(Look Up Stories ) मेरा घर ( blog related)

जिंदगी की गाड़ी ठीक-ठाक चल रही थी। बच्चे पढ़ाई में व्यस्त थे। हम पति और पत्नी अपने-अपने नौकरी में खुश थे। पति का जहां भी तबादला होता। वहीं किराए का घर ले कर आशियाना बसा लेते थे। चिड़ियों की तरह तिनका-तिनका सजाने लगते थे।

जिंदगी अच्छी कट रही थी। सिनेमा देखना, बाहर घूमने जाना, गोलगप्पे और चाट खाना, बच्चों के रिजल्ट निकलने पर उनके स्कूल जाना जैसी बातों में मगन थे हम सब। बच्चों की खिलखिलाहटों के साथ हम भी हँसते। उन्हें एक-एक क्लास ऊपर जाते देखना सुहाना लगता। बड़ी बेटी इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुँच गई थी। छोटी बेटी भी ऊँची कक्षा में चली गई थी। पढ़ाई का दवाब और खर्च दोनों बढ़ गए थे। बच्चों की हर उपलब्धि मन में खुशियाँ भर देती थी। ये सब खुशियाँ ही इतनी बड़ी लगती कि इससे ज्यादा कुछ चाहत हीं नहीं होती थी। ना हमारे ज़्यादा अरमान थे, ना कोई लंबा चौड़ा सपना था। हम अपने छोटे-छोटे सपनों को पूरा होते देख कर खुश थे।

ऐसे में एक दिन बड़ी बेटी ने पूछा – “मम्मी, हमारा अपना घर कौन सा है? हमें भी तो कहीं अपना घर लेना चाहिए”। मैं और मेरे पति चौंक पड़े। हमारा घर? यह तो हमने सोचा ही नहीं था। किराये के घर को हीं अपना मान लेने की आदत पड़ गई थी।
मन में एक बड़ा सपना जाग उठा। एक अपने घर की चाहत होने लगी। पर जब हमने इस बारे में सोचना शुरू किया। तब लगा कि हमारे आय में एक अच्छे घर या फ्लैट की गुंजाइश नहीं है। बच्चों की पढ़ाई में काफी खर्च हो रहा था। घर के और ढेरों खर्च थे। कुछ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी थीं।

काफी सोंच-विचार के बाद हमने बैंक लोन के लिए बात किया। दो कमरे का खूबसूरत प्यारा सा फ्लैट पसंद भी आ गया। पर हर महीने कटने वाला बैंक इन्स्टाल्मेंट हमारे बजट से कुछ ज्यादा हो रहा था। घर के खर्चों में काफी कटौती के बाद भी कठिनाई हो रही थी। कभी-कभी मेरे पति झल्ला उठते। उन्हें लगता कि मैं कुछ ज्यादा बड़ी उम्मीदें पालने लगी हूँ। अपना घर लेना हमारे बूते से बाहर है। तभी मेरे पति की तरक्की हो गई और तनख़्वाह में भी इजाफ़ा हुआ। इससे हमारी समस्या खत्म तो नहीं हुई। पर आसानी जरूर हो गई। हमने फ्लैट बुक कर लिया।

कुछ समय पैसे की थोड़ी खिचातानी और घर के खर्चों में परेशानी जरूर हुई। पर जल्दी ही मालूम हुआ की घर के ऋण पर मेरे पति को  आयकर  में कुछ छूट मिलेगा  और हमारी  बैंक इन्स्टाल्मेंट की समस्या लगभग  खत्म हो गई। कुछ समय में हमारा फ्लैट मिल गया। गृह प्रवेश की पूजा के दिन आँखों में खुशी के आँसू भर आए। लगा आज हमारा बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया।
इस खुशी में एक और बहुत बड़ी खुशी यह थी कि हमारी बड़ी बेटी की पढ़ाई भी पूरी हो गई थी और उसे वहीं नौकरी मिल गई थी। जहाँ हमारा फ्लैट है। छोटी बेटी का भी वहीं इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो गया। दोनों बहने अपने नए घर में रहने लगीं। हम दोनों भी अक्सर वहाँ छुट्टियां बिताने लगे। अपने घर में रह कर हम सभी कॉ बड़ी आत्मसंतुष्टि होती।

