Shree Yantra Temple of Amarkantak ( travel experience)

Beautiful shree yantra temple.
Beautiful shree yantra temple.

Shree Yantra Temple, Amarkantak, chhatisgarh, India – a temple of its own kind in the       shape of powerful Sri Yantra.

02012010436

The temple is designed like Shree yantra. Shree Yantra is a Beautiful, complex, geometric, sacred and spiritual yantra used for meditation.

Excellent sculptures of temple

Construction only on Pushya Nakshatra day– in Amarkantak Valley , the Shri Yantra Temple is under construction for many years. As, it is constructed  according to Hindu calendar , only  on pushy Nakshatra day.
In Indian astrology nakshatras is used for accurate predictions and astrological analysis. Pushya is one among the 27 nakshatras. It is the most auspicious and effective for siddhi of tantra and mantra. Means it is extremely beneficial for the practitioner of spiritual and religious activities. It is believed that all new works, started during this time, are fulfilled and give positive results.

 20150725_163611

कोणार्क मंदिर -चमकते सूर्य और बोलते पत्थरों का काला पैगोड़ा ( यात्रा वृतांत और पौराणिक कथा )

          IMG-20150423-WA0001जब सूर्य या अर्क एक  विशेष समय पर, एक ख़ास कोण से उदित होते हैं।  तब  कोणार्क मंदिर मेँ एक दिव्य दृश्य दिखता है। लगता है जैसे सूर्य देव मंदिर के अंदर जगमगा रहें है। शायद  इसलिए यह  मंदिर कोणार्क कहलाया । यहाँ सूर्य को बिरंचि-नारायण भी  कहा जाता है।  इसका काफी काम काले ग्रेनाईट पत्थरों से हुआ है।  इसलिए इसे काला पैगोड़ा भी कहा जाता है। 

पौराणिक मान्यता रही  है कि सूर्य की किरणों में अनेक रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं विशेष कर त्वचा रोग  के उपचार के लिए प्राचीन काल से सूर्य उपासना प्रचलित था। आज भी छठ पूजा और अन्य सूर्य उपासनाएँ प्रचलित है।

 आज, आधुनिक  विज्ञान ने भी सूर्य के किरणों के महत्व को  स्वीकार किया  है।  किवदंती है कि कृष्ण- पुत्र   साम्ब  कोढ़ग्रस्त    हो गए। तब सांब ने  मित्रवन में चंद्रभागा   नदी और  सागर के  संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की। सूर्य देव ने  प्रसन्न हो कर  सांब के  रोगों का  नाश  किया। 

तब साम्ब  चंद्रभागा  नदी में स्नान करने गए । वहाँ  उन्हें  सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली।  मान्यता है कि इस  मूर्ति  के रचनाकर देव शिल्पी   विश्वकर्मा स्वयं  थे। उन्होने  सूर्यदेव के शरीर के तेज़ से   इस मूर्ति का  निर्माण किया  था। साम्ब ने “कोणार्क सूर्य   मंदिर’ बनवा कर इस मूर्ति की वहाँ  स्थापना किया।

यह मंदिर एक  रथ रूप में बना है। जिसे सात घोड़े  खींच  रहें हैं।यह  अद्वितीय सुंदरता और शोभामय शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण उत्कृष्ट मंदिर  है। यह  मनमोहक  स्थापत्यकला का उदाहरण है। पत्थर पर जीवंत  भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र उकेरे हुए हैं।यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है, जिन्हे कामसूत्र  से लिया गया  है।।ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहतें हैं। इस मंदिर में इसी कल्पना को मूर्त रूप में उतारा  गया है।

इस मंदिर के निर्माण कला को कलिंग शैली कहा गया है। यह  पूरा मंदिर अर्क या सूर्य के रथ के रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं। इस मंदिर में  बड़े दिलचस्प तरीके से पहर और महीनों का चित्रण किया गया है। रथ के बारह पहिये/ चक्के या चक्र  लाजवाब नक्कासी से पूर्ण हैं। ये बारह चक्र वर्ष के  बारह महीनों के प्रतीक हैं। इन चक्कों में   आठ अर हैं , जो दिन के  आठ प्रहर के सूचक हैं। आधुनिक घड़ी के उपयोग में आने से पहले तक दिन के समय की पहचान पहर/प्रहर के आधार पर होती थी। आज भी हम दिन के दूसरे प्रहर को आम बोलचाल में दोपहर कहते हैं। इस रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं ।

 कोणार्क  मंदिर युनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व धरोहर है। यह भारत के उड़ीसा राज्य में, पूरी में स्थित  है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 1236 से 1264 के दौरान निर्मित हुआ है। गंग वंश के राजा नृसिंह देव ने इसका निर्माण  करवाया था। इसके निर्माण में काले  ग्रेनाईट पत्थरों का बहुलता से  उपयोग हुआ है। साथ ही लाल बलुआ पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ है। मान्यता हैं कि इसमे दधिनौती या गुम्बज पर एक विशाल चुम्बक लगा था. जिसकी सहायता से इस के अंदर सूर्य की हीराजटित मूर्ति हवा में लटकी रहती थी. विदेशी लुटेरों ने चुम्बक निकाल लिया, जिस से मंदिर ध्वस्त होने लगा. एक मान्यता यह भी हैं कि इस चुम्बक से समुद्र से गुजरने बाले जहाजों के दिशा यंत्र काम करना बंद कर देते थे.

