रंगीली ( कहानी )

 

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रंगीली और रंजन की जोड़ी नयनाभिराम थे। रंगीली के सौंदर्य में कशिश थी। बड़े-बड़े खूबसूरत नयन, दमकता चेहरा, लंबी – छरहरी देहयिष्टि। लगता था विधाता ने बड़े मनोयोग से गढ़ा था। पर रंजन का व्यक्तित्व उससे भी प्रभावशाली था। लम्बी-चौड़ी, बलशाली काया, काली आँखों में एक अनोखा दर्प , उनके गोद में होती उनकी परी सी सुंदर पुत्री एंजले। अभिजात्यता की अनोखी छाप पूरे परिवार पर थी। उनकी आंग्ल भाषा पर जबर्दस्त पकड़ थी। दोनों के दोनों ऐसी अँग्रेजी बोलते थे। जैसे यह उनकी मातृ भाषा हो। पर जब उतनी ही शुद्ध संस्कृत बोलना- पढ़ना शुरू करते। तब देखने और सुनने वाले हक्के बक्के रह जाते।

उनके कम उम्र और सात्विक रहन-सहन देख लोग अक्सर सोंच में पड़ जाते। इतनी कम उम्र का यह राजा-रानी सा जोड़ा इस आश्रम में क्या कर रहा है? जहाँ वृद्धों और परिवार के अवांछनीय परित्याक्तों की भीड़ है। अनेकों धनी, गण्यमान्य और विदेशी शिष्यों की भीड़ इस जोड़े के निष्ठा से प्रभावित हो आश्रम से जुटने लगी थी । आश्रम के विदेशी ब्रांचो में गुरु महाराज इन दोनों को अक्सर भेजते रहते थे। गुरु महाराज को मालूम था कि ये विदेशों में अपनी प्रभावशाली अँग्रेजी से लोगों तक बखूबी भारतीय दर्शन को पहुँचा और बता सकते हैं। सचमुच शांती की खोज में भटकते विदेशी भक्तों की झड़ी आश्रम में लग गई थी।

दोनों को देख कर लगता जैसे कोई खूबसूरत ग्रीक सौंदर्य के देवी-देवता की जोड़ी हो। बड़ी मेहनत और लगन से दोनों मंदिर का काम करते रहते। उनका मंदिर और गुरु महाराज के प्रति अद्भुत और अनुकरणीय श्रद्धा देख अक्सर गुरु महाराज भी बोल पड़ते –‘ दोनों ने देव योनि में जन्म लिया है। इन पर कान्हा की विशेष कृपा है। इनका जन्मों-जन्म का साथ है।“
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रंजन के पिता थे नगर के सम्मानीय वणिक और अथाह धन के मालिक। अनेक बड़े शहरों में उनके बड़े-बड़े होटल और मकान थे। ढेरो बसें और ट्रक यहाँ से वहाँ सामान और सवारी ढोते थे। जिसकी आड़ में उनका मादक पदार्थों और ड्रग्स का काम भी सुचारु और निर्बाध्य चलता रहता। अपने काले व्यवसाय को अबाध्य रूप से चलाने के लिए  शहर के आला अधिकारियों और पुलिस वर्ग से उन्होने  दोस्ताना संबंध बना रखे थे। धीरे-धीरे अपने एकलौते पुत्र को भी अपने जैसा व्यवसायपटु बनाने का प्रयास उन्होंने शुरू कर दिया था।

उस दिन शहर में नए पदास्थापित उच्च पुलिस पदाधिकारी के यहाँ उपहार की टोकरियाँ ले जाने का काम उन्होने रंजन को सौपा था। तभी, लगभग आठ- दस वर्ष पहले रंगीली और रंजन पहली बार मिले थे। रंजन ने जैसे हीं उनके ऊँचे द्वार के अंदर अपनी चमकती नई लाल कार बढाई। तभी नौसिखिया, नवयौवना  कार चालक, पुलिसपुत्री कहीं जाने के लिए बाहर निकल रही थी। नकचढ़ी रंगीली ने रंजन की नई स्पोर्ट्स कार को पिता के पुलीसिया गाड़ी से रगड़ लगाते हुए आगे बढ़ा लिया था। रंजन का क्रोध भी दुर्वासा से कम नहीं था। पर धक्का मारने वाली के सौंदर्य ने उसके कार के साथ उसके दिल पर भी छाप छोड़ दिया था।

अब बिना पिता के कहे वह गाहे-बगाहे उपहारों के साथ रंगीली के घर पहुँच जाता था। अगर रंगीली से सामना हो जाता। तब रंजन मुस्कुरा कर उससे पुछता – “ आज मेरी कार में धक्का नहीं मारेंगी? रंगीली तिरछी नज़र से उसे  देखती, खिलखिलाती हुई निकल जाती। रंजन को लगता जैसे आज उसका जीवन सफल हो गया।

