हैलो गौरया (20 मार्च, विश्व गौरया दिवस पर )

हैलो गौरया, आज तुम्हारा दिन है।

कहाँ खो गई थी तुम कि तुम्हें याद करना पड़ता है।
अब तो तुम हर दिन मेरे घर दाना खाने आती हो

पानी पी कर फुर्र से उड़ जाती हो।

शायद हम ने हीं तुम्हारे रहने के जगह छीन लिए है।

वरना तुम तो रोशनदानों और पंखों के ऊपर भी घर

बसा लेती थी। तुम्हारी ची-ची, चूँ-चूँ की झंकार

अच्छी लगती है। छिछले पानी में नहाती हो,

छोटे- छोटे चोंच से अपने पंख संवारती और

सुखाती हो। फिर फुर्र से उड़ जाती हो।

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