
फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।

फिर याद आए वो,
तो ग़मगीन हो जाते हो।
चाह कर भी भूल ना पाए
तो ग़मगीन हो जाते हो।
कभी दुआओं में किसी को माँगते हो।
कभी उसे हीं भूलने की दुआएँ माँगतें हो।
थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.
अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.
कभी बादलो में घिर जाता है.
फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.
ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.
बस वही सबक़ सीख लेना है.
पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.
यही जीवन का मूल मंत्र है.

समय चक्र चलता रहता है,
अँधेरा …. अौर फिर उजाला….
कहते हैं –
अँधेरे को उजाला हराता है।
पर अक्सर लगता है –
रात के अँधेरे अनोखे…. अद्भुत…… विचार देते हैं।
शायद
मौन अंधेरा आँखों
की ताकत भी दिलो दिमाग में भर देता है।
शायद
स्वयं को देखने अौर आत्म मंथन
के हालात बना नवल -नये विचारों को जगाता है।
Anonymous
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