A new born girl ( poem )

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I opend my dark eyes
saw the big beautiful
world around me ,
for the first  time.
There was smile on ,
My pink cupid lips.
Suddenly  heard my mothers’
voice., which I was
Listening for last ,
Nine months in her womb.
She whispered – A GIRL ?
And she turned her face away.

 

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न्यू मूर – एक विवादित द्वीप का गायब होना ( कविता)

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     अचानक एक दिन, बंगाल की खाड़ी में एक द्वीप उभर आया।

न्यू मूर 

 

1970 में एक ,चक्रवात भोला  …. की वजह से ।

दोनों देश – भारत और बांग्ला   देश लगे अपना अधिकार जमाने।

भूमि विवाद चल पड़ा।

चालीस वर्ष का द्वीप पलायन कर गया, इस  झगड़े को देख कर।

समा गया वापस उसी सागर में जहां से जन्म लिया था,

 और सुलझा गया विवादित झगड़ें को।

ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ती गर्मी से बढ़े जल स्तर  के नीच खो गया।

शायद मनुष्यों का लालच देख शर्मिंदा हो जलमग्न हो गया।   

( न्यू मूर द्वीपबंगाल की खाड़ी में  गंगा -ब्रह्मपुत्र डेल्टा क्षेत्र के तट पर 1970 में निकाल आया। जिसे 1974 में एक अमरीकी उपग्रह चित्रो में स्पष्ट देखा गया। इस पर भारत और बंगला देश दोनों ने अपना दावा किया। )

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कोमगाटा मारू ( सच्चाई पर आधारित मार्मिक कविता)

 

(यह भारतीयों की एक मार्मिक कहानी है। “कोमगाटा मारू” जापानी जहाज़ में 376 भारतीय यात्री सवार थे। यह जहाज़ 4 अप्रैल 1914 को निकला। ये भारतीय कनाडा सरकार की  इजाज़त से वहाँ पहुंचे। पर उन्हे बैरंग लौटा दिया गया। )

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सुदूर देशों में ज्ञान बाँटने और व्यवसाय करने,

         हम जाते रहें है युगों से।

          आज हम फिर, अच्छे जीवन की कामना, गुलामी और

                संभावित  विश्वयुद्ध के भय से भयभीत।  

                        निकल पड़े अनंत- असीम  सागर में,

                               कोमगाटा मारू जहाज़ पर सवार हो।

                                       चालीस दिनों की कठिन यात्रा से थके हारे,

                                               हम पहुँचे सागर पार अपने मित्र देश।

                                                         पर, पनाह नहीं मिला। 

 वापस लौट पड़े भारतभूमि,

        पाँच महीने के आवागमन के बाद

               कुछ मित्रो को बीमारी और अथक यात्रा में गवां।

                        टूटे दिल  और कमजोर काया के साथ लौट,

                               जब सागर से दिखी अपनी मातृभूमि।

                                       दिल में राहत और आँखों में आँसू भर आए।

   अश्रु – धूमिल नेत्रों से निहारते रहे पास आती जन्मभूमि – मातृभूमि।

 

 तभी ………………….

गोलियों से स्वागत हुआ हमारा। कुछ बचे कुछ मारे गए।

अंग्रेजों  ने देशद्रोही और प्रवासी का ठप्पा लगा ,

 अपने हीं देश आने पर, भेज दिया कारागार।

स्वदेश वापसी का यह इनाम क्यों?

 

 

छाया- चित्र इन्टरनेट के सौजन्य से।

काला पड़ता सफेद ताजमहल का नूर (कविता)

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नूरजहां के याद मॆं
शाहजहाँ में बनवाया
सफ़ेद ताज़महल
दुनिया का सातवाँ आश्चर्य

आज़ का प्रदुषण
और गंदगी उसे
बना रहा हैं
काला – हरा दागदार
यह हैं हमारा  विरासत प्रेम.

