चले थे शिकायतों की पोटली ले ज़िंदगी के पास.
हँसी वह और बोली एहसान फ़रामोश ना बनो.
तुम्हारा अपना क्या है?
ज़िंदगी? तन? मन? धन? साँसे?
सब मिला है तुम्हें
दाता से उधार, ऋण में.
बस हिफ़ाज़त से रखो.
जाने से पहले सब वापस करना है.
और गौर से उन्हें भी देखो जिनके पास तुमसे कम है,
पर वे खुश तुमसे ज़्यादा है.
Image courtesy – Aneesh