ज़िंदगी के रंग -73

बाहर जाने का रास्ता खोजती

काँच और असली खुली

खिड़की की मृग मरिचिका

में उलझी काँच पर सर पटकती

कीट या मक्षिका  को देख कर क्या

नहीं लगता कि हम भी अक्सर

ऐसे ही किसी उलझन में फँस

किसी भ्रम के पीछे

सिर पटकते रहते हैं ?

19 thoughts on “ज़िंदगी के रंग -73

  1. ऐसा वाक़ई होता है रेखा जी । और इस बात से मुझे फ़िल्म ‘धुंध’ का एक गीत याद आ गया जो मुझे बहुत प्रिय है – ‘उलझन सुलझे ना, रस्ता सूझे ना, जाऊं कहाँ मैं जाऊं कहाँ’ ।

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    1. बहुत आभार जितेंद्र जी .
      धुँध मेरी पसंदीदा फ़िल्म है और इस गाने का भावार्थ बिलकुल मेरी कविता के भाव की तरह है . उलझन में डूब हम खुली खिड़की भी नहीं पहचान पाते .

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