साँस के साथ बुनी गई ज़िंदगी!

साँस के साथ बुनी गई जो ज़िंदगी,

वह अस्तित्व खो गया क्षितिज के चक्रव्यूह में.

अब अक्सर क्षितिज के दर्पण में

किसी का चेहरा ढूँढते-ढूँढते रात हो जाती है.

और टिमटिमाते सितारों के साथ फिर वही खोज शुरू हो जाती है –

अपने सितारे की खोज!!!!

Image courtesy- Aneesh    

 

शुजाअत

अक्सर ज़िंदगी के बहाव में,

हर दो राहे पर ख़ुद से ख़ुद जंग लड़नी पड़ती है.

शुजाअत….इसमें हीं है कि

बिना हारे अपनी सही राह पर बहते रहें…चलते रहें।

अगर मंज़िल पाना है.

अर्थ उर्दू लफ्ज़ का –

शुजाअत….वीरता

ज़िंदगी के रंग -192

जी लो ज़िंदगी, जैसी सामने आती है.

सबक़ लो उस से …..

क्योंकि ज़िंदगी कभी वायदे नहीं करती.

इसलिए उससे शिकायतें बेकार है.

और जिन बातों को हम बदल नहीं सकते.

उनके लिए अपने आप से शिकायतें बेकार है.

छोटी-छोटी खुशियां हीं बड़ी खुशियों में बदल जाती हैं

जैसे छोटी दिवाली….से  बड़ी दिवाली ।

शुभ छोटी दिवाली!!!

 

 

अंश

कई बार मर- मर कर जीते जीते,
मौत का डर नहीं रहता.
पर किसी के जाने के बाद
अपने अंदर कुछ मर जाता है.
….शायद एक अंश अपना.
वह ज़िंदगी का ना भरने वाला
सबसे बड़ा ज़ख़्म, नासूर  बन जाता है.

 

ज़िंदगी के रंग- 186

“You have to keep breaking your heart until it opens.”
― Rumi

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चुभते, बेलगाम,  नुकीले आघातों से टूटना,

दस्तुर-ए- ज़िदंगी है। 

पर किसी को तोङना क़सूर है।

दूसरों को तोड़ने की कोशिश

वही करते हैं, जो ख़ुद टूटे रहते हैं.

इसलिये हौसला हारे बिना 

लगे रहना, आगाज-ए- जीत है।

ज़िंदगी के रंग -185

वर्षा सी बरसती,

अर्ध खुली भीगी आँखों के

गीले पलको के चिलमन से

कभी कभी दुनियाइंद्रधनुष सी,

सतरंगी दिखती है.

आँखों के खुलते ही सारे

इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते हैं.

ख़्वाबों का पीछा करती

ज़िंदगी कुछ ऐसी हीं होतीं.

ये हम नहीं जानते

हमें तुम से प्यार कितना,

ये हम नहीं जानते

मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना

जाने ज़िंदगी कैसे, बिताते हैं लोग.

ज़िंदगी के रंग- 87

ज़िंदगी में जंग

और ज़िंदगी से जंग

चलती रहती है.

अगर लड़ाई जारी रखो बिना डरे……

कोई साथ दे या ना दे तब भी ….

जीत मिल ही जाती है.

 

 

ज़िंदगी के रंग -75

कहते है – यह ज़िंदगी बुलबुला है.

पर जीवन के रंगमंच पर

ना तो इसे फूँक मार

अस्तित्व मिटाया जा सकता है

ना नियति के झोंके से

बचाया जा सकता है .

हम सब किसी और की

ऊँगलियों से बँधे,

नियंता के हाथों

की कठपुतलिया हैं.

और सब जानते – समझते भी

ज़िंदगी और मौत का रंग

अंदर तक हिला जाता है……….

 

थकान

कभी कभी ज़िंदगी

से थकान होने लगती है .

चाहो कुछ

होता कुछ और है

.ना जाने किस मुक़ाम पर

क्या रंग दिखाएगी ?

कब हँसाएगी कब रुलाएगी ?