Psychology #understandyourbehavior /मनोविज्ञान #अपने व्यवहार को समझने का विज्ञान

 

 

मनोविज्ञान – क्या यह मन का विज्ञान है?  इसके नाम से लगता हे, जैसे यह मन का विज्ञान है।  यह अनुभव अौर व्यवहार का विज्ञान है। यह एक एेसा विषय है जो हमारे व्यवहार को समझने में मदद करता है। यह हमारी मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों अौर  व्यवहार का अध्ययन करता है। हम कब, क्या , क्यों, अौर कैसे य्यवहार करते हैं। इसे समझने का  विज्ञान है।

आज के समय में मनोविज्ञान बङा महत्वपुर्ण  हो गया है। यह  विज्ञापन, व्यावसाय, लोगों के  प्रतिक्रियाओं, जनमत या बाजार का रुझान,  खेल अौर खिलाङियों , अपराध का व्यवहार सब कुछ समझने के काम आता है।

क्यों नहीं अपने व्यवहार को समझा जाये?– विचार, चिन्तन, भाव ,आसपास के वातावरण अौर घटनाअों का असर हम पर पङता है। हमारा व्यक्तित्व , बौद्भिकता, संवेदन, सीखना, स्मृति, चिन्तन  हमारे व्यवहार पर असर ङालतें हैं। दरअसल,  हमारे व्यवहार एवं मानसिक प्रक्रियाएं आपस में जुटे होते  हैं। अतः अपने  व्यक्तित्व  को समझना जरुरी है।  ताकि अपने व्यवहार को समझा जा सके।

 

 

 

 

 श्वास –प्रश्वास का महत्व

 

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 साँसो की मदद से रक्तशोधन, अंगों का पुष्ट होना, शरीर में आक्सीजन की मात्रा और ऊर्जा में वृद्धि जैसी बातें हम सभी जानते हैं। श्वास रोग के मनोवैज्ञानिक कारणों से भी होते हैं।  

हमारी अनेक बीमारियाँ साईकोसोमैटिक होती है। साईकोसोमैटिक का मतलब होता है मन की परेशानियाँ शारीरिक बीमारी का रूप ले लेती है। मतलब बीमारी का कोई शारीरिक कारण नहीं होता है, बल्कि मानसिक कारणों से ये बीमारियाँ होती है। चिंता, परेशानी या घबराहट जैसी स्थिति में साँसों का तेज़ चलना, साँस न ले पाना, साँस अटकना या दम फूलना इसका उदाहरण है। पर जब ये परेशानियाँ बढ़ कर बीमारी बन जाती है । तब इलाज की जरूरत पड़ती है।ऐसी साईकोसोमैटिक बीमारियों का सबसे अच्छा और स्वाभाविक इलाज है गहरा, लंबा साँस या प्राणायाम। प्राणायाम रोगों के उपचार में  सहायता करने  के साथ हमारे अंदर  शक्ति भी जगाता है।

 गुलाब के फूलों का क्या वजन होता है ? यह वजन फूलों से ज्यादा मतलब रखता है कि हमने इसे कितने देर  के लिए थाम रखा है। कुछ पलों या मिनटों  के लिए थामना हो तो ये फूल, फूलों जैसे हल्के लगेंगे। अगर कुछ घंटे पकड़ना हो तो थोड़े भारी लगेंगे अगर कुछ दिनों तक थामना हो तब बहुत भारी लगेंगे। जब नाजुक, खुबसूरत फूल भी थामे रखने से भारी लगते है। तब सोचिए,  अगर हम अपनी चिंताओं, तनाव,  विचारों और परेशानियों को थामे रहें तो ये कितने भारी पड़ते होंगे हमारे मन पर। इसलिए इन चिंताओं, तनाव,  विचारों को हमारे  जीवन में आते-जाते रहने देना चाहिए। साँसें भी हमे यही सिखाती है। किसी परेशानी को पकड़ो मत। साँसों की तरह आने जाने दो।

