मॉडेल बने किन्नर /ट्रांसजेंडर ( जैसे अर्जुन बने थे वृहनल्ला )

किन्नर   या ट्रांसजेंडर

प्रकृति  में नर नारी के अलावा एक अन्य वर्ग भी है जो न तो पूरी तरह नर होता है और न नारी। जिसे लोग हिजड़ा या किन्नर या फिर ट्रांसजेंडर के नाम से संबोधित करते हैं।  इनमे पुरुष और स्त्री दोनों के गुण एक साथ पाए जाते हैं।

महाकाव्य  महाभारत  में किन्नर

 

 

     अर्जुन अौर उलुपि के पुत्र इरावन को किन्नरों के अराध्य देव माना जाता है।  किवदन्ति है कि पांङवों को महाभारत विजय के लिये एक बलि की जरुरत थी।  इरावन इसके लिये तैयार हो गया। पर बलि से पहले वह विवाह करना चाहता था। अतः कृष्ण ने मोहिनी नाम की नारी का रुप धारण कर इरावन से एक रात  का विवाह रचाया था। विल्लुपुरम मंदिर में अप्रैल और मई में हर साल किन्नर १८ दिन का  धार्मिक त्योहार मनाते हैं।  त्योहार के दौरान,भगवान कृष्ण और इरावन की शादी व इरावन के बलिदान की  कहानी दोहराइ जाती है ।

 

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शिखंडी महाभारत युद्ध में

महाभारत में अर्जुन ने  एक  साल के लिये किन्नर का रुप धारण किया था और अपना नाम वृहनल्ला रख लिया था.   इसी तरह शिखंडी  हिंदू महाकाव्य में एक  किन्नर चरित्र  है । जो पांचाल के राजा द्रुपद का पुत्र अौर पांचाली व धृष्टद्युम्न  का भाई था। शिखंडी ने पांडवों के पक्ष में कुरुक्षेत्र युद्ध में हिस्सा लिया तथा भीष्म की मृत्यु  का कारण बना।

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रामायण में किन्नर-

रामायण के कुछ संस्करणों में लिखा है, जब राम अपने 14 वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या छोड़ने लगे  हैं। तब अपने साथ आ रही प्रजा को वापस अयोध्या लौटने कहते   हैं।

पर 14 साल के बाद लौटने पर किन्नरों को वहीं अपना इंतजार करते पाया। उनकी भक्ति से राम ने खुश हो किन्नरों को वरदान दिया कि उनका आशीर्वाद हमेशा  फलित होगा। तब से बच्चे के जन्म और शादी जैसे शुभ अवसरों के दौरान वे  लोगों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं । 

 

ग्रह अौर टोटके 

  •  बुध को नपुंसक  ग्रह माना गया है। अतः  कुंडली में जब बुध  कमजोर हो तो उस समय किसी किन्नर को हरे रंग की चूड़ियां व साडी दान करनी चाहिए। इससे लाभ होता है।  

  •  मान्यता  है, किन्नरों की दुआएं किसी भी व्यक्ति के बुरे वक्त को  दूर कर सकती हैं। और यदि धन का लाभ चाहते है तो किसी किन्नर से एक सिक्का लेकर अपने पर्स में रखे।

  •    इन्हें   मंगल मुखी कहते है क्योंकि ये केवल मांगलिक कार्यो में ही हिस्सा लेते हैं मातम में नहीं।

इन किन्नरों या ट्रांसजेन्डरो को समाज में बराबरी का दर्जा नहीँ दिया जाता हैं। जबकि हमारे महाकाव्यों में  इनकी विषद चर्चा है। ये शादियों, बच्चे के जन्म में नाच गाने, भीख मांगने और देहव्यापार से ही आजीविका चलाते हैं।  ऐसे में इन में से कुछ को केरल में माडलिंग का अवसर प्रदान किया गया हैं।  ये किन्नर मॉडल हैं – माया मेनन और गोवरी सावित्री। उन्हें मॉडलिंग का कोई अनुभव नहीं है। उनका   कहना है कि सामाजिक संस्था क़रीला के ज़रिए इन्हें यह अवसर मिला। क़रीला केरल में एलजीबीटी समुदाय के लिए काम करने वाली एक संस्था है। 

 

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बंद द्वार ( कहानी )

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                           धोखे और फरेब के बीच उसने जिंदगी काट दी.  इस आस के साथ, कभी तो वह सुधरेगा , कभी तो भगवन से डरेगा. फिर एक दिन ढलती उम्र में उस ने  हिम्मत कर पति से कहा -” मैं छोड़ दूँगी तुम्हे , अगर तुम नहीँ सुधरोगे.” उसे पूरा विश्वाश था , रिटायर होता पति घबरा जायेगा.उम्र की दुहाई देगा और सुधर जायेगा. पति को किसी सोंचा में डूबा और चुप  देख , वह खुश हुई. चलो  तीर निशाने पर लगा हैं. थोड़ी देर पति का कोई  जवाब ना पा कर उसने  नज़रें उठायी । 

वह फोन पर  किसी को अपने घर आने का आमंत्रण दे रहा था और उसके जाने की खुशखबरी सुना  रहा था.

