
परायों को अपना कहनेवाले
अच्छों को बुरा कहने वाले
कहीँ ना कहीँ मिल जाते है

रोज़ सफेद -काले और
सतरंगी जिंदगी नज़र आती है
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है।

जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें(3)

अटकामा रेगिस्तान में
तपती रेत और गर्म हवाओं के बीच
अचानक एक सुबह खूबसूरत नज़ारा था,

चारो ओर फूल खिल आये थे
और रंगो की चादर सी  बिछ गई थी
क्या पता है कब जीवन में नये रंग
किस मोड़ पर आ जाये ?
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है हमें ….

( चिली, दक्षिण अमेरिका के सूखे -बंजर अटकामा रेगिस्तान  में अचानक लाखो करोड़ों फूल खिल आये है. यह जादू  दुनिया में मौसम को बिगाडने वाले अल नीनो वर्षा ने कर दिखाया है.   )News -The Times Of India, dated-31.10.2015, pg 30.

 

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वैधनाथ धाम या बाबधाम – (ज्योतिर्लिंग ५)

देवताओं का घर, देवघर बैद्यनाथ ज्योसतिर्लिंग, झारखंड में है। यह सिद्धपीठ है “कामना लिंग” भी कहलाता हैं। प्रायः सभी शिव मंदिरों के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दिखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण आदि सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था। यहाँ महाशिवरात्री और श्रावण माह में विशेष पूजन होता  है।

विशेष पूजा, काँवर पद यात्रा– यहाँ पवित्र श्रावण मास में गंगा जलार्पण का विशेष महत्व है। श्रद्धालु सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल पात्रों में भर काँवर में रखकर बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ की कठिन पद यात्रा करते हैं। यह दूरी लगभग १०५ किलोमीटर है। जिसे नंगे पैर चल कर पूरा किया जाता है। पवित्र जल पात्र व काँवर को कहीं भी भूमि पर नहीं रखा जाता है। मंदिर पहुँच कर इस जल से ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया जाता है।

मान्यता  है कि शिव के गले में लिपटे रहने वाले वासुकीनाथ की पूजा शिव को प्रसन्नता प्रदान करती है। अतः ज्योतिर्लिंग पूजन के बाद देवघर से 42 किलोमीटर दूर जरमुण्डी गाँव के शिव मन्दिर स्थित वासुकीनाथ का  दर्शन-पूजन अवश्य करना चाहिए। जनश्रुति व लोकमान्यता है कि यह वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है। इसलिए इसे कामना लिंग भी कहतें हैं।

किवदंती

किवदंती है कि महान शिव भक्त, राक्षसराज रावण ने हिमालय पर्वत पर घोर तपस्या की। अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाना  शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर काटने ही वाला था। तभी शिवजी प्रसन्न हो प्रकट हुए। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने कहा।

रावण ने लंका में उन्हे स्थापित करने की आज्ञा चाही। शिवजी ने उसे एक शिवलिंग दे कर कहा, वह जहां भी इसे पृथ्वी पर रखेगा, शिव वहाँ वास करेंगे। प्रसन्न, मुदित रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर चला। ईश्वर इच्छा, मार्ग में उसे लघुशंका की आवश्यकता हुई। वह शिवलिंग एक चरवाहे को थमा लघुशंका-निवृत्ति होने गया।

रावण को देर होते देख चरवाहा शिवलिंग भूमि पर रख चला गया। वापस आ कर रावण पूरी शक्ति लगा कर भी शिवलिंग को उखाड़ नहीं सका। क्रोध और निराशावश शिवलिंग को अपना अँगूठे से नीचे धंसा दिया। आज भी इस शिवलिंग का छोटा हिस्सा हीं धरती से ऊपर है। फिर सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की स्थापना उसी स्थान पर कर दी। जनश्रुति के अनुसार वैद्यनाथ-ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है अतः भगवान शिव ने जानबुझ कर ऐसी परिस्थिति बना दी कि राक्षस राज रावण शिवलिंग लंका नहीं ले जा सके।

ज्योतिर्लिंग – पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। हिंदु मान्यतानुसार इनके दर्शन, पूजन या प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेने मात्र से सात जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है।

