यादें धुंधली पड़ती हैं समय के साथ,
आंखों की रोशनी धुंधली पड़ती है समय के साथ,
पर
यादों से
तारीखे क्यों नहीं धुंधली पड़ती?
जिंदगी के किताब से?
ना जाने क्यों हम खोलते हैं ,
दफ्न पन्नों और बंद किताबों को बारंबार ।




श्रद्धांजलि Tribute to my husband 12.10.2018
I lost him in an accident. We donated his eyes. I am sure he is still here, watching this beautiful world.
जब देखा तुम्हें,
शांत, नींद में डूबी बंद आँखें
शीतल चेहरा …..
चले गए ऐसा तो लगा नहीं.
वह पल, वह समय, वह दिन ….
लगा वहीं रुक गया।
वह ज़िंदगी के कैलेंडर का असहनीय दिन बन गया .
उस दिन लगा –
ऐसा क्या करूँ कि तुम ना जाओ?
कुछ तो उपाय होगा रोकने का.
रोके रखने का, लौटाने का ……
कुछ समझ नहीं आ रहा था.
कुछ भी नहीं ….
पर इतना पता था –
रोकना है, बस रोकना है .
तुम्हें जाने से रोकना है .
और रोक भी लिया ………
अब किसी भी अजनबी से मिलती हूँ
तब उसकी आँखों में देखतीं हूँ ….
कुछ जाना पहचाना खोजने की कोशिश में .
कहीं तुम तो नहीं …….
शायद किसी दिन कहीं तुम्हें देख लूँ.
किसी की आँखों में जीता जागता .
बस दिल को यही तस्सली है ,
तुम हो, कहीं तो हो, मालूम नहीं कहाँ ?
पर कहीं, किसी की आँखों में.
हमारी इसी दुनिया में.
या क्षितिज के उस पार ………?
श्रद्धा सुमन हैं ये अश्रु बिंदु
जो लिखते वक़्त आँखों से टपक
इन पंक्तियों को गीला कर गए .

कहते हैं- सुबह का भूला,
शाम को लौट आए तो …
लौटने का इंतज़ार करते रहे.
पर वह शाम आती हीं नही.
गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करनी है,
ऐ ऊपर वाले!!

Rumi ❤
किताब-ए-ज़िंदगी
का पहला सबक़ सीखा,
रिश्तों को निभाने के लिए,
अपनों की गिलाओ पर ख़ामोशी के
सोने का मुल्लमा चढ़ना अच्छा है.
पर अनमोल सबक़ उसके बाद के
पन्नों पर मिला –
सोने के पानी चढ़ाने से पहले
देखो तो सही…
ज़र्फ़….सहनशीलता तुम्हारी,
कहीं तुम्हें हीं ग़लत इल्ज़ामों के
घेरे में ना खड़ा कर दे.

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