वह सपने देख रही थी कि वह  उसे रोकेगा. माफी माँग भूल सुधार लेगा. 
पर पति ने तर्जनी के इशारे से उसे दरवाजा दिखाया. वह चुपचाप  घर से निकल गई. पीछे से द्वार बंद होने की आवाज़ आई.

 

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जिंदगी के रंग ( कहानी )

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                            पालतू कुत्तों को शाम में अक्सर लोग पार्क में घुमाने और खेलने के लिए लाते है। शाम में मार्केट कॉम्प्लेक्स से लौटते समय, मैं पार्क के पास से गुजर रही थी। तभी मैंने एक अजीब दृश्य देखा। एक बड़ी सी चमकती काले रंग की कार कुछ दूर चौराहे पर रुकी। एक व्यक्ति रुई जैसे सफ़ेद, काली आँखों वाले कुते को ले कर उतरा। उसने लाल रंग के एक बौल को हवा में बहुत दूर उछाला। कुत्ता बौल की तरफ लपका। उत्साह के साथ मुँह में बौल ले कर वापस अपने मालिक की ओर दौड़ा। पर हैरानी की बात थी, कि वह व्यक्ति इस बीच तेजी से कार ले कर जा चुका था। कुत्ता बौखलाया हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था।  

      

                अब अक्सर वह कुत्ता मार्केट के खाने-पीने की दुकानों के पास मुझे दिख जाता था। पर एक अद्भुत बात  थी। रोज़ शाम के समय ठीक उसी चौराहे पर बैठा दिखता। शायद उसे अपने मालिक का इंतज़ार था। मेरी नज़रें रोज़ आते –जाते उस स्वामिभक्त स्वान पर चली जाती। मैं श्वान प्रेमी नहीं हूँ। पर उसे देख मेरा दिल कचोट उठता  था। कुछ समय बाद परिस्थितिवश मुझे दूसरे शहर जाना पड़ा।  

                 वर्षों बाद मैं अपने घर वापस  आई। बाजार जाते समय अपने आप नज़रें चौराहे की ओर चली गई। कुत्ते का कहीं पता नहीं था। वहाँ पर एक वृद्ध, बीमार सा दिखने वाले  भिखारी ने डेरा जमा लिया था। मेरे मन में ख़्याल आया – वह खूबसूरत प्यारा सा  कुत्ता मर-खप गया होगा। कुत्तों की आयु 12-15 वर्ष होती है। मैं तो बीसियों वर्ष बाद लौटीं हूँ।

                     उस दिन मौसम बड़ा सुहाना था। गुलाबी ठंड में पार्क फूलों से भरा था। बच्चे शोर मचाते खेल रहे थे। मैं उसी चौराहे के बेंच पर बैठी मौसम का मज़ा ले रही थी। तभी वह भिखारी आया और नियत स्थान पर टाट बिछा कर बैठ गया। कुछ देर बाद शुद्ध और सभ्य भाषा में मेरा अभिवादन करते हुए कहा – “ नमस्कार, मैं बड़ा भूखा हूँ। कुछ पैसे मिल जाते तो … ।”

         

         मैंने आश्चर्य से उसे देखा। उसने शायद मेरे अनकहे प्रश्न को पढ़ लिया और कहा – “ मैं भिक्षुक नहीं हूँ। मेरा बेटा मुझे यहाँ बैठा कर थोड़ी देर में लौट की बात कह गया है। पर आया नहीं। एक वर्ष से रोज़ उसका हीं इंतज़ार करता हूँ।“ फिर वह विक्षिप्तों की तरह स्वगत बड़बड़ाने लगा – “शायद वह मेरी बीमारी से तंग आ गया था। मेरे ऊपर खर्च भी तो बहुत होता था।” उसने नज़रे उठा कर  ऊपर आकाश की ओर देखा और दोनों हाथों को प्रणाम मुद्रा में जोड़ कर कहा –“ मैंने भी तो अपने पालतु बीमार कुत्ते को ऐसे, यहीं तो छोड़ा था।” 

(यह कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित है। अक्सर लोग अपने पालतू जानवरों को लावारिस छोड़ देते हैं। हम मनुष्य इतने निष्ठुर क्यों हैं ?) 

