वह भी रहती हैं वहाँ
जहां खारा पानी बिकता है।
दरिद्र, पति परित्यक्ता,
दस बच्चों के साथ,
दशकों पुरानी अपनी
बावड़ी का जल बाँट कर
कहती है –“ पानी बेच कर क्या जीना?
क्या पूजा सिर्फ मंदिरों और मस्जिदों में ही होती है ?
यह इबादत का उच्चतम सोपान नहीं है क्या?
(मुंबई, मानखुर्द बस्ती में जहाँ गर्मी में लोग पानी खरीद रहे हैं। वहाँ ज़रीना अपनी पुरानी बाबड़ी का द्वार सभी के लिए खोल रखा है। ) news from daily – HINDU, pg – 2 dated may 12 2016.
Bahut hi sunder rachna… Ppl like jareena has kept humanity alive
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Very true buddy. I wrote this poem in the month of June / summer. Somehow it wasn’t posted. Today I saw it in draft.
Kavita Pasand karne ke liye dhanyvaad. 😊
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..
बहुत खूब रेखा जी,
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शुक्रिया सागर जी , यह कविता जून में मैंने लिखा था. ना जाने कैसे यह ड्राफ्ट में पड़ा था. कल मैंने इसे पोस्ट किया.
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bahut hi sundar jo dil ko chhu jaye , sach ka aayna dikhati ye kavita ..
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हाँ अमित जी, यह सच्ची समाचार पर आधारित है। कविता पसंद करने अौर हौसला अफजाई के लिये धन्यवाद।
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😊😊😊
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Keep smiling.
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😊
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