(  समाचार -द हिंदू , 23.5.2016  पृष्ठ 8 . News -The Hindu -Taj Mahal turns green,  23may 2016 , pg 8 .)

 

 

 

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जिंदगी के रंग ( कविता ) 7

 

 

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यह बड़ी   दुनिया छोटी बन जाती हैं ,
जब कोई  ऐसा अचानक

मिल जाता हैं

जो अपना सा लगता हैं.

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बुलावा (कविता)

 

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एक मधुर आवाज़
सिर्फ जानेवाले को बुलाती है.
और एक मीठी  चिर  निद्रा
नयनो मॆं समा जाती हैं.

 

 

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हवा में जहर

 

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हवा में क्यों है घुला जहर?

बनने की कामना है विश्वगुरु,

योग दिवस मनाते  है हम।

देते है उच्च संस्कृति और

प्राचीन इतिहास की दुहाई।

 कहाँ है हमारी तथाकथित संवेदनशीलता?

जब हम अपना पर्यावरण

और वायु भी स्वच्छ

नहीं रख सकते हैं?

क्यों है हवा में इतना जहर?

( विश्व स्वास्थ संगठन/ WHO, के 100 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची  में भारत के 34 शहरों के नाम है। अच्छी खबर यह है, कि दक्षिण भारत के किसी शहर का नाम इस सूची में नहीं है। – समाचार इए शॉर्ट / INSHORT 15.5.2016  )  

 

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जिंदगी के रंग (1) ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें ( कविता )

 

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ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें
दूर खड़ा फूलों भरा, हरा भरा,

पुराना दरख्त समीर के झोंकों में झूम रहा था।
नीचे खेलते बच्चे किलक रहे थे।
ड़ालों पर पंछी चहक रहे थे।
जिंदगी के रंग कितने सलोने है।

तभी पेड़ चीख़ उठा। उस से भी तेज़ चीख़ें आईं
ऊपर नीड़ों से, और गोल-गोल उड़ते पंछियो की।
कोई उसे बेरहमी से काट रहा था,

शायद सीमेंट-बालू के नीड़ बनाने के लिए।
आसपास के पेड़ सन्न देख रहे थे,
क्या इसके बाद हमारी बारी है? सोच रहे थे।
पेड़ धरा पर पड़ा था, फूल टूट-टूट कर बिखर गए थे।

हमें हमेशा लगता है, दुर्घटनाएँ दूसरों के साथ हीं होते है
पर ऐसा नहीं है। जिंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें।
हम हीं भूल जाते है, कभी-कभी गहरी जड़ें भी सहारा नहीं दे पातीं हैं हमें,

image from internet

जहां खारा पानी बिकता है # mumbaislum ( कविता )

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वह भी रहती हैं वहाँ

जहां खारा पानी बिकता है।

दरिद्र, पति परित्यक्ता,

दस बच्चों के साथ,

दशकों पुरानी अपनी

बावड़ी का जल  बाँट कर

कहती है –“ पानी बेच कर क्या जीना?

क्या पूजा सिर्फ मंदिरों और मस्जिदों में ही होती है ?

यह इबादत का  उच्चतम सोपान नहीं है क्या?

 (मुंबई, मानखुर्द बस्ती में जहाँ गर्मी में लोग पानी खरीद रहे हैं। जहाँ खारा पानी भी घरेलु काम मॆं आता है। वहाँ  ज़रीना ने अपनी पुरानी बाबड़ी का द्वार सभी के लिए खोल दिया  है। ) news from daily – HINDU, pg – 2 dated may 12 2016.

 

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राग वीतराग (काविता)

राग-वितराग
राग-वितराग

जीवन के मधुर राग में ,
वीतराग भर जाता हैं  ,
जब अपनो के ही बदलते रंग,
जीवन बेरंग कर देते हैं.
क्या यही  हैं वैराग्य का द्वार ?

 

Image by Chandni Sahay.