रंजन के पिता ने शायद माजरा भाँप लिया था। पर उन्हें इससे कोई ऐतराज नहीं था। न हिंग लगे ना फिटकिरी और रंग चोखा। इसी बहाने पुत्र व्यवसाय पर ध्यान तो देने लगा। उन्हें सिर्फ पत्नी की ओर से चिंता थी। जो वैरागी बनी हर वक्त पूजा-पाठ, आश्रम और गुरु में व्यस्त रहती। अक्सर घर में झुंड के झुंड साधु – संत कीर्तन करते रहते। कभी नवरात्री का नौ दिन अखंड कीर्तन चलता । कभी राम और कृष्ण का जन्मदिन मनता रहता। सभी किरतनिया दूध, फल, मेवा, फलहारी घृत पकवान और नए वस्त्र पाते रहते। घर शुद्ध घी, कपूर, धूप, हवन और सुगंधित अगरबतियों के खुशबू से तरबतर रहता। अखंड भंडारा का द्वार सभी के लिए खुला रहता।

रंजन के पिता को पत्नी का यह तामझाम पसंद नहीं था। पर वे एक होनहार व्यवसाई की तरह इस में से भी अपना फायदा निकाल लेते थे और सम्मानीय अतिथियों को आमंत्रित करने के इस सुअवसर का भरपूर फ़ायदा उठाते थे। ऐसे ही अवसरों पर रंगीली का परिवार भी आमंत्रित होने लगा। गुरु महाराज के सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित रंगीली के परिवार ने भी उनसे दीक्षा ले ली। अब रंजन और रंगीली की अक्सर भेंट होने लगी। जिससे दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अब रंजन के छेड़ने पर रंगीली हँस कर कहती – “ सब तो ठीक है, पर तुम्हारी यह पुजारिन, निरामिष माँ मुझे अपने घर की बहू कभी नहीं बनने देगी।“

पर हुआ इसका उल्टा। हर दिन अपराधियों की चोरी पकड़ने वाले पिता ने रंगीली और रंजन के इस रास-लीला को तत्काल पकड लिया। अपनी 14-15 वर्ष की नासमझ पुत्री की हरकत उन्हें नागवार गुजरी। उन्होंने भी अपना पुलिसवाला दाव-पेंच आजमाया। नतीजन, अचानक उनके तबादले का ऑर्डर आया। सामान बंधा और रातों – रात वे परिवार के साथ दूसरे शहर चले गए। जैसा अक्सर इस उम्र की प्रेम कथा के साथ होता है, वैसे ही इस कमसिन तोता-मैना की अधूरी प्रेम कहानी के साथ भी हुआ। बुद्धिमान पिता ने इस कहानी पर पूर्णविराम लगा दिया।
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20-21 वर्ष की रंगीली के पिता ने बड़े जतन से होनहार और योग्य दामाद की खोज शुरू की। सबसे पहले वे पहुँचे गुरु महाराज के पास। गुरु महाराज ने रंगीली के जन्म की जानकारी मांगी और जल्दी ही उसकी कुंडली बनाने का आश्वासन दिया। कुंडली बन कर आई। उच्चपद और उच्चकुल वरों के यहाँ हल्दी-अक्षत लगी कुंडली और सुंदर पुत्री की तस्वीरें, अथाह दहेज के आश्वासन के साथ जाने लगीं। पर ना-जाने क्यों कहीं बात हीं नही बन रही थी।

दुखी हो कर वे फिर गुरु आश्रम पहुँचे। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु महाराज ने व्यथित और चिंतित पुत्रिजनक के माथे पर अनगिनत चिंता की लकीरें देखीं। तब सांत्वना देते हुए बताया कि उनकी पुत्री की कुंडली के अष्टम घर के भयंकर मांगलिक दोष है। शनि भी लग्न में हैं। सारे ग्रह कुंडली में ऐसे स्थापित हैं कि राहू और केतु के अंदर हैं। अर्थात कालसर्प दोष भी है।

पुलिसिया दावपेंच में पारंगत रंगीली के पिता कुंडली ज्ञान में शून्य थे। अतः उन्होंने गुरु महाराज के चरण पकड़ कर कुछ उपाय जानना चाहा। जीवन भर रुपए की महिमा से हर काम निकालने वाले दुखित पिता ने यहाँ भी ईश्वर को चढ़ावा पहुँचा कर काम निकालना चाहा। गुरु महाराज ने कुपित नज़र से देख कर कहा- “ईश्वर को सिर्फ चढ़ावा से नहीं खुश किया जा सकता है।“ चिंतित पिता ने गुरु महाराज के सामने रुपयों की गड्डियों का ढेर रख दिया। नए निर्माणाधीन मंदिर का पूर्ण व्यय वहन करने का वचन दे डाला और अनुरोध किया कि पुत्री के त्रुटीपुर्ण कुंडली का भी वैसे ही आमूलचूल परिवर्तन कर दें, जैसे वे अक्सर अपराधियों के फाइलों में हेरफेर करते अौर उन्हें बेदाग, कानून की पकड़ से बाहर  निकाल देते हैं।

गुरु महाराज ने करुण दृष्टि से उन्हें ऐसे देखा, जैसे माँ, आग की ओर हाथ बढ़ाते अपने अबोध और नासमझ संतान को देखती है। फिर विद्रुप भरी मुस्कान के साथ उन पर नज़र डाली और कहा – “देखिये वत्स, मैं ऐसे काम नहीं करता हूँ। आपकी मनोकामना पूर्ण करनेवाले अनेकों ज्ञानी पंडित मिल जाएँगे। पर कुछ ही समय बाद जब आपकी राजदुलारी सफ़ेद साड़ी में आपके पास वापस लौट आएगी। तब क्या उसका वैधव्यपूर्ण जिंदगी आपकी अंतरात्मा को नहीं कचोटेगी?

