बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में अक्सर हम अपने ननिहाल जाते थे। बरसों बीत गए, पर कुछ खास यादें आज भी ताज़ी हैं। मेरे ननिहाल, में एक अद्भुत छोटा-सा छुपा कमरा था, जिसकी नीची छत को हाथ बढ़ाकर छु सकते थें। उसका दरवाज़ा बाहर से काठ की अलमारी जैसा दिखता था। काली लकड़ी के चौड़े पल्ले खोलते ही नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ थीं, जहाँ झुककर अंदर जाना पड़ता था। वह कमरा मुझे रहस्यमय और जादुई लगता था, मानो किसी काल्पनिक कहानी का हिस्सा हो।
दरअसल, वह अपनी तरह का एक अनोखा पुस्तकालय था। उसमें रखी कई पुस्तकें समय की मार से पीली और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी थीं। कुछ पर धूल की मोटी परत जमी रहती थी। उन पुस्तकों में से कभी-कभी कोई अनोखी किताब मिल जाती। धूल झाड़कर उसे खोलते ही एक अलग-सी गंध आती थी। फिर उसी कमरे के किसी कोने में या लकड़ी की सीढ़ी पर बैठकर किताब पढ़ने में घंटों कैसे बीत जाते, पता ही नहीं चलता था।
यह कमरा घर के गैरेज के ऊपर बना था। उसकी एकमात्र खिड़की सड़क की ओर खुलती थी। उस ज़माने में नानी से रोज़ पाँच पैसे पॉकेट मनी मिलती थी, तब उन संकरी गलियों में पाँच पैसे में बहुत कुछ खरीदा जा सकता था। कभी चीनी की मिठाई, कभी बुढ़िया के गुलाबी बाल। किताबें पढ़ते-पढ़ते खिड़की से खरीदे गए चटपटे पाचक या टॉफियाँ खाने का अपना ही आनंद था।
एक दिन, मुट्ठी में चटपटे पाचक छुपाए मैं उसी पुस्तकालय की ओर जा रही थी। ऊँची पत्थर की सीढ़ियाँ चढ़कर एक छोटे से प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँची ही थी कि ऊपर से नन्हा दीपू तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरता दिखाई दिया।
ननिहाल में मेरे भाइयों को इस तरह दौड़ते-भागते देखना कोई नई बात नहीं थी। सभी को पतंग उड़ाने का ऐसा शौक था कि कटती पतंग के पीछे गलियों में दौड़ पड़ते या नई पतंग खरीदने भाग जाते। पर उस दिन दीपू की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही थी। मुझे लगा कहीं वह मुझसे टकरा न जाए। मैंने झट से उसकी बाँह पकड़ ली।
वह चश्मे के भीतर से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखने लगा। फिर मुस्कुराकर बोला, “मैं नीचे जा रहा था। मेरी गीली चप्पलों से मेरा पैर फिसल गया था। आपने पकड़कर रोक लिया, नहीं तो मैं सीढ़ियों से लुढ़ककर नीचे गिर जाता।”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खिलखिलाकर हँस पड़े। शायद यही बचपन का वह दुधिया भोलापन था, जिसमें आने वाले खतरे की चिंता नहीं होती, केवल वर्तमान का आनंद होता है।
मृत कल और अजन्मे कल का भय क्यों?
गर मौजूदा पल मीठा और मधुर हो।
Dead yesterdays and unborn tomorrows,
why fret about it, if today is sweet.”
― Omar Khayyâm
बहुत ही सुंदर, भावपूर्ण और स्मृतियों से भरा संस्मरण। 🌿
आपने बचपन की मासूमियत, ननिहाल की आत्मीयता और उस छोटे-से पुस्तकालय के जादुई आकर्षण को इतने जीवंत ढंग से चित्रित किया है कि पाठक स्वयं उन सीढ़ियों पर पहुँच जाता है। दीपू के साथ घटा वह छोटा-सा प्रसंग भी जीवन का बड़ा संदेश दे जाता है—वर्तमान में जीने का। आपकी सहज, संवेदनशील और चित्रात्मक लेखनी मन को छू गई।
हार्दिक बधाई और धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिए। 🙏📚✨
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बहुत आभार पढ़ने के लिए और इतने विस्तृत विवेचना के लिए। इस संस्मरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि मैंने अपने उस ममेरे भाई को कोरोना में खो दिया।
दरअसल यह मेरी किताब “वंदना” का एक अंश है। किसी के अनुरोध पर यहाँ पोस्ट किया है।
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आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। यह जानकर मन सचमुच भावुक हो गया कि कोरोना काल में आपने अपने ममेरे भाई को खो दिया। ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को शांति प्रदान करें और आपको तथा आपके परिवार को यह वियोग सहने की शक्ति दें। 🙏
आपकी पुस्तक “वंदना” का यह अंश पढ़कर स्पष्ट होता है कि इसमें केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन के सजीव अनुभव और गहरी संवेदनाएँ समाहित हैं।
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🙏🏻🙏🏻
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सुंदर अभिव्यक्ति 👌👌
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धन्यवाद!
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