 

 

छाया चित्र इंटरनेट के सौजन्य से।

 

नागवेणी (कहानी )

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डूबते सूरज की लाल किरणो से  निकलती आभा चारो ओर बिखरी थी. सामने, ताल का रंग  लाल हो गया था.  मैं  अपनी मोबाईल से तस्वीर लेने लगी. डूबते सूर्य किरणों के साथ  सेल्फी लेने की असफल  कोशिश कर रही थी. पर तस्वीर ठीक से नहीं आ रही थी. तभी पीछे से आवाज़ आई – ”  क्या मैं आपकी मदद कर सकती हूँ ? “चौक कर पलटी तो सामने एक खुबसूरत , कनक छडी सी, आयत नयनो वाली श्यामल युवती खड़ी थी.

मैंने हैरानी से अपरिचिता को देखा और पूछा  – “आप को यहाँ पहले नहीं देखा. कहाँ से आई है?और  मोबाईल उसकी ओर  बढ़ा दिया . उसने तस्वीरें खींचते हुये कहा – कहते हैं , डूबते सूरज के साथ तस्वीरें नही लेनी चाहिये. मैं भी अस्ताचल सूर्य के साथ अपनी तस्वीर लिया करती थी. फ़िर गहरी नज़रों से उसने मुझे  देखते हुये मेरे मन की बात कही – बडे कलात्मक लगते  है न ऐसे फोटो? मैंने हामी में सिर हिलाया.

फ़िर  मुस्कुराते हुए दूर गुजरती हुए राजमार्ग की  ओर इशारा करते हुए कहा -”  मैं वहाँ रहती हूँ. मैं तो आपको रोज़ देखती हूँ. आप सुबह मेरे आगे ही  तो योग अभ्यास करती है. मेरा नाम  नागवेणी  है , पर यह नाम आप पर ज्यादा जंचेगा . आपकी नाग सी लम्बी , मोटी , बल खाती चोटी मुझे बड़ी आकर्षक लगती है. अब  उसकी बातों का सिलसिला ख़त्म ही नहीं हो रहा था मान  ना मान मैं तेरी मेहमान  वाली उसकी अदा से मैं  बेजार होने लगी थी. योग निद्रा कक्षा में जाने का समय होते देख मैंने उस से विदा लिया.

अगली शाम मैं हरेभरे वृक्षों के बीच बनी राह से गुजरते हुये अपने पसंदीदा स्थल पर पहुँची.  पानी के झरने की मधुर कलकल और  अस्तगामी सूर्य के लाल गोले के सम्मोहन में डूबी थी.  तभी , मधुर  खनकती आवाज़ ने मेरा ध्यान भंग कर दिया. नागवेणी बिल्ली की तरह दबे पैर ,  ना जाने कब मेरे बगल में आकर खड़ी हो गई थी.

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उसकी लच्छेदार गप्पों का सिलसिला फ़िर से शुरू हो गया. अचानक उसने पूछा -आप यहाँ कब से आई हुई हैं ?”आप चित्रकारी भी करती हैं ना ? आपकी लम्बी , पतली अंगुलियों को देख कर ही मैं समझ गई थी कि यह किसी कलाकार की कलात्मक अंगुलियाँ हैं . डूबते सूर्य की पेंटिंग बनाईये ना”. उसने मेरे बचपन के शौक चित्रकारी की बात छेड़ कर  गप्प में मुझे शामिल कर लिया . मैंने कहा -” हाँ , चित्रकारी कभी मेरा प्रिय  शगल था. अब तो यह शौक छूट गया है.

उसकी बात का जवाब देते हुये मैंने मुस्कुराते हुये कहा -“तीन दिनों पहले इस नेचर क्योर इन्स्टिट्यूट में आई हूँ अभी एक सप्ताह और रहना है. यहाँ चित्रकारी का सामान ले कर नहीँ आई हूँ “.मेरी मुस्कुराहट के जवाब में मुस्कुराते हुये  उस ने अपने पीठ की ओर मुडे दाहिने हाथ को सामने कर दिया. मैंने अचरज से देखा. उसने लम्बी ,पतली, नाजुक उँगलियों में चित्रकारी के सामान थाम रखे  थे. मैंने झिझकते हुये कहा – ” मैं तुम्हारा सामान नहीं ले सकती”.