 

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रंगीली के पिता जैसे नींद से जाग उठे। अपनी नासमझी की माफी मांगते हुए वह कुटिल, कठोर और उच्च ओहदा के अभिमान में डूबा पिता, गुरु महाराज के चरणों में लोट गया। वे आँखों में आँसू भर कर उपाय की याचना करने लगे। गुरु जी ने मृदुल-मधुर स्वर में बताया कि सबसे अच्छा होगा, कुंडली मिला कर विवाह किया जाये। पुत्री के सौभाग्यशाली और सुखी जीवन के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण है। पद, ओहदा, मान सम्मान जैसी बातों से ज्यादा अहमियत रखती है पुत्री का अखंड सौभाग्य।

गुरु महाराज ने उन्हें एक उपयुक्त वर के बारे में भी बताया। जिससे उनकी पुत्री की कुंडली का अच्छा मिलान हो रहा था। वह वर था रंजन। परिवार जाना पहचाना था। ऊपर से गुरु महाराज की आज्ञा भी थी। किसी तरह की शंका की गुंजाईश नहीं थी। पर अभी भी उच्चपद आसीन दामाद अभिलाषी पिता, बेटी के बारे में सशंकित थे। पता नही उनकी ऊँचे पसंदवाली, नखड़ाही पुत्री, जो प्रत्येक भावी योग्य वारों में मीनमेख निकालते रहती थी। उसे व्यवसायी रंजन और उसका अतिधार्मिक परिवार पसंद आयेगा या नहीं? पहले के नासमझ उम्र की प्रेम लीला की बात अलग थी।स्वयं उन्हें भी किसी उच्च पदासीन, उच्च शिक्षित दामाद की बड़ी आकांक्षा थी।

तभी गुरु महाराज ने उनकी रही-सही चिंता भी दूर कर दी। गुरु महाराज ने उनसे कहा –“ मुझे लगता है, रंगीली और रंजन का विवाह, उनका प्रारब्ध है। अतः मैं उन दोनों से स्वयं बात करना चाहता हूँ। आगे ईश्वर इच्छा। अगले दिन सुबह शुभ पुष्य नक्षत्र के समय भावी वर वधू गुरु महाराज के समक्ष आए। एकांत कक्ष में मंत्रणा आरंभ हुई। गुरु महाराज ने बताया कि उनकी दिव्य दृष्टि से उन्हें संकेत मिल रहें हैं कि रंगीली और रंजन एक दूसरे के लिए बने हैं। दोनों का जन्मों – जन्म का बंधन है। फिर उन्हों ने अर्ध खुले नयनों से दोनों को ऐसे देखा जैसे ध्यान में डूबे हों। फिर अचानक उन पर प्रश्नों की झड़ी सी लगा दी – ‘ बच्चों क्या तुम्हारा कभी एक दूसरे की ओर ध्यान नहीं गया? तुम दोनों को आपसी प्रेम का आभास नहीं हुआ? तुम्हे तो ईश्वर ने मिलाया है। हाँ, कुंडली के कुछ दोषों को दूर करने के लिए किसी मंदिर में कार सेवा करने की जरूरत है।

रंगीली और रंजन को अपनी पुराना प्रणय याद आ गया। सचमुच ईश्वर किसी प्रयोजन से बारंबार दोनों को आमने –सामने ला रहें हैं क्या? दोनों गुरु महिमा से अभिभूत हो गए। तुरंत उनके चारणों में झुक मौन सहमती दे दी। दोनों के परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई। तत्काल वहीं के वहीं गुरु महाराज के छत्रछाया में दोनों की सगाई करा दी गई।

कुंडली के क्रूर ग्रह, राहू और केतू की शांती के लिए गुरु जी ने सुझाव दिया – “शिवरात्री के दिन किसी शिव मंदिर में रंगीली और रंजन से काल सर्प पूजान  करवाना होगा। आंध्र प्रदेश के श्री कालहस्ती मंदिर, या भगवान शिव के बारह ज्योतृलिंगों में कहीं ही इस पुजन को कराया जा सकता है।“