  आज मंदिर का बहुत भाग ध्वस्त हो चुका है। पर इस खंडित और ध्वस्त  मंदिर के सौंदर्य से अभिभूत हो नोबल पुरस्कार प्राप्त कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कभी कहा था-

        “कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।”

#BloggerDreamTeam सुंदर बन- राजसी बाघों का साम्राज्य- यात्रा वृतांत ( यात्रा वृतांत )

20150221_070655

हमारी बहुत अरसे से सुंदरबन / वन जाने की कामना थी। हमने पश्चिम-बंगाल, कोलकाता, पर्यटन विभाग द्वारा चलाये जा रहे सुंदरबन सफारी कार्यक्रम का टिक़ट ले लिया। इस कार्यक्रम में रहने, खाने और सुंदरबान के विभिन्न पर्यटन स्थल दिखाने की व्यवस्था शामिल है। इसमें एक गाईड भी साथ में होता है।जो यहाँ की जानकारी देता रहता है। 

इस सफ़ारी के  टिकट अलग अलग कार्यक्रमों में उपलब्ध है। जिसके  टिकटों का  मूल्य 3400 से 7000 रुपये तक ( प्रति व्यक्ति) है। एक रात – दो दिन तथा दो रात तीन दिन के कार्यक्रम होते हैं।यह कार्यक्रम ठंढ के मौसम में ज्यादा लोकप्रिय है। 

बीस फरवरी (20-02-2015) का दिन मेरे लिए खास था।इस दिन  मेरी बेटी चाँदनी का जन्मदिन भी था। उस दिन ही सुंदरबन जाने का कार्यक्रम हमने बनाया । मैं और मेरे मेरे पति अधर सुबह आठ बजे टुरिज़्म सेंटर, बी बी डी बाग, कोलकाता  पहुँचे। वहां से 3-4 घंटे की एसी बस की यात्रा कर सोनाखली पहुँचे। इस यात्रा में हमें नाश्ता और पानी का बोतल दिया गया। सोनाखली पहुँच कर, बस से उतार कर  दस मिनट पैदल चल कर हम नदी के किनारे पहुँचे। जहाँ से नौका द्वारा हमें एम वी (मरीन वेसल) चित्ररेखा ले जाया गया। यह काफी बड़ा जलयान है। इसमें 46 लोगों के रहने और खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम है। हमारे ट्रिप में 22 लोग थे। यहाँ से हमारी सुंदरबन जल यात्रा आरंभ हुई।

सुंदरबन  नाम के बारे में अनेक मत है। एक विचार के मुताबिक इसकी खूबसूरती के कारण इसका नाम सुंदरबन पड़ा। इस नाम का एक अन्य  कारण है, यहाँ  बड़ी  संख्या में मिलनेवाले सुंदरी पेड़ । कुछ लोगों का मानना है, यह समुद्रवन का अपभ्रंश है। एक मान्यता यह भी है की यह नाम यहाँ के आदिम जन जातियों के नाम पर आधारित है।

जहाज़ तीन तालों वाला था। निचले तल पर रसोई थी। वहाँ कुछ लोगों के रहने की व्यवस्था भी थी। दूसरे तल पर भी रहने का इंतज़ाम था। ट्रेन के बर्थ जैसे बिस्तर थे। जो आरामदायक थे। सबसे ऊपर डेक पर बैठने और भोजन-चाय आदि की व्यवस्था थी। वहाँ से चरो ओर का बड़ा सुंदर नज़ारा दिखता था। जैसे हम जहाज़ पर पहुँचे। हमें चाय पिलाया गया। दोपहर में बड़ा स्वादिष्ट भोजन दिया गया। संध्या चाय के साथ पकौड़ी का इंतज़ाम था। रात में भी सादा-हल्का पर स्वादिष्ट भोजन था।

सुंदरवन बंगाल का  सौंदर्य से पूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र है। यह दुनिया में ज्वार-भाटा से बना सबसे बड़ा सदाबहार जंगल है। यह भारत के पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में है। इसका बहुत बड़ा भाग बंगला देश में पड़ता है। यह अभयारण्य बंगाल के 24 परगना जिले में है।

सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के दक्षिणी भाग में गंगा नदी के सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। यह एक राष्ट्रीय उद्यान, बाघ संरक्षित क्षेत्र एवं बायोस्फ़ीयर रिज़र्व क्षेत्र है। यह क्षेत्र मैन्ग्रोव के घने जंगलों से घिरा हुआ है और रॉयल बंगाल टाइगर का सबसे बड़ा संरक्षित क्षेत्र है। यह बहुत बड़े क्षेत्र में फैला है।

