#MyAirtelApp एयरटेल एप का जादू ( blog related topic )
मेरे पास एयरटेल का मोबाइल कनेक्शन काफी पहले से है। लगभग छः महीने पहले मैंने अपने पुराने फोन को बदलने का निश्चय किया। बड़े दिनों से एंड्रोएड स्मार्ट फोन की तमन्ना मेरे दिल में थी। आखिरकार मेरा सपना साकार हुआ। मैंने एक एंड्रोएड फोन खरीद लिया। दो-चार दिन तो मैं नए फोन को समझने और चलाने की उलझन में उलझ गई। मैंने स्मार्ट फोन की बड़ी चर्चा सुनी थी। इसलिए जल्दी जल्दी मैंने इसे सीख लिया।
युजर फ्रेंडली या दोस्ताना एप – तभी मुझे एयरटेल एप की जानकारी मिली। पहले तो मुझे घबराहट हुई। नया-नया फोन, इसमें एप कैसे डाला जाए? थोड़ा ड़र भी लगा। कही एप डालने से कोई परेशानी ना हो जाये। कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और अपने से इस एप को फोन में डाउनलोड करने का निश्चय किया। मैंने एप डालने की कोशिश की। तब पाया यह तो बड़ा आसान है। बड़े आसानी और स्वाभाविता से एप डाऊनलोड हो गया। एप डालने के बाद लगा मेरे सामने एक नई दुनिया ही खुल गई। यह तो सपनों का संसार है। मेरे अपने फोन की खिड़की से सारी दुनिया नज़र आ रही थी। ढेरो ऑप्शन के साथ एयरटेल एप मेरे मुट्ठी में था। मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। जिन कामों को करना पहाड़ लगता था। क्या सचमुच घर बैठे हो जाएगा? वह भी इतनी सरलता से ? सच बताऊँ, मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। इस आधे बित्ते के मोबाईल के विंडो यानि खिड़की से झाँकते इस एप में क्या सचमुच इतनी शक्ति है? मेरे मन में खयाल आया – पहले इस्तेमाल करो, फिर विश्वाश ।

अलादीन का चिराग – मैंने सोचना शुरू किया, कहाँ से शुरुआत करूँ? सारे के सारे ऑप्शन बड़े लुभावने लग रहे थे। मन में तरह – तरह के ख्याल आ रहे थे। इस जलती गर्मी में घर से बाहर निकल कर कुछ भी करने का मन नहीं करता है। अगर सचमुच घर बैठे ये काम हो जाए, तब सचमुच मज़ा आ जायेगा । मैं अभी सोच विचार में लगी थी । तभी एयरटेल का एक आकर्षक ऑफर मेरे फोन पर आया। 14 रुपये के रेचार्ज से मेरे सारे काल 30 पैसे प्रति मिनट हो जाएँगे। मैंने अपने एयरटेल – मनी से यह काम करने की कोशिश की और हैरान रह गई। यह काम पल भर में हो गया। अब मैं एयरटेल – मनी का भरपूर इस्तेमाल करने लगी हूँ। यह मुझे बड़ा सरल और सुविधाजनक लगने लगा है।
अब तो मैं बड़ी सहजता और स्वाभाविता से इसके इंटरनेट का उपयोग भी करने लगी हूँ। एयरटेल वन टच इंटरनेट से मैं बड़ी आसानी से सभी से जुड़ा हुआ महसूस करती हूँ। बिना लैपटाप के जब चाहो, जहां चाहो ईमेल देखना हो या व्हाट्सएप से परिवार, मित्रों या बच्चों से बातें करना हो, सब मुट्ठी में होता है। यहाँ तक कि ब्लॉग पढ़ना या पोस्ट करना जैसे काम भी उँगलियों के इशारे से हो जाता है। लगता है जैसे हाथों में अलादीन का चिराग आ गया है।
वैसे तो ख़रीदारी महिलाओं का मनपसंद शगल और शौक होता है। पर बाज़ार की भीड़भाड़ और मोलतोल से मुझे बड़ी परेशानी मससूस होती है। ऊपर से यह भयंकर गर्मी रहा सहा उत्साह भी ठंडा कर देतीं है। ऐसे में एयरटेल से ख़रीदारी की सुविधा ठंढे – सुहाने बौछार सा लगता है। घर बैठे मन चाही ख़रीदारी करो। वह भी ढेरो ऑफरों के साथ। यह बड़ा अच्छा लगता है। वन स्टॉप शॉप फॉर ऑल कंटेन्ट ने जिंदगी को सरल और सुकून भरा बना दिया है।
फूलों से बरसते ऑफ़र– एक बात इस एप की मुझे बड़ी अच्छी लगती है। वह है ढेर सारे ऑफर। लगता है जैसे ड़ाल से टूट कर खूबसूरत फूल हथेलियों में आ गिरे हों। जब मैंने अपना मोबाईल रेचार्ज करवाया तब मुझे कुछ रेस्टोरेन्ट के डिस्काउंट कूपन ऑफर में मिले। इसी तरह इंटरनेट रीचार्ज के साथ मुझे वाइकिंग म्यूजिक की सुविधा ऑफर में प्राप्त ई।