 विज्ञान, मनोविज्ञान और आध्यात्म, तीनों के अनुसार हम सभी के अंदर अपार  मानसिक और शारीरिक  क्षमता संचित  है। जो सुप्त या सोई अवस्था में है। हम उस शक्ति  का बहुत कम  हिस्सा उपयोग में लाते है। अगर हम अपने अंदर की शक्ति या क्षमता के थोड़े  हिस्से से इतना कुछ कर रहे है। तब सोचिए, अगर हम अपनी  क्षमता बढ़ा लें तब हम  कितना कुछ कर सकते है? हमें इसे बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। जिस से हम अपनी चिंताओं, तनाव,  विचारों, परेशानियों का सामना सही तरीके से कर सकें।   

 विज्ञान के अनुसार हमारा मस्तिष्क दाहिना और बायाँ दो हेमीस्फेयर में  बाँटा है। हम प्रायः किसी एक हिस्से को ज्यादा काम में लाते है।

 मनोविज्ञान के मुताबिक मस्तिष्क तीन स्तरों पर काम करता है- चेतन, अवचेतन और अचेतन। अचेतन मन लगभग 70 प्रतिशत है। यह मन का  सबसे बड़ा हिस्सा है । इस पर हमारा नियंत्रण न के बराबर है। मतलब हम लगभग 30  प्रतिशत दिमाग ही नियंत्रित करते हैं और उपयोग में लाते हैं।

 आध्यात्म के अनुसार हमारे अंदर सात चक्र है। जिनमे विभिन्न  शक्तियाँ संचित है। इसे  कुंडलनी शक्ति के नाम से जाना जाता है। जो शक्ति सोई है।  

अर्थात विज्ञान, मनोविज्ञान और आध्यात्म तीनों मानते है कि मनुष्य में बहुत  शक्ति और सामर्थ्य  है। जिसका काफी कम हिस्सा ही हम अपने काम मे लाते है। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या  हम अपनी इस संचित शक्ति को  जागृत कर सकते है ? इसका जवाब किसी  विज्ञान या  मनोविज्ञान के पास नहीं है।

पर हमारे विद्वान मनीषियों, ज्ञानी जनों  और संत- महात्माओं के पास इसका उत्तर उपलब्ध है, योग और प्राणायाम के रूप में। प्राचीन काल से  विद्वान जन योगाभ्यास की सहायता से इसे जागृत करते रहे हैं। यह ज्ञान आज भी हमारे पास है। इसे जागृत करने में योग और प्राणायाम महत्वपूर्ण है।

साँस हमारे जीवन का आधार है। पर जब हम इसे सुनिश्चित तरीके से प्राणायाम के रूप में  साँस लेते है तब यह बहुत लाभदायक हो जाता है। जब हम दाहिनी नासिका से साँस लेते है तब इड़ा नाड़ी और बाईं नासिका के साँस से पिंगला नाड़ी काम करती है। दोनों नासिका से सही और समान रूप से साँस लेने से  दोनों नाड़ियों  समान रूप से चलने लगती हैं। जिससे हमारी तीसरी महत्वपूर्ण नाड़ी सुषुम्ना काम करने लगती है। यह नाड़ी सातों चक्रों को बेधती हुई कपाल पर स्थित  सहस्त्रार चक्र तक जाती है। अर्थात यह सभी चक्रो को जागृत या एक्टिव करती है। सभी चक्रों में विभिन्न ऊर्जा  संचित होती है। इन शक्तियों के जागरण से व्यक्ति में  मानसिक, शारीरिक  और  आध्यात्मिक संतुलन का विकास होता है साथ ही विभिन्न कला में निपुणता आती है जैसे गायन, वाचन, वादन, संगीत, चित्रकारिता, लेखन, बौद्धिकता  आदि ।  

हमारे अंदर की अपार शक्ति को  श्वास –प्रश्वास या प्राणायाम  से जागृत कर काम में लाया जा सकता  हैं। ठीक वैसे, जैसे बिजली के सभी फिटिंग्स  बिजली या विद्धुत प्रवाह से काम में लाये जा सकते  हैं। इसलिए साँसों के महत्व को समझते हुए हमें नियमित प्राणायाम करना चाहिए। जिससे शारीरिक और मानसिक समस्याओं के उपचार के साथ हमारा  आध्यात्मिक विकास भी होता है।  श्वास  रोग का उपचार श्वासों मे ही छुपा है।    

                       साँस तो हम लेते है। हर दिन हर पल ।

                             क्यों नहीं लेते इसे प्यार से,

                         साँस लीजिये, खुलकर साँस लीजिये।

                         आती जाती इन साँस की लहरों को

                           बस नियम में बांध लीजिये,

                            देखिए फिर इनका जादू ।

 

 

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Karn n Pandavas -Were they Designer babies ?

