जिंदगी की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। बच्चे पढ़ाई में व्यस्त थे। हम पति और पत्नी अपने-अपने नौकरी में खुश थे। पति का जहां भी तबादला होता। वहीं किराए का घर ले कर आशियाना बसा लेते थे। चिड़ियों की तरह तिनका-तिनका सजाने लगते थे।
जिंदगी अच्छी कट रही थी। सिनेमा देखना, बाहर घूमने जाना, गोलगप्पे और चाट खाना, बच्चों के रिजल्ट निकलने पर उनके स्कूल जाना जैसी बातों में मगन थे हम सब। बच्चों की खिलखिलाहटों के साथ हम भी हँसते। उन्हें एक-एक क्लास ऊपर जाते देखना सुहाना लगता। बड़ी बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुँच गई थी। छोटी बेटी भी ऊँची कक्षा में चली गई थी। पढ़ाई का दवाब और खर्च दोनों बढ़ गए थे। बच्चों की हर उपलब्धि मन में खुशियाँ भर देती थी। ये सब खुशियाँ ही इतनी बड़ी लगती कि इससे ज्यादा कुछ चाहत हीं नहीं होती थी। ना हमारे ज़्यादा अरमान थे, ना कोई लंबा चौड़ा सपना था। हम अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा होते देख कर खुश थे।
ऐसे में एक दिन बड़ी बेटी ने पूछा – “मम्मी, हमारा अपना घर कौन सा है? हमें भी तो कहीं अपना घर लेना चाहिए”। मैं और मेरे पति चौंक पड़े। हमारा घर? यह तो हमने सोचा ही नहीं था। किराये के घर को हीं अपना मान लेने की आदत पड़ गई थी। मन में एक बड़ा सपना जाग उठा। एक अपने घर की चाहत होने लगी। पर जब हमने इस बारे में सोचना शुरू किया। तब लगा कि हमारे आय में एक अच्छे घर या फ्लैट की गुंजाइश नहीं है। बच्चों की पढ़ाई में काफी खर्च हो रहा था। घर के और ढेरों खर्च थे। कुछ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी थीं।
काफी सोंच-विचार के बाद हमने बैंक लोन के लिए बात किया। दो कमरे का खूबसूरत प्यारा सा फ्लैट पसंद भी आ गया। पर हर महीने कटने वाला बैंक इन्स्टाल्मेंट हमारे बजट से कुछ ज्यादा हो रहा था। घर के खर्चों में काफी कटौती के बाद भी कठिनाई हो रही थी। कभी-कभी मेरे पति झल्ला उठते। उन्हें लगता कि मैं कुछ ज्यादा बड़ी उम्मीदें पालने लगी हूँ। अपना घर लेना हमारे बूते से बाहर है। तभी मेरे पति की तरक्की हो गई और तनख़्वाह में भी इजाफ़ा हुआ। इससे हमारी समस्या खत्म तो नहीं हुई। पर आसानी जरूर हो गई। हमने फ्लैट बुक कर लिया।
कुछ समय पैसे की थोड़ी खिचातानी और घर के खर्चों में परेशानी जरूर हुई। पर जल्दी ही मालूम हुआ की घर के ऋण पर मेरे पति को आयकर में कुछ छूट मिलेगा और हमारी बैंक इन्स्टाल्मेंट की समस्या लगभग खत्म हो गई। कुछ समय में हमारा फ्लैट मिल गया। गृह प्रवेश की पूजा के दिन आँखों में खुशी के आँसू भर आए। लगा आज हमारा बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया। इस खुशी में एक और बहुत बड़ी खुशी यह थी कि हमारी बड़ी बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो गई थी और उसे वहीं नौकरी मिल गई थी। जहाँ हमारा फ्लैट है। छोटी बेटी का भी वहीं इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। दोनों बहने अपने नए घर में रहने लगीं। हम दोनों भी अक्सर वहाँ छुट्टियां बिताने लगे। अपने घर में रह कर हम सभी कॉ बड़ी आत्मसंतुष्टि होती।
बड़ी बेटी की शादी के बाद हमने घर किराये पर दे दिया है। सच बताऊँ तो, हमारा घर आज हमारा एक कमाऊ सदस्य है। उससे आने वाला किराया हमारे बहुत काम आता है। जब भी अपना घर देखती हूँ। मन में बहुत बड़ी उपलब्धि का एहसास होता है। जल्दी ही पति के रिटायरमेंट के बाद हम अपने सपनों के घर में जाने वालें हैं। मेरे पति अक्सर कहते है- “ यह घर तुम्हारे सपने और सकारात्मक सोंच का नतिज़ा है।
आपके सपनों के बारे में पढ़ कर और उन्हें पूरा होता देख बहुत अच्छा लगा |
मेरी मुबारक स्वीकार कीजिये |
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बहुत धन्यवाद, हम सभी सपने देखते है। सपने पूरे होते होते देखना बहुत अच्छा लगता है।
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बहुत -बहुत धन्यवाद॰
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