एक राह दिख गया गुलाबों की पंखुड़ियों भरा !!
चल दिए उसपर ,
भूल कर कि गुलाबों में काटें भी होते हैं……..
काटों की कसक आज भी है.

एक राह दिख गया गुलाबों की पंखुड़ियों भरा !!
चल दिए उसपर ,
भूल कर कि गुलाबों में काटें भी होते हैं……..
काटों की कसक आज भी है.

पता बदल चुका है,
पर दिल है कि
मानता नहीं.
वही लवों पर छलकती
ख़तों की भाषा
पुरानी यादों की ख़ुशबू,
उसी पते पर आतीं और
द्वार खटखटातीं है.

ज़रूर दिल बादलों का भी किसी ने दुखाया होगा,
वर्ना इतनी शिद्दत से बरसता कौन है?

Unknown

सोंच- संभाल कर
बोली के जादू को काम में लाओ .
बातों के रंग
निराले होते हैं.
ना जाने कब , कैसे
किसी की बातें
दिल में उतर कर मन मोह लेतीं हैं.
किसी की , तीर बन दिल को चीर जातीं हैं,
नश्तर बन मन को छलनी कर देतीं हैं.

राष्ट्र कवि, पद्म विभूषण रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (२३ सितंबर १९०८-२४ अप्रैल१९७४) का जन्म सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था । उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की । उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था । उनकी अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है ।
कुरूक्षेत्र – प्रथम सर्ग की चंद पंक्तियाँ
वह कौन रोता है वहाँ-
इतिहास के अध्याय पर,
जिसमें लिखा है, नौजवानों के लहु का मोल है
प्रत्यय किसी बूढे, कुटिल नीतिज्ञ के व्याहार का;
जिसका हृदय उतना मलिन जितना कि शीर्ष वलक्ष है;
जो आप तो लड़ता नहीं,
कटवा किशोरों को मगर,
आश्वस्त होकर सोचता,
शोणित बहा, लेकिन, गयी बच लाज सारे देश की ?
और तब सम्मान से जाते गिने
नाम उनके, देश-मुख की लालिमा
है बची जिनके लुटे सिन्दूर से;
देश की इज्जत बचाने के लिए
या चढा जिनने दिये निज लाल हैं ।
ईश जानें, देश का लज्जा विषय
तत्त्व है कोई कि केवल आवरण
उस हलाहल-सी कुटिल द्रोहाग्नि का
जो कि जलती आ रही चिरकाल से
स्वार्थ-लोलुप सभ्यता के अग्रणी
नायकों के पेट में जठराग्नि-सी ।

आँसू और मुस्कान की पहेली पुरानी है.
ख़ुशी हो या ग़म
आँखे छलक हीं जातीं हैं.
ये मुस्कान भी फ़रेब है या सच
पहेली बन हीं जाती है .

उदास मुस्कान ,
एक नयन में आँसू
दूसरे में खिलती हँसी.
कौन सच , कौन मिथ्या ?
उदासी या हँसी ?
आँसुओं को आँखों हीं आँखों में पीती
आँखों की करुणा
या लबों की मुस्कान ?

कटे का दर्द तो ठीक हो जाता है ,
पर रह जाते है निशान याद दिलाने के लिए .

हम कौन हैं….
क्या हैं……
क्यों लोगों को समझाया जाय ?
कभी कोशिश करके देखो
जिन्हें जो मानना है
जो समझना है
वही समझेंगे .
क्या खारे …
नमकीन समंदर को
शक्कर डाल
मीठा किया जा सकता है ?

उगते सूरज ने नम आँखों से देखा
एक नन्हा सा दीप
अपनी बंद होती
कमज़ोर आँखों से ,
आख़री लौ में जलता- बुझता
सूरज की कमी पूरी करने में
जी जान से लगा हैं.
सूरज ने अपनी पहली किरण से
उसे सहला कर अपने
आने की ख़बर दे दी .

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