पारिवार का मददगार दोस्त – अब मेरे बच्चे और पति सब इस एप को इस्तेमाल करने लगे हैं। मेरे पति मोबाईल रीचार्ज, डीटीएच, और ना जाने कितना सारा काम इस एप के जरिये करने लगे है। बेटियाँ भी ख़रीदारी और इंटरनेट बड़े मज़े से इस्तेमाल करने लगी है। इस से समय और मेहनत दोनों की बचत होती है।
नेशनल ग्रीन ट्रीब्युनल (महत्वपूर्ण जानकारी )
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अधिनियम 2010 में पर्यावरण के मुद्दों से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटाने और संभालने के लिए बना एक विशेष न्यायाधिकरण है। यह भारत की संवैधानिक प्रावधान के तहत बना अधिनियम है। जो भारत के नागरिकों को एक स्वस्थ पर्यावरण उपलब्ध कराना चाहता हैं।
जून 1992 में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के रियो डी जनेरियो शिखर सम्मेलन में भारत ने भाग लिया। इसके बाद हमारे देश में विभिन्न राज्यों में होनेवाले प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति को नियंत्रित करने के लिए इसकी स्थापना की गई।
यह ट्रीब्युन पर्यावरण सुरक्षा और नदियों को सफाई के लिये सजग है. विशेष कर नदियों और सागर के किनारे स्थित होटलों, रिसॉर्ट्स, शहरों द्वारा नदियों में जानेवाले कचरे और गंदगी को रोकने के लिये प्रयासरत है.
पुरी, टिहरी, कश्मीर का डल झील, लक्ष्यद्वीप, गोआ, महाबलीपुरम, हरीद्वार आदि द्वारा कचरों को नदियों व सागर में प्रवाहित करने पर कठोर प्रतिक्रियाएँ दिखाई है. यह सराहनीय कदम है.
हमारी विरासतों और बीते समय के पद चिन्हों ने हमें तराशा हैं……( एक विचार )
हम में से ज़्यादातर लोग वर्तमान में जीते हैं। भविष्य के सपने सँजोते और योजनाएँ बनाते हैं। बीते हुए समय को अक्सर भुला देते हैं। हम पुरानी बातों को कम महत्व देते हैं। पर यह गौर करने की बात हैं। हम आज जो भी हैं इसमें सबसे ज्यादा महत्व हमारे बीते समय का है। पर हम सभी शायद ही इस बारे में सोचते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है – बीती बातों से हमें वे सीख मिलती है, जो हमे पुरानी गलतियों को करने से रोकती है।
विरासतें – अक्सर विरासत का मतलब पूर्वजों से प्राप्त मकान, जमीन और दौलत जैसी बातों से जोड़ा जाता है। विरासतों को सिर्फ धन-संपाति या जमीन-जायदाद के रूप में देखना सही नहीं है। इसे जीवन के धरोहर के रूप में देखना चाहिए। यानि पुरानी बातों से सीखना चाहिए। वर्तमान में जीना चाहिए और भविष्य के लिए रचना करने की कोशिश करना चाहिए।
स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड — कभी-कभी कुछ लोग कहतें है वे स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड है। बात सही है। पर क्या आज हम जो बने है उसमें हमारी विरासतों का हाथ नहीं है? पुश्त दर पुश्त हम तक बहुत सी बातें, व्यवहार पढ़ाई का प्रभाव हम तक ट्रान्सफर होता है। जिस से हमारे व्यक्तित्व निर्माण होता है।
विरासतें शक्तिशाली हथियार – हमारी विरासतें ऐसी शक्तिशाली हथियार या औज़ार है । जिस से आगे की जीवन को खूबसूरती से तराशा जा सकता हैं। हमारी विरासतें, धरोहर, परम्पराएँ, संस्कृती, पैतृक प्रभाव इन सब का हम पर असर पड़ता है। जिस से आगे सामाजिक बदलाव और तरक्की लाये जा सकते हैं। हम आज जो हैं और जैसे है, वह व्यक्तित्व इन्ही विरासातों से बना है।
हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि अपने धरोहर या थाती को ठीक-ठीक आगे ले जाएँ। ठीक वैसे जैसे हमें मिला है। हो सके तो इसे चिंतन-मनन और समझदारी से और अच्छा रूप दें। ये विरासतें और थाती हमारे सुनहरे कल का आधार है।
इस लेख पर विचार आमंत्रित है। अपने विचार और सुझाव निसंकोच लिखें।
