Size of God

A boy asked the father: _What’s the size of God?_ Then the father looked up to the sky and seeing an airplane asked the son: What’s the size of that airplane? The boy answered: It’s very small. I can barely see it. So the father took him to the airport and as they approached an airplane he asked: And now, what is the size of this one? The boy answered: Wow daddy, this is huge! Then the father told him: God, is like this, His size depends on the distance between you and Him. *The closer you are to Him, the greater He will be in your life!

Karan Arjun #Mahabharat

While the battle of Kurushetra was at its peak, Arjuna and Karna were fighting each other. It was a battle to witness, a flurry of arrows were being exchanged, and even Gods were witnessing this epic battle between the 2 warriors.

Arjuna would shoot his arrows and the impact of these arrows would be so much that Karna’s chariot would go back by 25-30 feet. People who witnessed this were amazed by the skills of Arjuna.

Karna was no less. When he shot arrows, Arjuna’s chariot would also shake and go back by 3-4 feet.

More than everyone, Krishna would applaud Karna every time his arrow hit Arjuna’s chariot. But not once did He applaud Arjuna’s skills.

At the end of the day, Arjuna asked Krishna: “Oh Lord, I have shot so many arrows at Karna’s chariot, it was being displaced like a feather in wind, but not once did you appreciate me. Rather, you would appreciate his skill despite his arrows just displacing my chariot a little”.

Krishna smiled and replied “Oh, Arjuna, remember, your chariot is protected by Hanuman at the top on your flag, Me as your charioteer in the front and by Sheshnag at its wheels, yet the whole chariot would still sway and displace whenever the valiant Karna hit us with his arrows”.

“But Karna’s chariot is not protected by any such force, he is on his own, yet he fights valiantly”.

It is said that after the battle of Kurushetra was over, Krishna refused to get off the chariot till Arjuna got down. Once Krishna alighted from the chariot, it caught fire and turned to dust.

Krishna said “Oh Arjuna, your chariot was destroyed by Karna a long time ago, it is I who was still protecting it.”

“Never in your life have the arogance to say that you have achieved something. If you have achieved something, it is the divine will, it is the divine intervention that has always protected you, cleared your path and given you the right opportunities at the right time”

#यादें – बचपन का वह साथ

सुहाना  शाम  थी। मैं सोफ़े पर अधलेटी टीवी देख रही थी। दिन भर की भाग – दौड़ के बाद बड़ा अच्छा लगता है आराम से बैठ कर अपना मन पसंद टीवी कार्यक्रम देखना। अगर ऐसे में हाथों में गरमा – गरम चाय का प्याला हो। तब और भी अच्छा लगता है। ऐसे में लगता है कि कोई परेशान ना करे। ना कोई छेड़े। फोन की घंटी भी उकताहट पैदा कर देती है। वह दिन भी ऐसा ही था। मैं बड़े मनोयोग से टीवी देख रही थी।

तभी फोन की आवाज़ आई। शायद कोई मैसेज था। मन में ख्याल आया – बाद में देखूँगी। पर फिर मैंने सोचा कहीं मेरे ब्लॉग की कोई सूचना या वोट तो नहीं है। ब्लॉग लिखना बहुत अच्छा लगता है। पर उसके ज्यादा खुशी होती है उसके बारे में वोट या कमेंट्स पढ़ कर। मैं अपने इस लोभ को रोक नहीं पाई। फोन हाथों में ले कर देखा। मैसेंजर पर किसी का मैसज था। फेसबुक पर भी आमंत्रण था। नाम तो जाना पहचाना था, पर सरनेम कुछ अलग था।