आँखें बंद कर थोड़े देर के मौन के बाद गुरु जी ने नेत्र खोले। सभी को अपनी ओर देखता पा कर उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान छा गई। हँस कर उन्हों ने पुनः कहा – आप लोग चिंतित ना हों। ईश्वर तो हर जगह विद्यमान है। आप किसी भी मंदिर में यह पूजा करवा सकते है। चाहें तो यहाँ भी पूजा हो सकती है। यह मंदिर भी आपका हीं है। यहाँ तो मैं स्वयं सर्वोत्तम विधि से पूजा करवा दूंगा।“ मंदिर में भोग का समय हो रहा था। गुरु महाराज उठ कर अपने पूजा कार्य में व्यस्त हो गए। रंगीली और रंजन का परिवार एक साथ माथा से माथा  मिला कर काल सर्प पूजा कहाँ हो इसकी मंत्रणा करने लगे।

दोनों नव सगाई जोड़ा बड़े आम्र वृक्ष के ओट में अपने पुराने बचकाने प्रेम की याद में डूब गया। हमेशा मौन की चादर में लिपटी रहनेवाली रंजन की माँ ने पहली बार मुँह खोला- “ देखिये, गुरु महाराज हमलोगों के शुभचिंतक है। उन्हें किसी प्रकार का लालच नहीं है। वर्ना वे हमें अन्य मंदिरों के बारे में क्यों बताते? मेरा विचार है, पूजा इस मंदिर में गुरु जी से करवाना उचित होगा। बड़े-बड़े मंदिरों में पुजारी कम समय में आधे-अधूरे विधान से पूजा करवा देंगे और हम समझ भी नहीं सकेंगे।“

नई समधिन के सौंदर्य पर रीझे रंगीली के रसिक पिता बड़े देर से उनसे बातें करने का अवसर खोज रहे थे। इस स्वर्ण अवसर का उन्होंने तत्काल लाभ उठाया और  तुरंत अपनी सहमती दे दी। गुरु जी की शालीनता और निस्वार्थता से सभी अभिभूत हो गए। फिर तो बड़ी तेज़ी से घटनाक्रम ठोस रूप लेता गया। विवाह आश्रम के मंदिर में हुआ। उस के बाद नव युगल जोड़े ने अपना मधुयामिनी अर्थात हनीमून भी आश्रम में ही मनाया।

दोनों परिवारों की विपुल धन राशी के समुचित उपयोग का ध्यान रखते हुए नव विवाहित जोड़े की लंबी विदेश मधुयामिनी यात्रा हुई। लगभग एक महीने बाद दोनों  उपहारों से लदे घर वापस लौटे। विदेश में उनका ज्यादा समय गुरु निर्देशानुसार विभिन्न आश्रमों में  बीता। अतिधर्मभीरु रंजन अपनी माँ की तरह  अति धार्मिक था। शौकीन और पिता की दुलारी पुत्री रंगीली, प्रणय  क्षणों के लिए तरस कर रह गई।

रंगीली ने अपने और अपने  अल्पशिक्षित पति की सोच-समझ में जमीन आसमान का अंतर देख  हैरान थी। हनीमून की खूबसूरत यात्रा को उसके पति ने धार्मिक तीर्थयात्रा में बदल दिया था। पर संध्या होते रंजन अक्सर गायब हो जाता था। एक दिन वह भी रंजन के पीछे-पीछे चल दी। पास के बार में उसने रंजन को मदिरा और बार बाला के साथ  प्रेममय रूप में देख, वह सन्न रह गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रंजन का कौन सा रूप सच्चा है। 

विदेश से लौटने तक दोनों में अनेकों बार नोक-झोंक हो चुका था। दोनों अपने ठंढे मधुयामिनी से  वापस लौटे। रंगीली उदास और परेशान थी। उनके  साथ में आया आश्रम के विदेशी शाखाओं में नए बने शिष्यों की लंबी सूची। जिसने  सभी में खुशियाँ भर दी। किसी का ध्यान रंगीली की उदासी पर नहीं गया।

विदेशी शिष्यों की संख्या बढ़ने से रंजन और रंगीली की जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं। अतः दोनों अपना काफी समय आश्रम में देने लगे। साल बितते ना बितते दोनों माता-पिता बन गए। प्यारी-प्यारी पुत्री एंजेल पूरे आश्रम और रंजन – रंगीली के पूरे परिवार का खिलौना थी। गुरु महाराज के असीम कृपा से दोनों परिवार कृतज्ञ था।

एक दिन, जब दुखित और व्यथित रंगीली ने गुरु महाराज से रंजन के विवेकहीन चरित्र और व्यवहार के बारे में बताया,  तब उन्होंने उसे समझाया कि यह सब उसके कुंडलीजनित दोषों के कारण हो रहा है। उन्हों ने पहले ही बताया मंदिर में कार सेवा से दोष दूर होगा।अब रंजन और रंगीली,  दोनों अब लगभग आश्रमवासी हो गए थे।रंगीली के पिता भी अब धीरे-धीरे उच्चपदासीन दामाद के ना मिलने के क्षोभ और दुख  से बाहर आने लगे थे।
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शाम का समय था। मौसम बड़ा खुशनुमा था। रिमझिम वर्षा हो रही थी। चारो ओर हरीतिमा थी। हरियाली की चादर पर, पास लगी रातरानी की बेल ने भीनी- भीनी खुशबू बिखेर दी थी। सामने बड़े से बगीचे में रंग बिरंगे फूल आषाढ़ महीने के मंद समीर में झूम रहे थे। आश्रम का पालतू मयूर आसमान में छाए बादल और रिमझिम फुहार देख कर अपने पंख फैलाये नाच रहा था। रंजन और रंगीली अपनी बेटी और पूरे परिवार के साथ आश्रम में अपनी छोटी कुटियारूपी कौटेज के बरामदे में गरम चाय की चुसकियों और गर्मागर्म पकौड़ियों के साथ मौसम का मज़ा ले रहे थे। पाँच वर्ष की एंजेल खेल-खेल में अपने पिता के अति मूल्यवान मोबाईल से नृत्यरत मयूर की तस्वीरें खींच रही थी।

