थोड़ी भी ऊँचाई
गुमान भर देती है.
किसी घर का छत
कितना भी ऊँचा क्यों ना हो,
उसके ऊपर वाले घर का
फ़र्श हीं रहता है.

थोड़ी भी ऊँचाई
गुमान भर देती है.
किसी घर का छत
कितना भी ऊँचा क्यों ना हो,
उसके ऊपर वाले घर का
फ़र्श हीं रहता है.


कुछ ना कुछ सबक़ ले कर आती है….
ख़्वाबों, ख़्वाहिशों को तोड़ती,
ज़िंदगी की ठोकरें.
तराशती है अनगढ़े टुकड़े को….


Rumi ❤ ❤
ना जाने कैसी राहों से
गुज़र रही है ज़िंदगी
अनमने चलते रहे ….
कई बार बताए गए रास्ते
पर चलते चलते ग़लत जगह
पहुँच जाती हैं ज़िंदगी .
तब लगता है –
काश दिल की आवाज़ सुनी होती ,
शायद सही मंज़िल मिल जाती.
अभी तो लापता हैं…खो गए हैं,
भटके हुए राहों पर …….


बच्चों को सम्भालना इतना भी
कठिन नहीं, अगर अगर
बच्चों के साथ बच्चा बनना आ जाए.
लाजवाब इनोवेटिव आइडिया !!

A traction rod, ropes and a doll — these are among crucial elements being used to treat the fractured leg of 11-month-old Zikra Malik. In the orthopaedic block of Lok Nayak Hospital, bed number 16 has not one, but two “patients” lying down with their legs attached to a traction rod — Zikra and her doll, Pari, being used by doctors to get the toddler to cooperate.
धूप की चादर तले,
धूप-छांव से आँख मिचौली खेलते
बादलों को देख ख़्याल आया-
गुज़रे पुराने दिनों से किसी
एक दिन से थोड़ा सर्द शाम चुरा लें,
तो शायद पुराना मौसम लौट आए….
यादों के धुँध में लिपटा हुआ.


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