यही विरोधाभास है हमारे यहाँ। लड़कों के नाम तो ज्यों के त्यों रहते है। पर लड़कियों को अपने परिचय में कुछ नया जोड़ना पड़ता है शादी के बाद। मुझे पूरा नाम पढ़ कर ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा था। मानव स्वभाव भी बड़ा विचित्र होता है। अक्सर हमें आधी अधूरी कहानियां ज्यादा परेशान करती है। हमारी पूरी कहानी जानने की चाह का फायदा टीवी सीरियल वाले भी उठाते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। मेरे आधी याद ने मेरा पूरा ध्यान उधर ही खींच लिया। यह किसका मैसेज है? दिमाग में यह बात घूमने लगी।

निर्णय नहीं ले पा रहीं थी। जीत अधूरे टीवी कार्यक्रम की होगी या अधूरी याद की। आखिरकार मैंने फेसबुक देखा। आँखों के आगे लाभग 36 वर्ष पुराने दिन घूमने लगे। यह तो लिली है। हम दोनों ने बचपन का बहुत खूबसूरत समय साथ गुजारा था। हम एक ही कॉलोनी में रहते थे। हमारे घर आमने सामने था। हमारे पारिवारिक संबंध थे। साथ में खेलना कूदना और समय बिताना। हमने ना जाने कितनी होली साथ खेली थीं, और दुर्गा पूजा के कार्यक्रम इकट्ठे मनाये । ढेरो मीठी यादों ने घेर लिया।

मेरे पिता के तबादले के बाद हमलोगों का साथ छूट गया था। हमारी शादियाँ हो गई। हमारे उपनाम बदल गए। परिवार और बच्चों में उलझ कर हमारी जिंदगी तेज़ी से आगे बढ़ गई। किसी जरिये से उसे मेरे बारे में मालूम हुआ था। तभी लिली का फोन आ गया। उसकी आवाज़ में उत्साह और खुशी झलक रही थी। हम बड़े देर तक भूली- बिसरी यादों को बताते, दोहराते रहे।

बचपन का साथ और यादें इतनी मधुर होती है।यह तभी मैंने महसूस किया। सचमुच बड़ा मार्मिक क्षण था वह। आज इतने समय के बाद हमारी बातें हो रहीं थी। जब हमारे बच्चे बड़े हो चुके है। दुनिया बहुत बदल चुकी है। पर बचपन का वह साथ आज भी मन में उल्लास भर देता है।

वसीयत और नसीहत

एक दौलतमंद इंसान ने अपने बेटे को वसीयत देते हुए कहा – मेरे मरने के बाद मेरे पैरों में ये फटे हुऐ मोज़े (जुराबें) पहना देना, मेरी यह कामना जरूर पूरी करना ।

पिता के मरते ही नहलाने के बाद, बेटे ने पंडितजी से पिता की आखरी कामना बताई । पंडितजी ने कहा: हमारे धर्म में कुछ भी पहनाने े की प्रथा नहीं है. पर पुत्र की ज़िद थी कि पिता की आखरी कामना पूरी हो ।

बहस इतनी बढ़ गई की शहर के पंडितों को जमा किया गया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला । तभी एक व्यक्ति आया, और आकर बेटे के हाथ में पिता का लिखा हुआ खत दिया, जिस में पिता की नसीहत लिखी थी.

मेरे प्यारे बेट

देख रहे हो..? दौलत, बंगला, गाड़ी और बड़ी-बड़ी फैक्ट्री और फॉर्म हाउस के बाद भी, मैं एक फटा हुआ मोजा तक नहीं ले जा सकता । एक रोज़ तुम्हें भी मृत्यु आएगी, आगाह हो जाओ, तुम्हें भी एक सफ़ेद कपडे में ही जाना पड़ेगा ।

लिहाज़ा कोशिश करना,पैसों के लिए किसी को दुःख मत देना, ग़लत तरीक़े से पैसा ना कमाना, धन को धर्म के कार्य में ही लगाना

सबको यह जानने का हक है कि शरीर छूटने के बाद सिर्फ कर्म ही साथ जाएंगे”। लेकिन फिर भी आदमी तब तक धन के पीछे भागता रहता है जब तक उसका निधन नहीं हो जाता।