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कोणार्क मंदिर -चमकते सूर्य और बोलते पत्थरों का काला पैगोड़ा ( यात्रा वृतांत और पौराणिक कथा )
जब सूर्य या अर्क एक विशेष समय पर, एक ख़ास कोण से उदित होते हैं। तब कोणार्क मंदिर मेँ एक दिव्य दृश्य दिखता है। लगता है जैसे सूर्य देव मंदिर के अंदर जगमगा रहें है। शायद इसलिए यह मंदिर कोणार्क कहलाया । यहाँ सूर्य को बिरंचि-नारायण भी कहा जाता है। इसका काफी काम काले ग्रेनाईट पत्थरों से हुआ है। इसलिए इसे काला पैगोड़ा भी कहा जाता है।
पौराणिक मान्यता रही है कि सूर्य की किरणों में अनेक रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं विशेष कर त्वचा रोग के उपचार के लिए प्राचीन काल से सूर्य उपासना प्रचलित था। आज भी छठ पूजा और अन्य सूर्य उपासनाएँ प्रचलित है।
आज, आधुनिक विज्ञान ने भी सूर्य के किरणों के महत्व को स्वीकार किया है। किवदंती है कि कृष्ण- पुत्र साम्ब कोढ़ग्रस्त हो गए। तब सांब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी और सागर के संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की। सूर्य देव ने प्रसन्न हो कर सांब के रोगों का नाश किया।
तब साम्ब चंद्रभागा नदी में स्नान करने गए । वहाँ उन्हें सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली। मान्यता है कि इस मूर्ति के रचनाकर देव शिल्पी विश्वकर्मा स्वयं थे। उन्होने सूर्यदेव के शरीर के तेज़ से इस मूर्ति का निर्माण किया था। साम्ब ने “कोणार्क सूर्य मंदिर’ बनवा कर इस मूर्ति की वहाँ स्थापना किया।
यह मंदिर एक रथ रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं।यह अद्वितीय सुंदरता और शोभामय शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण उत्कृष्ट मंदिर है। यह मनमोहक स्थापत्यकला का उदाहरण है। पत्थर पर जीवंत भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र उकेरे हुए हैं।यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है, जिन्हे कामसूत्र से लिया गया है।।ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहतें हैं। इस मंदिर में इसी कल्पना को मूर्त रूप में उतारा गया है।
इस मंदिर के निर्माण कला को कलिंग शैली कहा गया है। यह पूरा मंदिर अर्क या सूर्य के रथ के रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं। इस मंदिर में बड़े दिलचस्प तरीके से पहर और महीनों का चित्रण किया गया है। रथ के बारह पहिये/ चक्के या चक्र लाजवाब नक्कासी से पूर्ण हैं। ये बारह चक्र वर्ष के बारह महीनों के प्रतीक हैं। इन चक्कों में आठ अर हैं , जो दिन के आठ प्रहर के सूचक हैं। आधुनिक घड़ी के उपयोग में आने से पहले तक दिन के समय की पहचान पहर/प्रहर के आधार पर होती थी। आज भी हम दिन के दूसरे प्रहर को आम बोलचाल में दोपहर कहते हैं। इस रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं ।
कोणार्क मंदिर युनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व धरोहर है। यह भारत के उड़ीसा राज्य में, पूरी में स्थित है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 1236 से 1264 के दौरान निर्मित हुआ है। गंग वंश के राजा नृसिंह देव ने इसका निर्माण करवाया था। इसके निर्माण में काले ग्रेनाईट पत्थरों का बहुलता से उपयोग हुआ है। साथ ही लाल बलुआ पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ है। मान्यता हैं कि इसमे दधिनौती या गुम्बज पर एक विशाल चुम्बक लगा था. जिसकी सहायता से इस के अंदर सूर्य की हीराजटित मूर्ति हवा में लटकी रहती थी. विदेशी लुटेरों ने चुम्बक निकाल लिया, जिस से मंदिर ध्वस्त होने लगा. एक मान्यता यह भी हैं कि इस चुम्बक से समुद्र से गुजरने बाले जहाजों के दिशा यंत्र काम करना बंद कर देते थे.
