उखड़ा-उखड़ा नाराज़ मौसम
बिखरी बेचैन हवाएँ
सर पटकती सी .
कभी-कभी अपनी सी लगने लगतीं हैं.

उखड़ा-उखड़ा नाराज़ मौसम
बिखरी बेचैन हवाएँ
सर पटकती सी .
कभी-कभी अपनी सी लगने लगतीं हैं.

प्रतिपदा का कमज़ोर, क्षीण चाँद
थका हारा सा अपनी
पीली अल्प सी चाँदनी ,
पलाश के आग जैसे लाल फूलों पर
बिखेरता हुआ बोला –
बस कुछ दिनो की बात है .
मैं फिर पूर्ण हो जाऊँगा।
मेरी चाँदी सी चाँदनी हर अोर बिखरी होगी .
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