1) जो आपसे दिल से बात करता है उसे कभी दिमाग से जवाब मत देना

2) एक साल मे 50 मित्र बनाना आम बात है। 50 साल तक एक मित्र से मित्रता निभाना खास बात है।

3) एक वक्त था जब हम सोचते थे कि हमारा भी वक्त आएगा और एक ये वक्त है कि हम सोचते हैं कि वो भी क्या वक्त था।

4) एक मिनट मे जिन्दगी नहीं बदलती पर एक मिनट सोच कर लिखा फैसला पूरी जिन्दगी बदल देता है।

5) आप जीवन में कितने भी ऊॅचे क्यों न उठ जाएं, पर अपनी गरीबी और कठिनाई को कभी मत भूलिए।

6) वाणी में भी अजीब शक्ति होती है। कड़वा बोलने वाले का शहद भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्ची भी बिक जाती है।

7) जीवन में सबसे बड़ी खुशी उस काम को करने में है जिसे लोग कहते हैं कि तुम नही कर सकते हो।

8) इंसान एक दुकान है और जुबान उसका ताला। ताला खुलता है, तभी मालूम होता है कि दुकान सोने की है या कोयले की।

9) कामयाब होने के लिए जिन्दगी में कुछ ऐसा काम करो कि लोग आपका नाम Face book पे नही Google पे सर्च करें।

10) दुनिया विरोध करे तुम डरो मत, क्योंकि जिस पेङ पर फल लगते है दुनिया उसे ही पत्थर मारती है।

11) जीत और हार आपकी सोच पर ही निर्भर है। मान लो तो हार होगी और ठान लो तो जीत होगी।

12) दुनिया की सबसे सस्ती चीज है सलाह, एक से मांगो हजारो से मिलती है। सहयोग हजारों से मांगो एक से मिलता है।

3) मैने धन से कहा कि तुम एक कागज के टुकड़े हो। धन मुस्कराया और बोला बिल्कुल मैं एक कागज का टुकड़ा हूँ, लेकिन मैने आज तक जिंदगी में कूड़ेदान का मुंह नहीं देखा।

14) आंधियों ने लाख बढ़ाया हौसला धूल का, दो बूंद बारिश ने औकात बता दी।

15) जब एक रोटी के चार टुकड़े हों और खाने वाले पांच हों, तब मुझे भूख नहीं है, ऐसा कहने वाला कौन है.? सिर्फ “माँ”।

16) जब लोग आपकी नकल करने लगें तो समझ लेना चाहिए कि आप जीवन में सफल हो रहे हैं।

17) मत फेंक पत्थर पानी में, उसे भी कोई पीता है।

धोखा (कहानी)

सुषमा बड़ी साधारण सी लड़की थी. बदसूरत तो नहीँ कहेंगे. पर सुंदरता के भी कोई विशेष चिन्ह नहीँ थे उसमे. चपटी और आगे से फैली नासिका ने चेहरे को थोड़ा और बिगाड़ दिया था.

अचानक ही एक दिन बड़े अच्छे परिवार से रिश्ता आया. सब हैरान थे. चट मँगनी और पट ब्याह हो गया. बारात और दूल्हे को देख सुषमा की साखियां, रिश्तेदा और मुहल्ला रश्क़ से बोल उठा – सब इतना अच्छा है. तो क्या हुआ , लड़का तो बेरोजगार ही है ना ?

ससुराल पहुँच कर सुषमा भी वहाँ की रौनक देख बौरा गई. उसे अपने सौभाग्य पर विश्वाश ही नहीँ हो रहा था. पति भी उसके पीछे दीवाना हुआ उसके चारो और लट्टू की तरह घूमता रहता. कभी बाज़ार घुमाता कभी सिनेमा दिखलाता. सास नवेली बहू कह कर उसे कुछ काम नहीँ करने देती. देवर और जेठ भी लाड बरसाते. उसे लगता , यह सब सपना तो नहीँ है ?

