
ज़िंदगी के रंग -224



फूलों की पंखुड़ियाँ!!!
अगर टूटने की चाहत नहीं,
तब किसी से
इतना जुटना नहीं कि
रिश्ते खंडित होते
स्वयं भी खंडित हो जाओ …..
झड़ते फूल की पंखुड़ियों
सा बिखर जाओ।
मेरा विचार है, ज़िंदगी के कई रंग होते है। हम इन्हें चाहे जिस रूप में जियें – कविता, कहानी, सुखद या दर्द भरी कहानी। इस कविता संग्रह भी ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को शब्दों में पिरो कर खबसूरती से व्यक्त किया गया है। ये कविताएँ आपको राह दिखाएँगी, सुकून पहुँचाएँगी।
अगर रिश्ते, सपने, जीवन के पहलुओं को काव्यमय तरीक़े से जानना है। ज़िंदगी को समझना है। तब इन कविताओं को ज़रूर पढ़ें।

शुभ गुरुपूर्णिमा !!!
अपने गुरु हम सब स्वयं हैं,
ग़र होड़ दूसरों से नहीं
अपने आप से हो।
किसी और को नहीं
अपने आप को नापो, तौलो….परखो।
खुद को खुद से बेहतर
औ स्वच्छ बनाओ……
अपने पानी से खुद को खुद
बार-बार धोते,
गलते बर्फ़ के टुकड़े सा।
अपने गुरु खुद बन जाओगे।
ग़र अपना बेहतर संस्करण
बनने की चाहत हो।
शुभ गुरुपूर्णिमा!!!
Happy Guru Purnima 2021 !! All teachers and spiritual guru plays a significant role in shaping our lives. Thanks to all of them on Guru Purnima!
आपने अपने आप को आईने में देखा ज़िंदगी भर।
एक दिन ज़िंदगी के आईने में प्यार से मुस्कुरा कर निहारो अपने आप को।
अपने को दूसरों की नज़रों से नहीं, अपने मन की नज़रों से देखा। कहो, प्यार है आपको अपने आप से!
सिर्फ़ दूसरों को नहीं अपने आप को खुश करो।
रौशन हो जाएगी ज़िंदगी।
जी भर जी लो इन पलों को।
फिर नज़रें उठा कर देखो। जिसकी थी तलाश तुम्हें ज़िंदगी भर,
वह मंज़िल-ए-ज़िंदगी सामने है। जहाँ लिखा है सुकून-ए-ज़िंदगी – 0 किलोमीटर!


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कुछ समझदारों को कहते देखा है- बात ना पकड़ो !!!!!
पर खुद ऐसे लोगो को हमेशा
बातें पकड़तें देखा,
बातें बनाते भी देखा।
इससे इनके रिश्ते भले छूट जाएँ
या अपने टूट जायें।
ऐसे में यह मुहावरा याद आता है – “पर उपदेश, कुशल बहुतेरे।”

अक्सर लोगों ने कहा –
पुरानी बातें ना दोहराओ ।
पर क्यों?
हम सब रामायण, गीता और महाभारत दोहरातें हैं,
समझ और ज्ञान पाने, ग़लत बातों
को ग़लत बताने के लिए।
अनुचित करने वाले अपनी त्रुटि
छुपाने के लिए ये सब कहते हैं!
ग़लतियाँ करने से क्यों नहीं डरते हैं।
ऐसे लोगों को ग़लत हरकतें
कर नई बातों की उम्मीद क्यों?

ज़िंदगी के रंग – 217
ज़िंदगी के देखे कई रंग,
कई बसंत !
सतरंगी ज़िंदगी ने सिखाया बहुत कुछ।
कभी हँसाया कभी रुलाया।
आज जहाँ खड़े हैं,
आप सब के साथ ।
वह है उम्र किस्टलाइस्ड इंटेलिजेन्स का,
अनुभव और समझदारी की वह उम्र जहाँ बस चाहत है,
खुश रहने की!
खट्टी-मीठी ज़िंदगी की राहों को ख़ुशियों के साथ तय करने की।
अब दुनिया और काम में
वक्त के साथ छूटते, भूलते जा रहे अपनों के साथ
बैठ कर वक्त भूलने की चाहत है।

ज़िंदगी की राहों में लोग
रूठते-छूटते रहते हैं।
कुछ अपनों के अपना होने के
भ्रम टूटते रहतें हैं।
अँधेरे पलों में कुछ सच्चे अपने,
दमकते सितारों से,
ज़िंदगी में जुटते रहतें हैं।

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