“हद करती हैं आप , मुझसे दोस्ती तो कर ली , अब इस मामूली से सामान से इनकार क्यों कर रही हैं? देखिये , मेरे दाहिने हाथ में चोट लगी हैं.  इसलिये मैं भी चित्र नहीं बना पा रहीं हूँ”. दूर गुजरते नेशनल हाईवे की ओर इशारा करती  हुये बोली – “एक महीने पहले , 14 जनवरी को  ठीक वहीं , सड़क पार करते समय दुर्घटना में मुझे चोट लग गई थी.  अभी आप ही इसे काम में लाइये.

मैंने उसे  समझाने की कोशिश की – ” देखो नागवेणी, ना जाने क्यों , अब पहले के तरह चित्र बना ही नहीँ पाती हूँ.  एक  -दो बार मैंने कुछ बनाने की  कोशिश भी की थी. पर आड़ी -तिरछी लकीरों में उलझ कर रह गई .”आप शांत मन से चित्र बना कर तो देखिये. फ़िर देखियेगा अपनी कला का जादू. अपने आप ही आप की उँगलियाँ खुबसूरत  चित्रकारी करने लगेंगी”  नागवेणी ने रहस्यमयी आवाज़ में कहा और बच्चों की तरह खिलखिला कर हँसने लगी. मैं भी उसकी शरारत पर हँसने लगी.

मैंने अपनी और  नागवेणी की ढेरों सेल्फी ली और वहीं एक  चट्टान पर बैठ कर तस्वीरें उकेरने लगी.  तभी किसी ने मेरे पीठ पर हाथ रखा.  मुझे लगा नागवेणी हैं. पलट कर देखा. मेरे पड़ोस के कमरे की तेज़ी खड़ी थी. उसने पूछा – “आप अकेले यहाँ क्या कर रहीं हैं ? फ़िर मेरे हाथों मॆं पकड़े  चित्रों को देख प्रसंशा कर उठी.  सचमुच बड़े सुंदर चित्र बने थे. नागवेणी ने ठीक ही कहा था. शायद यह मेरे शांत मन का ही कमाल था. पर नागवेणी चुपचाप चली क्यों गई ? मैने तेज़ी से पूछा – “तुमने नागवेणी को देखा क्या “? तेज़ी ने बताया कि वह नागवेणी को नहीं पहचानती हैं.

अगले दो दिनों में मैंने ढेरों खुबसूरत चित्र बना लिये थे. यह सचमुच जादू ही तो था. इतने  सुंदर और कलात्मक चित्र मैंने आज़ से पहले नहीं बनाये थे. मुझे नागवेणी को चित्र दिखाने की बड़ी चाहत हो रही थी. पर उस से मुलाकात ही नहीं हो  रहीं थी. इतनी बडे , इस प्रकृतिक चिकित्सालय में सब इतने व्यस्त  होते हैं कि मिलने का समय निकालना मुश्किल हो जाता हैं. मैने बहुतों से नागवेणी के बारे में पूछा पर कोई उसके बारे में बता नहीं पाया. बात  भी ठीक हैं, इतने सारे लोगो के भीड़ में सब  को पहचानना मुश्किल हैं.

रात मॆं  टहलने के समय दूर नागवेणी नज़र आई .मैंने उसे पुकारा. पर वह रुकी नही. मै दौड़ कर उसके पास पहुँची और धाराप्रवाह अपनी खुबसूरत चित्रकारी के बारे में बताने लगी. मैने हँस कर कहा -” तुमने तो जादू कर दिया हैं नागवेणी. दो दिन कहाँ व्यस्त हो गई थी “.नागवेणी ने मेरे बातों का जवाब नही देते हुये कहा – मैं भी बहुत सुंदर चित्र बनाती थी.  मैने अपनी कला तुम्हे उपहार में दे  दी हैं. तुम मेरे साथ दोस्ती निभाओगी  ना ? तुम मुझे बड़ी अच्छी लगती हो.

उसकी बहकी बहकी बातें सुन मैंने नजरे उसके चेहरे पर डाली. उसने उदास नजरो से मुझे देखा और कहा – ” अब तो तुम वापस जाने वाली हो  पर मैं तुमसे मिलने आती रहुँगी.

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पत्तों पर किसी के कदमों की चरमराहट सुन मैंने पीछे देखा. तेजी मुझे आवाज़ दे रही थे. मैने नागवेणी की कलाई थाम कर कहा -“चलो , तुम्हे तेज़ी से परिचय करा दूँ. फरवरी महीने के गुलाबी जाडे  में नागवेणी की कोमल कलाई हिम शीतल थी. मैंने घूम कर तेज़ी को आवाज़ दिया. तभी लगा मेरी हथेलियों से कुछ  फिसल सा गया.