हाँ , दो पुत्रियों की माता , उसकी जेठानी ज़रूर थोड़ी उखड़ी -उखड़ी रहती. पर वह रसोई और बेटियों मॆं ही ज्यादा उलझी रहती. कभी उनकी दोनों प्यारी -प्यारी बेटियाँ छोटी माँ – छोटी माँ करती हुई उसके पास पहुँच जाती. ऐसे में एक दिन जेठानी भी उनके पीछे -पीछे उसके कमरे मॆं आ गई. कुछ अजीब सी दृष्टि से उसे देखती हुई बोल पड़ी -” क्यों जी , दिन भर कमरे मॆं जी नहीँ घबराता ? जानती हो … ” वह कुछ कहना चाह रहीं थी.

अभी जेठानी की बात अधूरी ही थी. तभी उसकी सास कमरे में पहुँच गई. बड़ी नाराजगी से बड़ी बहू से कहने लगी -” सुषमा को परेशान ना करो. नई बहू है. हाथों की मेहन्दी भी नहीँ छूटी है. घर के काम मैं इससे सवा महीने तक नहीँ करवाऊगी. यह तुम्हारे जैसे बड़े घर की नहीँ है. पर मुन्ना की पसंद है.” सुषमा का दिल सास का बड़प्पन देख भर आया.

नाग पंचमी का दिन था. सुषमा पति के साथ मंदिर से लौटते समय गोलगप्पे खाने और सावन के रिमझिम फुहार मॆं भीगने पति को भी खींच लाई. जब गाना गुनगुनाते अध भीगे कपडों में सुषमा ने घर में प्रवेश किया. तभी सास गरज उठी -“यह क्या किया ? पानी मॆं भींगने से मुन्ना की तबियत खराब हो जाती है.” वे दवा का डब्बा उठा लाईं. जल्दी-जल्दी कुछ दवाईया देने लगी. सुषमा हैरान थी. ज़रा सा भीगने से सासू माँ इतना नाराज़ क्यों हो गई ?

शाम होते ही उसके पति को तेज़ पेट दर्द और ज्वर हो गया. सास उससे बड़ी नाराज थीं. पारिवारिक , उम्रदराज डाक्टर आये. वह डाक्टर साहब के लिये चाय ले कर कमरे के द्वार पर पहुँची. अंदर हो रही बातें सुनकर सन्न रह गई. डाक्टर सास से धीमी आवाज़ मॆं कह रहे थे – लास्ट स्टेज में यह बदपरहेजी ठीक नहीँ है. आपको मैंने इसकी शादी करने से भी रोका था.

 

सुषमा के आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा. लगा जैसे चक्कर खा कर गिर जायेगी. तभी न जाने कहाँ से आ कर जेठानी ने उसे सहारा दिया. उसे बगल के कमरे में खींच कर ले गई. उन्होने फुसफुसाते हुए बताया , उसके पति को कैंसर है. इस बात को छुपा कर उससे विवाह करवाया गया. ताकि उसका पति मरने से पहले गृहस्थ सुख भोग ले.

सास ने सिर्फ अपने बेटे के बारे में सोचा. पर उसका क्या होगा ? पति से उसे वितृष्णा होने लगी. ऐसे सुख की क्या लालसा , जिसमे दूसरे को सिर्फ भोग्या समझा जाये. तभी सास उसे पुकारती हुई आई – ” सुषमा….सुषमा..तुम्हें मुन्ना बुला रहा है. जल्दी चलो. वह भारी मन से कमरे के द्वार पर जा खड़ी हुई.।

बिस्तर पर उसका पति जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था. पीडा से ओठ नीले पड गये थे. सुषमा ने कभी मौत को इतने करीब से नहीँ देखा था. घबराहट से उसके क़दम वही थम गये. तभी अचानक उसके पति का शरीर पीडा से ऐंठ गया और आँखों की पुतलिया पलट गई.

