आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

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(यह कहानी बच्चों को बॉडी क्लॉक और इच्छा शक्ति के बारे में जानकारी देती है। यह कहानीबच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कहानी बतलाती है कि, बाल मनोविज्ञान को समझते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अच्छी बातें सरलता से सिखलायी जा सकती हैं। सही तरीके और छोटी-छोटी प्रेरणाओं की सहायता से बच्चों को समझाना बहुत आसान होता है। यह कहानी इन्ही बातों पर आधारित है। बाल दिवस – १४ नवंबर, के अवसर पर ।)

नन्हा आशु थोड़ी देर पहले ही जागा था। वह कमरे से बाहर आया, तभी उसने दादी को बाहर से आते देखा। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा- “अरे, तू जाग गया है?” आशु ने पूछा- दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ गई थी? दादी ने कहा- “मैं रोज़ सुबह मंदिर जाती हूँ बेटा। ये ले प्रसाद।” दादी ने उसके हथेली पर बताशे और मिश्री रख दिये। आशु को बताशे चूसने में बड़ा मज़ा आ रहा था। यह तो नए तरह की टाफ़ी है। उसने मन ही मन सोंचा।

उसके मन में ख्याल आया कि अगर वह दादी के साथ मंदिर जाए, तब उसे और बताशे-मिश्री खाने के लिए मिलेंगे। कुछ सोचते हुए उसने दादी से पूछा – ‘दादी, मुझे भी मंदिर ले चलोगी क्या?” दादी ने उसे गौर से देखते हुए कहा –“तुम सुबह तैयार हो जाओगे तो जरूर ले चलूँगी।‘ दादी पूजा की थाली लिए पूजा-घर की ओर बढ़ गईं। “दादी मेरी नींद सुबह कैसे खुलेगी? बताओ ना”- आशु ने दादी की साड़ी का पल्ला खींचते हुए पूछा। तुम रोज़ सुबह कैसे जाग जाती हो?

दादी ने हँस कर पूछा-“और बताशे-मिश्री चाहिए क्या?” आशु ने सिर हाँ में हिलाया। दादी ने उसके मुँह में बताशे डाल कर कहा – ‘मेरे तकिये में जादुई घड़ी है बेटा। वही मुझे सुबह-सुबह जगा देती है। अगर तुम्हें सुबह जागना है। तब रात में मुझ से वह तकिया ले लेना। सोते समय सच्चे मन से तकिये को अपने जागने का समय बता कर सोना। वह तुम्हें जरूर जगा देगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखना। रात में देर तक मत जागना। क्यों दादी?– आशु ने पूछा। दादी ने जवाब दिया – “वह इसलिए ताकि तुम्हारी नींद पूरी हो सके। वरना तकिये के जगाने के बाद भी तुम्हें बिस्तर से निकलने का मन नहीं करेगा।“

आशु मम्मी-पापा के साथ दादा-दादी के पास आया था। उसके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही थी। वह दादी के जादुई तकिये की बात से बड़ा खुश था क्योंकि उसे रोज़ सुबह स्कूल के लिए जागने में देर हो जाती थी। जल्दीबाजी में तैयार होना पड़ता। मम्मी से डांट भी पड़ती। कभी-कभी स्कूल की बस भी छूट जाती थी।

रात में वह दादी के पास पहुँचा। बड़े ध्यान से उनके बिस्तर पर रखे हुए तकियों को देख कर सोंच रहा था – इनमें से कौन सा तकिया जादुई है? देखने में तो सब एक जैसे लग रहे हैं। तभी मम्मी ने पीछे से आ कर पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो आशु? तुम्हारा प्रिय कार्टून कार्यक्रम टीवी पर आ रहा है।“ आशु ने जवाब दिया – “नहीं मम्मी, मैं आज देर रात तक टीवी नहीं देखूंगा। आज मुझे समय पर सोना है।“ मम्मी हैरानी से उसे देखती हुई बाहर चली गईं।

