रास्ते कहां खत्म होते हैं ज़िन्दगी के सफ़र में…
मंज़िल तो वही है जहां ख्वाहिशें थम जाएं…!!
Unknown
William Wordsworth was spot on when he said “Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquility.” When my pen meets the paper, it always captures the many moods and their wild swings and emotions and their detours which overflows from my heart spontaneously into the paper transmogrifying into verses!!
Unknown
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो,
प्रकृति दुल्हन का रूप धर
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी,
तब चैत्र-शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय-गान सुनाया जायेगा…
नव संवत्सर १८.०३.२०१८


बिखर आये पतझङ के मौसम में
सूखते….
लाल, पीले, भूरे , शुष्क होते पत्ते
उङते गर्दो-गुबार से धूल धुसरित थे।
तभी गर्म , तेज़ हवा के झोंके ने
अश्वत्थ की ङालियों को हिला दिया
अौर पर्णपाती…. पत्तों का झङना शुरू हो गया।
अद्भुत नज़ारा था –
मृत गोल -गोल, घुमते- नाचते
गिरते, झङते, पीपल के पत्ते मानो
खुशी मनाते…….
सूफी दरवेश नृत्य कर रहे हों ।
मृत्यु वरण करते इन पर्ण -पत्तों में
यह हौसला कहाँ से आया?
कुछ लिखने की कोशिश में
कभी-कभी महसूस होता है,
ऐसा कुछ तो पढ़ा है……….
शायद पहले किसी ने लिखा है……
पर सच तो यह है कि
कविताएं खुद को दोहराती रहती हैं,
अलग-अलग शब्दों ….. भावों…. में।
वैसे हीं जैसे मौसम बदलते हैं,
बार-बार वही गर्मी-सर्दी-बरसात या
मधुमास दोहरा कर आता हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता ब्राजीली कवियत्री मार्था मेरिडोस की “You Start Dying Slowly कविता के लिए नोबल पुरस्कार मिला था जिस का हिन्दी अनुवाद –
1) आप धीरे-धीरे मरने किधीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– करते नहीं कोई यात्रा,
– पढ़ते नहीं कोई किताब,
– सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
– करते नहीं किसी की तारीफ़।
2) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप
– मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
– नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
3) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
– चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
– नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
– नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
– आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
4) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
5) आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:
– नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
– अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
– अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
– अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं..!!


अगर
दुखः-सुखः भरी इस जिंदगी की
कोई खिङकी खुली रह गई
तब मिल जाते हैं ,
हजार झाँकनेवाले।
अक्सर लोग भूल जातें हैं
नियती ने, जीवन ने ……
सबके घरों में काँच के झरोखे लगा रखे हैं।
अौर दुखः-सुखः भी आनी-जानी है।
गवाक्ष से झाँकना छोङ
द्वार पर जा मदद का हाथ बढ़ाअो।
तब बात बने।
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