 

सास जलती नज़रों से उसे देख कर बुदबुदा उठी – भाग्यहीन , मनहूस, मेरे बेटे को खा गई. उससे लाड़ करनेवाला ससुराल , और उसे प्यार से पान के पत्ते जैसा फेरने वाली सास पल भर में बदल गये. सास हर समय कुछ ना कुछ उलाहना देती रहती.सुषमा प्रस्तर पाषाण प्रतिमा बन कर रह गई. उसके बाद सुषमा को कुछ सुध ना रहा. सास ने ठीक तेरहवीं के दिन, सफेद साड़ी में, सारे गहने उतरवा कर घर के पुराने ड्राइवर के साथ उसे उसके मैके भेज दिया.

सुषमा की माँ ने दरवाजा खोला. सुषमा द्वार पर वैधव्य बोझ से सिर झुकाये खड़ी थी. वह सचमुच पत्थर बन गई थी. वह पूरा दिन किसी अँधेरे कोने मॆं बैठी रहती. सास के कहे शब्द उसके मन – मस्तिष्क में जैसे नाचते रहते – भाग्यहीन, मनहूस…. उसका पूरा परिवार सदमें मॆं था. तभी एक और झटका लगा. पता चला सुषमा माँ बनने वाली हैं.

तब सुषमा के पिता ने कमर कस लिया. वैसी हालत में ही सुषमा का दाखिल तुरंत नर्सिंग की पढाई के लिये पारा मेडिकल कॉलेज में करवा दिया. सुषमा बस कठपुतली की तरह उनके कहे अनुसार काम करते रहती. उसके पापा हर रोज़ अपनी झुकती जा रही कमर सीधी करते हुए, बच्चों की तरह उसका हाथ पकड़ कर कालेज ले जाते और छुट्टी के समय उसे लेने गेट पर खड़े मिलते.

मई की तपती गर्मी में सुषमा के पुत्र ने जन्म लिया. सुषमा अनमने ढंग से बच्चे की देखभाल करती. कहते हैं, समय सबसे बड़ा मरहम होता है. सुषमा के घाव भी भरने लगे थे. पर पुत्र की और से उसका मन उचाट रहता. जिस समय ने उसके घाव भरे थे. उसी बीतते समय ने उसके वृद्ध होते पिता को तोड़ दिया था. ऊपर से शांत दिखने वाले पिता के दिल में उठते ज्वार-भाटे ने उन्हें दिल के दौरे से अस्पताल पहुँचा दिया. अडिग चट्टान जैसा सहारा देने वाले अपने पिता को कमजोर पड़ते देख सुषमा जैसी नींद से जागी. उसने पिता की रात दिन सेवा शुरू कर दी.

पिता की तबियत अब काफी ठीक लग रही थी. उनके चेहरे पर वापस लौटती रंगत देख सुषमा आश्वस्त हो गई. वह रात में पापा के अस्पताल के बेड के बगल के सोफे पर ही सोती थी. वह पुनम की रात थी. खिड़की से दमकते चाँद की चाँदनी कमरे के अंदर तक बिखर गई थी. तभी पापा ने उसे अपने पास बुला कर बिठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले बोले -” बेटा, तुम्हे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मज़बूती से….समझी ?

सुषमा ने हिचकते हुए जवाब दिया -” मेरे जैसी भाग्यहीन… ” पिता ने उसकी बात काटते हुए कहा – “तुम भग्यहीन नहीँ हो.बस एक धोखे और दुर्घटना की शिकार हो. जिसमें गलती तुम्हारी नहीँ , मेरी थी. अक्सर मुझे पश्चाताप होता है. तुम्हारी शादी करने से पहले मुझे और छानबीन करनी चहिये थी.”