आशु ने दादी की ओर देखा। दादी ने एक छोटा तकिया उसकी ओर बढ़ाया और पूछा – “तुमने खाना खा लिया है ना?” आशु ने खुशी से तकिये को बाँहों में पकड़ लिया और चहकते हुए कहा –“हाँ दादी। मैंने खाना खा कर ब्रश भी कर लिया है दादी।“ वह अपने कमरे में सोने चला गया। वह तकिये को बड़े प्यार से सवेरे जल्दी जगाने कह कर सो गया।

अगले दिन सचमुच वह सवेरे-सवेरे जाग कर दादी के पास पहुँच गया। दोनों तैयार हो कर मंदिर चले गए। मंदिर में एक बड़ा बरगद का पेड़ था। बरगद के लंबी-लंबी जटाएँ जमीन तक लटकी हुईं थीं। पेड़ पर ढेरो चिड़ियाँ चहचहा रहीं थी। बगल में गंगा नदी बहती थी। आशु को यह सब देखने मे बड़ा मज़ा आ रहा था। दादी नदी से लोटे में जल भरने सीढ़ियों से नीचे उतर गईं। आशु बरगद की जटाओं को पकड़ कर झूला झूलने लगा। दादी लोटे में जल ले कर मंदिर की ओर बढ़ गईं। आशु दौड़ कर दादी के पास पहुँच कर पूछा – ‘दादी तुम मेरे लिए जल नहीं लाई क्या?” दादी मुस्कुरा पड़ी। उन्होंने पूजा की डलिया से एक छोटा जल भरा लोटा निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। वह दादी का अनुसरण करने लगा। पूजा के बाद दादी ने उसे ढेर सारे बताशे और मिश्री दिये।

आशु दादी के साथ रोज़ मंदिर जाने लगा। जादुई तकिया रोज़ उसे समय पर जगा देता था। दरअसल आशु को सवेरे का लाल सूरज, ठंडी हवा, पेड़, पंछी, नदी, प्रसाद और मंदिर की घंटिया सब बड़े लुभावने लगने लगे थे। आज मंदिर जाते समय दादी ने गौर किया कि आशु कुछ अनमना है। उन्हों ने आशु से पूछा – आज किस सोंच मे डूबे हो बेटा?” आशु दादी की ओर देखते हुए बोल पड़ा – “दादी, अब तो मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो रही है। घर जा कर मैं कैसे सुबह जल्दी जागूँगा? मेरे पास तो जादुई तकिया नहीं है।‘

दादी उसका हाथ पकड़ कर नदी की सीढ़ियों पर बैठ गईं। दादी प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहने लगी – “आशु, मेरा तकिया जादुई नहीं है बेटा। यह काम रोज़ तकिया नहीं बल्कि तुम्हारा मन या दिमाग करता है। जब तुम सच्चे मन से कोशिश करते हो , तब तुम्हारा प्रयास सफल होता है। यह तुम्हारे मजबूत इच्छा शक्ति का कमाल है। जब हम मन में कुछ करने का ठान लेते है, तब हमारी मानसिक शक्तियाँ उसे पूरा करने में मदद करती हैं। हाँ आशु, एक और खास बात तुम्हें बताती हूँ। दरअसल हमारा शरीर अपनी एक घड़ी के सहारे चलता है। जिससे हम नियत समय पर सोते-जागते है। हमें नियत समय पर भोजन की जरूरत महसूस होती है। जिसे हम मन की घड़ी या बॉडी क्लॉक कह सकते हैं। यह घड़ी प्रकृतिक रूप से मनुष्यों, पशुओं, पक्षियों सभी में मौजूद रहता है। इसे अभ्यास द्वारा हम मजबूत बना सकतें हैं।“