सुंदरवन यूनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व विरासत है । साथ ही प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र है। सुंदरवन तीन संरक्षित भागों में बंटा है – दक्षिण,पूर्व और पश्चिम। सुंदरवन में राष्ट्रीय उद्यान, बायोस्फीयर रिजर्व तथा बाघ संरक्षित क्षेत्र है। यह घने सदाबहार जंगलों से आच्छादित है साथ हीं बंगाल के  बाघों की सबसे बड़ी आबादी वाला स्थान भी है। सुंदरबन के जंगल गंगा, पद्मा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों का संगम स्थल है। यह बंगाल की खाड़ी पर विशाल डेल्टा है। यह सदियों से विकसित हो रहा प्रकृति क्षेत्र है। जिसकी स्वाभाविक खूबसूरती लाजवाब है।

यह विशेष कर रॉयल बंगाल टाइगर के लिए जाना जाता है। 2011 बाघ की जनगणना के अनुसार, सुंदरबन में 270 बाघ थे। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि इस राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की संख्या १०३ है। यहाँ पक्षियों की कई प्रजातियों सहित कई जीवों का घर है। हिरण, मगरमच्छ, सांप, छोटी मछली, केकड़ों, चिंराट और अन्य क्रसटेशियन की कई प्रजातिया यहाँ मिलती हैं। मकाक, जंगली सुअर, मोंगूस लोमड़ियों, जंगली बिल्ली, पंगोलिने, हिरण आदि भी सुंदरवन में पाए जाते हैं।

ओलिव रिडले कछुए, समुद्री और पानीवाले सांप, हरे कछुए, मगरमच्छ, गिरगिट, कोबरा, छिपकली, वाइपर, मॉनिटर छिपकली, हाक बिल, कछुए, अजगर, हरे सांप, भारतीय फ्लैप खोलीदार कछुए, पीला मॉनिटर, वाटर मॉनिटर और  भारतीय अजगर भी सुंदरवन में रहतें हैं।

लगभग दो घंटे के जल यात्रा के बाद मिट्टी के एक ऊँचे टीले पर हमें एक विशालकाय मगरमच्छ आराम करता दिखा। कहीं दूर कुछ जल पक्षी- सीगल नज़र आए। वहाँ से आगे हमें सुधन्यखली वाच-टावर पर छोटी नाव से ले जाया गया। ये टावर काफी सुराक्षित बने होते हैं।

सुंदरबान  की वनदेवी प्रतिमा
सुंदरबान की वनदेवी प्रतिमा

प्रत्येक टावर में देवी का एक छोटा मंदिर बना है। दरअसल सुंदरवन के निवासी इस जंगल की देवी की पूजा करने के बाद हीं जंगल में प्रवेश करते हैं। अन्यथा वनदेवी नाराज़ हो जातीं हैं। उनकी ऐसी मान्यता है।

यहाँ ऊँचाई से, दूर-दूर तक जंगल को देखा जा सकता है। यहाँ चरो ओर पाया जाने वाला पानी नमकीन होता है। ज्वार की वजह से समुद्र का पानी नदियों मे आ जाता है। प्रत्येक वाच-टावर के पास जंगली जानवरों के लिए मीठे पानी का ताल बना हुआ है। अतः यहाँ पर अक्सर जानवर पानी पीने आते  हैं। इस लिए वाच टावर के पास जानवर नज़र आते रहते है।

इस टावर पर नदी किनारे की दलदली गीली मिट्टी पर ढ़ेरो लाल केकड़े और मड़स्कीपर मछलियाँ दिखी। मड़स्कीपर मछलियाँ गीली मिट्टी पर चल सकती हैं। ये अक्सर पेड़ों पर भी चढ़ जाती हैं। बिजली रे, कॉमन कार्प, सिल्वर कार्प, कंटिया, नदी मछली, सितारा मछली, केकड़ा, बजनेवाला केकड़ा, झींगा, चिंराट, गंगा डॉल्फिन, भी यहाँ आम हैं। यहाँ मछली मड़स्कीपर और छोटे-छोटे लाल केकड़े भी झुंड के झुंड नज़र आते हैं।

सुंदरवन एक नम उष्णकटिबंधीय वन है। सुंदरवन के घने सदाबहार पेड़-पौधे खारे और मीठे पानी दोनों में लहलहाते हैं। यहाँ जंगलों में सुंदरी, गेवा, गोरान और केवड़ा के पेड़, जंगली घास बहुतायात मिलते है। डेल्टा की उपजाऊ मिट्टी खेती में काम आती है।

वाच टावर के पास बने मीठे पानी का ताल और  हिरण
वाच टावर के पास बने मीठे पानी का ताल और हिरण

वाच-टावर से जंगल में कुछ हिरण, बारहसिंगा और पक्षी नज़र आए। यहाँ नीचे से ऊपर निकलते जड़ों को पास से देखने का मौका मिला। यहाँ के मैन्ग्रोव की यह विशेषता है। ज्वार-भाटे की वजह से पेड़ अक्सर पानी में डूबते-निकलते रहते हैं। अतः यहाँ के वृक्षों की जडें ऑक्सीजन पाने के लिए कीचड़ से ऊपर की ओर बढ़ने लगती हैं। जगह-जगह पर मिट्टी से ऊपर की ओर निकली काली नुकीली जड़ें दिखती हैं।

2-3 घंटे बाद हम यहाँ से आगे एक ओर वॉच टावर- सजनेखली पर पहुँचे। जहाँ जंगली सूअरों का झुंड दिखा। साथ ही गोह, बंदर, हिरण और कुछ पक्षी दिखे।