“ क्या जीवन इससे ज्यादा सुंदर और सुखमय हो सकता है? – रंजन ने मुस्कुरा कर पूछा। थोड़ा रुक कर उसने माता-पिता, सास-स्वसुर और अपनी पत्नी पर नज़र डाली और कहा – “कल गुरु पूर्णिमा है। मैंने गुरु जी के लिए स्वर्ण मुकुट और नए वस्त्र बनवाए हैं। मुझे लगता है, कल ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी को उन्हें  उपहार दे कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। खुशहाल और संतुष्ट परिवार ने स्वीकृती दे दी। सुबह-सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक मन से सारा परिवार गुरु महाराज के कक्ष के बाहर पहुंचा। द्वार सदा की तरह खुला था। भारी सुनहरा पर्दा द्वार पर झूल रहा था। पूर्व से उदित होते सूर्य की सुनहरी किरणें आषाढ़ पूर्णिमा की भोर को और पावन बना रहीं थीं। कमरे से धूप की खुशबू और अगरबत्ती की ध्रूमरेखा बाहर आ रही थीं। थोड़ी दूर पर बने मंदिर से घण्टियों की मधुर ध्वनी और शंख की आवाज़ आ रही थी।

गुरु जी के कुटिया के आस-पास पूर्ण शांती थी। दरअसल बहुत कम लोगों को यहाँ तक आने की अनुमति थी। पर रंजन और रंगीली के लिए गुरु जी के द्वार हमेशा खुले रहते थे। अतः दोनों बेझिझक आगे बढ़े। तभी, अंदर से आती किसी की खिलखिलाने और गुरु जी के ठहाके की आवाज़ सुनकर आधा हटा पर्दा रंजन हाथों में अटका रह गया। पर्दे की ओट से पूरे परिवार ने देखा, बिस्तर पर गुरु जी की बाँहों में उनकी निकटतम शिष्या मेनका हँस कर पूछ रही थी – यह सब इतनी सरलता से आपने कैसे किया?

गुरु जी  अपनी अधपकी दाढ़ी सहलाते हुए कह रहे थे – “रंजन और रंगीली के बालपन के प्रणयकेली पर तभी मेरे नज़र पड़ गई थी। इतने वर्षों बाद सही मौका मिलते ही, सात जन्मों का बंधन बता कर उसे मैंने भंजा लिया। आज ये दोनों मेरे लिए सोने की अंडा देनेवाले मुर्गी है। देखती हो, इनकी वजह से मेरे आश्रम में स्वर्ण और धन वृष्टि हो रही है। मेनका तकिये पर टिक, अधलेटी हो कर पूछ रही थी – उन दोनों की कुंडलियाँ कैसे इतनी अच्छी मिल गई। गुरु जी ने एक आँख मारते हुए कहा – “वह तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है मेनका !!!सब नकली है। 

रंजन और रंगीली को लगा जैसे वे गश खा कर गिर जाएँगे। रंजन की माँ के आँखों से गुरु महिमा धुल कर बह रही थी। दोनों के पिता द्वय की जोड़ी हक्की-बक्की सोंच रहे – क्या उनसे भी धूर्त कोई हो सकता है? जीवन भर इतने दाव-पेंच करते बीता और आज ईश्वर जैसे उन्हें दिखा रहें हों – सौ चोट सुनार की और एक चोट लोहार की। ईश्वर के एक ही चोट ने उन्हें उनके सारे कुकर्मों का जवाब सूद समेत दे दिया था। रंगीली के पिता के नेत्रों के सामने उन योग्य, उच्चपद, उच्च शिक्षित वरों का चेहरा नाचने लगा, जो उनकी प्राणप्यारी सुंदरी पुत्री से विवाह के लिए तत्पर थे।

  तभी खटके की आवाज़ से सारे लोग और गुरु जी चौंक गए। नन्ही एंजेल ने खेल-खेल में अपने पिता के मोबाइल से एक के बाद एक ना जाने कितनी तस्वीरें प्रणयरत शिष्या-गुरु के खींच लिए थे।

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मैगी को एक प्रेमपत्र ( व्यंग )

