कहते हैं-
हम सब खाली हाथ आये थे।
खाली हाथ जायेंगें।
पर हसरते-अरमानों का क्या होगा?
ना जाने कितनी अधुरी -बाकी
तमन्नायें, अरमान, चाहतें, हसरतें …..
सभी साथ जायेंगीं।
कहते हैं-
हम सब खाली हाथ आये थे।
खाली हाथ जायेंगें।
पर हसरते-अरमानों का क्या होगा?
ना जाने कितनी अधुरी -बाकी
तमन्नायें, अरमान, चाहतें, हसरतें …..
सभी साथ जायेंगीं।
बिखर आये पतझङ के मौसम में
सूखते….
लाल, पीले, भूरे , शुष्क होते पत्ते
उङते गर्दो-गुबार से धूल धुसरित थे।
तभी गर्म , तेज़ हवा के झोंके ने
अश्वत्थ की ङालियों को हिला दिया
अौर पर्णपाती…. पत्तों का झङना शुरू हो गया।
अद्भुत नज़ारा था –
मृत गोल -गोल, घुमते- नाचते
गिरते, झङते, पीपल के पत्ते मानो
खुशी मनाते…….
सूफी दरवेश नृत्य कर रहे हों ।
मृत्यु वरण करते इन पर्ण -पत्तों में
यह हौसला कहाँ से आया?
कुछ लिखने की कोशिश में
कभी-कभी महसूस होता है,
ऐसा कुछ तो पढ़ा है……….
शायद पहले किसी ने लिखा है……
पर सच तो यह है कि
कविताएं खुद को दोहराती रहती हैं,
अलग-अलग शब्दों ….. भावों…. में।
वैसे हीं जैसे मौसम बदलते हैं,
बार-बार वही गर्मी-सर्दी-बरसात या
मधुमास दोहरा कर आता हैं।
अगर
दुखः-सुखः भरी इस जिंदगी की
कोई खिङकी खुली रह गई
तब मिल जाते हैं ,
हजार झाँकनेवाले।
अक्सर लोग भूल जातें हैं
नियती ने, जीवन ने ……
सबके घरों में काँच के झरोखे लगा रखे हैं।
अौर दुखः-सुखः भी आनी-जानी है।
गवाक्ष से झाँकना छोङ
द्वार पर जा मदद का हाथ बढ़ाअो।
तब बात बने।
मुस्कुराहटें बाँटते-बाँटतें ,
यह तो समझ आ गया- यह नफे का सौदा है……
सब सूद समेत वापस मिल जाता है
बकाया- उधार नहीं रहता ।
छोटी छोटी खुशियाँ ही तो
जीने का सहारा बनती है ।
ख्वाहिशों का क्या वो तो
पल पल बदलती है ।

Anonymous
कहते हैं –
ज्ञान इंसान को बेहतर बनाता है।
दर्द गायन को तराशती है।
पीङा आध्यात्मिकता….वैराग उत्पन्न करती है,
वेदना साहित्यकार को निखारती है,
व्यथा – कष्ट जीवन के नज़रिये को,
दंड-यंत्रणा भूल करने वालों को सुधारता हैं
अयोग्य राजनीतिज्ञ को क्या सुधारता है?
भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है यह भय
भूत काल का दुख ….अफसोस ….पछतावा
क्या कुछ बदल सकता है ?
फिर क्यों नहीं वर्तमान में …..
जिया जाये ? ?

चाँद डूबा सूरज के लिए,
सूरज ढल गया चाँद के लिए
रिश्तों में झुकना तो चलता है
पर कुछ एक दूसरे से बँधे होते है
पर नदी के दो किनारे जैसे .
एक रिश्ता ये भी निभा रहे है .
चाँद डूबा सूरज के लिए,
सूरज ढल गया चाँद के लिए

रंग बदलती यह रंगीन दुनिया…..
रोज नये रंग दिखाती है .
कभी बेआवाज़-बेरंग दुआ, रंग लाती हैं।
कभी कच्चे रंग के रिश्ते पक्के बन जाते हैं।
रंगों के संगत से बेरंग पानी भी रंग बदलाता है,
जैसे पल-पल रंग बदलते लोग।
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