
हमारी बेटियां
कल की हमारी छुई-मुई बेटियां अचानक बड़ी हो जाती है…
अब वो रसोई संभालती है और रिश्ते भी,
बच्चे संभालती है और काम-काज भी।
कई हसरतों को दिल में क़ैद कर,
मुस्कान को इबादत बना लेती है।
कई बार अपनी ख़्वाहिशों को दरकिनार कर,
परिवार के अरमान संजों देती है।
थकान को चादर की तह में छुपाकर,
दर्द की तहरीर दिल में दबाकर,
लबों पर दुआ सजा लेती है।
वो आँचल में अमन की ख़ुशबू बसाए,
हर रोज़ ख़ुद को भूलकर भी
अपनी दुनिया सँवार लेती है।
कल की हमारी छुई-मुई बेटियाँ
अचानक बड़ी हो जाती है…