मेरी प्यारी मैगी,

                      प्यार 

                     मेरे जिंदगी तुम्ही से शुरू हुई। पर तुम्हारे साथ खत्म हो, यह नहीं कह सकता। जाने वाले के साथ तो कोई नहीं जाता है न। पर मैं तुमसे इतना जरूर कहना चाहता हूँ कि तुम्हें मैं भूल नहीं पाता हूँ। मेरा तुम्हारा बचपन का प्यार है। मेरी माँ ने मेरा परिचय तुमसे करवाया था। पूरे परिवार और समाज को हमारा प्यार मंजूर था। पर आज वही दुनिया कठोर बन कर हमारे बीच आ गई है।

मुझे आज भी तुम्हारी खूबसूरती याद है। गोरी, बल खाती काया ऊपर से तुम्हारी दो मिनट की फुर्ती। कुछ भी भूल नही पाता हूँ। घर से हॉस्टल जाने पर भी हमारा प्यार कम नहीं हुआ था। कितनी रातें तुम्हारी याद आने पर, वार्डेन से छुप कर, आयरन उल्टा कर उसे हॉट प्लेट बना तुम्हारे लिए पानी उबालता था।

आज तक तुम जैसी कोई मेरी जिंदगी में आई नहीं। पर लगता है यह बेदर्द समाज मेरी जिंदगी में तुम्हारी सौत को लाने की तैयारी में हैं। आज ना कल तुम्हारे जैसी कोई ना कोई हमारे जीवन में आ जाएगी।

आज एक सच्ची बात तुम्हारे सामने कबूल करने जा रहा हूँ। तुम मुझे बड़ी पसंद थी पर ठंड़ी होने पर बड़ी मोटी, भद्दी हो जाती थी। तुम्हारा यह बदसूरत रूप हमारे स्कूल शिक्षिका ने बहुत बार हमें दिखाने की कोशिश की, तुम्हारी ढ़ेरो बुराईयाँ भी की। पर तुम तो जानती हो प्यार अंधा होता है।

तुम्हारा पुराना चाहने वाला

भोजन भट्ट

वेद व्यास कृष्ण द्वयपायन – महाभारत के रचनाकार ( महाभारत की रोचक कथा )

(आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले गुरु पूर्णिमा का प्रसिद्ध पावन  पर्व,  जो वेद  व्यास जी की जयन्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है ( 31 जुलाई 2015))

महाभारत के महान रचयिता वेदव्यास थे । जिन्हें श्याम या कृष्ण  रंग होने और  द्वैपायन द्वीप पर तपस्या  करने के कारण कृष्ण द्वयपायन के नाम से  जाना जाता है।वेदों का भाष्य करने के कारण उन्हें  वेदव्यास कहा गया। वे महाभारत काल के  युग पुरुष थे। उन्हों ने पूरे महाभारत के घटना क्रम को देखा और लिखा है।  उनके जन्म की  कथा अनोखी है।

 किवदंती के अनुसार,   निषाद  पुत्री  मत्स्यगंधा यमुना नदी पर नाव चला कर  पथिकों को पार पहुंचाती थी । उसके शरीर से  मछली की  महक आते रहने के कारण उसे मत्स्यगंधा पुकारा जाता था। 

आषाढ़ पूर्णिमा अर्थात गुरु पूर्णिमा  के शुभ  दिन  पराशर मुनि  उसकी नाव से  यमुना पार कर रहे थे । सुंदरी  मत्यगंधा पर वे मोहित हो गए।रूप आसक्त  मुनि ने उससे संबंध स्थापित करना चाहा। उसे झिझकते देख  त्रिकालदर्शी , ब्रह्मज्ञानी, दिव्य दृष्टि  और ईश्वरांश  मुनि ने  आश्वासन दिया कि इस संबंध से  और उससे उत्पन्न संतान  से उसका  कौमार्य खंडित नहीं होगा। वह कुमारी ही रहेगी।

  अपने तपबल और माया से उन्हों नौका के  चारों ओर  कुहरे का झीना  आवरण फैला   दिया। फलतः  किनारे खड़े लोगों को कुछ नज़र नहीं आया।  मत्स्यगंधा  और उनके संबंध से वेदव्यास का जन्म  तत्काल हुआ।  जो जन्म से वेद वेदांगों में पारंगत थे।

   पराशर मुनि अपने पुत्र को अपने साथ ले कर चले गए। जाने से पहले  मत्स्यगंध के मत्स्य गंध को सुगंध में बदल दिया। जो  योजन तक फैलने लगी  । जिस से वह योजनगंधा  कहलाई और  आगे चल कर सत्यवती नाम से जानी जाने लगी। कुछ समय बाद   भीष्म के पिता राजा शांतनु ने योजनगंधा के रूप और सुगंध से प्रभावित हो कर  उस से विवाह कर लिया। 

क्या सीता जी टेस्ट ट्यूब बेबी थीं ? ( एक विचार )

