प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?

प्यासे मृग सी कशाकश में,
मृगतृष्णा के पीछे भागते
बीतती है दिन-रात।
कट जाती है ज़िंदगी फ़क़त
मरीचिका सी उलझन में।
बता वक्त ख़ता ढूँढे या सज़ा?


नज़रें झुका कर,
उठा कर,
पलकें झपका
कर अश्कों को क़ाबू
करना सीखा था, पर
आँखें ऐन वक्त पर
धोखा दे गईं।
जब आँखों को आँखें दिखाईं,
जवाब मिला
हमारी नहीं जज़्बातों
की ख़ता है।