आशु हैरानी से दादी की बातें सुन रहा था। उसने दादी से पूछा –“ इसका मतलब है दादी कि मुझे तुम्हारा तकिया नहीं बल्कि मेरा मन सवेर जागने में मदद कर रहा था? मैं अपनी इच्छा शक्ति से बॉडी क्लॉक को नियंत्रित कर सवेरे जागने लगा हूँ?” दादी ने हाँ मे माथा हिलाया और कहा – “आज रात तुम अपने मन में सवेरे जागने का निश्चय करके सोना। ताकिया की मदद मत लेना। रात में सोते समय आशु नें वैसा ही किया, जैसा दादी ने कहा था। सचमुच सवेरे वह सही समय पर जाग गया। आज आशु बहुत खुश था। उसने अपने मन के जादुई घड़ी को पहचान लिया था।

40 thoughts on “आशु की जादुई घड़ी ( बाल मनोविज्ञान और बॉडी क्लॉक पर आधारित कहानी ) #ChildrensDay

  1. इस रचना में तो आपकी मनोविज्ञान में शिक्षा तथा कार्य और रचनात्मक लेखन में रुचि दोनों का ही अच्छा समागम हुआ है । यह बहुत अच्छा प्रयास है । इसे अवश्य जारी रखिएगा ।

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    1. बहुत धन्यवाद अमित जी. मनोविज्ञान मेरा प्रिय विषय है. मात्र इसलिये नहीँ क्योंकि मैने पढ़ा है. मेरा मानना है इसे समझ कर बहुत सी बातें अौर समस्याएँ सुलझाई जा सकतीं हैं। मानव मनोविज्ञान जटिल पर रुचिकर विषय है और सारे व्यवहार इससे नियंत्रित होतें हैं।

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  2. बहुत ही अच्छी कहानी है रेखा जी आपकी । अभिनंदन । मैं आपके इस विचार से सहमत हूँ कि मनोविज्ञान एक जटिल किन्तु रुचिकर विषय है एवं मनुष्य के सभी व्यवहार उसकी मनोवृत्तियों से ही संचालित एवं नियंत्रित होते हैं । मनोविज्ञान मेरा भी प्रिय विषय है तथा मैंने इसका बहुत अध्ययन किया है यद्यपि मेरा व्यवसाय कुछ और है ।

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    1. मनोविज्ञान तो ऐसा विषय है , जिसे व्यवहार के अध्ययन से आसानी से जाना और पढ़ा जा सकता है. मेरे विचार में लेखकों में यह योग्यता ईश्वर प्रदत्त होती है. तभी तो चरित्र चित्रण और वर्णन सम्भव होता है. आप किसी भी व्यवसाय में हो इससे फर्क नहीँ पड़ता है.
      मैने आपके लेखों में बहुत अच्छा वर्णन पढ़ा है. मेरी कहानी पढ़ने और पसंद करने के लिये शुक्रिया. 😊

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  3. बहुत ही अच्छी एवं प्रेरक कथा है रेखा जी जिसके लिए आप अभिनंदन की पात्र हैं । मनोविज्ञान मैंने भी खूब पढ़ा है तथा यह मेरा भी प्रिय विषय रहा है । मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि यह एक रोचक विषय है तथा मानव के सभी व्यवहार उसकी मनोवृत्तियों से ही नियंत्रित होते हैं ।

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    1. आपके posts से पत्ता चलता है कि आपको मनोविज्ञान की बहुत अच्छी जानकारी है। तभी आप इतना सुंदर लिखते हैं।
      मुझे बच्चों के लिये लिखना बहुत पसंद है,जिसे मैं बाल मनोविज्ञान से जोङने का प्रयास करती रहती हूँ।
      प्रशंसा के लिये धन्यवाद।

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    1. Thanks a lot Dash ji The tradition of telling /narrating stories to children is quite old.
      The aim behind it was to provide them variou knowledge in an interesting way and may be to live the life of child within us , as you said.. 😊😊

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    1. बहुत शुक्रिया. इस कहानी का प्रयोग वास्तविक जीवन में कर के देखिये. फायदेमंद पयेँगी. 😊

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