रात हो चली थी। डेक पर बैठ कर गाना और कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम में शाम अच्छी कटी। बंगाल के संस्कृतिक जीवन पर सुंदरबान का गहरा प्रभाव है। सुंदरवन वन तथा उसके के देवी-देवताओं का प्रभाव यहाँ के अनेक साहित्य, लोक गीतों और नृत्यों में स्पष्ट दिखता है।

रात में जहाज़ एक जगह पर रोक दिया गया। दुनिया से दूर अंधेरे में, जहाँ चारो ओर पानी ही पानी था। एक अजीब सा एहसास था, वहाँ पर रात गुजरना। अगले दिन सुबह-सुबह ही एक अन्य वाच टावर- दोबांकी जाना था। अतः मैं 5 बजे सुबह उठ कर नहा कर तैयार हो गई। वहाँ की सारी व्यवस्था अच्छी थी। पर बाथ रूम  छोटे थे और अपेक्षित सफाई नहीं थी।

सुबह की चाय पीने तक हम वाच-टावर पहुँच गए थे। यह टावर विशेष रूप से बाघों का क्षेत्र था। हिरण, बंदर जैसे जानवर तो दिखे। पर बाघ नहीं नज़र आया। आज के समय में बाघ एक दुर्लभ प्राणी है और यहाँ पर भी कभी-कभी हीं दिखता है। बाघ के हमलों सुंदरवन के गाँव में अक्सर सुनने में आता है। लगभग 50 लोग हर साल बाघों के हमले से मारे जाते हैं।

यहाँ पर सुंदरबान संबन्धित एक दर्शनीय म्यूजियम है और रहने के लिए कमरे भी है। इन कमरों की बुकिंग पहले से करना पड़ता है। यहाँ हमने सुंदरी के पेड़ और यहाँ पाये जाने वाले अन्य वृक्षों को निकट से देखा।

दोबांकी वाच टावर का गेस्ट हाऊस
दोबांकी वाच टावर का गेस्ट हाऊस

वहाँ से लौटते-लौटते दोपहर हो रही थी। हमें गरमा गरम भोजन कराया गया। अब हमें वापस सोनाखलीले जाया गया। वहाँ से हमें बस द्वारा वापस कोलकाता पहुंचाया गया। रास्ते में हल्का नाश्ता उपलब्ध करवाया गया।

दो दिन और एक रात जलयान पर जंगलों और नदियों के बीच गुज़ारना मेरे लिए एक नया अनुभव है। यहाँ शहर का शोर-शराबा

 नहीं होता है, बल्कि प्रकृति की सौंदर्य  का अनुभव होता है। नदियों के जल की कलकल , पक्षियों के कलरव और जंगल की सरसराहट इतने स्वाभाविक रूप से मैंने अपने  जीवन  में कभी अनुभव नही किया था।  

क अद्भुत, खूबसूरत यात्रा समाप्त हुई। यह एक यादगार और खुशनुमा यात्रा थी।

#BloggerDreamTeam – Food & Travel Carnival

TRAVEL – Unforgettable travel story.

#FarMoreSingaporeमेरी ख्वाहिश – एक उत्कृष्ट देश का भ्रमण ( blog related )

मेरी बहुत लंबे अरसे से सिंगापुर जाने की चाहत है। इसकी खुबसूरती और प्राकृतिक सौंदर्य हमेशा मुझे अपनी ओर खींचती है। जीवन के भाग-दौड़ में अवसर ही नहीं मिला इस सुंदर देश को देखने का। कामना है, जल्दी मुझे यहाँ जाने का सुअवसर मिले। यहाँ के भोजन चखने का मौका मिले। यह अपनी व्यवस्था, सौंदर्य और स्वादिष्ट भोजन के लिए जाना जाता है।

सिंगापुर दुनिया का एक छोटा और युवा दक्षिण एशियाई देश है। युवा होने पर भी एक सफल, तरक्कीशील और खूबसूरत देश है। इसका नाम हिन्दी के शब्द शेर / सिंह से बना है। जबकि सच्चाई यह है कि यहाँ कभी शेर नहीं रहते थे। पौराणिक कथा के अनुसार, 14 वीं सदी में सुमात्रा राजकुमार ने एक राजसी सिंह को देख इसका नामकरण सिंगापुर किया।

यह देश अपनी साफ-सफाई और नियम पालन के लिए भी जाना जाता है। इसकी खुबसूरती अद्वितीय है। रात में यह शहर रोशनी में नहाया हुआ और भी खूबसूरत दिखता है।
सिंगापुर में सिंगापुर के स्थायी निवासियों के अलावा चीनी, मलय और भारतीय भी काफी संख्या में है। इस देश ने अपनी तरक्की के लिए समुद्री बन्दरगाह, शुल्क मुक्त पुनर्निर्यात (टैक्स फ्री), निर्यात, औद्योगीकरण, एडुकेशन हब आदि का विकास किया है। इसकी दूरदर्शी नीतियों के कारण यह विकास के पाएदान पर तेज़ी से तरक्की कर रहा है।