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A designer baby is to create desired traits in a child. Today genetic engineers and scientists are working on this.

The six  brothers  five pandavas and Karan of mahabharat had specific qualities. Yudhisthir was most honest, Bhim strongest, Arjun most skilled, Nakul most handsome and Sahadev was most knowledgeable of all. Similarly, Greatest warrior, Karn was born with armour and earring and had qualities of Sun God. 

Their mother Kunti was granted a boon by sage Durvasa. So she was able to get babies from any God she desired. As a result, all her sons had different qualities.

Were all of them genetically designed? Were all of them designer babies ?

 

 

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साया भी जब साथ छोङ दे

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कभी देखा है,

जब साया भी

साथ छोङ दे?

कहते हैं, बुरे दिनों में

छाया  भी साथ छोङ देती है।

अगर, आज साया ना दिखे,

ङरो नहीं

आज  तो छायाविहिन दिवास है।

 

 

 

 

 

 

 

( छायाविहिन दिवस /नो शैङौ या जीरो शैङो  ङे १६-५-२०१६ पर )

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ऑनर किलिंग, क्यों ?

क्या कर्ण और पांडव डिजाइनर बेबी थे ?

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आजकल जेनेटिक विज्ञान और वैज्ञानिक डिजाइनर  बेबी के विषय पर शोध कर रहे है. जिस से मनचाहे गुणों वाली संतान प्राप्त की  जा सके.

 

महाभारत में ऐसे संतति प्राप्ति के उदाहरण मिलते  है. महान योद्धा कर्ण, सूर्य के गुणों वाले थे. धर्म संरक्षक युधिष्ठिर धर्मराज यम  के समान गुणवान  थे. बलशाली भीम  वायु देव के समान थे. धनुर्धारी अर्जुन में देवराज इन्द्र के गुण थे. इसी प्रकार जुड़वा भाई सुदर्शन नकुल  और ज्ञानवान सहदेव में देवताओं के  राज़ वैध,  जुड़वा भाई अश्विनी कुमार  के गुण थे.

महाभारत कथानुसार, इनकी माता कुंती को दुर्वासा मुनि से मनचाहे देव से संतान प्राप्ति का वरदान मिला था. 

आज वैज्ञानिक  जिस डिज़ाइनर बेबी पर शोध कर रहे है. यह उसका  ज्वलंत उदाहरण है. तब क्या यह विद्या हमारे प्राचीन ऋषियों को ज्ञात था ? क्या उपरोक्त सभी डिज़ाइनर बेबी थे?

 

 

 

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#Honey Diet अम्बरिय मधुर आहार – मधु

 

त्रिदोष नाशक शहद को अमृततुल्य माना गया है। लगभग सभी धर्मों में किसी ना किसी रूप में मधु के उपयोगिता की चर्चा की गई है। हिन्दु धर्म के सभी धार्मिक अवसरों पर प्राय इसे उपयोग में लाया जाता है। इस्लाम में इसे सर्वरोग निवारक माना गया है। यूनानी और यहूदी धर्मों में शहद को अतिमूल्यवान और स्वस्थवर्धक कहा गया है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा शास्त्र शहद को ऊर्जादायक और स्वास्थवर्धक मानता है। महत्वपूर्ण आहार और खाने-पीने  की चीज़ों को धर्मों के साथ इसलिए जोड़ा जाता है, ताकि हम सभी उसका उपयोग किसी ना किसी रूप में हमेशा करते रहें।

उत्पादन– शहद प्रकृतिक प्रदत, खुबसूरत पुष्पों से प्राप्त होता है। मधुमक्खियाँ फूलों के रसों से मधु का निर्माण करती हैं। अक्सर मधुमक्खियाँ छत्ते बना कर  उसमें शहद जमा करती हैं। साथ ही मधुमक्खियों का पालन कर के  भी शहद प्राप्त किया जाता है।