शिव पुराण – शिव पुराण, कोटि ‘रुद्रसंहिता’ में इस प्रकार बारह ज्योतिर्लिंगों की चर्चा है, जिसमें सोमनाथ का वर्णन प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में किया गया है।

सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।

अर्थात – सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।

ओंकारेश्वर – (ज्योतिर्लिंग 4 )

कावेरिका नार्मद्यो: पवित्र समागमे सज्जन तारणाय |
सदैव मंधातत्रपुरे वसंतम ,ओमकारमीशम् शिवयेकमीडे ||

अर्थ:- कावेरी एवं नर्मदा नदी के पवित्र संगम पर सज्जनों के तारण के लिए, सदा ही मान्धाता की नगरी में विराजमान श्री ओंकारेश्वर जो स्वयंभू हैं वही ज्योतिर्लिंग है.

यह मध्य प्रदेश के प्रमुख शहर इंदौर से ७७ किमी की दूर खंडवा जिले में नर्मदा के उत्तर, नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है। इंदौर से यहाँ सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। यह द्वीप हिन्दू पवित्र चिन्ह ॐ के आकार में बना है। ओंकारेश्वर लिंग एक प्राकृतिक शिवलिंग है। इसके चारों ओर हमेशा जल भरा रहता है। यहाँ पर भगवान महादेव को चना का दाल चढ़ाने की परम्परा है। स्कंद पुराण, शिवपुराण व वायुपुराण में भी ओम्कारेश्वर क्षेत्र की महिमा का उल्लेख मिलता है |

मान्यता है, यहाँ भगवान शिव ओंकार स्वरुप में प्रकट हुए थे और यायावर शिव प्रतिदिन तीनो लोकों में भ्रमण के बाद यहाँ आकर विश्राम करते हैं।अतः यहाँ के शयन आरती और शयन दर्शन का विशेष महत्व हैं।

एक अन्य मान्यतानुसार, ओंकार शब्द का उच्चारण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से हुआ था, अतः किसी भी वेद का पाठ इसके उच्चारण बिना पूर्ण नहीं होता है। माना जाता हैं कि इस पवित्र ॐ क्षेत्र में 33 करोड़ देवी- देवता निवास करते हैं।

किवदंतियाँ

1 राजा मान्धाता ने नर्मदा तट के इस पर्वत पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया। उनसे यहीं निवास करने का वरदान माँग लिया। तब से यह शिव स्थली, पर्वत मान्धाता पर्वत कहलाने लगा।

2 एक अन्य कथानुसार, इस मंदिर में शिवलिंग स्थापना, देवताओ के धनपति कुबेर ने की थी। यहाँ धनतेरस की सुबह ४ बजे से अभिषेक और लक्ष्मी वृद्धि पेकेट (सिद्धि) वितरण होता है। जिसे घर पर ले जाकर दीपावली की अमावस को विधिनुसार धन रखने की जगह पर रखने से घर में प्रचुर धन और सुख शांति आती हैं I

3 एक कहानी के अनुसार एक बार देव और दानवों में भयंकर युद्ध हुआ। दानव विजयी होने लगे। तब देवताओं के आवहान से भगवान शिव ने ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में आ कर दानवों को पराजित किया।

4 एक पौराणिक कथानुसार  एक बार घुमक्कड़ नारद मुनी ने विंध्य पर्वत से पर्वत मेरु की प्रसंशा की। विंध्य पर्वत ने मेरु से बड़ा बनने के लिए यहाँ पर भगवान शिव के पार्थिवलिंग की पूजा की और भगवान शिव की कृपा और वरदान प्राप्त किया।

ज्योतिर्लिंग – पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। हिंदु मान्यतानुसार इनके दर्शन, पूजन या प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेने मात्र से सात जन्मों का पाप नष्ट हो जाता है।
शिव पुराण – शिव पुराण, कोटि ‘रुद्रसंहिता’ में इस प्रकार बारह ज्योतिर्लिंगों की चर्चा है, जिसमें सोमनाथ का वर्णन प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में किया गया है।

सौराष्ट्रे सोमनाथंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्।
वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।
सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये।।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।।
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः।
तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः।।

अर्थात – सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जयिनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशङ्कर, सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्रीघुश्मेश्वर। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है।