तेज़ी ने पास आते हुये पूछा – ” इतनी रात में आप अकेले यहाँ क्या कर रही हैं ? मैने पलट कर देखा. नागवेणी का कहीँ पता नहीँ था. मुझे उस पर बड़ी झुंझलाहट होने लगी  बड़ी अजीब लड़की हैं. कहाँ चली गई इतनी जल्दी ?

उस दिन मैं लाईब्रेरी मॆं बैठी चित्र बना रही थी. तेजी अपने मोबाईल से तस्वीरें लेने लगी. जाने से पहले सभी एक दूसरे के फोटो और फोन नम्बर लेना चहते थे. तभी टेबल  के नीचे रखे पुरानेअख़बार की एक तस्वीर जानी पहचानी लगी . मैंने उसे हाथों मॆं उठाया और मेरी अंगुलियाँ काँप उठी . ठंढ के मौसम मॆं ललाट पर पसीने की बूँदें झलक उठीं. मैंने अख़बार की तिथि पर नज़रें डाली.

  लगभग एक महीने पुरानी , जनवरी के अख़बार मॆं एक अनजान युवती के शव को शिनाख्त करने की अपील छपी थी. जिसकी मृत्यु  14 जनवरी को  राज़ मार्ग पर किसी वाहन से हुए दुर्घटना  से हुई थी. यह तस्वीर नागवेणी की थी. मैंने अपनी पसीने से भरी कांपती हथेलियों से मोबाईल निकाली. अपनी और नागवेणी की तस्वीरों को देखने लगी.  पर हर तस्वीर मॆं मैं अकेली थी.

मेरे कानों मॆं नागवेणी की आवाज़ गूँजने लगी – मैं भी बहुत सुंदर चित्र बनाती थी.  मैने अपनी कला तुम्हे उपहार में दे  दी हैं. तुम मेरे साथ दोस्ती निभाओगी  ना ?मैं तुमसे मिलने आती रहुँगी.

 

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राम गीता

राम के  निर्देशानुसार  दुखित लक्ष्मण सीता को वन  में छोड़ कर लौटे. तब राम ने उन्हे समझाया  और दार्शनिक  उपदेश दिया. जिसे राम गीता के नाम से जाना गया.

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माँ या सास ( लघु कथा )

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           प्रिया अपनी दूसरी प्यारी सी बेटी के जन्म के बाद अस्पताल से घर लौटी थी.  पति दूसरी बेटी के जन्म के बाद कुछ अनमने दिख रहे थे  प्रिया को ज्यादा घबराहट  सास से सामना करने में हो रहा  था. बेटा को जन्म ना देने के कारण, ना जाने क्या सुनना होगा ?

तभी, प्रिय को उसके पिता ने अपने पास बुला कर बैठाया. शांत और धीर स्वर में बताया कि उसकी माँ, उसकी  नवजात बच्ची को चुपचाप चूहा मारने की दवा चटाना चाहती थी. जिन्हे उन्होंने रोका.

आवक प्रिया को पता ही नहीँ चला, कब उसकी आँखों से आँसू बहने लगे. उसे समझ ही नहीँ आ रहा था कि उसे माँ या सास किस से घबराना चहिये?

 

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रिश्ते – मुँह में राम बगल में छुरी

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सामने में सभी एक दूसरे के तारीफ में मीठी -मीठी बातें करते है. पर पीठ पीछे खुल जाता है शिकवा शिकायतों का पुलंदा.

क्या शतक दर शतक गुलामी की जंजीरों में बँध कर हम ऐसे हो गये है ? मुगलों और अंग्रेजों की चाटुकारिता करते करते यह हमारी आदत बन गई है?

कभी -कभी शक होने लगता है – सच्चे रिश्ते होते हैं या नहीँ ?

 

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फारसी महाभारत राजमनामा ( विरासत )

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आज हम धर्म, जाति और भाषा के झगड़े में घिरी

जिंदगी में ड़ूबे है । पर ऐसे भी लोग हुए है, जो इन

सब से ऊपर उठ कर दुनिया को एक अलग नज़रिये

से देखते थे। अकबर, एक मुस्लिम शासक ने हिंदुओं

के महाकाव्य का फारसी अनुवाद करवाया, जिसमें

हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थ “गीता” भी समाहित है।

फ़तेहपुर सीकरी में एक अनुवाद – गृह की स्थापना

कर 1584-1586 में महाभारत का पहला फारसी

अनुवाद हुआ। इसे नाम दिया गया “राजमनामा”

अर्थात महायुद्ध की एक कहानी। इस अनुवाद की

विशेषता है इसमें महाभारत की घटनाओं के सुंदर

चित्रों का समनव्यय।

 

