हमारी बेटियां

कल की छुई-मुई बेटियां कब बड़ी होकर घर-परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर उठा लेती हैं, पता ही नहीं चलता। डॉ. रेखा सहाय की यह मर्मस्पर्शी कविता बेटियों के त्याग, ममता और उनके अटूट साहस को एक भावपूर्ण सलाम है। जरूर पढ़ें और साझा करें।

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Hamari Betiyan Image

हमारी बेटियां

कल की हमारी छुई-मुई बेटियां अचानक बड़ी हो जाती है…

अब वो रसोई संभालती है और रिश्ते भी,

बच्चे संभालती है और काम-काज भी।

कई हसरतों को दिल में क़ैद कर,

मुस्कान को इबादत बना लेती है।

कई बार अपनी ख़्वाहिशों को दरकिनार कर,

परिवार के अरमान संजों देती है।

थकान को चादर की तह में छुपाकर,

दर्द की तहरीर दिल में दबाकर,

लबों पर दुआ सजा लेती है।

वो आँचल में अमन की ख़ुशबू बसाए,

हर रोज़ ख़ुद को भूलकर भी

अपनी दुनिया सँवार लेती है।

कल की हमारी छुई-मुई बेटियाँ

अचानक बड़ी हो जाती है…

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