आज मंदिर का बहुत भाग ध्वस्त हो चुका है। पर इस खंडित और ध्वस्त मंदिर के सौंदर्य से अभिभूत हो नोबल पुरस्कार प्राप्त कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कभी कहा था-
“कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।”
हमारा गुस्सा – उपयोगी भी हो सकता है !!! ( एक विचार )
गुस्सा हम सभी में होता हैं. अक्सर हम गुस्सा करते हैं। अपने आस – पास हर दिन किसी ना किसी को नाराज़ होते देखते हैं। यह स्वभाविक व्यवहार हैं। कहते हैं, बड़े – बड़े ऋषि, मुनि, और विद्वान भी अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीँ रख पाये।
मन में जमे गुस्से के गुबार को बाहर निकालना ज़रूरी हैं। मन में भरी बातें अक्सर हम पर नाकारात्मक असर डालती है। पर इस गुस्से को निकालने का तरीका और जगह ठीक होना चाहिए। कुछ लोग छोटी – छोटी बातों से नाराज़ होते रहते हैं।हर समय उनमें चिड़चिड़ापन रहता है। जिस से उनकी नाराज़गी का प्रभाव कम हो जाता हैं।
लेकिन जब हम किसी ना नाराज़ होनेवाले को गुस्से में देखते हैं। तब हम सब सकते में आ जाते हैं। क्यों ? क्योंकि जो कभी गुस्सा नहीँ करता, उसका गुस्सा हमें मालुम नहीँ होता। जिस से उनका गुस्सा ज़्यादा प्रभावशाली बन जाता हैं। वैसे लोग अपने गुस्से के असर का सही उपयोग करना जानते हैं। इसलिए हर छोटी-छोटी बात पर चिढ़ने और नाराज़ होने की आदत को नियंत्रित करना चाहिए। ताकि सही समय पर और सही जगह पर गुस्सा कर उसे प्रभावशाली बनाया जा सके।
क्रोध को कला मान कर सीखने की ज़रूरत हैं। कौन जाने, शायद कुछ समय में गुस्से /क्रोध/नाराज़गी के मैनेजमेंट की पढ़ाई भी शुरू हो जाये।
#DigitalIndia ( blog related ) Dream India
The dream of seeing India as an egalitarian society where plumbers, gardeners, tutors, technocrats all can find new markets for employment using telecommunication network or internet is not far from reality.
The flagship program of ‘Digital India’ launched by our present government seeks to transform India into a digitally empowered knowledge society. It envisages bridging the much needed gap between the affluent and the poor, digital haves and digital have-nots, urban India and rural India, the employed and the unemployed by creating equality of opportunity to encourage employment and foster entrepreneurship.
Further, Digital India conforms to the true spirit of democracy by creating non discriminatory infrastructure for all categories of service providers for wholesale bandwidth. Telcos, ISPs, virtual network operators and cable TV providers can all plug into this network for offering next generation services to citizens.
However, India’s demography and insufficiently developed infrastructure offers great challenge to the policy makers to ensure that the public programs are well targeted and devoid of leakages.