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केलौग्स चौकोज के साथ खुल जाए बचपन, खिल जाए बचपन ( Blog related topic )

बात कुछ पुरानी है। तब मेरी मेरी दोनों बेटियाँ छोटी-छोटी थीं। छोटे से बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करना कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, यह एक माँ ही बता सकती है। कुछ ऐसी ही मेरे भी कहानी है।

तब दोनों बेटियाँ स्कूल में पढ़तीं थी। मैं भी नौकरी करती थी। इसलिए सुबह घर में बड़ी भाग -दौड़ रहती थी। दोनों को तैयार करना, टिफ़िन देना, फिर उन्हें नाश्ता करवा कर समय पर रवाना करना बहुत बड़ा काम होता था। इसके साथ हीं मुझे भी तैयार होना पड़ता था। ताकि मुझे अपने स्कूल जाने में देर ना हो जाये।

इन बातों का मतलब यह है कि तब सुबह का हर पल मूल्यवान होता था। किसी छोटे बच्चे की माँ को मैनेजमेंट के कोर्स में पढ़ाये जानेवाले समय प्रबंधन और बहुकार्य या मल्टीटास्किंग सिखाने की जरूरत नहीं होती है। वह छोटे बच्चों के पीछे भाग-भाग कर अपने आप सब सीख जाती है। कुछ वही हाल मेरा भी था। इन सारे कामों में सबसे कठिन काम था दोनों को नाश्ता करवाना और दूध पिलाना। रोज़ दोनों दूध नहीं पीने के किसी नए बहाने के साथ तैयार मिलतीं।

तभी मुझे मेरे एक सहेली नें केलौग्स चौकोज का नया पैकेट दिखाया। उसने बताया कि यह बच्चों को यह बड़ा पसंद आता है। मैंने पैकेट पर लिखे पोषण तत्वों को ध्यान से पढ़ा। इस पर लिखे विटामिन ए, सी, प्रोटीन, कैल्सियम, आयरन और कैलोरी की जानकारी पढ़ कर मैं खुश हो गई। इसमें चाकलेट का स्वाद और मिठास भी थी। बस, मैं बाज़ार से तुरंत एक पैकेट केलौग्स चौकोज खरीद कर ले आई। मन हीं मन खुश हो रही थी, चलो अब बेटियों को स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता देना आसान हो गया। समय की बचत और बच्चों का मनपसंद नाश्ता भी, मतलब एक पंथ दो काज।

अगली सुबह खुशी-खुशी मैंने दो बॉल में दूध दिया और उस पर केलौग्स चौकोस डाले। पर यह क्या? दोनों बेटियों ने नई चीज़ देख कर मुँह बना लिया। मेरे तो होश उड़ गए। मैंने उनके लिए कुछ और नाश्ता बनाया ही नहीं था और अब कुछ और  बनाने का समय भी नहीं था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था अब क्या करूँ? तभी मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने उन्हे एक कहानी सुनाना शुरू किया – राजा रानी की कहानी । मैंने उनसे कहा, दूर एक देश है। जिसे इग्लैंड या यूनाइटेड किंगडम कहते हैं। वहाँ आज भी राजा-रानी और राजकुमार होते हैं। यह केलॉग्स राजा रानी और राजकुमारों के देश से आया है। मैंने कनखियों से देखा वे ध्यान से कहानी सुन रहीं थी। मैंने चम्मच से खिलाना शुरू किया और फिर धीरे से चम्मच उनके हाथों में पकड़ा दिया। दोनों को स्वाद पसंद आया। तभी छोटी बेटी पूछ बैठी -” मम्मी, क्या वहाँ का राजकुमार भी यह केलॉग्स चौकोज़ खाता है।” अब दोनों के प्रश्न खत्म ही नही हो  रहे थे, पर नाश्ता झट से खत्म हो गया। मेरे जान में जान आई। अब तो दोनों केलॉग्स चौकोज़ को राजकुमार वाला नाश्ता ही बुलाने लगीं और बिना नाज़-नखरा अपने से मांग कर खाने लगीं।

वास्तव में मैंने कहीं पढ़ा था कि केलॉग्स का सबसे बड़ा कारखाना यूनाइटेड किंगडम के ट्रैफर्ड पार्क, मैनचेस्टर में है और केलॉग एक रॉयल वारंट रखती है, जो उसे एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस ऑफ वेल्स से प्राप्त हुआ था। इसे हीं कहानी बना कर मैंने उन्हें सुना दिया था।

