पता बदल चुका है,
पर दिल है कि
मानता नहीं.
वही लवों पर छलकती
ख़तों की भाषा
पुरानी यादों की ख़ुशबू,
उसी पते पर आतीं और
द्वार खटखटातीं है.

पता बदल चुका है,
पर दिल है कि
मानता नहीं.
वही लवों पर छलकती
ख़तों की भाषा
पुरानी यादों की ख़ुशबू,
उसी पते पर आतीं और
द्वार खटखटातीं है.

ज़रूर दिल बादलों का भी किसी ने दुखाया होगा,
वर्ना इतनी शिद्दत से बरसता कौन है?

Unknown
The path to the Truth
is a labour of the heart,
not of the head.
Make your heart
your primary guide!
Not your mind.
Meet, challenge and ultimately prevail over your
nafs / false ego with your heart.
Knowing your ego will
lead you to the
knowledge of God.

Shams Tabriz spiritual instructor of Rumi ❤️❤️

सोंच- संभाल कर
बोली के जादू को काम में लाओ .
बातों के रंग
निराले होते हैं.
ना जाने कब , कैसे
किसी की बातें
दिल में उतर कर मन मोह लेतीं हैं.
किसी की , तीर बन दिल को चीर जातीं हैं,
नश्तर बन मन को छलनी कर देतीं हैं.

How we see God is a direct reflection of how we see ourselves.
If God brings to mind
mostly fear and blame,
it means there is too much
fear and blame welled inside us.
If we see God as full of love
and compassion, so are we.

– Shams Tabriz , spiritual instructor of Rumi ❤️❤️

राष्ट्र कवि, पद्म विभूषण रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (२३ सितंबर १९०८-२४ अप्रैल१९७४) का जन्म सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था । उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की । उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था । उनकी अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है ।
कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग की चंद पंक्तियाँ
वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?
और तब सम्मान से जाते गिने
नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;
देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिनने दिये निज लाल हैं ।
ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी ।

आँसू और मुस्कान की पहेली पुरानी है.
ख़ुशी हो या ग़म
आँखे छलक हीं जातीं हैं.
ये मुस्कान भी फ़रेब है या सच
पहेली बन हीं जाती है .

Whenever they
rebuild an old building,
they must first of all
destroy the old one.

Rumi ❤️❤️
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