दोस्त

मै यादों का किस्सा खोलूँ तो,

कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं….

मैं गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं….

अब जाने कौन सी नगरी में, आबाद हैं जाकर मुद्दत से….

मैं देर रात तक जागूँ तो , कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं….

कुछ बातें थीं फूलों जैसी, कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,

मैं शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.

सबकी जिंदगी बदल गयी,एक नए सिरे में ढल गयी,

किसी को नौकरी से फुरसत नही. किसी को दोस्तों की जरुरत नहीं .

सारे यार गुम हो गये हैं.तू” से “तुम” और “आप” हो गये है.

मै गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं….

धीरे धीरे उम्र कट जाती है. जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,

कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है.

और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है .

किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते,

फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते.

जी लो इन पलों को हँस के दोस्त,

फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते.

 

 

.– हरिवंशराय बच्चन

ज़िंदगी के रंग -83

आने वाले कल का

इंतज़ार करते हुए ,

हम भूल जाते हैं

कि आज वही कल है

जिसका इंतज़ार बेसब्री

से हम कल कर रहे थे .

 

ज़िंदगी के रंग – 82

हर सच्चा विचार ……

पॉज़िटिव विचार …….

वह मौन प्रार्थना है

जो जीवन और जीवन का अर्थ बदल देती है .

ज़िंदगी के रंग -81

बड़प्पन है अगर

किसी को छोटा ना

महसूस कराएँ,

ऊँचाइयों पर पहुँच कर भी .

ज़िंदगी के उतार चढ़ाव

में कभी ना कभी

सभी की ज़रूरत पड़ती है.

 

ज़िंदगी के रंग – 80

हौसले जीत से नहीं बढ़ते .

परेशानियों से डरे बिना ,

उन को हराने से बढ़ते हैं .

ज़िंदगी में हमें दूसरों को हराने की नहीं

अपने आप से जीतने से आदत होनी चाहिये.

 

यह कविता किसी अपने के लिये जो दिल के बहुत करीब है।

Image courtesy – Monica

 

 

ज़िंदगी के रंग -79

एक बात ज़िंदगी ने बता दी .

जब आप सच और सिर्फ़ सच बोलते हैं.

गोया साफ़ बोलते हैं.

कम बोलते हैं,पर काम का बोलते है

और आपका काम बोलता है .

तब सारी दुनिया नाराज़गी दिखलाती है .

 

ये सदायें

बरसात में बिन बोए भी

कुकुरमुते निकल आते है,

वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .

पहाड़ों में दी आवाज़ें भी गूँज बन

लौट आती है वापस.

फिर क्यों कभी – कभी ,

किसी किसी को बुलाने पर भी

जवाब नहीं आता ?

कहाँ खो जाती है?

ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

ख़ुद को

हम कई बार खुद को

बिसार देते हैं।

खुद का ख्याल रखना भूल जाते हैं,

अपनों  के लिए अपने-आप को सहेजना है जरुरी।

स्पष्ट सुलझे दिलो-दिमाग अौ मन के लिये

टूट कर बिखरने से खुद को खुद से है संभालना है जरुरी।

सदायें

बरसात में बिन बोए भी

कुकुरमुते निकल आते है,

वैसे ही जैसे बिन बुलाए बरस जाते है बादल .

पहाड़ों में दी आवाज़ें भी

गूँज बन लौट आती है वापस.

फिर क्यों कभी – कभी ,

किसी किसी को बुलाने पर भी जवाब नहीं आता ?

कहाँ खो जाती है ये सदाये…… ये पुकार …… ये लोग ?

एक मुट्ठी इश्क़

एक मुट्ठी इश्क़

बिखेर दो इस ज़मीन पे,

बारिश का मौसम है

शायद मोहब्बत पनप जाए।

 

Unknown