
अपने


बारिश में काग़ज़ की कश्तियाँ तैराते बच्चे
कल दुनिया के समंदर में ग़ुम हो जाएँगें या
खुद विशाल सागर बन जाएँगें।
तितलियाँ पकड़ते नन्हे फ़रिश्ते
दुनिया में गुमनाम हो जाएँगे या
अपनी सफ़ल दुनिया सज़ायेगें।
बच्चों का बचपना बनता है उनकी ज़िंदगी।
ये बचपन का लम्हा पल में गुज़र जाएगा।
जैसा आज़ देंगे, कल वे वही बन,
वही लौटाएँगें।

कभी ग़ौर किया क्या?
शुक्रिया अदा करते वक्त,
दिल होता है पाक-साफ़।
शिकायतें-शिकवे आते नहीं ज़ेहन में।
एहसानमंद अल्फ़ाज़ों में होती है रूहानियत।
वे नहीं करते दिल दुखाने का गुनाह।
क़ुसूरवार तो होते हैं कड़वे-कृतघ्न दिलों से
निकलते चासनी डूबे, हिजाब ओढ़ें लफ़्ज़।
“Gratitude is the healthiest of all human emotions.”
Zig Ziglar

सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,
याद दिलातीं हैं – बचपन की,
बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।
नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,
पर अब ङूबे हैं जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।
तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।
अब समझदार माँझी
कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा
तलाशता है सुकून-ए-साहिल।
ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,
पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.
देखा है हमने.
हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.
तब भी,
कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,
बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं
मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,
भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.
जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,
अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.