
अजीब सी रोक
पंछियों के चहचहाने से गुलजार था सारा माहौल तभी आवाज आई – अपने घरों से तो तुमने हमें निकाल दिया है। अब बेदखल कर रहे हो पेङों से। हम जाएं तो जाएं कहां ? तुम तो बंधे हो बंधन में -देश, सीमा, धर्म, रंग….. हमें तो आजाद रहने दो। अभी पिछले वर्ष तुमने पक्षी या वर्ड्स वर्ष मनाया। अब हमें निकाल रहे हो हमारे घरों से? भूल गये क्या प्रकृति के संतुलन में भी हम महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।





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