सिंगापुर ने पिछले कुछ वर्षों में 650 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कई हजार वित्तीय संस्थानों और व्यापारिक फर्मों के लिए मेजबान की भूमिका निभाई। इस तरह के मेजबानी के लिए आवश्यक है सभी के स्वाद को समझना , और उसके अनुसार भोजन उपलब्ध कराना।

अर्थव्यवस्था प्रोत्साहन के लिए यहाँ एक और बात पर विशेष बल दिया गया है। वह है पर्यटन और उससे संबधित लुभावने, स्वादिष्ट भोजन । शायद यहाँ के लोग समझ चुके हैं –
             ” किसी के दिल को जीतने की राह पेट से हो कर जाती है”।

यहाँ के सिंगापुरी व्यंजनों के आलावा चीनी, मलय , कॉन्टिनेन्टल और भारतीय सभी प्रकार के भोजन मिलते हैं। यह देश सागर के किनारे बसा है इसलिए यहाँ समुद्री भोजन (सी फूड) भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। पर सिंगापुर में शाकाहारी रेस्तरां: ग्रीन भी जाया जा सकता हैं। यहाँ की एक और विशेषता है, यहाँ उच्च श्रेणी के अनेक रेस्तरा । कुछ रेस्तरा सिंगापुर नदी के किनारे रोमांटिक माहौल में खाने-पीने की व्यवस्था रखते है। पर यहाँ कम खर्च वाले भोजन के स्थान भी उपलब्ध है। यह मेरे जैसे भोजन के शौकीन पर्यटक के लिए अच्छी सूचना है।

सिंगापुर विविधता से भर एक संपन्न देश है। यहाँ की संस्कृति, भाषा , कला और स्थापत्य कला लाजवाब है । सिंगापुर के अनेकों हिस्सों को खूबसूरती से डिजाइन और विकसित किया गया था । सिंगापुर लगातार नए और आकर्षक यात्रा के अनुभवों को पेश करने के लिए अपने को विकसित कर रहा है। ताकि यहाँ अधिक से अधिक संख्या में पर्यटक आए और उनका मूल मंत्र है –

     “अपने घर से दूर घर जैसा आराम और स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध करवाना”

http://discover.stayfareast.com/

<img src="http://d.adroll.com/ipixel/BPN4U5UIGNB6XFIPC5EYLC/TWORJ3VYMVFU7HU55Y347Q" />

सीमेंट की एक बोरी (यात्रा अनुभव )

जब हम किसी काम के लिए सीमेंट की बोरी लाते हैं। तब कभी उसे इतिहास के बारे में नहीं सोचते हैं। पर इसका भी एक लंबा इतिहास होता है। सीमेंट एक लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार होता है। भारत विश्व में सबसे अधिक सीमेंट बनाने वाले देशों की सूची में दूसरे स्थान पर है।

अभी हाल में मुझे एक पूरी तरह से स्वचालित सिमेंट प्लांट देखने का अवसर मिला। यह प्लांट है – टॉपसेम सीमेंट या मेघालय सीमेंट लिमिटेड। स्वचालित तरीके से सीमेंट बनते देखना अपने आप में अद्भुत अनुभव है।

यह प्लांट असम के गौहाटी शहर में है। यह शहर से थोड़ा हट कर स्थित है। टॉपसेम सीमेंट प्लांट में हम लोग 10 फरवरी 2015 की सुबह लगभग 9:30 में पहुँचें। वहाँ के वी पी श्री राजेश रंजन ने पूरी फ़ैक्टरी दिखाई। उन्होने बड़े अच्छे तरीके से विस्तार से सीमेंट बनने की प्रक्रिया बताई। साथ ही मशीनों की कार्य प्रणाली बताई। सीमेंट बनने की पूरी कहानी बड़ी रोचक लगी।

यह सीमेंट प्लांट काफी बड़े दायरे में फैला है। यहाँ विशालकाय मशीनें लगी हैं। अलग-अलग आकार और नाप की मशीने लगी हैं । जो लगातार, बिना रुके काम कर रहतीं हैं । यहाँ के कामगारों, कर्मचारियों तथा अधिकारियों के रहने की अच्छी व्यवस्था है। साथ ही मेहमानो के लिए गेस्ट-हाऊस की भी व्यवस्था है। यह फैक्टरी पंद्रह वर्ष से सीमेंट उत्पादन कार्य में लगी है।

सीमेंट पर्वतों से लाये क्लिंकर, एश/ राख़ आदि मिला कर बनते हैं। इन सब को अलग-अलग स्थानों से मंगाया जाता है। निर्धारित मात्रा में इन सब को बड़ी-बड़ी मशीनों में पिसा और मिलाया जाता है। कच्चे माल चूना पत्थर आदि खनन के द्वारा प्राय पहाड़ों से प्राप्त किया जाता है। वहाँ से इन्हे ट्रकों के द्वारा सीमेंट प्लांट में लाया जाता। इन

शिलांग या पूर्व का स्कॉटलैंड – (यात्रा वृतांत और दुर्घटना )