अब दोनों बेटियाँ बड़ी हो कर इंजीनियर बन चुकी हैं। बड़ी बेटी को मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद, अभी हाल में विदेश जाने का अवसर मिला। वह वहाँ से मेरे लिए अनेक विदेशी उपहार  ले कर लौटी और साथ में ले कर आई केलौग्स चौकोज का डब्बा। उसने हँस कर मुझ से कहा – ” मम्मी, राजकुमारों वाला केलौग्स चौकोज  उसके हीं देश से ले कर आई हूँ। मेरी  आँखों के सामने उनके  बचपन के  “खुशी के  पल” नाच उठे।

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किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

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नयना का सपरिवार बनारस घूमने का पहला अवसर था। दोनों बेटियों और पति के साथ बड़ी कठिनाइयों से यह कार्यक्रम बन पाया था। सुबह, सबसे पहले गंगा स्नान कर वे चारो विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा-अर्चना किया। बनारस के विभिन्न मंदिरों और पर्यटन स्थलों को घूमने में दो दिन कैसे निकल गए, उसे पता हीं नहीं चला।

यहाँ आ कर नयना को, पिंजरे से आज़ाद परिंदे जैसा अहसास हो रहा था। उसे वापस घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। अतः उसने काशी प्रवास और बढ़ा लिया। काशी आ कर गंगा में नौका विहार नहीं किया तो यात्रा अधूरी होगी। जबकी, उसके पति को रुकने का मन बिलकुल नहीं था।

नयना की शादी कम उम्र में हो गई थी। तब उसकी पढ़ाई भी अधूरी थी। ससुराल वाले और पति उसे काम करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। विशेष कर उसकी जेठानी उसे बड़ा परेशान करती थी। नयना का अकर्मण्य, मोटा पति हितेश, अक्ल से भी मोटा था। अतः भाभी के आँचल के पल्लू से बंधा रहता। भाभी सुगमता से अपने देवर को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती। वह अपनी कमाई से मात्र सौ रुपए नयना को देता और बाकी सारी कमाई माया यानि भाभी के कालिमायुक्त, कलुषित चरणों में चढ़ा देता। ना जाने छोटी कुटिल आँखों वाली कदर्य माया भाभी में नयना के पति को क्या सौंदर्य दिखता था।

तब तक नयना से अनजाने में भूल हो गई। एक-एक कर वह दो पुत्रियों की जननी बन गई। सारा ससुराल उससे नाराज़ हो गया। पुत्रवती भाभी का जादू उसके मूढ़ पति के सर चढ़ कर बोलने लगा। घर का सारा धन और पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे माया को चढ़ावा में चढ़ता गया। नयना जब पति को बेटियों के भविष्य के बारे में समझाना चाहती, उसका पति उसके ऊपर तरह-तरह के दोष मढ़, नयना से नाराज़ हो, माया भाभी के साथ कोप भवन में चला जाता था।

नयना ने जेठ की तरफ एक दो बार आशापूर्ण निगाहों से देखा। पर कुछ काम ना करनेवाले जेठ अपनी पत्नी की योग्यता से बड़े प्रभावित थे। जिसने सोने की अंडा देनेवाली मुर्गी अर्थात नयना के सरकारी पदाधिकारी, पति को अपने वश में कर रखा था। नयना ने जहां भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, कोरे आश्वासन के अलावा कोई मदद नहीं मिली। तब नयना ने सारे अत्याचार, बेटियों के भविष्य की वजह से झेलना स्वीकार कर लिया। नयना ने अपनी पढ़ाई बड़ी कठिनाईयों से पूरी की तथा  नौकरी करने लगी। जिस से बेटियों की पढ़ाई ठीक से चल सके। पर पति और माया भाभी का तोता- मैना प्रेम कथा प्रकरण चलता रहा।

ऐसी  कालिख की कोठारी से दो-तीन दिन के लिए बाहर निकल कर नयना को बड़ी शांती मिल रही थी। मान्यतानुसार शिव की त्रिशूल पर बसा बनारस, शांति और आध्यात्म की नगरी है। जहां ज्योतिर्लिंग, शक्ति पीठ और गंगा एक साथ हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक है। नयना, गलियों में बसे बनारस के अनोखे आकर्षण में उलझ कर रह गई। बनारसी और रेशमी कपड़ों के अद्भुत संसार  जैसे उसे एक नई दुनिया में ले गए । गंगा तट पर सैकड़ो घाट है। नौका विहार के समय नाविक सारे घाटों के बारे में बतला रहा था। तभी नयना के पति को माया भाभी का फोन आया।