जनकपुत्री सीता
जनकपुत्री सीता

रामायण महाकथा  के  अनुसार जनक पुत्री  सीता जी उन्हें एक  घड़े   या पात्र   में मिली थीं ।भूमि पुत्री सीता जी के  जन्म के  संबंध में अनेकों किवदंतियाँ है। एक कथानुसार वृहत यज्ञ के बाद  मिथिला नरेश  राजा जनक ने खेतों में हल चलाया। तभी उन को सीता जी खेत में  मिली थीं। खेत जोतने के दौरान उनका   हल या सीत   एक घट से  टकराया, जिसमें तेजोमय , अपूर्व सुंदर कन्या थी।  अतः उन्हें सीता  नाम दिया गया। जिसे उन्होंने गोद लेकर पाला।

एक  अन्य  कथा के अनुसार वे रावण और मंदोदरी पुत्री थीं। विद्वानों ने भविष्यवाणी की, कि सीता  रावण के मृत्यु और लंकादहन  का कारण बनेगी  । अतः रावण ने  मारीच को उन्हें मृत्यु के घाट उतारने का आदेश दिया, पर  तेजोमय कन्या को मारने का साहस न होने के कारण मारीच  उन्हें खेत में   छोड़ लौट गया।

भूमिसुता सीता
भूमिसुता सीता

एक कहानी के अनुसार मिथिला के एक  महत्वपूर्ण मंदिर में पूजा करने के बदले  एक विद्वान ब्राह्मण को  वहाँ के राक्षस को अपना  रक्तान्श, कर के रूप में देना पड़ा। जिसे उस असुर ने  खेत  में   ड़ाल दिया , जहाँ से माता  सीता मिलीं थी। 

रामायण काल के विमान, शक्तिशाली युद्ध अस्त्रा-शस्त्र, जैसी  बातें पहले भले  मात्र कपोल कल्पना  लगती होंगी। पर आज विज्ञान ने इसे हकीकत बना दिया है। तब क्या इसका अर्थ है कि तब विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी?

क्या वैसे ही यह सत्य भी कभी समझ आयेगा? आज के वैज्ञानिक खोज, रीसर्च , प्रयोग  तब के यज्ञ नहीं हो सकते क्या? घट  टेस्ट ट्यूब का दूसरा  रूप  नहीं हो सकता है क्या? महाभारत में भी अनेक ऐसे  आलौकिक जन्म की घटनाएँ वर्णित हैं । 

विश्व जैव विविधता दिवस #The International Day for Biological Diversity (IDB)

 

हमारा पर्यावरण
हमारा पर्यावरण

२२ मई का दिन आज के वैश्विक परीप्रेक्ष में पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण हो गया है। इस दिन को विश्व जैव विविधता दिवस या विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस के रूप में मनाने का निश्चय संयुक्त राष्ट्र ने किया है। इसे अन्तर्राष्ट्रीय पर्व कहा गया है।

यह संसार विविध जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों से भरा है। सभी किसी ना किसी रूप से एक दूसरे से जुड़े है। पर आज बदलते समय और पर्यावरण से छेड़-छाड़ ने प्रकृती पर असर डालना शुरू किया है। बहुत से जीव और पेड़ पौधे लुप्त हो गए और कुछ लुप्त होने की कगार पर हैं। इन्हे बचाने के लिए जागरूकता जरूरी है। अतः यह प्रयास प्रसंशनीय है।

यह प्रकृति हमारे लिए महत्वपूर्ण है। यह बात हमारे गुणी-जनों और ऋषी-मुनियों ने बहुत पहले ही समझ लिया था। इसी लिए नदियों, वनों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों आदि को पूजा और आध्यात्म से जोड़ दिया था। ताकि उनका संरक्षण और सम्मान हो। जिन बातों की आलोचनाएं होती थी। उनका महत्व आज स्पष्ट है। अगर हम आज भी अपनी पुरानी संस्कृती को याद रखें , तब हर दिन ही विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस होगा।

आप्रेशन मुस्कान और आप्रेशन स्माइल

मानव तस्करी कोई नया विषय नहीं है। प्राचीन समय से दास खरीदने-बेचने, गुलाम और बँधुआ रखने की प्रथा रही है। पर आज के सभ्य समाज में इन्सानों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार निंदनीय है। अनपढ़, गरीब, गुमशुदा और कमजोर लोगों को अक्सर इस तरह के जाल में फंसाया जाता रहा है।
इसी प्रकार गमशुदा बच्चों के लिए आप्रेशन स्माइल चलाया जा रहा है।
नेपाल के हालिया भूकंप के बाद ऐसी बातों की संभावना बढ़ जाती है। इसे रोकने के लिए आप्रेशन मुस्कान एक जुलाई से शुरू किया जा रहाहै। यह एक सराहनीय प्रयास है। उम्मीद है उत्तर प्रदेश सरकार  यह काम  सुचारु रूप  करेगी।

हमारी टूटती – बिखरती विरासतें( जागरूकता )

विरासतों को संरक्षित किया जाये या नहीं ? यह चर्चा का विषय है। कुछ लोग पुरानी चीजों पर किए जा रही खर्च को व्यर्थ मान सकतें है। पर विरासतों को संरक्षित करनेवाली विभिन्न संस्थाएं इसके लिए प्रयासरत है। यूनेस्को (UNESCO) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational Scientific and Cultural Organization) अनेक विश्व विरासतों को संरक्षित कर रही है।
कुछ विरासतें प्रकृतिक आपदाओं से नष्ट हो रही है, और कुछ हमारी नादानियों से। युद्ध और आपसी तकरार का आक्रोश निरीह और निर्जीव धरोहरों पर उतारने की नासमझी प्राचीन समय से चला आ