7 फरवरी 2015
मैं शिलांग पहले भी जा चुकी हूँ। यह मेघालय की राजधानी है। शिलांग एक खूबसूरत पहाड़ी स्थान है। अतः जब दूसरी बार जाने का अवसर मिला। तब मैं तुरंत तैयार हो गई।
शिलांग जाने के लिए रेल मार्ग नहीं है। यहाँ हवाई जहाज़ की कम ही उड़ानें जाती हैं। सड़क मार्ग से यहाँ जाना सबसे सुविधाजनक है। सात फरवरी को दोपहर लगभग एक बजे मैं और मेरे पति हवाई जहाज़ से गौहाटी पहुँचें। वहाँ से कार से शिलांग के लिए निकले। यह दूरी लगभग 120 किलोमीटर है। हमलोगों ने सोचा दोपहर का भोजन मार्ग में किसी होटल या ढाबा में खा लेंगे। शाम तक शिलांग पहुँच जाएँगे। तब थोड़ी देर वहाँ बाज़ार में घूमेंगे।
शिलांग जाने की सड़क पूरी तरह से पहाड़ी मार्ग है। एक तरफ पहाड़ और दूसरी ओर घाटियां और हरे-भरे पेड़ पौधे बड़े सुंदर लग रहे थे। हम मंत्र-मुग्ध प्रकृतिक सौन्दर्य को निहार रहे थे। पर तभी हमारी कार रुक गई। पता चला, आगे पूरी सड़क जाम थी। दोपहर से शाम और फिर रात हो गई। पर आवागमन ठप्प था। किसी तरह कार थोड़ी–थोड़ी खिसक रही थी। कुछ पुलिसवाले और मिलिट्री की गाडियाँ आई। तब मार्ग खुलने की आस जागी। काफी देर के बाद रात नौ बजे रास्ता खुला।
अभी थोड़ी दूर ही पहुँच थे। तभी कुछ लोग हमारी कार रोक कर मदद मांगने लगे। उनके साथ एक घायल युवक था। जिसे आगे पुलिस थाने या अस्पताल तक ले जाने का अनुरोध कर रहे थे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे में क्या करें। अन्य गाड़ियों की तरह आगे बढ़ जाएँ या मदद करें।? खैर, हमने उस युवक को कार में बैठा लिया। वह होश में था। पर बदहवाश था। इस लिए ठीक से कुछ बता नहीं पा रहा था। सौभाग्यवश थोड़ी दूर पर कुछ पुलिसवाले मिल गए। उनके साथ एम्बुलेन्स भी थी। हमने उस युवक को वहाँ उतारा। तब पता चला कि वह पुलिस का जवान था। उस दिन वहाँ पर भीड़ और पुलिस में भयंकर झड़प हुई थी। कुछ वाहनें भी जला दी गई थी। इसी से वजह से सड़क जाम थी। उस उपद्रव में यह जवान घायल हो अकेला सड़क के किनारे पड़ा रह गया था। वर्दी के ऊपर उस जवान ने काली जैकेट पहन रखी थी। अतः वह पुलिस का जवान है, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था।
वहाँ से आगे बढ़ने पर एक आत्म संतुष्टि थी, किसी अनजाने को मदद करने का। पर शिलांग जल्दी पहुँचने की चिंता भी थी। हम रात 10 बजे शिलांग पहुँचे। हमने 2-3 घंटे के रास्ते को नौ घंटे में तय किया था। हमारा उस दिन का सारा कार्यक्रम बेकार हो गया। मन में खयाल आया-
                                    होई है सोई जो राम रची राखा.