Intel has been playing a significant role in this regard by being a key enabler in digitizing India. The National Digital Literacy Mission (NDLM) was launched by Intel in three villages in 2012 and was successful in achieving 100% e-literacy there. Recently, Intel India has unveiled a digital skills training application, which includes modules on digital literacy, financial inclusion, healthcare and cleanliness in 5 Indian languages under Digital Skills for India’ program. It has also launched ‘Innovate For India Challenge’, to create solutions that are relevant for the country.
Although India is a powerhouse of software, availability of electronic government services for the citizens is inadequate. Digital India aims at giving an impetus to e-governance in the country. It seeks to meet the aspirations of the people in bringing the government and its services to the doorsteps of the citizens.
Since well informed and empowered citizens form pillars of an accountable and inclusive democracy, Government of India has launched the National optical fiber network project as a part of Digital India. This project aims at providing broadband connectivity to over two lakh gram panchayats creating digital infrastructure at rural level bringing millions of rural Indians into the fold of modern technology.
Demographically, India is a young country and it is estimated that by 2016, approximately 50% of the population will be in the age group of 15-25 years of age. On the other hand, an ageing world population will soon need a younger workforce. This program therefore, has great potential to harness India’s demographic dividend.
Digital India is designed to empower Indians with the power of technology. It is the right step towards channelizing the potential and enthusiasm of Indians for technology and giving an impetus to the soaring aspiration of young India.
http://www.intel.in/
#Digitallndia आओ हम डिजिटल बन जाएँ ( blog related topic )
क्या है डिजिटल भारत परियोजना?
यह परियोजना वर्तमान सरकार की शीर्ष प्राथमिक परियोजनाओं में से एक है।
यह भारत के विकास के लिए बनाई गई एक परियोजना है। इसकी कार्य अवधि 26 नवंबर 2014 से 2019 के बीच है। डिजिटल भारत देश को सशक्त और ज्ञानपूर्ण अर्थव्यवस्था देने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है । यह कार्यक्रम इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा परिकल्पित किया गया है। जिस से भारत तेज़ी से प्रगती पथ पर अग्रसित हो सके ।
डिजिटल भारत विकास के नौ क्षेत्रों पर बल डालेगा। जो निम्नलिखित हैं-
1. ब्रॉडबैंड राजमार्ग
2. मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए सार्वभौमिक पहुँच
3. पब्लिक इंटरनेट एक्सेस कार्यक्रम
4. ई-शासन – प्रौद्योगिकी के माध्यम से सरकार में सुधार
5. ई-क्रांति – सेवा की इलेक्ट्रॉनिक डिलिवरी,
6. सूचना,
7. इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण,
8. नियुक्ती के लिए
9. अर्ली हार्वेस्ट कार्यक्रम
क्या किया जा रहा है?
इसमें उच्च गति के इंटरनेट नेटवर्क के साथ ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने की योजना शामिल है। डिजिटल भारत के तीन मुख्य घटक हैं-
1 डिजिटल बुनियादी ढांचे का निर्माण
2 डिजिटल सेवाओं का समुचित वितरण
3 डिजिटल साक्षरता हैं।
इस योजना में सरकारी सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक रूप दिया जाना है। जिससे कागजी कार्रवाई को कम किया जा सके। इसमें सेवा प्रदाताओं और उपभोक्ताओं दोनों के फायदे के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराया जाएगा।
