सप्तपर्णी / एल्स्टोनिया स्कोलरिस – Apocynaceae / Alstonia scholaris
‘यक्षिणी वृक्ष’ कहलाने वाला सप्तपर्णी वृक्ष के नीचे कविन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश लिखे थे। शांति निकेतन में दीक्षांत समारोह में छात्रों को सप्तपर्णी के गुच्छे देने का प्रचलन हैं। थरवडा बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष की पत्तियों के इस्तेमाल की बात है। ये फूल मंदिरों और पूजा में भी काम आता है , हालाकि इसके पराग से कुछ लोगों को एलर्जी भी होती है।आयुर्वेद व आदिवासी लोग प्राकृतिक उपचार में इस पेड़ की छाल, पत्तियों आदि को अनेक हर्बल नुस्खों के तौर पर अपनाते हैं।
बिन बुलाये घुस आई रातों में अपनी खुशबू लिये ,
यक्षिणी वृक्ष के फूलों की मादक सम्मोहक सुगंध।
अौर
कस्तूरी मृग की तरह, खुशबू की खोज खींच लाई,
चक्राकार सात पत्तियो के बीच खिले
सप्तपर्णी के सदाबहार फूलों के पास।
जिसकी सुरभी शामिल है,
रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ में भी ।

Images from internet.
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