दूसरे दिन सुबह-सुबह हम तैयार हो कर घूमने निकाल गए। पर्वत, हरीयाली और शीतल समीर ने मन प्रसन्न कर दिया। यहाँ की पर्वत माला बड़ी सुंदर है। यहाँ के लोग शांत स्वभाव के हैं। शिलांग और आस-पास के ग्रामीण परिवेश बड़े साफ-सुथरे हैं। वहाँ की सफाई देख कर मन खुश हो गया।
एशिया के सबसे साफ सुथरे गाँव का श्रेय वहाँ के एक ग्राम मावियननिंग ग्राम को मिला है। जिसे समय की कमी की वजह से हम देख नहीं पाये।
हम सभी एलीफेंट झरना / फ़ाल पहुँचें। यह एक खूबसूरत पहाड़ी झरना है। शिलांग पीक वहाँ की सबसे ऊंची पर्वत चोटी है। जहाँ से शिलांग का बड़ा खूबसूरत नज़ारा दिखता है। राह में और भी अनेक खूबसूरत झरने नज़र आये । यहाँ का गोल्फ कोर्स विश्व प्रसिद्ध है।
चेरापुंजी विश्व की सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह है। इस स्थान का वास्तविक नाम सोहरा है। सोहरा बड़ी साफ-सुथरी जगह है। यहाँ के इको पार्क से पहाड़, और घाटियाँ का नज़ारा खूबसूरत लगता है। यहाँ की एक और लाजवाब चीज़ है- पेडों की सजीव जड़ों से बना झूलता पुल। यहाँ की ख़ासी जन जातियों के लोग अपने अद्भुत योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के पुल बना लेते हैं। जब किसी नदी के ऊपर यह पुल बनाना होता है, तब ये सुपारी के पेड़ के लंबे-लंबे तनों को बीच से चीर कर नदी के ऊपर इस पार से उस पार तक रख देते है। यहाँ के रबर के पेड़ों की नई पतली जड़ों को उस दिशा में बढ़ने देते है। यहाँ का मौसम और हमेशा होने वाली बारिश इन जड़ों को सुपारी के तनों पर बढ्ने में मदद करती है। बढ़ते-बढ़ते दूसरे किनारे पर जा कर ये जड़ें मिट्टी में जड़ें जमा लेतीं हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें मजबूत हो जाती है। इस तरह ये जड़ें मजबूत पुलों का रूप का ले लेती है। इन पर से आसानी से नदी पार किया जा सकता है। ये पुल बहुत मजबूत होतें हैं। इस तरह के पुल मानव मस्तिष्क की अद्भुत देन है। पूरे विश्व में ये पुल अनोखे हैं। ऐसे पुल और कहीं नहीं पाए जाते हैं।
मवासमाई गुफाएँ प्रकृतिक रूप से बनी गुफा हैं। यहाँ पानी के कटाव ने कुदरती तौर पर बड़े सुंदर आकार बना दियेँ हैं। एक ओर से अंदर जाने का रास्ता है। यह गुफा काफी लंबी है। बाहर निकालने का रास्ता दूसरी ओर है। इसमें अद्भुत आकृतियाँ हैं। varsha काल में इन गुफाओं में जाना संभव नहीं होता है।
शिलांग से 15 किलोमीटर दूर यहाँ का ऊमीयम लेक है। यह ऊमीउम नदी पर बनाया गया लेक है। यह बड़ापानी के नाम से भी प्रसिद्ध है। लेक के किनारे ढेरो पाइन के वृक्ष हैं। साथ ही नेहरू पार्क है। इसे शिलांग- गौहाटी के सड़क मार्ग यानि उच्च राजपथ से बड़ी सुविधा से देखा जा सकता है। यह बड़ा खुबसूरत लेक है।
भारत के इस उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में प्रायः मातृसत्ता व्यवस्था है। यहाँ अनेक जनजातियाँ है। जिनमें जायदाद की हकदार पुत्री होती है। यहाँ ख़ासी और जनटिय जनजातियों की जनसंख्या सर्वाधिक हैं। यहाँ की जनजातियाँ प्रायः आदिशक्ति शिव या देवी के उपासक हैं।

चेरापुंजी ( खूबसूरत यात्रा वृतांत )

शिलांग के पास, चेरापुंजी विश्व की सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह है। इस स्थान का वास्तविक नाम सोहरा है। सोहरा बड़ी साफ-सुथरी जगह है। यहाँ के इको पार्क से पहाड़, और घाटियाँ का नज़ारा खूबसूरत लगता है।

यहाँ की एक और लाजवाब चीज़ है- पेडों की सजीव जड़ों से बना झूलता पुल। यहाँ की ख़ासी जन जातियों के लोग अपने अद्भुत योग्यता का इस्तेमाल करते हुए इस तरह के पुल बना लेते हैं। जब किसी नदी के ऊपर यह पुल बनाना होता है, तब ये सुपारी के पेड़ के लंबे-लंबे तनों को बीच से चीर कर नदी के ऊपर इस पार से उस पार तक रख देते है। यहाँ के रबर के पेड़ों की नई पतली जड़ों को उस दिशा में बढ़ने देते है। यहाँ का मौसम और हमेशा होने वाली बारिश इन जड़ों को सुपारी के तनों पर बढ्ने में मदद करती है। बढ़ते-बढ़ते दूसरे किनारे पर जा कर ये जड़ें मिट्टी में जड़ें जमा लेतीं हैं। धीरे-धीरे ये जड़ें मजबूत हो जाती है। इस तरह ये जड़ें मजबूत पुलों का रूप का ले लेती है।

इन पर से आसानी से नदी पार किया जा सकता है। ये पुल बहुत मजबूत होतें हैं। इस तरह के पुल मानव मस्तिष्क की अद्भुत देन है। पूरे विश्व में ये पुल अनोखे हैं। ऐसे पुल और कहीं नहीं पाए जाते हैं।

कोलकाता की यादें १ – वह रिक्शावाला ( यात्रा अनुभव )

मैं और मेरे पति अधर कोलकाता के न्यू मार्केट में घूम रहे थे। बाज़ार में भीड़ और चहल-पहल थी। बगल में था होग मार्केट। कपड़े, जूते, चप्पल, बैग और ढेरो समान से बाज़ार भरा था। यह बाज़ार ऐसा है, जहाँ पैदल घुमने का अपना मज़ा है। पर काफी चलने के बाद थकान हो गई। तब मेरे पति अधर नें रिक्शा लेने का सुझाव दिया और एक रिक्शेवाले से बातें करने लगे।
कोलकाता के ऊँचे और बड़े-बड़े चक्कों वाले रिक्शे मुझे देखने में अच्छे लगते हैं। पर किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचना मुझे अच्छा नहीं लगता है। अतः मैंने रिक्शे पर बैठने से मना कर दिया। रिक्शेवाला मेरी इन्कार सुन कर मायूस हो गया। उसे लगा कि मैं पैसे की मोल-मोलाई कर रही हूँ। उसने मुझसे कहा- “ दीदी, पैसे कुछ कम दे देना। मैंने बताया कि पैसे की बात नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचंना मुझे अच्छा नहीं लगता । तब रिक्शे वाले ने ऐसी बात कही, जो मेरे दिल को छु गई और मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई।
उम्रदराज, दुबला-पतला, सफ़ेद बालोंवाले रिक्शा चालक ने कहा- “ यह तो मेरा रोज़ का काम है। हमेशा से मैंने यही काम किया है। अब मैं दूसरा कोई काम कर भी नहीं सकता। यही मेरी कमाई का साधन है। आप बैठेंगी तो मेरी कुछ कमाई हो जाएगी। वरना कोई दूसरी सवारी का इंतज़ार करना होगा।पैसे तो मुझे कमाने होंगे।
                    पता नहीं कब हमारे देश से गरीबी कम होगी? लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर कब प्राप्त होगें?