भीगे नेत्रों से उन्हों ने अपनी बात आगे बढाई -“पर जानती हो बिटिया, असल गुनाहगार धोखा देनेवाले लोग है. एक बात और बेटा, तुम इसका प्रतिशोध अपने पुत्र से नहीँ ले सकती हो. उसका ख्याल तुम्हें ही रखना है.” थोड़ा मौन रह कर उसके नेत्रों में देखते हुए पिता ने कहा – “भाग्यहीन तुम नहीँ तुम्हारी सास है. बेटे को तो गंवाया ही. बहू और पोते को भी गँवा दिया. पर कभी ना कभी ईश्वर उन्हें उनकी गलतियों का आईना ज़रूर दिखायेगा. ईश्वर के न्याय पर मुझे पूर्ण विश्वाश हैं.”

पापा से बातें कर सुषमा को लगा जैसे उसके सीने पर से भारी बोझ उतर गया. पढाई करके उसे शहर के एक अच्छे अस्पताल में नौकरी मिल गई. वह बेटे के साथ खेल कर अपना दुःख भूल खिलखिलाने लगी । किसी न किसी से उसे अपने ससुराल की ख़बरें मिलती रहती. देवर की शादी और उसे बेटी होने की खबरें मिली. पर सुषमा को ससुरालवालों ने कभी उसे याद नहीँ किया. सुषमा ने भी पीछे मुड़ कर देखने के बदले अपने आप को और बेटे को सम्भालने पर ध्यान दिया.

उस दिन सुषमा अस्पताल पहुँची. वह आईसीयू के सामने से गुजर रही थी. तभी सामने देवर और जेठ आ खडे हुए. पता चला सास बीमार है. इसी अस्पताल में भर्ती हैं. उन्हें इस बात का बहुत ग़म है कि सुषमा के पुत्र के अलावा उन्हें पोता नहीँ सिर्फ पोतिया ही है. अब वह सुषमा और उसके बेटे को याद करते रहती हैं. एक बार पोते क मुँह देखना चाहती हैं.

देवर ने कहा – “भाभी, बस एक बार मुन्ना भैया के बेटे को अम्मा के पास ले आओ. सुना है बिल्कुल भैया जैसा है. ” तभी जेठ बोल पड़े – सुषमा , मैं तो कहता हूँ. अब तुम हमारे साथ रहने आ जाओ. मैं कल सुबह ही तुम्हे लेने आ जाता हूँ. सुषमा बिना कुछ जवाब दिये अपनी ड्यूटी कक्ष में चली गई.वह उनकी बेशर्मी देख वह अवाक थी. वह चुपचाप अपना काम कर रहीं थी. पर उसके माथे पर पड़े शिकन से स्पष्ट था, उसके मन में बहुत सी बातो का तूफान चल रहा हैं.

वह सोंच रहीं थी , पहले तो उसे खिलौना समझ मरनासन्न पुत्र की कामना पूरी करने के लिये धोखे से विवाह करवाया. बाद में दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंक दिया. आज़ अपनी पौत्रियों को पौत्र से कम आँका जा रहा है. क्योंकि वे लड़कियाँ हैं. अच्छा है वह आज़ ऐसे ओछे परिवार का हिस्सा नहीँ है. क्या उसके पुत्र को ऐसे लोगों के साथ रख कर उन जैसा बनने देना चाहिये ? बिल्कुल नहीँ. वह ऐसा नहीँ होने देगी. मन ही मन उसने कुछ निर्णय लिया. घर जाने से पहले उसने छुट्टी की अर्जी दी.

उसी रात को वह ट्रेन से बेटे को ले कर निकट के दूसरे शहर चली गई. वहाँ के अच्छे बोर्डिंग स्कूल में बेटे का नाम लिखवा दिया. काफी समय से बेटे का दाखिला इस स्कूल में करवाने का मन बना रहीं थी. वह तीन -चार दिनों के बाद वापस घर लौटी.अगले दिन अस्पताल के सामने ही देवर मिल गया. उसे देख कर लपकता हुआ आया और बोल पड़ा -भाभी , अम्मा की तबियत और बिगड़ गई हैं. आप कहाँ थी ?

