गुलाबों जैसी हंसी

उसकी

गुलाबों जैसी हंसी

मीठी मधुर

जो बिखेरती है

इत्र….जैसी खुशबू

हर अोर।

 आंखें सूरज सी

जीवन की सुगंध अौर

 सुबह की ताज़गी से भरी….

शुकून देती है।

4 thoughts on “गुलाबों जैसी हंसी

  1. आपके इन शब्दों ने मुझे एक बहुत पुरानी फ़िल्म – ‘फूल बने अंगारे’ (1963) में स्वर्गीय मुकेश जी का गाया हुआ यह अत्यंत लोकप्रिय गीत स्मरण करा दिया (सम्पूर्ण गीत ही प्रस्तुत कर रहा हूँ) :

    चाँद आहें भरेगा, फूल दिल थाम लेंगे
    हुस्न की बात चली तो सब तेरा नाम लेंगे

    ऐसा चेहरा है तेरा, जैसे रोशन सवेरा
    जिस जगह तू नही है, उस जगह है अंधेरा
    कैसे फिर चैन तुझ बिन तेरे बदनाम लेंगे
    हुस्न की बात…

    आँख नाजुक सी कलियाँ, बातें मिसरी की डलियाँ
    होठ गंगा के साहिल, ज़ुल्फें जन्नत की गलियाँ
    तेरी ख़ातिर फ़रिश्ते सर पे इल्ज़ाम लेंगे
    हुस्न की बात…

    चुप ना होगी हवा भी, कुछ कहेगी घटा भी
    और मुमकिन है तेरा, ज़िक्र कर दे खुद़ा भी
    फिर तो पत्थर ही शायद ज़ब्त से काम लेंगे
    हुस्न की बात…

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    1. बहुत शुक्रिया इस ख़ूबसूरत गीत के लिए और मेरी कविता का सम्मान बढ़ाने के लिए .

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