रूप रंग स्वाद – यह हल्के या गहरे खुबसूरत अंबरी रंग का होता है। इसकी अपनी एक खुशबू होती है। इसकी खुशबु पुष्प स्रोत पर भी  निर्भर करती है। यह मीठा और हल्का सा कसाय स्वाद का होता है।

औषधिय उपयोग – यह रक्तवर्धक, ऊर्जादायक, संक्रमण कम करने वाला होता है। घाव, सूजन, दर्द और जलने में इसका उपयोग बड़ा फायदेमंद होता है। यह पाचन क्रिया में मदद करता है।

सौंदर्य वर्धक – सौंदर्यवर्धन में  शहद बहुत लाभदायक  होता है। यह विभिन्न सौंदर्य उत्पादनों और फेसियलों आदि  में काम में लाया जाता है। यह त्वचा को नमी प्रदान कर युवा बनाता है।

आहार के रूप में उपयोग – हमारे देश में मधु ज़्यादातर औषधि के रूप में प्रयुक्त होता रहा है। अब इसे आहार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। चीनी के स्थान पर शहद का प्रयोग ज्यादा फायदेमंद है अतः  आज कल चीनी के स्थान पर शहद का प्रचलन बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव
मेरे जीवन में शहद किसी ना किसी रूप में हमेशा शामिल रहा है। मेरे दिन की शुरुआत सुबह गुनगुने जल में नींबू और शहद से होती है। यह मेद कम करता है और विजातीय पदार्थ या टॉक्सिन हटाता है। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब उंगली पर पतले मलमल का कपड़ा लपेट कर उसमें शहद लगा कर मैं अपने नवजात शिशु के जीभ और मुँह की  सफाई करती थी। छोटे बच्चों के दाँत निकलने के समय मसूढ़ो पर शहद मालिश करती। जिस से आसानी से दाँत निकलते जाते थे और संक्रामण का भी भय नहीं होता था। शहद के मीठे स्वाद के कारण बच्चे इस उपचार का मज़ा लेते थे। उनके पीने के पानी के साथ कुछ बुँदे शहद देते रहने से यह रक्तवर्धक का काम करता है। हमारे यहाँ रोटी के साथ, सलाद में ड्रेसिंग के रूप में, आइसक्रीम पर कुछ बूंदें, दूध के साथ, चीनी के बदले , मीठे व्यंजनों  के रूप में प्रत्येक दिन भोजन में शहद हमारा साथी रहता है। दरअसल मैं आहार में पोषक तत्वों से समझौता नहीं करना चाहती हूँ।

इतना ही नहीं मैं शहद का प्रयोग चेहरे और आँखों में आँजने के लिए   भी करती हूँ। कुछ देर शहद लगा कर धो देने से त्वचा मुलायम और नमीयुक्त रहती है और आँखें स्वच्छ हो जाती हैं। पर यह आवश्यक है कि शुद्ध, स्वच्छ, साफ और उचित प्रकार से छने  हुए शहद का प्रयोग किया जाय।

पहले शहद बहुत मूल्यवान और अल्प प्राप्य   होता था क्योंकि यह कम मात्रा में उपलब्ध था। तब इसे प्रकृति की देन मानी जाती थी। अतः सामान्य जन तक इसकी पहुँच पूजन सामग्री या औषधि रुप में हीं थी। अक्सर शहद के नाम पर नकली शहद बेची जाती थी। पर अब  मधुमक्खी पालन उद्योग के द्वारा शहद अधिक रूप में तैयार किया जाने लगा है। साथ ही बड़ी-बड़ी भरोसेमंद कंपनियाँ जैसे डाबर द्वारा सर्व साधारण तक शुद्ध और स्वच्छ शहद उपलब्ध कराया जाने लगा है।

http://www.daburhoney.com/

हमारी विरासतों और बीते समय के पद चिन्हों ने हमें तराशा हैं……( एक विचार )