सुषमा चुपचाप हेड मेट्रन के कमरे में अपनी ड्यूटी मालूम करने चली गई. उस दिन उसकी ड्यूटी उसके सास के कमरे में थी. वह कमरे में जा कर दवाईया देने लगी. सास उसके बेटे के बारे में पूछने लगी. सुषमा ने शालीनता से कहा – “ईश्वर ने आपके घर इतनी कन्याओं को इसलिये भेजा हैं ताकि आप उनका सम्मान करें. जब तक आप यह नहीँ सीखेंगी , तब तक आप अपने इकलौते पौत्र का मुँह नहीँ देख सकतीं.”

सास क चेहरा तमतमा गया. लाल और गुस्से भरी आँखों से उसे घुरते हुए बोल पड़ी – “भाग्यहीन .. तुम धोखा कर रहीं हो , मेरे पौत्र को छुपा कर नहीँ रख सकतीं हो. lतुम्हारे जैसी मामूली लड़की की औकात नहीँ थी मेरे घर की बहू बनने की…” सुषमा ने उनकी बात बीच में काटते हुए कहा “भाग्यहीन मैं नहीँ आप हैं. सब पा कर भी खो दिया. आपने मुझे धोखा दिया पर भगवान को धोखा दे पाई क्या ? आपको क्या लगता हैं एक सामान्य और मामूली लड़की का दिल नहीँ होता हैं ? उसे दुख तकलीफ़ की अनुभूति नहीँ होती? एक बात और हैं, देखिये आज़ आपको मेरे जैसी मामूली लड़की के सामने इतना अनुनय – विनय करना पड रहा है.”

अगली सुबह सास के कमरे के आगे भीड़ देख तेज़ कदमों से वहाँ पहुँची. पता चला अभी -अभी दिल का दौरा पड़ने से सास गुजर गई. पास खडे अस्पताल के वार्ड बॉय को कहते सुना -” दिल की मरीज थीं. कितनी बार डाक्टर साहब ने ने इन्हें शांत रहने की सलाह दी थी. अभी भी ये अपनी बहुओं को बेटा ना पैदा करने के लिये जोर – जोर से कोस रहीं थीं. उससे ही तेज़ दिल का दौरा पड़ा.”

सुषमा ने पापा को फोन कर सास के गुजरने की ख़बर दी. वह आफिस में माथे पर हाथ रखे बैठी सोंचा में डूबी थी -पौत्र से भेंट ना करा कर उसने गलती कर दी क्या ? तभी पीछे से पापा की आवाज़ आई – ” सुषमा, जिसके पास सब कुछ हो फ़िर भी खुश ना हो. यह उसकी नियति हैं. यह ईश्वर की मर्जी और न्याय हैं.”

हमारे समाज में जब नारी की चर्चा होती है या विवाह की बातें होती हैं। तब विषय अक्सर उसका रुप -रंग होता है। विरले हीं कोई नारी की योग्यता को प्राथमिकता देता है। क्या नारी सिर्फ भोग्या रहेगी?

Speak…don’t just talk!

Amazing Facts of India….

How to find Satisfaction

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Satisfaction, the feeling of achieving your life’s goal. This world currently lacks satisfaction as the growing mankind blinds nature making it’s way through nature’s loss.

Now, how shall one find his or her satisfaction in this world where everything runs on trend:

  1. Peace with what you own.

Now many of you are thinking people with old stuff and people who aren’t changing their stuff are outdated. That isn’t the real fact. The fact is that they have found a way to attain satisfaction. Achieving satisfaction isn’t easy but the one who has attained it has made is hard and tough life into living paradise. Achieving satisfaction is like becoming a ninja. You have to find your way through a race where people are running for one single thing.

2000px-Peace_sign.svg2.Mind should be the master of your body

This is a very tough thing to do as the the current period trend…

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A re-blogged post —First Blog

One where Mystery turns History