बुद्ध प्रतिमा, साँची स्तूप
बुद्ध प्रतिमा, साँची स्तूप

रहा है। आज भी विभिन्न आतंकी संगठन इस तरह के काम में लगे हैं।
बामियान में बुद्ध के 58 और 38 मीटर ऊँची मूर्तियाँ, 2000 हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता के पलम्यरा के अवशेष जो रेगिस्तान में लगभग 120 एकड़ में फैले है, इराक का हातरा या प्राचीन इराक़ी शहर निमरूद आदि ना जाने कितने धरोहर नष्ट किए जा रहें है।
क्या इस तरह के तोड़-फोड़ को रोका नहीं जाना चाहिए? यह क्षति अपूर्णिया है। ये विरासतें हमारी धरोहर हैं।

चिकेंनकारी – (लखनऊ की नाजुक कशीदाकारी)

यह लखनऊ की जानी-मानी कढ़ाई है। यह मुगक शासकों और नवाबों को बड़ी प्रिय थी। इसे अमीरों की पसंद मानी जाती थी। वास्तव में आज भी जब चिकेंनकारी विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर किया जाता है। तब यह काफी मूल्यवान हो जाता है।

ओरगेंज़ा कपड़े पर बना बारीक  चिकेनकारी
ओरगेंज़ा कपड़े पर बना बारीक चिकेनकारी

किव्दंती– इस कढ़ाई की उत्पत्ति के बारे में अनेक कहानियाँ हैं। ऐसा माना जाता है की मुगल बादशाह जहांगीर की शौकीन और विदुषी पत्नी नूरजहाँ ने इस कढ़ाई की शुरूआत करवाई थी। तब यह प्रायः नफासत और नज़ाकत की पहचान मानी जाती थी। हल्के रंगों के कपड़ों पर शुद्ध धागों से हल्के रंग की नाजुक और बेहद बारीक कढ़ाई की जाती थी। कपड़े भी उत्तम प्रकार के और मूल्यवान होते थे। अतिरिक्त खूबसूरती के लिए सितारे, मोती और दर्पण अलंकार के तौर पर लगाए जाते है।

वर्तमान कशीदाकारी – आज यह लखनऊ की पहचान है। इसकी प्रसिद्धी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी है। आज यह आम जनों के बीच भी लोकप्रिया हो गया है। आज कल यह अन्य सामान्य कपड़ों पर भी बनने लगा है। साथ ही हल्की और सामान्य कढ़ाई भी होने लगा है। जिससे कम मुल्य पर भी ये कपड़े उपलब्ध होने लगा है।

चिकेंनकारी की प्रक्रिया – ऐसा कहा जाता है की इसमें 36 अलग- अलग प्रकार के टांकों का उपयोग होता है। इसमें पहले डिज़ाइन चुना जाता है। फिर उसे कपड़े पर उत्कीर्णन यानि ब्लॉक प्रिंटिंग की सहायता से छापा जाता है। इसके बाद इसे विभिन्न कढ़ाई करने वालों को ये कपड़े धागों के साथ दे दिया जाता है। यह काम आस-पास के अनेकों गाँव में होता है। कढ़ाई पूरी होने पर कपड़े को धोया और पालिश / इस्तरी किया जाता है। तब यह बाज़ार में जाने के लिए तैयार हो जाता है।

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कारीगर – सामान्य और साधारण चिकेंनकारी के कारीगर बहुतायत है। सूफियाना रंगों, बारीक 36 अलग अलग टांकों को मूल्यवान कपड़ों पर बनाने वाले कारीगर बहुत कम हैं। इसलिए आज के समय में इस तरह की कढ़ाई काफी दामी है। विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर बने कढ़ाई अनमोल है, पर उन्हे पहन कर नवाबों जैसा और राजसी अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।

#Spellingbee भरतीय बच्चे और स्पेलिंग बी ( समाचार )

यह सम्मान और खुशी की बात है, कि हमारे देश  के बच्चे विदेशों में भी सफलता के परचम लहरा रहें हैं. अमेरिका में होने वाले अंग्रेजी भाषा के प्रतियोगिता  लगातार पिछले आठ वर्षों से भरतीय मूल के बच्चे जीतते आ रहें है. स्पेलिंग बी अमेरिक की  महत्वपूर्ण और मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता है. यह प्रत्येक वर्ष आयोजित होती है.

इस से यह  बात स्पष्ट हो जाती है कि  हमारे बच्चों में योग्यता की कमी नहीँ है. सही महौल और उचित शिक्षा मिलने पर वे कहीँ भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं. इस वर्ष 13 वर्षीय वन्या और 14 वर्षीय गोकुल ने यह कठिन प्रतियोगिता जीता है. इन दोनो बच्चों को बधाई.