कोलकाता की यादें ३ – कोहिनूर चाय ( यात्रा अनुभव )

मुझे मालूम हुआ न्यू मार्केट में चाय पत्ती की बड़ी अच्छी दुकान “कोहिनूर” है। बंगाल की दार्जिलिंग चाय बड़ी मशहूर है और मेरी पसंदीदा भी। दुकान ढूँढते हुए हम हौग मार्केट के पीछे की सड़क पर पहुँचें। वहाँ चाय पत्ती की एक दुकान तो दिखी। पर उसका नाम कहीं लिखा नज़र नहीं आया। पूछने पर मालूम हुआ कि इस दुकान का नाम कोहिनूर है।
चाय की प्याली को होठों के लगाने के पहले हम शायद हीं उसके इतिहास या नाम के बारे में सोंचते है। पर सच्चाई यह है कि इनकी भी अपनी कहानी होती है और इनका भी अपना एक नाम होता है। काली, सफ़ेद , हरी और ऊलोंग (चीन की) चाय पत्तियाँ अलग-अलग होतीं हैं।
चाय पत्तियों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि चाय पत्तियाँ जिस स्थान या स्टेट में उपजाई जाती हैं। उस नाम से ही जानी जाती हैं। जैसे तीस्ता घाटी क्षेत्र की पत्तियाँ तीस्ता चाय पत्ती और मकईबारी स्टेट की पत्ती मकाईबारी चाय पत्ती के नाम से बाज़ार में मिलती है। दार्जिलिंग में ऐसे ही ढेरो टी स्टेट है। अलग-अलग जगहों कि पत्तियों के रंग, स्वाद और खुशबू में अंतर होता है। स्वाद और खुशबू के आधार पर चाय पत्तियों का मूल्य तय होता है।
कोहिनूर दुकान से हमने थोड़ा गोल दाने वाली पत्तियाँ ली। ये चाय को गहरा रंग देती है। साथ में थोड़ा लीफ़ लिया। ऐसी पत्ती हल्का रंग देती है पर इनकी खुशबू बड़ी अच्छी होती है। वापस लौटने पर इन से चाय बना कर पीने पर दिल खुश हो गया। साथ ही आफसोस हुआ कि मैंने पत्तियाँ ज्यादा क्यों नहीं लीं। कोहिनूर दुकान वास्तव में अच्छी दुकान है। ।

कोलकाता की यादें २- कस्तुरी रेस्टोरेन्ट (यात्रा अनुभव )

 
कोलकाता जा कर मुझे वहाँ की बंगाली तरीके से बनी मछ्ली खाने की बड़ी इक्छा थी। हमारे एक परिचित ने कस्तुरी रेस्टोरेन्ट का पता बताया। यह न्यू मार्केट में फ्री स्कूल स्ट्रीट में है।
सीढ़ियों से ऊपर पहुँच कर लंबा सा हाल नज़र आया। वहाँ का रख-रखाव भी मामूली था। बड़ा साधारण सा दिखनेवाले रेस्टोरेन्ट देख दुविधा होने लगी। कहीं हमने यहाँ आ कर गलती तो नहीं किया। हमने मेनू देखना चाहा। वहाँ का मेनू बड़ा नायाब था। दो ट्रे में ढेर सारे मछली के बने व्यंजन कटोरों में सजे थे। जो व्यंजन पसंद हो उन कटोरों को उठा लेना था।
उस रेस्टोरेन्ट में सिर्फ मछली के व्यंजन मिलते है। चिंगड़ी, रेहू, भेटकी, कतला, पोमफ्रेट, हिलसा / इलिस मछली के अलावा कई और मछलियों के व्यंजन भी उपलब्ध थे। साथ में सादा चावल था। सभी व्यंजन स्वाद के लिहाज़ से दूसरे से भिन्न थे। मैंने पहली बार मछली किसी साग या सब्जी के साथ बना देखा था। भोजन का स्वाद लाजवाब था। टमाटर की मीठी चटनी और सेवई भी स्वादिष्ट थी।
रेस्टोरेन्ट देख कर हुई दुविधा व्यर्थ निकला। वहाँ भोजन कर बंगाल के स्वादिष्ट भोजन का भरपूर लुत्फ़ मिला। तब खयाल आया – “रूप से ज्यादा गुण मायने रखता है।“ कस्तुरी वास्तव में कस्तुरी खुशबू की तरह सुवासित थी- “भोजन के सुगंध से।“