योजना का संचालन-
यह योजना संचार मंत्रालय और आईटी की अध्यक्षता में क्रियान्वित हो रहा है। इसे डिजिटल भारत सलाहकार के समूह द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। यह भारत के सभी मंत्रालयों और विभागों को डिजिटल बनाएगा। यह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत किया जाएगा। इसके अलावा, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र का पुनर्गठन करने की योजना भी हैं।
डिजिटल भारत के सामने चुनौतियां
भारत इस क्षेत्र में अभी अपेक्षित ऊचाँइयों तक नहीं पहुच पाया है। इसलिए सबसे पहले आवश्यक है कि भारत में साइबर सुरक्षा नीति को मजबूत बनाया जाय। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2013 साइबर कानून को सही प्रकार से लागू करने किया जाये। जिससे साइबरस्पेस के जोखिम को कम किया जा सके। इस परियोजना में ई-कचरा प्रबंधन पर उचित ध्यान देने की जरूरत होगी। साथ-साथ ई-निगरानी, नागरिक अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था, कानूनी ढांचे में ई- सुरक्षा संबंधी नियम बनाने और लागू करने जैसी चुनौतियाँ है। साथ हीं डेटा संरक्षण कानून, गोपनियता, जैसे विषयों का प्रबंधन भी एक चुनौती होगी।
डिजिटल भारत की वर्तमान स्थिति
शीर्ष समिति बहुत जल्द ही इसकी प्रगति का विश्लेषण करने जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों ने भी डिजिटल भारत के लिए नीतियों के विकास की ओर संकेत किया है। टेलीकॉम मंत्री श्री रवि शंकर ने बताया है कि इस परियोजना से रोजगार की संभावना भी काफी बढेंगी। कई कंपनियों ने इस परियोजना में अपनी रुचि दिखाई है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में श्री नरेन्द्र मोदी ने डिजिटल भारत के लिए अपनी मंजूरी दे दी है।
विश्व के विकास पटल पर भारत
हर साल विश्व आर्थिक मंच इनसीड के साथ सहयोग में वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी रिपोर्ट प्रकाशित करता है। यह विभिन्न देशों में अनुसंधान, नेटवर्क तत्परता, अर्थव्यवस्था आर्थिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ जैसे विषयों का व्यापक आकलन करता है।
इस रिपोर्ट में भारत 83 वें स्थान पर है। इंडोनेशिया, थाईलैंड , ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका श्रीलंका, और फिलीपींस जैसे देशों से भारत पीछे है।
भारत ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं रिपोर्ट में भी भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। । रिपोर्ट के अनुसार भारत में बुनियादी डिजिटल सुविधाओं की कमी, नेटवर्क तत्परता में कमी, राजनीतिक, विनियामक और कारोबारी माहौल की गुणवत्ता में कमी है। जो विकास में बाधक बनी हुई है।
भारत आज विश्व का सबसे युवा देश है। अर्थात हमारे यहाँ हमारी बहुत बड़ी जनसंख्या युवा वर्ग की है। अतः हमारे देश में विकास की अपार संभावनाएं है। यह नई खोजों और आधुनिकीकरण की ओर हमारा मार्ग प्रशस्त करेगा । ऐसे में यह परियोजना बहुत मददगार सिद्ध होगी। इसके लिए हमारे देश में डिजिटल कौशल और बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का स्वागत योग्य फैसला- धारा 66 ए ( समाचार )
सुप्रीम कोर्ट ने एक सराहनीय फैसला लिया है। धारा 66 ए ( आईटी – एक्ट ) को कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। यह एक बड़ा फैसला है। जो तत्काल लिया गया है। यह धारा सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत अभिव्यक्ती को रोकने का काम करती रही है। जिसके वजह से अनेक लेखकों, व्यंगकारों, विधार्थियों और सामान्य जन को सजा झेलनी पड़ी है।
धारा 66 ए क्या है? – यह धारा सोशल मीडिया पर लिखे जा रहे विषयों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया कानून है। धारा धारा 66 ए ( आईटी – एक्ट ) में सोशल मीडिया (इंटरनेट, मोबाईल, सोशल नेट्वर्किन साईट आदि ) पर आपतिजनक बातें लिखने पर सजा का प्रावधान है। जिस वजह से फेस बुक, इंटरनेट, मोबाईल मैसेजों आदि में लिखे गए व्यंगों और विचारों के कारण अनेक लोगों को सज़ा मिली है।
