Category: The Bard’s Apprentice!
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
पीपल के पत्ते
बिखर आये पतझङ के मौसम में
सूखते….
लाल, पीले, भूरे , शुष्क होते पत्ते
उङते गर्दो-गुबार से धूल धुसरित थे।
तभी गर्म , तेज़ हवा के झोंके ने
अश्वत्थ की ङालियों को हिला दिया
अौर पर्णपाती…. पत्तों का झङना शुरू हो गया।
अद्भुत नज़ारा था –
मृत गोल -गोल, घुमते- नाचते
गिरते, झङते, पीपल के पत्ते मानो
खुशी मनाते…….
सूफी दरवेश नृत्य कर रहे हों ।
मृत्यु वरण करते इन पर्ण -पत्तों में
यह हौसला कहाँ से आया?
कुछ लिखने की कोशिश में
कुछ लिखने की कोशिश में
कभी-कभी महसूस होता है,
ऐसा कुछ तो पढ़ा है……….
शायद पहले किसी ने लिखा है……
पर सच तो यह है कि
कविताएं खुद को दोहराती रहती हैं,
अलग-अलग शब्दों ….. भावों…. में।
वैसे हीं जैसे मौसम बदलते हैं,
बार-बार वही गर्मी-सर्दी-बरसात या
मधुमास दोहरा कर आता हैं।
You Start Dying Slowly आप धीरे धीरे मरने लगते हैं
नोबेल पुरस्कार विजेता ब्राजीली कवियत्री मार्था मेरिडोस की “You Start Dying Slowly कविता के लिए नोबल पुरस्कार मिला था जिस का हिन्दी अनुवाद –
1) आप धीरे-धीरे मरने किधीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– करते नहीं कोई यात्रा,
– पढ़ते नहीं कोई किताब,
– सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
– करते नहीं किसी की तारीफ़।
2) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप
– मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
– नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
3) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
– चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
– नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
– नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
– आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
4) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
5) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
– अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
– अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
– अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..!!

स्टीफेन हॉकिंस का निधन

काँच के झरोखे
अगर
दुखः-सुखः भरी इस जिंदगी की
कोई खिङकी खुली रह गई
तब मिल जाते हैं ,
हजार झाँकनेवाले।
अक्सर लोग भूल जातें हैं
नियती ने, जीवन ने ……
सबके घरों में काँच के झरोखे लगा रखे हैं।
अौर दुखः-सुखः भी आनी-जानी है।
गवाक्ष से झाँकना छोङ
द्वार पर जा मदद का हाथ बढ़ाअो।
तब बात बने।
A Woman
ख्याल अपना-अपना
एक हीं सागर को देख,
कितने अलग-अलग ख्याल आते हैं।
जब सागर के अथाह जल राशि
में झाँका ……….
उसमें किसी को बस अपनी परछांई दिखी।
किसी को लगा – बङा खारा यह समुंदर है।
तभी पास खङे परिचित वृद्ध सज्जन नें ,
समुद्र को नमन किया
अौर कहा –
ये तो लक्ष्मी के उत्पति दाता हैं।
किवदंति ( Mythology )
दैत्य, असुर तथा दानव अति प्रबल हो उठे। तब उन पर विजय पाने के लिये विष्णु जी के सुझाव पर क्षीर सागर मथंन कर उससे अमृत निकाला गया।
मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया। स्वयं भगवान श्री विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखकर उसका आधार बने। समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला।महादेव जी उस विष को पी लिया किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ कहते हैं। उनकी हथेली से थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया था जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया।
इसके पश्चात् फिर से समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी निकलीं। साथ हीं कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा , ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष , रम्भा नामक अप्सरा , वारुणी , चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष, शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य, अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।
समय मौन है !
समय गूंगा नहीं
बस मौन है,
वक्त , वक्त पर बताता है,
किसका वक्त है
अौर
किसका कौन है!
Unknown
समय का गुल्लक
बरसों से बचा बचाकर समय के पल इकट्ठे किए थे।
उन्हे मन में जोड़कर कई दिन भी बना लिए
और सोचा था जब समय आएगा ……
तब दिल खोलकर इन पलों को खर्च करूँगी,
घूमूंगी, जियूँगी , जो जी चाहेगा वही करूँगी…
आज मन पक्का करके तोड़ा उन
पलों के गुल्लक, तब पता चला ..
जो बीत गया वह बीत गया .
बीता “समय” वर्तमान में नहीं चलता…

Unknown
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