बड़ी बेटी की शादी के बाद हमने घर किराये पर दे दिया है। सच बताऊँ तो, हमारा घर आज हमारा एक कमाऊ सदस्य है। उससे आने वाला किराया हमारे बहुत काम आता है। जब भी अपना घर देखती हूँ। मन में बहुत बड़ी उपलब्धि का एहसास होता है। जल्दी ही पति के रिटायरमेंट के बाद हम अपने सपनों के घर में जाने वालें हैं। मेरे पति अक्सर कहते है- “ यह घर तुम्हारे सपने और सकारात्मक सोंच का नतिज़ा है।

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#StartANewLife जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत (blog related ) )

     तब उन्नीस वर्ष की थी मैं । अभी टीन एज के आखरी वर्ष में थी। बड़ी बेफ़िक्री और मस्ती के दिन थे। आई. ए. परीक्षा के रीजल्ट आ गए थे। बड़े अच्छे अंकों से मैं पास हुई थी। अतः बी. ए. में मनचाहे विषय – मनोविज्ञान में प्रवेश मिल गया था। खुशी-खुशी कालेज में बी. ए. में पढ़ रही थी।

तभी अचानक मेरी शादी तय हो गई। शादी के नाम से इतनी खुश थी, जैसे जीवन का सबसे अनमोल खजाना मिल गया हो। नए कपड़े, गहने, सहेलियों की छेड़-छाड़ में सारी खुशियाँ समाई थी। बड़ी-बड़ी आँखों में ढेरो सपने थे।

नई जिंदगी के नए सपनों के साथ ससुराल पहुँची। पर यह क्या? वहाँ तो जीवन का अर्थ ही कुछ और था। बहू यानि काम करने की मशीन। सुबह से रात तक बीसियों लोगों का भोजन बनाना, चाय पिलाना जैसे कामों में दिन कब बीत जाता पता ही नहीं चलता। इसके बाद भी दहेज पर छींटाकशी और उलाहनों का अंत नहीं था। इस जीवन की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। दिन भर किसी की एक मीठी बोली के लिए तरस जाती। इस समय मुझे समझ आया कि मैं माँ बनने वाली हूँ।

तभी बी. ए. के परीक्षा की तिथि निकल गई। पढ़ाई बिलकुल ठप्प थी। कालेज छूट गया था। पर मन के किसी कोने में यह ख्याल था कि मुझे किसी भी हाल में परीक्षा देनी है। परीक्षा के समय माईके जाने का अवसर मिला। बड़ी राहत मिली। लगा माँ को सारी बातें बता कर कुछ उपाय निकलेगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वहाँ से कुछ दिनों के बाद इस आश्वासन के साथ वापस ससुराल भेज दिया गया – घबराओ नहीं। कुछ दिनो में सब अपने आप ठीक हो जाएगा। पर आज तक क्या अपने आप कभी कुछ ठीक हुआ है?

बेटी के जन्म के बाद ससुराल आने पर मुसीबतें और बढ़ गई। साथ में काम भी बढ़ गया। बेटी होने का ताना भी मिलने लगा। घर के कामों में फर्माइशों की लिस्ट बढ़ती गई। यह शायद बेटी के होने की सज़ा भी थी।

मन में अक्सर खयाल आता कि क्या यही मेरी पहचान है? क्या यही मेरा जीवन है? एक बँधुआ मजदूर की तरह खटना और ताने सुनते रहना। रात में यह सब सोंच कर नींद नहीं आती। तब खिड़की के पास खड़े-खड़े ना जाने कितनी रातें बिताईं। आँखों से आँसू बहते रहते।
तभी मेरे बी. ए. का रिजल्ट आ गया। खुशी मिश्रित हैरानी हुई। मैं प्रथम श्रेणी में अच्छे अंकों से पास हुई थी।

तब मैंने अपने नए जीवन के लिए एक निर्णय लिया। एक नई शुरुआत की ओर कदम बढ़ाने का निश्चय किया और मैंने एम. ए. के प्रवेश का फार्म भर दिया। यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में सीमित सीटें थी। पर अच्छे अंक होने की वजह से प्रवेश मिल गया। घर के विरोध, काम के बोझ, उलाहनों और नन्ही सी बिटिया के देख-भाल का बोझ तो था। पर कहतें है – दिल से कुछ करने की चाहत हो तो ईश्वर भी मदद करतें है। उसी ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप मैंने एम. ए. किया। फिर पी. एच. डी. किया। आज मैं दो प्यारी बेटियों की माँ, एक सफल गृहणी और कालेज शिक्षिका हूँ। मेरे उस एक निर्णय ने मेरी जिंदगी बदल दी। 

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