हम में से ज़्यादातर लोग वर्तमान में जीते हैं। भविष्य के सपने सँजोते और योजनाएँ बनाते हैं। बीते हुए समय को अक्सर भुला देते हैं। हम पुरानी बातों को कम महत्व देते हैं। पर यह गौर करने की बात हैं। हम आज जो भी हैं इसमें सबसे ज्यादा महत्व हमारे बीते समय का है। पर हम सभी शायद ही इस बारे में सोचते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है – बीती बातों से हमें वे सीख मिलती है, जो हमे पुरानी गलतियों को करने से रोकती है।

विरासतें – अक्सर विरासत का मतलब पूर्वजों से प्राप्त मकान, जमीन और दौलत जैसी बातों से जोड़ा जाता है। विरासतों को सिर्फ धन-संपाति या जमीन-जायदाद के रूप में देखना सही नहीं है। इसे जीवन के धरोहर के रूप में देखना चाहिए। यानि पुरानी बातों से सीखना चाहिए। वर्तमान में जीना चाहिए और भविष्य के लिए रचना करने की कोशिश करना चाहिए।

स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड — कभी-कभी कुछ लोग कहतें है वे स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड है। बात सही है। पर क्या आज हम जो बने है उसमें हमारी विरासतों का हाथ नहीं है? पुश्त दर पुश्त हम तक बहुत सी बातें, व्यवहार पढ़ाई का प्रभाव हम तक ट्रान्सफर होता है। जिस से हमारे  व्यक्तित्व निर्माण होता है।

विरासतें शक्तिशाली हथियार – हमारी विरासतें ऐसी शक्तिशाली हथियार या औज़ार है । जिस से आगे की जीवन को खूबसूरती से तराशा जा सकता हैं। हमारी विरासतें, धरोहर, परम्पराएँ, संस्कृती, पैतृक प्रभाव इन सब का हम पर असर पड़ता है। जिस से आगे सामाजिक बदलाव और तरक्की लाये जा सकते हैं। हम आज जो हैं और जैसे है, वह व्यक्तित्व इन्ही विरासातों से बना है।

हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि अपने धरोहर या थाती को ठीक-ठीक आगे ले जाएँ। ठीक वैसे जैसे हमें मिला है। हो सके तो इसे चिंतन-मनन और समझदारी से और अच्छा रूप दें। ये विरासतें और थाती हमारे सुनहरे कल का आधार है।

इस लेख पर विचार आमंत्रित है। अपने विचार और सुझाव निसंकोच लिखें।
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हमारा गुस्सा – उपयोगी भी हो सकता है !!! ( एक विचार )

गुस्सा हम सभी में होता हैं. अक्सर हम गुस्सा करते  हैं।  अपने आस – पास हर दिन किसी ना किसी को नाराज़ होते देखते हैं।  यह स्वभाविक व्यवहार हैं।  कहते हैं, बड़े – बड़े ऋषि, मुनि, और विद्वान भी अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीँ रख पाये।

मन में जमे गुस्से के गुबार को बाहर  निकालना ज़रूरी हैं।  मन में भरी बातें अक्सर हम पर नाकारात्मक असर डालती है। पर  इस गुस्से को निकालने का तरीका और जगह ठीक होना चाहिए।  कुछ  लोग छोटी – छोटी बातों  से नाराज़ होते रहते  हैं।हर समय उनमें चिड़चिड़ापन रहता है। जिस से  उनकी नाराज़गी का प्रभाव कम हो जाता हैं।

लेकिन जब हम किसी ना नाराज़ होनेवाले को गुस्से  में देखते  हैं।  तब हम सब सकते में आ जाते हैं।  क्यों ?  क्योंकि जो कभी गुस्सा नहीँ करता, उसका गुस्सा हमें  मालुम नहीँ होता। जिस से उनका गुस्सा ज़्यादा प्रभावशाली बन  जाता हैं।   वैसे लोग  अपने गुस्से के असर का सही उपयोग करना जानते हैं। इसलिए हर छोटी-छोटी बात पर चिढ़ने और नाराज़ होने की आदत को नियंत्रित करना चाहिए। ताकि  सही समय पर और सही जगह पर गुस्सा कर उसे प्रभावशाली बनाया जा सके।

क्रोध को   कला मान कर  सीखने की ज़रूरत हैं।  कौन जाने, शायद  कुछ समय में गुस्से /क्रोध/नाराज़गी  के मैनेजमेंट की पढ़ाई भी शुरू हो जाये।