जहाँ खारा पानी बिकता है # mumbaislum ( कविता )

वह भी रहती हैं वहाँ

जहां खारा पानी बिकता है।

दरिद्र, पति परित्यक्ता,

दस बच्चों के साथ,

दशकों पुरानी अपनी

बावड़ी का जल  बाँट कर

कहती है –“ पानी बेच कर क्या जीना?

क्या पूजा सिर्फ मंदिरों और मस्जिदों में ही होती है ?

यह इबादत का  उच्चतम सोपान नहीं है क्या?

 (मुंबई, मानखुर्द बस्ती में जहाँ गर्मी में लोग पानी खरीद रहे हैं। वहाँ ज़रीना अपनी पुरानी बाबड़ी का द्वार सभी के लिए खोल रखा है। ) news from daily – HINDU, pg – 2 dated may 12 2016.

 

9 thoughts on “जहाँ खारा पानी बिकता है # mumbaislum ( कविता )

    1. शुक्रिया सागर जी , यह कविता जून में मैंने लिखा था. ना जाने कैसे यह ड्राफ्ट में पड़ा था. कल मैंने इसे पोस्ट किया.

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      1. हाँ अमित जी, यह सच्ची समाचार पर आधारित है। कविता पसंद करने अौर हौसला अफजाई के लिये धन्यवाद।

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