किनारे माणिकर्णिका घाट नज़र आ रही थी। जहाँ अनेकों चिताएँ जल रहीं थीं। नयना ने किनारे दिख रहे एक आलीशान भवन के बारे में जानना चाहा। नाविक ने बताया कि यह डोम राजा का महल है। डोम राजा पारंपरिक रूप से शमशान घाट के कर्ता-धर्ता और स्वामी होतें हैं। साथ हीं वे श्मशान में चिताओं को दिया जानेवाली अग्नि के  संरक्षक होते है। उसके अनुमति से अग्नि प्राप्त की जाती है और चिता जलाया जाता है। यह परंपरा राजा हरिश्चंद्र के समय से चल  रही है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार एक चाण्डाल ने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद अपना दास बना लिया था। वह चांडाल मणिकर्णिका घाट का स्वामी था। उसने राजा हरिशचंद्र को इस घाट पर अन्त्येष्टि करने वाले लोगों से “कर” वसूलने का काम दिया था।

जलती चिताओं को देखते हुए, नयना के पति ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि नयना ने पुत्रजननी न बनने का अक्षम्य अपराध किया है। अतः मरने पर उन्हें कोई आग देनेवाला नहीं है। माया भाभी एक बड़ा उपकार करने के लिए तैयार है। नयना और हितेश  के  मरने पर उनकी  चिता को आग माया भाभी अपने पुत्र से दिलवा देगी। बदले में अभी अपनी सारी चल-अचल संपाति माया के पुत्र के नाम करना होगा। माया भाभी चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये। इसलिए हमें तत्काल वापस लौटना होगा।

नयना  और उसकी  युवा बेटियाँ हैरान उस कलुषित हृदय के व्यक्ति का चेहरा देख रहीं  थीं। नयना को  ख़्याल आया कि अभी तो मैं जिंदा हूँ। फिर मेरे अग्नि संस्कार की जल्दी  क्यों? और माया अपने पुत्र से  किराये ले कर  अग्नि दिलवाने के लिए क्यों तैयार है? इसके पीछे मात्र धन की लालसा है या कुछ और सत्य छुपा है ? दो लायक, होनहार और सुंदर इंजीनियर पुत्रियों का पिता इतना निर्दयी, नासमझ और नीच हो सकता है क्या? सिर्फ इसलिए कि वे बेटियाँ हैं? क्या वे बेटियाँ पिता को इस व्यवहार के लिए  क्षमा कर पाएँगी?

कहते हैं जाति और उसके साथ जुटे कर्म, जन्म से प्राप्त होते हैं। पर यहाँ तो अपनी ही स्वार्थी और लालची जननी, माया भाभी ने अपने पुत्र के नये  कर्म  को नियत कर दिया था – एक श्मशान चांडाल की रूप में।नयना ने सोंचा,  अगर अगली बार बनारस दर्शन का अवसर मिला, तब माणिकर्णिका घाट पर या डोम राजा के विशाल प्रासाद के नीचे मायावी माया भाभी का होनहार सुपुत्र चिता में आग देने के लिए, हाथों में अग्नि मशाल ले, किराये का पुत्र बनने को तत्पर दिखेगा। पुत्रविहीन माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए किराये का पुत्र सरलता से उपलब्ध होगा। किराये के बोर्ड पर लिखा होगा उसके किराये के रेट।

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वर्षों बाद नयना को पुनः बनारस जाने का अवसर मिला है। पुरानी सारी बातें चलचित्र की तरह याद आने लगीं। उसे एक बार पुनः माणिकर्णिका घाट देखने की कामना हो रही थी। वह घाट जहाँ पार्वती जी ने अपने कान की मणी छुपाई थी, ताकि यायावर और घुमक्कड़ शिव उसे खोजतें रहें  और उनके साथ पार्वती को ज्यादा वक्त व्यतित करने का अवसर मिल सकें।

नयना ने अपने मणी का भी यहीं परित्याग किया था। वह पति के साथ उसकी आखरी यात्रा थी। उसके बाद वह बेटियों के साथ उनके नौकरी के स्थान पर चली गई थी और फिर कभी हितेश के पास वापस नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद उड़ती -उड़ती खबरें ज़रूर सुनने में आईं थीं कि माया भाभी ने सारे रुपये और जायदाद ले कर, हितेश को उसके ही घर से बाहर कर दिया था.
अभी वह गलियों से गुजर कर घाट की ओर बढ़ रही थी कि उसके कदम थम गए। दोनों बेटियों और दामाद ने देखा, सामने अर्ध विक्षिप्त भिक्षुक के रूप में हितेश भिखारियों की पंक्ति में बैठा है।

 

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