सुप्रीम कोर्ट का विचार – सोशल मीडिया पर अक्सर लोग अपनी व्यक्तिगत राय और विचार लिखते हैं। अतः धारा 66ए मन की बातों की अभिव्यकी में बाधक है। इसके अलावा बहुत बार, कुछ बातें हल्के तौर पर या व्यंग के रूप में भी लिखी जाती हैं। अतः कोर्ट ने इसे व्यक्तिगत अभिव्यक्ति माना है। व्यक्तिगत अभिव्यक्ति भारत के हर नागरिक का अधिकार है।
सावधानी – पर इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर आपतिजनक या ऊटपटाँग बातें लिखी जाये। साथ ही व्यक्तिगत हमले या अशोभनीय बातें लिखने से भी बचना चाहिए। भारत के अच्छे नागरिक होने के कारण ऐसी बातें भी नहीं लिखनी चाहिए जिस से समाज में आस्थिरता उत्पन्न हो। अर्थात किसी भी रूप में इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
#Iamhappy वह खुशी का पल ( blog related topic )
हम खुशियों की खोज में न जाने कहाँ-कहाँ भटकते है।बड़े-बड़े चाहतों के पीछे ना जाने कितना परेशान होते हैं। पर, सच पूछो तो खुशी हर छोटी बात में होती है। यह सृष्टि की सबसे बड़ी सच्चाई है।
इस जिंदगी के लंबे सफर में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। ये खुशियां इन उतार चढ़ाव में हमें हौसला और हिम्मत देती हैं। पर अक्सर हम छोटे-छोटी खुशियों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, किसी बड़ी खुशी की खोज में। ऐसा एहसास स्वामी विवेकानंद को अपने जीवन के आखरी दौर में हुआ था।
खुशी ऐसी चीज़ नहीं है जो हर समय हमारे पास रहे। यह संभव नहीं है। खुशी और दुख का मेल जीवन के साथ चलता रहता है। हाँ, खुशी की चाहत हमारे लिए प्रेरणा का काम जरूर करती है। कभी किसी के प्यार से बोले दो बोल, बच्चे की प्यारी मुस्कान, फूलों की खूबसूरती या चिड़ियों के चहचहाने से खुशी मिलती है। कभी-कभी किसी गाने को सुन कर हीं चेहरे पर मुस्कान आ जाती हैं या कभी किसी की सहायता कर खुशी मिलती है। जेनिफ़र माइकेल हेख्ट ने अपनी एक पुस्तक “दी हैपीनेस मिथ: द हिस्टीरिकल एंटिडौट टू वाट इस नॉट वर्किंग टुड़े“ में इस बात को बड़े अच्छे तरीके से बताया है।
कठिनाइयों की घड़ी में छोटे-छोटी खुशियाँ उनसे सामना करने का हौसला देती हैं। इस बारे में अपने जीवन की एक घटना मुझे याद आती है। मेरी बड़ी बेटी तब 12 वर्ष की थी। उसके सिर पर बालों के बीच चोट लग गया। जिससे उसका सर फूट गया। मैं ने देखा, वह गिरने वाली है।
घबराहट में मैंने उसे गोद में उठा लिया। जब कि इतने बड़े बच्चे को उठाना सरल नहीं था। मैंने एक तौलिये से ललाट पर बह आए खून को पोछा। पर फिर खून की धार सिर से बह कर ललाट पर आ गया। वैसे तो मैं जल्दी घबराती नहीं हूँ। पर अपने बच्चे का बहता खून किसी भी माँ के घबराने के लिए काफी होता है। इसके अलावा मेरे घबराने की एक वजह और भी थी । बालों के कारण चोट दिख नहीं रहा था। मुझे लगा कि सारे सिर में बहुत चोट लगी है।
मेरी आँखों में आँसू आ गए। आँखें आँसू से धुँधली हो गई। मैं धुँधली आँखों से चोट को ढूँढ नहीं पा रही थीं। मेरी आँखों में आँसू देख कर मेरी बेटी ने मेरी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की।
उसने मेरे गालों को छू कर कहा- “ मम्मी, तुम रोना मत, मैं बिलकुल ठीक हूँ’। जब मैंने उसकी ओर देखा। वह मुस्कुरा रही थी। मैं भी मुस्कुरा उठी। उसकी दर्द भरी उस मुस्कुराहट से जो ख़ुशी मुझे उस समय मिली। वह अवर्णनीय है। मुझे तसल्ली हुई कि वह ठीक है। उससे मुझे हौसला मिला। मेरा आत्मविश्वाश लौट आया। उसकी मुस्कान ने मेरे लिए टॉनिक का काम किया। मैंने अपने आँसू पोछे और घबराए बिना, सावधानी से चोट की जगह खोज कर मलहम-पट्टी किया और फिर उसे डाक्टर को दिखाया।
मुस्कुरा कर देखो तो सारा जहां हसीन है,
वरना भिगी पलकों से तो आईना भी धुंधला दिखता है।
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